भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
एक और दमनकारी क़ानून
जिस तरह हिन्दुस्तान में कारख़ाने बढ़ रहे हैं, उसी तरह हमारे पूँजीपति और अंग्रेज़ों
के लाभ-हानि भी साझे होते जा रहे हैं और ये दश में उभर रहे जन-आन्दोलन को
सामान्यतया दबाने का संयुक्त रूप से प्रयत्न कर रहे हैं। अब एक समय दो क़ानून
स्वीकृत हो रहे हैं : एक है जन-सुरक्षा बिल (पब्लिक सेफ़्टी बिल) और दूसरा
है औद्योगिक विवाद बिल (ट्रेड्स डिस्प्यूट बिल) अर्थात किसी पूँजीपति और
मज़दूरों का किसी सवाल पर झगड़ा हो जाये तब तुरन्त एक पंचायत गठित कर
दी जाये, जिसमें पूँजीपति मालिकों तथा मज़दूरों के प्रतिनिधि शामिल हों और इसका
अध्येता एक निष्पक्ष व्यक्ति हो। वह जो निर्णय दे उसे सभी स्वीकारें। हड़ताल का
अधिकार नहीं होगा। हड़ताल करने वाले को 500 रुपये जुर्माना या एक माह की
क़ैद की सज़ा दी जायेगी और अगर कोई राजनीतिक विचारधारा को लेकर हड़ताल
करेगा, उसे तीन माह की क़ैद तथा 500 रुपये के जुर्माने की सज़ा होगी। लेकिन
ये सज़ाएँ क्यों? विवाद निपटाने के लिए जो कमेटी बनायी जायेगी, अगर वह
मज़दूरों की इच्छाओं के विरुद्ध फ़ैसला कर दे, तब? तो भी क्या उन ग़रीबों को
हड़ताल करने का अधिकार नहीं मिलना चाहिए? बड़ी अजीब बात है। मज़दूरों को
जल्दी ही सँभल जाना चाहिए, क्योंकि ये उनके ही आन्दोलनों को दबाने का यत्न
हो रहे हैं। बम्बई की मज़दूर-किसान पार्टी ने घोषित किया है कि इस बिल के
विरुद्ध मज़दूरों को हड़तालें करनी चाहिए, बात भी ठीक है। असेम्बली के पूँजीपति
सदस्य तुरन्त ही यह क़ानून स्वीकृत कर देंगे। उन्हीं के लिए तो सरकार ने यह
क़ानून बनाया है। पहले ही प्रेमचन्द कीका भाई जैसे पूँजीपति सरकार से गुहार करते
थे कि मज़दूर-आन्दोलनों को दबाने की कोशिश की जानी चाहिए। सो सरकार ने
इसका हल बनाकर पेश कर दिया है। दोनों क़ानून स्वीकृत हो जायेंगे। लेकिन
मज़दूरों को सँभल जाना चाहिए, क्योंकि यदि अभी कोई ध्यान न दिया गया तो
बाद में बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। यह स्मरण रखना चाहिए कि
इंग्लैण्ड में भी ऐसा क़ानून स्वीकृत कराने की अंग्रेज़ी सरकार को हिम्मत नहीं हो
सकती। मज़दूरों के साथ रत्तीभर भी सहानुभूति रखने वाले सज्जनों को इस अवैध
तथा दमनकारी क़ानून के विरोध में आवाज़ उठानी चाहिए।
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 287
बारदोली सत्याग्रह
हम पहले से ही अपने पाठकों के सामने बारदोली के बहादुर किसानों के हालात
रखते रहे हैं। उन्होंने सत्याग्रह शुरू किया था, क्योंकि उनका बन्दोबस्त करके लगान
बढ़ा दिया गया है। उन्होंने लगान देने से ही इन्कार कर दिया था! बड़ा झगड़ा बढ़ा।
अन्त में समझौता हो गया। फ़ैसला यह हुआ कि एक व्यक्ति ने अपनी तरफ़ से
बढ़ा हुआ लगान जमा करवा दिया है तथा अब एक समिति जाँच करेगी कि लगान
बढ़ाना उचित है अथवा नहीं। और वह जो फ़ैसला करेगी वह दोनों पक्षों को मंजूर
करना पड़ेगा। अगर वह समिति फ़ैसला कर दे कि लगान बढ़ा दिया जाये – कोई
डर नहीं, तो फिर क्या होगा? बेचारे किसान पहले ही इतने कमज़ोर तथा असहाय
हैं कि वे एक पैसा भी अधिक नहीं दे सकते। फिर यह तो कुछ बात न बनी।
लेकिन हम देखते हैं कि यह सत्याग्रह सरकार के साथ संघर्ष के विचार से नहीं
आरम्भ किया गया वरन केवल यह शिकायत दूर करने के लिए था। नेताओं ने यह
स्वीकार भी किया है। लेकिन समझ में नहीं आता कि एक-एक शिकायत के लिए
लड़ने-झगड़ने के बजाय मूल या जड़ का क्यों नहीं इलाज किया जाता? असल
में ज़िम्मेदार नेता तो ज़िम्मेदारी से भागते हैं और तुरन्त समझौते पर उतर आते हैं।
तो यह बात स्पष्ट है कि इस तरह लाभ हमेशा ताक़तवर को ही होता है।
हम समझते हैं कि जब तक नेता युगान्तकारी भावना और उत्साह के साथ ऐसा
क्रान्तिकारी संघर्ष नहीं छेड़ेंगे, तब तक आज़ादी-आज़ादी का शोर करना दूर की
बात है।
288 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
नेहरू समिति की रिपोर्ट
हिन्दुस्तान भी अजब देश है। यहाँ के नेता भी अजीबो-ग़रीब हैं। बैठे-ठाले विचार
किया कि चलो एक संविधान ही तैयार कर लें कि हम हिन्दुस्तान में कैसा राज
चाहते हैं। तुरन्त सर्वदलीय कॉन्फ़्रेंस बुलायी गयी, जिसमें नेहरू समिति बनायी गयी
कि वह एक रिपोर्ट तैयार करे। रिपोर्ट तैयार हो गयी और प्रकाशित भी की गयी।
बड़ी प्रशंसा हो रही है, बड़ी श्लाघा हो रही है। तारीफ़ों के पुल बाँधे जा रहे हैं।
रिपोर्ट का अर्थ क्या है? क्या हमें भी सरकार कनाडा, आस्ट्रेलिया और आयरलैण्ड
जैसा राज दे दे? बहुत खूब! वायसराय अंग्रेज़ होगा जो काफ़ी अधिकार सम्पन्न
होगा। लेकिन चुनाव से ही कौंसिल और असेम्बली में सदस्य भेजे जायेंगे और चुनाव
में मत देने का अधिकार बालिग व्यक्तियों को ही होगा। सदन में वे स्वयं कुछ नहीं
कर सकेंगे। केवल वायसराय की उँगलियों पर नाचेंगे।
ऐसा लगता है कि वे कनाडा और आयरलैण्ड आदि के संविधान खोलकर और
सामने रखकर बैठ गये और यह रिपोर्ट लिख दी। लेकिन समस्या यह है कि यह रिपोर्ट
