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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 319, कुल 788 में से

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पृष्ठ 319

लाला जी, आप सर्वज्ञाता हैं। आपके समक्ष अनपढ़ सिख भाई अमेरिका में
से जत्थे बना-बनाकर यहाँ आये और उन्होंने जनता का आह्वान किया कि जनता
जंग में कोई सहायता न करे। अब वक़्त है, लोहा गर्म है, ज़बरदस्त चोट मारकर
आज़ाद हो जाओ। उनकी किसी ने नहीं सुनी। लेकिन वे शहादत पाकर अपना
कर्तव्य पूरा कर गये। उस समय आप सबकुछ जानते थे। आपके लिए तो कोई
नयी बात नहीं हुई। क्या आपके भीतर का सच मर गया था? आपको हिन्दुस्तान
लौटने की चाह ने तड़पाया? दरअसल आप अंग्रेज़ों की नज़र में भले बनकर
हिन्दुस्तान आना चाहते थे, इसलिए आप शान्त रहे और मौन धारण कर लिया।
अंग्रेज़ों के प्रति वफ़ादार बनने के लिए आप जर्मन के विरुद्ध क़लम उठाते रहे।
क्यों लाला जी, ठीक है ना?
लाला जी, वैसे तो सबकुछ आप जानते ही हैं, लेकिन चेतावनी देनी बेहतर
होगी। सुनिए, अब फिर युद्ध छिड़ने वाला है। अब फिर अंग्रेज़ हिन्दुस्तान को अपने
स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करेंगे। देश की जनता को सचेत करने के लिए घोषणा
करवा दो, ताकि जनता अंग्रेज़ों की चालबाज़ियों का शिकार न बने और अपने सहारे
खड़े होने के लिए तैयार हो जाये। क्या आप मैदान में आयेंगे?
लेकिन लाला जी तो अपनी अन्तर्आत्मा की आवाज़ के अनुसार काम करते हैं।
वे किसी के कहने पर कोई काम नहीं करते। लेकिन ज़माना बुरी चीज़ है। यह
किसी तरह भी नहीं जीने देता। क्यों, यह अन्तर्आत्मा का प्रकाश किसी भीतरी
कमज़ोरी का ही तो दूसरा नाम नहीं? प्रकाश प्रकाश में फ़र्क़ होता है, इसलिए लाला
जी ने भी अपने भीतर कई प्रकार के प्रकाश रखे हैं। एक आत्मप्रकाश तो वह था
जो लाला लाजपत राय को विदेशों में दौड़ाये फिरता था, एक प्रकाश यह है जो
उन्हें यहाँ ले आया है। एक प्रकार का प्रकाश लाहौर सेन्ट्रल जेल से छूटने के
पश्चात हुआ था। तब लाला जी असहयोग आन्दोलनकारियों का नेतृत्व करते थे।
समझ नहीं आता लाला जी, आप किस प्रकाश के पीछे फिरते हैं? कृपया बताइये!
क्या साम्यवाद स्वयं में, कम से कम आजकल की दुनिया में, फिरकेदारी नहीं
है? क्या यह एक वर्ग का दूसरे वर्ग के विरुद्ध संगठित संघर्ष नहीं है? लाला जी
तो यही कहते हैं। लेकिन लाला जी, आप स्वयं बतायें कि आप साम्यवाद को
फिरकेदारी समझकर ही तो नहीं आये? दरअसल आपने सोचा होगा कि लो
साम्यवादी क्या बनना, हिन्दू ही फिर बन जाते हैं।
लाला जी वर्ग-संघर्ष के भी विरुद्ध दिखायी देते हैं। क्योंकि मालूम होता है,
जैसे लाला जी को दो सौ बरसों से हिन्दुस्तान का ज्ञान है, ऐसे ही जो कुछ महात्मा
मार्क्स ने सिखाया है, उसका भी ज्ञान है। लाला जी ठहरे मज़दूर नेता, तो फिर क्यों
न वर्ग-संघर्ष के सिद्धान्त के ख़िलाफ़ हों, मज़दूर-आन्दोलन की नींव रखने वाले
महात्मा कार्ल मार्क्स के मोटे-मोटे तीन सिद्धान्तों में से एक वर्ग-संघर्ष है और इसी
नौजवान भारत सभा और राष्ट्रीय नेतृत्व का मूल्यांकन / 313