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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 320, कुल 788 में से

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पृष्ठ 320

सिद्धान्त पर चलते हुए आज दुनिया के मज़दूर अपनी-अपनी सरकारों और
अपने-अपने देश से टूटकर विश्व-मज़दूर-संगठन में शामिल हो रहे हैं। लेकिन
लाला जी, आज तो आप वर्ग-संघर्ष के ख़िलाफ़ होकर पूँजीवाद तथा तानाशाही को
भी रहने देना चाहते हैं। आप शायद यह समझते हैं कि सामाजिक विकास में, जिस
तरह आप जैसे पूँजीवादी कहते हैं, दोनों की ही आवश्यकता है।
असल बात तो यह है कि लाला जी एक-एक करके अपने पहले के सिद्धान्त
छोड़ रहे हैं और पुनः आर्यसमाजी बन रहे हैं। इसीलिए आपने बहुत खीजते हुए मिस
एग्निस स्मेडली के राष्ट्रवादी सिद्धान्त बताने वाले लेखों को प्रकाशित करना बन्द
कर दिया है। इस तरह प्रकाशन बन्द करते हुए जो टिप्पणी आपने 13 अक्टूबर के
पत्र में लिखी, उसने आपकी शान में चार चाँद नहीं लगाये। जहाँ तक हमें जानकारी
है कि मिस एग्निस स्मेडली अपने लेख बिना कोई पारिश्रमिक लिये भेजती रही
हैं। इस टिप्पणी पर अनेक विरोधात्मक पत्र आये हैं, जिन्हें आपने प्रकाशित करने
का भी साहस नहीं दिखाया। 15 दिसम्बर के पत्र में आपने इस तरह मिस स्मेडली
से क्षमा-याचना की है - “हम अपनी इच्छानुसार कार्य करते हैं। मिस स्मेडली को
यह जानना चाहिए कि ज़िन्दगी में मेरा तो अन्य कोई दूसरा (देशसेवा के अलावा)
काम ही नहीं है। अगर मैंने उन्हें कष्ट पहुँचाया है तो मुझे इसका बहुत अफ़सोस
है। मुझे यह सोचना चाहिए था कि मेरे 'रिमार्क' उन्हें दुख पहुँचाने के अलावा और
कर भी क्या सकते थे।”
लाला जी नित्य सूर्योदय से नौजवानों को उपदेश करने आरम्भ कर देते हैं, कि
शान्तिपूर्वक बुजुर्ग अनुभवी नेताओं के आदेशों को मानना चाहिए, तथा देश के लिए
कुर्बानियाँ करनी चाहिए। लेकिन लाला जी जब स्वयं पग-पग पर ठोकरें खाते हैं,
कई जगहों पर भूलें करते हैं, आत्मसंयम में नहीं रहते। क्षमा-याचनाएँ करते फिरते
हैं तो आप कैसे नौजवानों को नेतृत्व दे सकते हैं?
यदि सच पूछें तो 'पंजाब केसरी' अब बूढ़ा हो गया है। इसके ख़तरनाक दाँत झड़
गये हैं। नौकरशाही को डराने वाले इसके भयानक नाखून तेज़ नहीं रहे। अब तो यह
सर्कस के एक पालतू शेर की तरह बेअसर हो गया है। लाला पहले वाले लाला नहीं
रहे। पहले वाला लाला नौजवान था। उसमें नौजवानों वाला जोश, नौजवान वाला साहस
और जवाँमर्दों वाली कुर्बानी कूट-कूटकर भरी थी। वह लाला हिसाबी नहीं था। वह
कुर्बानी के समुद्र में कूदना जानता था और नौजवान भाइयो, देश का दुर्भाग्य! अब यह
लाला हम नौजवानों को उपदेश करने के लिए रह गया है। लाला स्वयं स्वीकारता है
और कहता है कि “मेरी तौबा, मैं कोई कुर्बानी नहीं कर सकता।” लेकिन वह
“नौजवानों को सही मार्ग” पर चलाने को अपना अधिकार समझता है। किसी कवि
ने ठीक कहा है, “बदलता है रंग आसमाँ कैसे-कैसे?”
जनवरी, 1928
314 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़