लिखी क्यों गयी? जब असहयोग आन्दोलन ज़ोरों पर था, उस समय बाबू भगवानदास
आदि ज़ोर-शोर से अपनी बातें उठाते रहे, लेकिन किसी ने स्वराज्य की व्याख्या करने
की आवश्यकता न समझी। पर आज जबकि कोई आन्दोलन भी नहीं है, संविधान
तैयार करके रख दिया गया है। आख़िर इसका क्या कारण है? असल में बात यह है
कि कुछ लोगों का विचार है कि साइमन कमीशन बना है तो यह ज़रूर कुछ न कुछ
देने के लिए ही बना है। और अब सरकार आने वाली जंग और अन्य देशों की
स्थितियों को सामने रखती हुई हिन्दुस्तान को कुछ न कुछ देने को तैयार है। कमीशन
का बहिष्कार तो इसलिए किया जा रहा है कि मिशन में कोई हिन्दुस्तानी सदस्य नहीं
है, और तो कोई बात नहीं। और अब सीधे नहीं बल्कि यों ही दूसरी तरह से कमीशन
को बताना चाहते हैं कि हम यह कुछ लेना चाहते हैं। एक सज्जन ने अच्छा उदाहरण
दिया कि एक फ़कीर ने अपनी लम्बी लाठी से एक लोटा बाँध लिया और कहने
लगा – मुझे भीख नहीं चाहिए, मेरे लोटे को दे दो! हमारे उग्र नेताओं की यह स्थिति
है। ये सभी समझे बैठे हैं कि अब कुछ न कुछ मिलकर ही रहेगा। इसलिए बता दें
कि हम क्या लेना चाहते हैं। अक्ल के अन्धे नेता आयरलैण्ड के समान अधिकार तो
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 289
ज़रूर माँगते हैं लेकिन यह नहीं देखते कि आयरलैण्ड की जनता ने ये अधिकार किस
तरह लिए हैं? 1916 से 1923 तक एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाकर वे अंग्रेज़ों से संघर्ष
करते रहे और इन अंग्रेज़ों की नाक में दम कर दिया। तंग आकर, मजबूर होकर जब
वहाँ से जड़ें बिल्कुल ही उखड़ गयीं तब उन्होंने उनको थोड़े-बहुत अधिकार दिये।
और हम चाहते हैं कि हमने बैठकर बतियाया है, इसलिए हमें भी उनके समान
अधिकार मिल जाने चाहिए! कितनी बड़ी ग़लतफ़हमी है? अच्छा फिर यह तो है ही
बड़ा भारी द्रोह। अभी पिछली कांग्रेस में ‘पूर्ण स्वराज्य’ का प्रस्ताव पास हुआ था। और
अब उन्होंने तुरन्त ही डोमेनियन स्टेट्स बनाया जाना मंजूर कर लिया है। इसका क्या
अर्थ है? कहा जाता है कि यह कांग्रेस पार्टी थोड़े ही थी, जिसने कांग्रेस के साथ द्रोह
किया हो, यह तो है सर्वदलीय कॉन्फ्रेंस। बहुत खूब! तुम कांग्रेस वाले ही समझौते के
ठेकेदार हो गये हो! उदारवादी नेताओं ने क्यों न समझौता करने के लिए पूर्ण स्वतन्त्रता
स्वीकार की? उन्हें तो हिन्दुस्तान की स्वतन्त्रता की कोई आवश्यकता नहीं? तब
कांग्रेस के होने वाले अध्यक्ष पण्डित मोतीलाल नेहरू आदि कांग्रेस को पीछे खींचने
का यत्न न करेंगे? समझ नहीं आता कि पण्डित जवाहरलाल आदि जोकि समाजवादी
विचारों के समर्थक हैं, क्यों इस समिति में शामिल होकर अपना आदर्श बदल सके?
क्या वह इन्कलाब नहीं चाहते, वैसे ही इन्कलाब-इन्कलाब चिल्लाते रहते हैं? क्या
उन्हें आशा है कि यह सरकार स्वयं ही, जो माँगें प्रस्तुत की गयी हैं उन्हें स्वीकार
कर लेगी (ऐसा सोचना) जान-बूझकर आँखें मूँदना है। या नेहरू साहब केवल सरकार
को भयभीत करने के लिए ही पूर्ण स्वतन्त्रता का शोर मचाते रहते हैं और चाहते अधीन
राज ही हैं? असल में यह आशा कि अभी कुछ मिलेगा, अभी कुछ मिलेगा, बहुत
बरबाद करती है। दास, बरकेन हैड की चापलूसी में कितना गिर गया था, यह उसके
फरीदपुर के सम्बोधन से ही पता चल सकता है। आज सभी नेता उस राह पर चल
पड़े हैं।
स्वतन्त्रता कभी दान में प्राप्त नहीं होगी। लेने से मिलेगी। शक्ति से हासिल की
जाती है। जब ताक़त थी तब लॉर्ड रीडिंग गोलमेज़ कॉन्फ्रेंस के लिए महात्मा गाँधी
के पीछे-पीछे फिरता था और जब आन्दोलन दब गया, तो दास और नेहरू बार-बार
ज़ोर लगा रहे हैं और किसी ने गोलमेज तो दूर, ‘स्टूल कॉन्फ्रेंस’ भी न मानी।
इसलिए अपना और देश का समय बरबाद करने से अच्छा है कि मैदान में आकर
देश को स्वतन्त्रता-संघर्ष के लिए तैयार करना चाहिए। नहीं तो मुँह धोकर सभी
तैयार रहें कि आ रहा है – स्वराज्य का पार्सल!
नौजवानों को इन बहकावों से बचकर चुपचाप अपना काम करते रहना चाहिए।
290 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
दिलचस्प और लाभदायक पुस्तकें
नवयुवकों को इस तरह की पुस्तकें पढ़ने का सुझाव दिया जाता था। - स.
- हिन्दुस्तान और आने वाली जंग (अंग्रेज़ी में)। लेखक, मिस एग्निस
स्मेडली, बर्लिन (जर्मनी)। क़ीमत - =) - ए काल टू एक्शन (अंग्रेज़ी में)। इसमें मौजूदा स्थिति को बड़ी भौंडी निगाह
से बयान किया गया है और साबित किया गया है कि मौजूदा नेता मुल्क़ को निजात
नहीं दिला सकते। क़ीमत-।।) - नौजवानों से दो-दो बातें (उर्दू)। लेखक, भाई छबीलदास बी.ए. ऑनर्स।
क़ीमत - ) - बन्दी जीवन, दोनों भाग (पंजाबी)
पंजाब और बंगाल की 1914-15 की ग़दर-लहर के पूरे और दिलचस्प
हालात। क़ीमत-2/- - शहीदों के दर्शन (पंजाबी)
बड़ा दिलचस्प, उपन्यास के ढंग का राजनीतिक पाठ है। क़ीमत-1)
'मैनेजर, किरती, अमृतसर'
सितम्बर, 1928
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 291
आर्म्स एक्ट ख़त्म कराओ
1857 के स्वतन्त्रता-संग्राम के बाद भारत को पूरी तरह जकड़ने के लिए बनाये
गये क़ानून के ख़िलाफ़ ‘किरती’ अक्टूबर, 1928 में प्रकाशित एक लेख। — स.
