भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
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शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 324, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंपुनः इस राह पर आयें और फिर हम अपने पूँजीपतियों के विरुद्ध क्रान्ति करें?
यह अव्वल दर्जे की मूर्खता होगी।
लाला जी ने एक-दो बार दास के शब्द सुन-सुनाकर गाँवों में संगठन की बात
थोड़ी-सी उठायी थी। लाला जी को तो गाँवों में जाने की फुरसत ही नहीं। वे क्या
जानें कि जनता के विचार क्या हैं? लोग साफ़ कहते हैं कि हमें इन्कलाब का क्या
लाभ? जब इसी तरह मर-खपकर दो जून की रोटी जुटनी है और तब भी नम्बरदार,
तहसीलदार और थानेदार को इसी तरह अत्याचार करने हैं, इसी तरह किराये वसूल
किये जाने हैं तो हम अभी की रोटी क्यों गँवाये? किसी के लिए अपने प्रियजनों
को क्यों उलझनों में डालें? हम उन्हें क्या बतायें कि उनके पूर्वज कैसे थे, जिससे
कि वे बलिदान के लिए तैयार हो जायें।
अच्छा, माना कि यहाँ क्रान्ति हो जाये तब लाला जी के विचार से किसे शासन
सौंपा जायेगा? क्या महाराज वर्द्धमान या महाराज पटियाला को और पूँजीपतियों के
टोले को? क्या आज अमेरिका और फ़्रांस के करोड़ों मज़दूर भूखों नहीं मर रहे?
हम सबकुछ जानते-बुझते क्यों कुएँ में गिरें?
लाला जी कहते हैं कि हमारे साम्यवादी विचारों के प्रचार से पूँजीपति सरकार
के साथ मिल जायेंगे। बहुत ख़ूब! पहले वे किधर हैं? कितने पूँजीपति युगान्तरकारी
बने हैं? क्रान्ति से जिन्हें अपनी सम्पत्ति में थोड़ी-बहुत हानि होने का डर होगा वे
हमेशा ही विरोधी हो जाते हैं। ऐसी स्थितियों में उनकी जी-हजूरी के लिए आदर्श
त्यागकर ख़ामखाह अपने कार्य को हानि पहुँचाना उचित नहीं। दूसरी बात यह कि
पूँजीपति ज़रा सोचें कि किस स्थिति में उन्हें लाभ है? आज अंग्रेज़ उन्हें अपने स्वार्थ
के लिए अपने साथ अवश्य मिला लेंगे, लेकिन धीरे-धीरे उनकी पूँजी छीनकर उसे
अपने पूँजीपतियों के हाथों में स्थानान्तरित कर देंगे। तब यह ग़रीब (हो गये
सरमायेदार) आज जैसे करोड़ों मज़दूरों में शामिल होकर मरते-खपते रहेंगे। इन्हें
सामाजिक व्यवस्था में अन्याय दिखायी देगा। अगर वे साम्यवादी क्रान्ति कर लें तो
आज उनकी हरामख़ोरी पर तो ज़रूर रोक लगायी जायेगी लेकिन दुनिया की आम
खुशहाली में जोकि निश्चय ही आनी है, शामिल होकर वे बहुत सुखी रहेंगे।
हिन्दुस्तानी पूँजीपति सोच लें कि उनको किस में लाभ है?
लेकिन मज़दूर-आन्दोलन उनके लिए रुक नहीं सकता, उनकी प्रतीक्षा भी नहीं
कर सकता। नौजवानों को घबराना नहीं चाहिए। काम को आरम्भ करने में बहुत
कठिनाइयाँ पैदा होती हैं, धीरज से मुक़ाबला करना चाहिए। लाला जी और दूसरे
प्रकार के पूँजीवादी नीति वाले नेता भी धीरे-धीरे स्वयं मैदान से बाहर हो रहे हैं,
जिस प्रकार पहले सुरेन्द्रनाथ बनर्जी हुए थे और आज सप्रू तथा चिन्तामणि जैसे हो
रहे हैं। अन्त में मज़दूर-आन्दोलन की जीत होगी। बोलो साम्यवादियों की जय!
युगान्तकारी धारा क़ायम रहे!
318 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़