सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 314, कुल 788 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 314
  1. हिन्दू-मुस्लिम-तनाव को बढ़ाना।
  2. उदारवादी बन जाना।
    इन आरोपों में से एक का भी आपने कोई तर्क-सम्मत खण्डन नहीं किया।
    जब चुनावों का जोश शान्त हो गया तब हमने बहुत चिन्तापूर्वक सुना कि आपके
    शरीर को फिर कोई रोग लग गया है। अफ़सोस, अस्वस्थता हमारे नेताओं का एक
    हिस्सा बन गयी है। वे अस्वस्थता की तभी शिकायत करने लग जाते हैं जब उन्हें
    मालूम होता है कि कोई न कोई हमसे गाँव की प्रगति और जन-एकता के वायदे
    को पूरा करने के सम्बन्ध में कुछ न कुछ कहेगा। ये वायदे ऐसे हैं जो हज़ारों बार
    किये तो गये, पर पूरे कभी नहीं उतरे।
    चिकित्सा विज्ञान क्या यही कहता है कि बुरे स्वास्थ्य का रोगी केवल यूरोप
    के ही स्वास्थ्य-लाभ-केन्द्र पर ठीक होगा? रोग की रोकथाम के लिए जो राय
    डॉक्टर दें उसे मानने से कौन इन्कार कर सकता है? हिन्दुस्तान एक बदक़िस्मत
    देश है जो जंगल और दलदल से भरा है। यहाँ कोई पहाड़ी स्थान नहीं है और न
    ही कोई स्वास्थ्य-लाभ-केन्द्र है। इन नेताओं का कश्मीर केवल इटली के उत्तर में
    है। 'मरी', मसूरी और नैनीताल भी यूरोप में ही मिलते हैं। आप जानते हैं कि अपने
    देश की सेवा के लिए जीना बहुत ज़रूरी है। इसलिए जीवन बहुमूल्य है। यह भी
    कहा जाता है कि सिपाही के लिए कोई आराम नहीं। वह मरने के लिए जीता है,
    ताकि वह दुख झेलते, देश की सेवा में रहते हुए ही मरे। और दुखी देश के लिए
    मरने के वास्ते कमर कसकर युद्ध में मरे, उसकी, बड़ी इच्छा होती है।
    लेकिन यूरोप जाने से पहले आप जब हिन्दुस्तान की ही हवाख़ोरी कर रहे थे
    और हिन्दुस्तान की ही ज़मीन पर चल रहे थे, तब आपके और आपके साथियों
    द्वारा बोये काँटे उग पड़े। आपने 'हिन्दुओ, मारो!' का प्रचार किया था और हिन्दू
    ही मारे गये!
    आप जैसे ही अन्य सज्जनों ने 'मुसलमानो, मारो!' का प्रचार किया था। जब
    मुसलमानों के मारे जाने का समय आया तो उनके नेताओं ने यह कमज़ोरी दर्शायी
    और वह सिपाही वाला काम न कर सके। इस तरह उन्हें भी काफ़ी मार पड़ी।
    लेकिन हमारा सिपाही उस समय बुज़दिली दर्शाने में बहादुर निकला। जब हिन्दू मारे
    जाने लगे तो आपने प्रथम श्रेणी के गद्दों पर बैठकर यूरोप चले जाना ही श्रेयस्कर
    समझा। आपने लाहौर के हिन्दुओं की इस संकट में मदद करने से असमर्थता प्रकट
    की। चुनाव के दिनों में आप आमतौर पर हिन्दुओं की मुसलमानों के हाथों रक्षा करने
    की डींगें हाँका करते थे।
    लेकिन अफ़सोस है कि यह सबकुछ आपका चुनावी सफलता तक ही सीमित
    था। इसके साक्ष्य में हम केवल यह कहना ही पर्याप्त समझते हैं कि आपने यूरोप
    से वापस लौटकर भी लाहौर के ग़रीब और दुखी हिन्दुओं की सहायता के लिए
    308 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़