किसी देश पर कुछ लोग जब किसी प्रकार क़ब्ज़ा जमा लेते हैं तो उनकी यही
कामना रहती है कि वह देश हमेशा ही उनके क़ब्ज़े में रहे और वे उसका लहू
निचोड़-निचोड़कर मोटे होते रहें और मौज़ मारते रहें। इसके लिए वे लगातार
प्रयासरत रहते हैं। वे चाहते हैं कि उस क़ौम का कोई साहित्य तथा भाषा न रहे।
देश का कोई इतिहास न रहे। मर्दानगी और बहादुरी का निशान तक मिटा दिया जाये।
इस प्रकार वहाँ की जनता को लगातार दबाया जाता है।
आज हम गुलाम हैं। हमारे ऊपर शासन करने वाली क़ौम दुनियाभर की क़ौमों
में से ज़्यादा चालाक, बादशाहत के मामले में ज़्यादा योग्य और समझदार है। उन्होंने
धीरे-धीरे हिन्दुस्तान को कमज़ोर करने की कोशिशें कीं। ग़लतियाँ भी उनसे हुईं।
उनकी ऐसी ही ग़लतियों का नतीजा था 1857 में हिन्दुस्तान की स्वतन्त्रता की
पहली जंग जो इतनी ज़ोरदार रही। लेकिन वह अपनी ग़लतियों से सीख लेते रहे।
इसलिए हम देखते हैं कि उन्होंने फिर किसी जन-आन्दोलन को ज़ोर नहीं पकड़ने
दिया।
उसी समय उन्होंने एक विशेष योजना के अन्तर्गत हिन्दुस्तान को लगातार
कमज़ोर करने की कुछ नीतियाँ अपना लीं। उनमें से आज हम एक का ज़िक्र करना
चाहते हैं और वह है हिन्दुस्तानियों से शस्त्र छीनने की नीति। 1857 के ग़दर, विद्रोह
या स्वतन्त्रता-आन्दोलन में सामान्य-जन के पास शस्त्र थे, इसलिए बहुत ऊधम
मचा। हिन्दुस्तानी बहादुरों ने एक बार हलचल मचा दी। लेकिन हिन्दुस्तान की
क़िस्मत और पंजाब के बुरे भाग्य। पंजाबियों ने कलंक का टीका माथे पर लगा
लिया। स्वतन्त्रता-आन्दोलन को कुचल डाला गया। अंग्रेज़ों ने सोचा, आख़िर यह
विदेश है — फिर अवसर मिला तो हिन्दुस्तानी पुनः विद्रोह खड़ा कर देंगे, इसलिए
एक बार में ही इनका पूरा इलाज कर देना चाहिए। उन्होंने एक साधारण-पत्र क़ानून
बनाया। उसके अनुसार उन्होंने कुछ विशेष ज़िलों के क्षेत्रों को निःशस्त्र कर दिया।
292 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
तब 17 जुलाई, 1860 को बाक़ायदा जो शस्त्र-क़ानून कौंसिल में स्वीकृत हुआ था,
वायसराय ने उसे मंजूर कर लिया। अक्टूबर, 1860 से उसे अमल में लाया गया,
लेकिन उसके अनुसार भी सिवाय उन क्षेत्रों के जहाँ वे विशेष अशान्ति की आशंका
महसूस करते थे, बाक़ी देश में शस्त्रों की कोई मनाही नहीं थी। उस समय इस
बात पर बहुत ज़ोर दिया जाता था कि सामान्य-जन बिना लाइसेंस तोपें न रखें। कुछ
सामान्य शस्त्रों के लिए भी मनाही हो गयी। तब 1878 में वह कठोर क़ानून पास
हुआ जो 1891, 1919, 1920 के थोड़े-थोड़े संशोधनों के बाद से अब तक चल
रहा है।
सामान्य-जन को इस मामले में बड़ी बेचैनी हुई। (उधर) इस विचार के लोग
घबराकर कोई और कार्यवाही न कर बैठें, उनको क़ानूनी आन्दोलन
(Constitutional Agitation) सिखाने के लिए कांग्रेस की बुनियाद रखी गयी। यह
बात तो मानी हुई है कि उस वक़्त के गवर्नर जनरल या वायसराय लॉर्ड रिपन और
बाद में लॉर्ड डफ़रिन के कथनानुसार, मिस्टर ह्यूम ने कांग्रेस की नींव रखी थी और
सभी लोगों को उसके आसपास इकट्ठा किया था। उसमें शस्त्र-क़ानून पर
सामान्यतया बहस की जाती रही।
इसी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के चौथे अधिवेशन में, जोकि 1888 में इलाहाबाद
में हुआ था, जो प्रस्ताव पेश और पास हुआ, उसमें इस बारे में कहा गया कि –
जनता की वफ़ादारी और आर्म्स एक्ट की परेशानियों को देखते हुए यह
आवश्यक है कि सरकार को मनाया जाना चाहिए कि वह क़ानून को कुछ इस तरह
बना दे जिससे कि सिवाय (ऐसे व्यक्तियों के) जिन्हें सरकार ने विशेष रूप से
किसी कारणवश रोका हुआ है, प्रत्येक व्यक्ति को हथियार रखने की मंज़ूरी दे।
इस प्रस्ताव को स्वीकृत करते हुए उदारवादी नेता सर फ़िरोज़शाह मेहता ने एक
बहुत महत्त्वपूर्ण भाषण दिया, जिसमें उन्होंने कहा कि यूँ ही जोश में आकर मैं इस
प्रस्ताव का समर्थन करने के लिए खड़ा नहीं हो गया। मैं तो यह कहता हूँ कि आप
सारे देश को नपुंसक न बनायें। कहते हैं कि वह समय भी जल्द आयेगा जब
शस्त्र-क़ानून हटा दिया जायेगा। लेकिन स्मरण रहे, एक बार यदि हिन्दुस्तानी जनता
नपुंसक बना दी गयी तो फिर उससे सँभलना मुश्किल हो जायेगा। साथ ही उन्होंने
उस व्यक्ति का उदाहरण दिया जिसके बेटे को बादशाह ने किसी बात पर फाँसी
पर टँगवा दिया था। फिर एक बार जब बादशाह उससे सहायता माँगने गया तो उसने
जवाब दिया कि मेरे एक बेटा था, जिसे मैं आपकी सहायता के लिए भेज सकता
था, लेकिन इस वक़्त वह बेटा है ही नहीं, इसलिए मैं आपकी कोई मदद नहीं कर
सकता। आख़िर वह समय जल्दी ही आने वाला है जब हम भी अंग्रेज़ी सरकार को
यही उत्तर देंगे। लेकिन निःशस्त्र हम किस काम के हैं और हमारी क्या ताक़त, क्या
क़ीमत होगी?
