सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 329, कुल 788 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 329

जाता है और एक को युगान्तकारी और विद्रोही! पण्डित जी एक स्थान पर कहते
हैं – "To those who still fondly cherish old ideas and are striving to bring
back the conditions which prevailed in Arabia 1300 years ago or in the
vedic Age in India. I say, that it is inconcievable that you can bring back
the hoary past. The world of reality will not retrace its steps, the world of
imagiation may remain stationary."
वे कहते हैं कि जो अब भी क़ुरान के ज़माने के, अर्थात 1300 बरस पीछे
के अरब की स्थितियाँ पैदा करना चाहते हैं या जो पीछे वेदों के ज़माने की ओर
देख रहे हैं उनसे मेरा यही कहना है कि यह तो सोचा भी नहीं जा सकता कि वह
युग वापस लौट आयेगा, वास्तविक दुनिया पीछे नहीं लौट सकती, काल्पनिक
दुनिया को चाहे कुछ दिन यहीं स्थिर रखो। और इसीलिए वे विद्रोह की आवश्यकता
महसूस करते हैं।
सुभाष बाबू पूर्ण स्वराज के समर्थन में हैं क्योंकि वे कहते हैं कि अंग्रेज़ पश्चिम
के वासी हैं। हम पूर्व के। पण्डित जी कहते हैं, हमें अपना राज क़ायम करके सारी
सामाजिक व्यवस्था बदलनी चाहिए। उसके लिए पूरी-पूरी स्वतन्त्रता प्राप्त करने की
आवश्यकता है।
सुभाष बाबू मज़दूरों से सहानुभूति रखते हैं और उनकी स्थिति सुधारना चाहते
हैं। पण्डित जी एक क्रान्ति करके सारी व्यवस्था ही बदल देना चाहते हैं। सुभाष
भावुक हैं – दिल के लिए नौजवानों को बहुत कुछ दे रहे हैं, पर मात्र दिल के
लिए। दूसरा युगान्तकारी है जोकि दिल के साथ-साथ दिमाग़ को भी बहुत कुछ
दे रहा है – "They should aim at Swaraj for the masses based on socialism.
That was a revolutionary change which they could not bring about without
revolutionary methods....Mere reform or gradual repairing of the existing
machinery could not achieve the real proper Swaraj for the General
Masses." (अर्थात) हमारा आदर्श समाजवादी सिद्धान्तों के अनुसार पूर्ण स्वराज्य
होना चाहिए, जोकि युगान्तकारी तरीक़ों के बिना प्राप्त नहीं हो सकता। केवल सुधार
और मौजूदा सरकार की मशीनरी की धीमी-धीमी की गयी मरम्मत जनता के लिए
वास्तविक स्वराज्य नहीं ला सकती।
यह उनके विचारों का ठीक-ठीक अक्स है। सुभाष बाबू राष्ट्रीय राजनीति की
ओर उतने समय तक ही ध्यान देना आवश्यक समझते हैं जितने समय तक दुनिया
की राजनीति में हिन्दुस्तान की रक्षा और विकास का सवाल है। परन्तु पण्डित जी
राष्ट्रीयता के संकीर्ण दायरों से निकलकर खुले मैदान में आ गये हैं।
अब सवाल यह है कि हमारे सामने दोनों विचार आ गये हैं। हमें किस ओर
झुकना चाहिए। एक पंजाबी समाचारपत्र ने सुभाष की तारीफ़ के पुल बाँधकर
नौजवान भारत सभा और राष्ट्रीय नेतृत्व का मूल्यांकन / 323