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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 318, कुल 788 में से

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पृष्ठ 318

मिस स्मेडली के लेख ‘द पीपल’ में प्रकाशित होते रहते हैं। जिसने उनके लेख
पढ़े हैं वह उनकी लेखकीय विद्वता एवं ज्ञान की प्रशंसा किये बिना नहीं रह सकता।
मिस स्मेडली बहुत अच्छी लेखिका हैं। वह जिस विषय को छूती हैं उसे जीवन्त
कर देती हैं। राष्ट्रीय राजनीति, हिन्दुस्तान का युगान्तकारी इतिहास तथा हिन्दुस्तान
के जलावतनों के बारे में जितना वह जानती हैं उतना शायद ही कोई हिन्दुस्तानी
जानता हो। हिन्दुस्तान के गुलाम होने की वजह से या किन्हीं दूसरे कारणों से वह
इससे बहुत लगाव रखती हैं तथा यहाँ के पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से अपने विचारों
से अवगत कराती रहती हैं।
लेकिन लाला लाजपत राय को मिस स्मेडली के विचार अच्छे नहीं लगते।
उनको मिस स्मेडली के लेखों में से बोल्शेविक वाली बू आती है। उनकी कोमल
नाक इस बोल्शेविकी बू को सहन न कर सकी। तभी लाला जी पुराने क़िस्सों की
तरह मानस-गन्ध, मानस-गन्ध चीख़ रहे हैं और मिस स्मेडली के लेखों से
तौबा-तौबा कर चुके हैं। इस बोल्शेविकी भय के कारण ही वे अपने मुख्य उद्देश्य
को भी छोड़ चुके हैं और अब अच्छे बच्चों के ‘बीबे राने’ लेख प्रकाशित करने
लगे हैं।
लाला लाजपत राय मज़दूरों के कट्टर समर्थक हैं। ट्रेड यूनियन कांग्रेस के
अध्यक्ष भी रह चुके हैं। आप जेनेवा की अन्तरराष्ट्रीय मज़दूर कांग्रेस में मज़दूरों के
प्रतिनिधि के रूप में शामिल हुए थे। आप मिस्टर मैकाडॉल्ड एण्ड कम्पनी को
पूँजीपति तथा तानाशाही समर्थक लिखते थे। लेकिन आप कौन हैं? मज़दूर हैं? नहीं,
बिल्कुल भी नहीं। आप तो असली पूँजीपति हैं तथा पूँजीपतियों से मित्रता रखते हैं।
आप अपने स्वास्थ्य-लाभ के बहाने मिस्टर बिरला के साथ जेनेवा गये थे तथा वहाँ
उसकी मदद करते रहे थे।
आपने लिखा है कि “मिस स्मेडली ने हमें कोई नयी बात नहीं बतायी। हम
जानते हैं, और पिछले दो सौ बरसों से जानते रहे हैं कि इंग्लैण्ड विकासशील देशों
में हिन्दुस्तान को अपनी जंग-जंगी तैयारियों के लिए उपयोग करता रहा है।” लेकिन
लाला जी से कोई पूछे कि जब आप अंग्रेज़ों की दो सौ बरसों की चालबाज़ियों से
परिचित हैं कि वह हिन्दुस्तान को युद्ध-कार्य के लिए इस्तेमाल करते रहे हैं, तब
आपने इस उपयोग के बारे में शोर क्यों न मचाया? आपने पिछले युद्ध में ही ये
सलाह क्यों नहीं दी कि हिन्दुस्तानियो सशक्त हो जाओ, अब वक़्त है कि युद्ध के
लिए इन्हें कोई मदद न दो और आज़ादी के लिए संघर्ष करो। लेकिन उस समय
आप ऐसा क्यों कहते? उस समय तो आप आनन्दमग्न बैठे अमेरिका में तमाशा देख
रहे थे और जर्मनी के विरुद्ध केवल लिखकर अंग्रेज़ों को यह भरोसा दिला रहे थे
कि आप ख़तरनाक नहीं हैं और देश-निकाले के बाद आपके वापस हिन्दुस्तान आने
में कोई डर नहीं है।
312 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़