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 293
खैर, हिन्दुस्तानी पहले से ही (यह क़ानून हटाने की) ज़रूरत महसूस करते
रहे हैं, लेकिन दिनोदिन सख़्ती बढ़ती ही चली गयी। पहले कहा गया था कि यह
क़ानून केवल चार या पाँच सालों के लिए ही है। बाद में वह ऐसा पक्का हुआ
कि अब यह लानत दूर होने में ही नहीं आती। एक बार संशोधन पेश हुआ कि जिस
तरह अंग्रेज़ों, एंग्लो-इण्डियनों और ऐसे दूसरे अन्य लोगों को लाइसेंस की
आवश्यकता नहीं पड़ती, उसी प्रकार आम हिन्दुस्तानियों को भी स्वतन्त्रता होनी
चाहिए। इसमें हमारा अपमान होता है। मगर अपमान का इलाज अंग्रेज़ों ने यह किया
कि चलो, लाइसेंस सभी के लिए आवश्यक कर देते हैं। अंग्रेज़ भी लाइसेंस लें।
हिन्दुस्तानियों को छूट नहीं दे सकते। लोग जानते ही हैं कि अंग्रेज़ों को लाइसेंस लेने
में कितना ‘कष्ट’ उठाना पड़ता है और हिन्दुस्तानियों की क्या गत बनती है। खैर,
मतलब तो यह है कि अंग्रेज़ी सरकार जोकि जानती है कि उसका क़ब्ज़ा हिन्दुस्तान
पर सरासर नाजायज़ और अन्यायपूर्ण है, वह किसी भी सूरत में हिन्दुस्तानियों को
हथियार रखने की इजाज़त नहीं दे सकती। मगर मुल्क़ के लिए ऐसे क़ानून हद
दर्जे के नुक़सानदेह होते हैं। लोगों में नामर्दी, बुज़दिली, कमज़ोरी इतनी ज़्यादा आ
गयी है कि सुनते ही शर्म आती है। आज हम देखते हैं कि जहाँ अन्य राष्ट्र
युद्ध-विद्या की आम शिक्षा देकर पूरे के पूरे देश को एक तरह की बिल्कुल तैयार
फ़ौज बनाकर (Nation in Arms) मुल्क़ को ज़्यादा महफ़ूज़ और फ़ौजी खर्च को
हद दर्जे तक घटा देते हैं, वहाँ हमारी यह हालत है कि हिन्दुस्तान में 99 फ़ीसदी
से अधिक लोग कभी पिस्तौल और बन्दूक़ की शक्ल भी नहीं देख सकते। फिर
कहा जाता है कि हिन्दुस्तान में से कोई प्रतिभाशाली जनरल (Military Genius) पैदा
नहीं हो रहे।
कहा जाता है कि हिन्द में अमन क़ायम रखने और अपराध घटाने के लिए
ही लोगों को निहत्थे रखा जाता है, लेकिन हम देखते हैं कि चोर और डाकू तो
जैसे भी बन पड़ता है, हथियार हासिल कर ही लेते हैं, लेकिन भले लोग अपनी
हिफ़ाज़त के लिए कहीं से भी हथियार हासिल नहीं कर सकते। कितनी सख़्त
तकलीफ़ हमें इस बात से होती है, यह अन्दाज़ा आसानी से ही लग सकता है।
जब भी सैनिक-शिक्षा का सवाल उठता है, उसी समय सरकार आयें-बायें
करके टालना शुरू कर देती है। क्या हमें साफ़ तौर पर नहीं समझ लेना चाहिए
कि यह हमें ख़ासतौर पर कमज़ोर बनाकर गुलाम बनाये रखने के लिए किया
जाता है? हम देखते हैं कि बेचारी औरतें भी अकेली सफ़र नहीं कर सकतीं,
क्योंकि उनके पास अपनी रक्षा का भी पूरा सामान मौजूद नहीं। अगर प्रत्येक स्त्री
के पास कम से कम एक पिस्तौल हो तो वह भी बेफ़िक्री के साथ घूम सकें
और आराम के साथ ज़िन्दगी गुज़ार सकें।
और यदि ज़रा ध्यान से देखें तो मालूम होगा कि इस विचार के साथ कि हमें
294 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
अपनी रक्षा के लिए पुलिस का मुँह देखना चाहिए, हम लोग कितने कमज़ोर हो
रहे हैं। इस तरह हमारे भीतर से इन्सानियत ख़त्म की जा रही है। यही तो वजह
है कि हरि सिंहजी नलवा जैसे जरनैल पैदा कर सकने वाली क़ौम के आदमियों
को महज आज़ादी से डराने के लिए सरहिन्द के पठानों का भूत दिखाकर थर-थर
कँपा दिया जाता है।
सबसे बड़ी बात है कि यह इन्सानियत का अपमान है कि सारे मुल्क़ में से
हथियार ग़ायब कर दिये जायें। जहाँ अपनी फ़ौजी ताक़त को अंग्रेज़ दिनोंदिन बढ़ाये
चले जा रहे हैं, वहाँ हमें किस तरह निहत्थे करके फेंका गया है। और आजकल
ख़ासतौर पर पुलिस और खुफ़िया पुलिस की सारी ताक़त लुके-छिपे हथियार
खोजने में और भविष्य में उनका आना बन्द करने में ख़र्च हो रही है। बात क्या है?
रोल्ट रिपोर्ट में साफ़तौर पर लिखा हुआ है कि यदि 1914-15 में पंजाब और बंगाल
के राजपरिवर्तनकारियों के पास काफ़ी हथियार होते तो बड़ा अन्धेर हो जाना था।
यही बात ‘बन्दी जीवन’ में लिखी गयी है। आजकल लड़ाई के आसार नज़र आ
रहे हैं। लड़ाई भी वह सामने सरहद पर। इस बार पिछले अनुभवों से फ़ायदा उठाया
जा रहा है और पहले से ही अनुमान लगाये जा रहे हैं।
लेकिन हम अपना क़ौमी हक़ और इन्सानी हक़ समझते हैं कि हम भी
हथियार रख सकें। हम पहले श्री अवारी, नागपुर शस्त्र-सत्याग्रह का कुछ हाल दे
चुके हैं। लोगों में इसके विरुद्ध विचार तो पैदा हो रहा है। नौजवान भारत सभा की
प्रान्तीय कॉन्फ़्रेंस, अमृतसर ने भी पास किया था कि जल्द ही यह सत्याग्रह किया
जाना चाहिए। नौजवानों के आन्दोलनों को तो ख़ासतौर पर इस ओर ध्यान देना
चाहिए। वजह यह है कि नौजवानों के दिल में क़ुदरती जज़्बा पैदा हो जाता है कि
वह भी हथियार रखें। अगर कोई सिर पीटकर, कोशिश करके एक-आध पिस्तौल
पा भी लेता है तो सरकार झट उस पर साज़िश का केस चला देती है, और उम्रक़ैद
दे देती है। फिर ज़रा विचार तो करें कि क्या अन्धेर हो रहा है। कोई ग़रीब पिस्तौल
रख ही ले तो 3 साल की क़ैद!! गज़ब है! हो क्या गया? कोई राजनीतिक विचारों
वाला कोई हथियार रख ले तो सात साल की क़ैद! दफ़ा 20 के अनुसार बिना
लाइसेंस हथियार रखने के साथ, उनको छुपाने की सज़ा 7 साल है। यही तो वजह
है कि जहाँ आम लोगों को 3-3 महीने की क़ैद होती है, वहाँ के.सी. बनर्जी को
राजपरिवर्तनकारी समझकर पाँच साल क़ैद दे दी गयी थी। हम समझते हैं कि
प्रत्येक हिन्दुस्तानी को इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठानी चाहिए। पहले लोगों को
इसकी ज़रूरत महसूस करवा देनी चाहिए। एक बार चारों तरफ़ से आवाज़ उठनी
चाहिए –
आर्म्स एक्ट उड़ा दो! (Repeal the Arms Act)
और फिर साथ ही सत्याग्रह शुरू कर देना चाहिए। असेम्बली और कौंसिलों
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 295
में ऐसे ही प्रस्ताव पास होने चाहिए। श्री अवारी ने जिस शुभ काम को शुरू किया
था, उसको क़ामयाब बनाने की पूरी कोशिश होनी चाहिए, ताकि फिर हिन्दुस्तानी
नौजवानों में से कमज़ोरी, बुज़दिली दूर हो। फिर हिन्दुस्तान के उठने के आसार हों।
296 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
VI.
नौजवान भारत सभा
और राष्ट्रीय नेतृत्व का मूल्यांकन
The provided image is completely blank and does not contain any text, diagrams, or content to transcribe.
Please provide an image that contains the page or document you would like transcribed.
नौजवान भारत सभा,
लाहौर का घोषणापत्र
भगतसिंह और भगवतीचरण वोहरा ने नौजवानों और विद्यार्थियों को संगठित
करने के प्रयास 1926 से ही शुरू कर दिये थे। अमृतसर में 11, 12, 13 अप्रैल,
1928 को हुए नौजवान भारत सभा के सम्मेलन के लिए सभा का घोषणापत्र तैयार
किया गया। भगतसिंह इस सभा के महासचिव और भगवतीचरण वोहरा प्रचार-सचिव
बने।
नौजवान साथियो,
हमारा देश एक अव्यवस्था की स्थिति से गुज़र रहा है। चारों तरफ़ एक-दूसरे
के प्रति अविश्वास और हताशा का साम्राज्य है। देश के बड़े नेताओं ने अपने आदर्श
के प्रति आस्था खो दी है और उनमें से अधिकांश को जनता का विश्वास प्राप्त
नहीं है। भारत की आज़ादी के पैरोकारों के पास कोई कार्यक्रम नहीं है, और उनमें
उत्साह का अभाव है। चारों तरफ़ अराजकता है। लेकिन किसी राष्ट्र के निर्माण की
प्रक्रिया में अराजकता एक अनिवार्य तथा आवश्यक दौर है। ऐसी ही नाज़ुक घड़ियों
में कार्यकर्ताओं की ईमानदारी की परख होती है, उनके चरित्र का निर्माण होता है,
वास्तविक कार्यक्रम बनता है, और तब नये उत्साह, नयी आशाओं, नये विश्वास
और नये जोशो-खरोश के साथ काम आरम्भ होता है। इसलिए इसमें मन ओछा करने
की कोई बात नहीं है।
हम अपनेआप को एक नये युग के द्वार पर खड़ा पाकर बड़े भाग्यशाली हैं।
अंग्रेज़ नौकरशाही के बड़े पैमाने पर गुणगान करने वाले गीत अब सुनायी नहीं देते।
अंग्रेज़ का हमसे यह ऐतिहासिक प्रश्न है कि “तुम तलवार से प्रशासित होगे या
क़लम से?” अब ऐसा नहीं रहा कि उसका उत्तर न दिया जाता हो। लॉर्ड बर्केनहेड
के शब्दों में, “हमने भारत को तलवार के सहारे जीता और तलवार के बल से ही
हम उसे अपने हाथ में रखेंगे।” इस खरेपन ने अब सबकुछ साफ़ कर दिया है।
जलियाँवाला और मानावाला के अत्याचारों को याद करने के बाद यह उद्धृत करना
कि “अच्छी सरकार स्वशासन का स्थान नहीं ले सकती”, बेहूदगी ही कही
नौजवान भारत सभा और राष्ट्रीय नेतृत्व का मूल्यांकन / 299
जायेगी। यह बात तो स्वतः स्पष्ट है।
भारत में अंग्रेज़ी हुकूमत की दी हुई सुख-सम्पदाओं के बारे में भी सुन
लीजिये।
भारत के उद्योग-धन्धों के पतन और विनाश के बारे में बतौर गवाही क्या
रमेशचन्द्र दत्त, विलियम डिगबी और दादा भाई नौरोजी के सारे ग्रन्थों को उद्धृत
करने की आवश्यकता होगी? क्या इस बात को साबित करने के लिए कोई प्रमाण
जुटाना पड़ेगा कि अपनी उपजाऊ भूमि तथा खानों के बावजूद आज भारत सबसे
ग़रीब देशों में से एक है, कि भारत जो अपनी महान सभ्यता पर गर्व कर सकता
था आज बहुत पिछड़ा हुआ देश है, जहाँ साक्षरता का अनुपात केवल पाँच प्रतिशत
है? क्या लोग यह नहीं जानते कि भारत में सबसे अधिक लोग मरते हैं और यहाँ
बच्चों की मौत का अनुपात दुनिया में सबसे ऊँचा है? प्लेग, हैजा, इनफ़्लुएंज़ा तथा
इसी प्रकार की अन्य महामारियाँ आये दिन की व्याधियाँ बनती जा रही हैं? क्या
बार-बार यह सुनना कि हम स्वशासन के योग्य नहीं हैं, एक अपमानजनक बात
नहीं है? क्या यह तौहीन की बात नहीं है कि गुरु गोविन्द सिंह, शिवाजी और हरी
सिंह जैसे शूरवीरों के बाद भी हमसे कहा जाये कि हममें अपनी रक्षा करने की
क्षमता नहीं है? खेद है कि हमने अपने वाणिज्य और व्यवसाय को उसकी
शैशवावस्था में ही कुचला जाते नहीं देखा। जब बाबा गुरुदत्त सिंह ने 1914 में गुरु
नानक स्टीमशिप चालू करने का पहला प्रयास किया था तो दूर देश कनाडा में और
भारत आते समय उनके साथ अमानवीय व्यवहार किया गया और अन्त में बज-बज
के बन्दरगाह पर उन साहसी मुसाफ़िरों का गोलियों से खूनी स्वागत किया गया।
और भी क्या कुछ नहीं किया गया? क्या हमने यह सब नहीं देखा? उस भारत में
जहाँ एक द्रौपदी के सम्मान की रक्षा में महाभारत जैसा महायुद्ध लड़ा गया था, वहाँ
1919 में दर्जनों द्रौपदियों को बेइज़्ज़त किया गया, उनके नंगे चेहरों पर थूका गया।
क्या हमने यह सब नहीं देखा? फिर भी हम मौजूदा व्यवस्था से सन्तुष्ट हैं। क्या
यह जीने योग्य ज़िन्दगी है?
क्या हमें यह महसूस कराने के लिए कि हम गुलाम हैं और हमें आज़ाद होना
चाहिए, किसी दैवी ज्ञान या आकाशवाणी की आवश्यकता है? क्या हम अवसर
की प्रतीक्षा करेंगे या किसी अज्ञात की प्रतीक्षा करेंगे कि हमें महसूस कराये कि
हम दलित लोग हैं? क्या हम इन्तज़ार में बैठे रहेंगे कि कोई दैवी सहायता आ जाये
या फिर कोई जादू हो जाये कि हम आज़ाद हो जायें? क्या हम आज़ादी के बुनियादी
सिद्धान्तों से अनभिज्ञ हैं? “जिन्हें आज़ाद होना है उन्हें स्वयं चोट करनी पड़ेगी।”
नौजवानो जागो, उठो, हम काफ़ी देर सो चुके!
हमने केवल नौजवानों से ही अपील की है क्योंकि नौजवान बहादुर होते हैं,
उदार एवं भावुक होते हैं, क्योंकि नौजवान भीषण अमानवीय यन्त्रणाओं को मुस्कुराते
300 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
हुए बरदाश्त कर लेते हैं और बग़ैर किसी प्रकार की हिचकिचाहट के मौत का
सामना करते हैं, क्योंकि मानव-प्रगति का सम्पूर्ण इतिहास नौजवान आदमियों तथा
औरतों के ख़ून से लिखा है; क्योंकि सुधार हमेशा नौजवानों की शक्ति, साहस,
आत्मबलिदान और भावात्मक विश्वास के बल पर ही प्राप्त हुए हैं - ऐसे नौजवान
जो भय से परिचित नहीं हैं और जो सोचने के बजाय दिल से महसूस कहीं अधिक
करते हैं।
क्या ये जापान के नौजवान नहीं थे जिन्होंने पोर्ट आर्थर तक पहुँचने के लिए
सूखा रास्ता बनाने के उद्देश्य से अपनेआप को सैकड़ों की तादाद में खाइयों में झोंक
दिया था? और जापान आज विश्व के सबसे आगे बढ़े हुए देशों में से एक है। क्या
यह पोलैण्ड के नौजवान नहीं थे जिन्होंने पिछली पूरी शताब्दीभर बार-बार संघर्ष
किये, पराजित हुए और फिर बहादुरी के साथ लड़े? और आज एक आज़ाद पोलैण्ड
हमारे सामने है। इटली को आस्ट्रिया के जुवे से किसने आज़ाद किया था? तरुण
इटली ने!
युवा तुर्कों ने जो कमाल दिखलाया, क्या आप उसे जानते हैं? चीन के नौजवान
जो कर रहे हैं, उसे क्या आप रोज़ समाचारपत्रों में नहीं पढ़ते हैं? क्या यह रूस के
नौजवान नहीं थे जिन्होंने रूसियों के उद्धार के लिए अपनी जानें कुर्बान कर दी थीं?
पिछली शताब्दीभर लगातार केवल समाजवादी परचे बाँटने के अपराध में
सैकड़ों-हज़ारों की संख्या में उन्हें साइबेरिया में जलावत़न किया गया था,
दोस्तोयेव्स्की जैसे लोगों को सिर्फ़ इसलिए जेलों में बन्द किया गया कि वे
समाजवादी डिबेटिंग (बहस-मुबाहसा चलाने वाली) सोसाइटी के सदस्य थे।
बार-बार उन्होंने दमन के तूफ़ान का सामना किया, लेकिन उन्होंने साहस नहीं
खोया। ये संघर्षरत नौजवान थे। और सब जगह नौजवान ही निडर होकर बग़ैर किसी
हिचकिचाहट के और बग़ैर (लम्बी-चौड़ी) उम्मीदें बाँधे लड़ सकते हैं। और आज
हम महान रूस में विश्व के मुक्तिदाता के दर्शन कर सकते हैं।
जबकि हम भारतवासी, हम क्या कर रहे हैं? पीपल की एक डाल टूटते ही
हिन्दुओं की धार्मिक भावनाएँ चोटिल हो उठती हैं! बुतों को तोड़ने वाले मुसलमानों
के ताजिये नामक काग़ज़ के बुत का कोना फटते ही अल्लाह का प्रकोप जाग उठता
है और फिर वह ‘नापाक’ हिन्दुओं के ख़ून से कम किसी वस्तु से सन्तुष्ट नहीं
होता! मनुष्य को पशुओं से अधिक महत्त्व दिया जाना चाहिए, लेकिन यहाँ भारत
में लोग पवित्र पशु के नाम पर एक-दूसरे का सिर फोड़ते हैं।
हमारे बीच और भी बहुत से लोग हैं जो अपने आलसीपन को
अन्तरराष्ट्रीयतावाद की निरर्थक बकवास के पीछे छिपाते हैं। जब उनसे अपने देश
की सेवा करने को कहा जाता है तो वे कहते हैं, “श्रीमानजी, हम लोग जगत-बन्धु
हैं और सार्वभौमिक भाईचारे में विश्वास करते हैं। हमें अंग्रेजों से नहीं झगड़ना
नौजवान भारत सभा और राष्ट्रीय नेतृत्व का मूल्यांकन / 301
चाहिए। वे हमारे भाई हैं।” क्या खूब विचार है, क्या खूबसूरत शब्दावली है! लेकिन
वे इसके उलझाव को नहीं पकड़ पाते। सार्वभौमिक भाईचारे के सिद्धान्त की माँग
है कि मनुष्य द्वारा मनुष्य का और राष्ट्र द्वारा राष्ट्र का शोषण असम्भव बना दिया
जाये, सबको बगैर किसी भेदभाव के समान अवसर प्रदान किये जायें। भारत में
ब्रिटिश शासन इन सब बातों का ठीक उल्टा है और हम उससे किसी प्रकार का
सरोकार नहीं रखेंगे।
अब दो शब्द समाजसेवा के बारे में। बहुत से नेक मनुष्य सोचते हैं कि
समाजसेवा (उन संकुचित अर्थों में जिनमें हमारे देश में इस शब्द का प्रयोग किया
जाता है और समझा जाता है) हमारी सभी बीमारियों का इलाज है और देशसेवा
का सबसे अच्छा तरीक़ा है। इस प्रकार हम देखते हैं कि बहुत से ईमानदार नौजवान
सारी ज़िन्दगी ग़रीबों में अनाज बाँटकर या बीमारों की सेवा करके ही सन्तुष्ट हो
जाते हैं। ये अच्छे और आत्मत्यागी लोग हैं लेकिन वे यह समझ पाने में असमर्थ
हैं कि भारत में भूख और बीमारी की समस्या को ख़ैरात के माध्यम से हल नहीं
किया जा सकता।
धार्मिक अन्धविश्वास और कट्टरपन हमारी प्रगति में बहुत बड़े बाधक हैं।
वे हमारे रास्ते के रोड़े साबित हुए हैं और हमें उनसे हर हालत में छुटकारा पा
लेना चाहिए। “जो चीज़ आज़ाद विचारों को बरदाश्त नहीं कर सकती उसे समाप्त
हो जाना चाहिए।” इसी प्रकार की और भी बहुत-सी कमज़ोरियाँ हैं जिन पर हमें
विजय पानी है। हिन्दुओं का दकियानूसीपन और कट्टरपन, मुसलमानों की
धर्मान्धता तथा दूसरे देशों के प्रति लगाव और आमतौर पर सभी सम्प्रदायों के
लोगों का संकुचित दृष्टिकोण आदि बातों का विदेशी शत्रु हमेशा लाभ उठाता है।
इस काम के लिए सभी समुदायों के क्रान्तिकारी उत्साह वाले नौजवानों की
आवश्यकता है।
हमने कुछ भी हासिल नहीं किया और हम किसी भी उपलब्धि के लिए
कुछ भी त्याग करने को तैयार नहीं हैं। सम्भावित उपलब्धि में किस सम्प्रदाय का
क्या हिस्सा होगा, यह तय करने में हमारे नेता आपस में झगड़ रहे हैं। महज
अपनी बुज़दिली को और आत्मत्याग की भावना के अभाव को छिपाने के लिए
वे असली समस्या पर पर्दा डालकर नक़ली समस्याएँ खड़ी कर रहे हैं। ये
आरामतलब राजनीतिज्ञ हड्डियों के उन मुट्ठीभर टुकड़ों पर आँखें गड़ाये बैठे हैं
जिन्हें, जैसा उनका विश्वास है, सशक्त शासकगण उनके सामने फेंक सकते हैं।
यह बहुत ही अपमानजनक बात है। जो लोग आज़ादी की लड़ाई में बढ़कर आते
हैं वे बैठकर यह तय नहीं कर सकते कि इतने त्याग के बाद उनकी क़ामयाबी
होगी और उसमें उन्हें इतना हिस्सा सुनिश्चित रहना चाहिए। इस प्रकार के लोग
कभी भी किसी प्रकार का त्याग नहीं करते। हमें ऐसे लोगों की आवश्यकता है
302 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
जो बग़ैर उम्मीदों के, निर्भय होकर और बग़ैर किसी प्रकार की हिचकिचाहट के
लड़ने को तैयार हों और बग़ैर सम्मान के, बग़ैर आँसू बहाने वालों के और बग़ैर
प्रशस्तिगान के मृत्यु का आलिंगन करने को तैयार हों। इस प्रकार के उत्साह के
अभाव में हम दो मोर्चों वाले उस महान युद्ध को नहीं लड़ सकेंगे, जिसे हमें
लड़ना है – यह युद्ध दो मोर्चों वाला है, क्योंकि हमें एक तरफ़ अन्दरूनी शत्रु से
लड़ना है और दूसरी तरफ़ बाहरी दुश्मन से। हमारी असली लड़ाई स्वयं अपनी
अयोग्यताओं के ख़िलाफ़ है। हमारा शत्रु और कुछ हमारे अपने लोग निजी स्वार्थ
के लिए उनका फ़ायदा उठाते हैं।
पंजाब के नौजवानो, दूसरे प्रान्तों के युवक अपने क्षेत्रों में जी-तोड़ परिश्रम कर
रहे हैं। बंगाल के नौजवानों ने 3 फ़रवरी को जिस जागृति तथा संगठन-क्षमता का
परिचय दिया उससे हमें सबक लेना चाहिए। अपनी तमाम कुर्बानियों के बावजूद
हमारे पंजाब को राजनीतिक तौर पर पिछड़ा हुआ प्रान्त कहा जाता है। क्यों? क्योंकि
लड़ाकू क़ौम होने के बावजूद हम संगठित एवं अनुशासित नहीं हैं। हमें तक्षशिला
विश्वविद्यालय पर गर्व है, लेकिन आज हमारे पास संस्कृति का अभाव है और
संस्कृति के लिए उच्चकोटि का साहित्य चाहिए, जिसकी संरचना सुविकसित भाषा
के अभाव में नहीं हो सकती। दुख की बात है कि आज हमारे पास उनमें से कुछ
भी नहीं है।
देश के सामने उपस्थित उपरोक्त प्रश्नों का समाधान तलाश करने के
साथ-साथ हमें अपनी जनता को आने वाले महान संघर्ष के लिए भी तैयार करना
पड़ेगा। हमारी राजनीतिक लड़ाई 1857 के स्वतन्त्रता संग्राम के ठीक बाद से ही
आरम्भ हो गयी थी। वह कई दौरों से होकर गुज़र चुकी है। बीसवीं शताब्दी के
आरम्भ से अंग्रेज़ नौकरशाही ने भारत के प्रति एक नयी नीति अपनायी है। वे हमारे
देश के पूँजीपति तथा निम्नपूँजीपति वर्ग को सहूलियतें देकर उन्हें अपनी तरफ़ मिला
रहे हैं। दोनों का हित एक हो रहा है। भारत में ब्रिटिश पूँजी के अधिकाधिक प्रवेश
का अनिवार्यतः यही परिणाम होगा। निकट भविष्य में बहुत शीघ्र हम उस वर्ग को
तथा उसके नेताओं को विदेशी शासकों के साथ जाते देखेंगे। किसी गोलमेज
कॉन्फ्रेंस या इसी प्रकार की और किसी संस्था द्वारा दोनों के बीच समझौता हो
जायेगा। तब उनमें शेर और लोमड़ी के बच्चे का रिश्ता नहीं रह जायेगा। समस्त
भारतीय जनता के आने वाले महान संघर्ष के भय से आज़ादी के इन तथाकथित
पैरोकारों की क़तारों की दूरी बग़ैर किसी समझौते के भी कम हो जायेगी।
देश को तैयार करने के भावी कार्यक्रम का शुभारम्भ इस आदर्श वाक्य से
होगा – “क्रान्ति जनता द्वारा, जनता के हित में।” दूसरे शब्दों में, 98 प्रतिशत के
लिए स्वराज्य। स्वराज्य, जनता द्वारा प्राप्त ही नहीं, बल्कि जनता के लिए भी। यह
एक बहुत कठिन काम है। यद्यपि हमारे नेताओं ने बहुत से सुझाव दिये हैं लेकिन
नौजवान भारत सभा और राष्ट्रीय नेतृत्व का मूल्यांकन / 303
जनता को जगाने के लिए कोई योजना पेश करके उस पर अमल करने का
किसी ने भी साहस नहीं किया। विस्तार में गये बग़ैर हम यह दावे से कह सकते
हैं कि अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए रूसी नवयुवकों की भाँति हमारे हज़ारों
मेधावी नौजवानों को अपना बहुमूल्य जीवन गाँवों में बिताना पड़ेगा और लोगों को
समझाना पड़ेगा कि भारतीय क्रान्ति वास्तव में क्या होगी। उन्हें समझाना पड़ेगा
कि आने वाली क्रान्ति का मतलब केवल मालिकों की तब्दीली नहीं होगा।
उसका अर्थ होगा नयी व्यवस्था का जन्म – एक नयी राजसत्ता। यह एक दिन या
एक वर्ष का काम नहीं है। कई दशकों का अद्वितीय आत्मबलिदान ही जनता को
उस महान कार्य के लिए तत्पर कर सकेगा और इस कार्य को केवल क्रान्तिकारी
युवक ही पूरा कर सकेंगे। क्रान्तिकारी से लामुहाला एक बम और पिस्तौल वाले
आदमी से अभिप्राय नहीं है।
युवकों के सामने जो काम है, वह काफ़ी कठिन है और उनके साधन बहुत
थोड़े हैं। उनके मार्ग में बहुत-सी बाधाएँ भी आ सकती हैं। लेकिन थोड़े किन्तु
निष्ठावान व्यक्तियों की लगन उन पर विजय पा सकती है। युवकों को आगे जाना
चाहिए। उनके सामने जो कठिन एवं बाधाओं से भरा हुआ मार्ग है, और उन्हें जो
महान कार्य सम्पन्न करना है, उसे समझना होगा। उन्हें अपने दिल में यह बात रख
लेनी चाहिए कि “सफलता मात्र एक संयोग है, जबकि बलिदान एक नियम है।”
उनके जीवन अनवरत असफलताओं के जीवन हो सकते हैं – गुरु गोविन्द सिंह को
आजीवन जिन नारकीय परिस्थितियों का सामना करना पड़ा था, हो सकता है उससे
भी अधिक नारकीय परिस्थितियों का सामना करना पड़े। फिर भी उन्हें यह कहकर
कि अरे, यह सब तो भ्रम था, पश्चाताप नहीं करना होगा।
नौजवान दोस्तो, इतनी बड़ी लड़ाई में अपनेआप को अकेला पाकर हताश मत
होना। अपनी शक्ति को पहचानो। अपने ऊपर भरोसा करो। सफलता आपकी है।
धनहीन, निस्सहाय एवं साधनहीन अवस्था में भाग्य आज़माने के लिए अपने पुत्र
को घर से बाहर भेजते समय जेम्स गैरीबाल्डी की महान जननी ने उससे जो शब्द
कहे थे (उन्हें) याद रखो। उसने कहा, “दस में से नौ बार एक नौजवान के साथ
जो सबसे अच्छी घटना हो सकती है वह यह है कि उसे जहाज़ की छत पर से
समुद्र में फेंक दिया जाये ताकि वह तैरकर या डूबकर स्वयं अपना रास्ता तय करे।”
प्रणाम है उस माँ को जिसने ये शब्द कहे और प्रणाम है उन लोगों को जो इन शब्दों
पर अमल करेंगे।
इतालवी पुनरुत्थान के प्रसिद्ध विद्वान मैजिनी ने एक बार कहा था, “सभी
महान राष्ट्रीय आन्दोलनों का शुभारम्भ जनता के अविख्यात या अनजाने,
ग़ैर-प्रभावशाली व्यक्तियों से होता है, जिनके पास समय और बाधाओं की परवाह
न करने वाला विश्वास तथा इच्छा-शक्ति के अलावा और कुछ नहीं होता।” जीवन
304 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
सेन्ट्रल असेंबली बम काण्ड, पर्चे एवं ऐतिहासिक अदालती बयान
की नौका को लंगर उठाने दो। उसे सागर की लहरों पर तैरने दो और फिर –
लंगर ठहरे हुए छिछले पानी में पड़ता है।
विस्तृत और आश्चर्यजनक सागर पर विश्वास करो
जहाँ ज्वार हर समय ताज़ा रहता है
और शक्तिशाली धाराएँ स्वतन्त्र होती हैं –
वहाँ अनायास, ऐ नौजवान कोलम्बस
सत्य का तुम्हारा नया विश्व हो सकता है।
मत हिचको, अवतार के सिद्धान्त को लेकर अपना दिमाग़ परेशान मत करो
और उसे तुम्हें हतोत्साहित मत करने दो। हर व्यक्ति महान हो सकता है, बशर्ते
कि वह प्रयास करे। अपने शहीदों को मत भूलो। करतार सिंह एक नौजवान
था, फिर भी बीस वर्ष से कम की आयु में ही देश की सेवा के लिए आगे
बढ़कर मुस्कुराते हुए वन्देमातरम् के नारे के साथ वह फाँसी के तख़्ते पर चढ़
गया। भाई बालमुकुन्द और अवधबिहारी दोनों ने ही जब ध्येय के लिए जीवन
दिया तो वे नौजवान थे। वे तुममें से ही थे। तुम्हें भी वैसा ही ईमानदार
देशभक्त और वैसा ही दिल से आज़ादी को प्यार करने वाला बनने का प्रयास
करना चाहिए, जैसेकि वे लोग थे। सब्र और होशो-हवास मत खोओ, साहस
और आशा मत छोड़ो। स्थिरता और दृढ़ता को स्वभाव के रूप में अपनाओ।
नौजवानों को चाहिए कि वे स्वतन्त्रतापूर्वक, गम्भीरता से, शान्ति और सब्र के
साथ सोचें। उन्हें चाहिए कि वे भारतीय स्वतन्त्रता के आदर्श को अपने जीवन के
एकमात्र लक्ष्य के रूप में अपनायें। उन्हें अपने पैरों पर खड़े होना चाहिए। उन्हें
अपनेआप को बाहरी प्रभावों से दूर रहकर संगठित करना चाहिए। उन्हें चाहिए कि
मक्कार तथा बेईमान लोगों के हाथों में न खेलें, जिनके साथ उनकी कोई समानता
नहीं है और जो हर नाजुक मौक़े पर आदर्श का परित्याग कर देते हैं। उन्हें चाहिए
कि संजीदगी और ईमानदारी के साथ “सेवा, त्याग, बलिदान” को अनुकरणीय
वाक्य के रूप में अपना मार्गदर्शक बनायें। याद रखिये कि “राष्ट्रनिर्माण के लिए
हज़ारों अज्ञात स्त्री-पुरुषों के बलिदान की आवश्यकता होती है जो अपने आराम व
हितों के मुक़ाबले, तथा अपने एवं अपने प्रियजनों के प्राणों के मुक़ाबले देश की
अधिक चिन्ता करते हैं।”
6-4-1928 वन्देमातरम!
(भगवतीचरण वोहरा बी.ए., प्रचारमन्त्री, नौजवान भारत सभा द्वारा
अरोड़ वंश प्रेस, लाहौर से मुद्रित एवं प्रकाशित।)
नौजवान भारत सभा और राष्ट्रीय नेतृत्व का मूल्यांकन / 305
लाला लाजपत राय के नाम खुला ख़त
लाला लाजपत राय को देश के बुजुर्ग नेता मानते हुए भी क्रान्तिकारी उनके
विचारों से असहमत थे। लाला जी और भगतसिंह व उनके साथियों के बीच बहस
में जो तर्क प्रस्तुत किये गये, उसका परिचय देने के लिए ‘किरती’ पत्रिका से कुछ
लेख यहाँ दिये जा रहे हैं।
नवम्बर, 1927 में लाला जी के नाम एक खुला पत्र छापा गया। जनवरी, 1928
में ‘लाला लाजपत राय और कुमारी एग्निस स्मेडली’ शीर्षक से दूसरा लेख छपा।
एग्निस स्मेडली यूरोप की प्रसिद्ध लेखिका थीं, जिनकी भारत व चीन के
स्वतन्त्रता-आन्दोलन में गहरी दिलचस्पी थी। लाला जी ने अपने अख़बार में मिस
स्मेडली की पुस्तक से कुछ अंश छापकर उनका छपना बन्द कर दिया। उसी सन्दर्भ
में यह लेख है। तीसरा लेख अगस्त, 1928 में ‘लाला लाजपत राय और नौजवान
आन्दोलन’ शीर्षक से छपा। – स.
‘किरती’ की सम्पादकीय टिप्पणी
(जिन सज्जनों को लाला लाजपत राय से राजनीतिक जीवन में अच्छी तरह वास्ता
पड़ा है, वे लाला जी की नेतागिरी की कोरी इच्छा और देश के लिए सिवाय टर्र-टर्र
करने तथा और कुछ न करने को अच्छी तरह जानते हैं। विदेशों में बसे भाइयों,
विशेषतः अमेरिका व कनाडा निवासी सिखों का विश्वास 1914 में ही लाला जी
से उठ गया था, जब आप कनाडा-अमेरिका गये थे और आपको उन हिन्दुस्तानी
भाइयों ने अपने गाढ़े पसीने की कमाई का काफ़ी रुपया हिन्दुस्तान में आज़ादी के
लक्ष्य के लिए दिया था और उन भाइयों के अनुसार लाला जी ने वह रुपया अपनी
मर्ज़ी से ख़र्च किया था और बहुत-सा रुपया स्वयं ही हड़प गये थे।
लाला जी की आजकल की मनमरजी और टेढ़ी चालों से हिन्दुस्तान के लोगों
व राजनीतिक क्षेत्रों में उनका विश्वास उठ गया है। हमारे पास 22 सज्जनों की ओर
से छपा ‘लाला जी के नाम ख़त’ प्रकाशित होने के लिए आया है, जिसका अनुवाद
प्रस्तुत है। – सम्पादक, ‘किरती’)
लाहौर, 18 सितम्बर, 1927
306 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़