भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
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शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 328, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंकर देते हैं – चाँदनी रात में ताजमहल को देखो और जिस दिल की यह समझ
का परिणाम था, उसकी महानता की कल्पना करो। सोचो एक बंगाली उपन्यासकार
ने लिखा है कि हममें 'यह हमारे आँसू ही जम-जमकर पत्थर बन गये हैं।' वह
भी वापस वेदों की ओर ही लौट चलने का आह्वान करते हैं। आपने अपने पूना वाले
भाषण में 'राष्ट्रवादिता' के सम्बन्ध में कहा है कि अन्तरराष्ट्रीयतावादी, राष्ट्रीयतावाद
को एक संकीर्ण दायरे वाली विचारधारा बताते हैं, लेकिन यह भूल है। हिन्दुस्तानी
राष्ट्रीयता का विचार ऐसा नहीं है। वह न संकीर्ण है। न निजी स्वार्थ से प्रेरित है
और न उत्पीड़नकारी है, क्योंकि इसकी जड़ या मूल तो यह 'सत्यम शिवम
सुन्दरम' है, अर्थात 'सच, कल्याणकारी और सुन्दर।'
यह भी वही छायावाद है। कोरी भावुकता है। साथ ही उन्हें भी अपने पुरातन
युग पर बहुत विश्वास है। वह प्रत्येक बात में अपने पुरातन युग की महानता देखते
हैं। पंचायतीराज का ढंग उनके विचार में कोई नया नहीं। 'पंचायती राज और जनता
का राज' वे कहते हैं कि हिन्दुस्तान में बहुत पुराना है। वे तो यहाँ तक कहते हैं
कि साम्यवाद भी हिन्दुस्तान के लिए नयी चीज़ नहीं। ख़ैर, उन्होंने सबसे ज़्यादा उस
दिन के भाषण में ज़ोर जिस बात पर दिया था वह यह थी कि हिन्दुस्तान का दुनिया
के लिए एक विशेष सन्देश है। पण्डित जवाहरलाल आदि के विचार इसके बिल्कुल
विपरीत हैं। वे कहते हैं –
“जिस देश में जाओ वही समझता है कि उसका दुनिया के लिए एक विशेष
सन्देश है। इंग्लैण्ड दुनिया को संस्कृति सिखाने का ठेकेदार बनता है। मैं तो कोई
विशेष बात अपने देश के पास नहीं देखता। सुभाष बाबू को उन बातों पर बहुत
यक़ीन है।” जवाहरलाल कहते हैं – "Every youth must rebel. Not only in
political sphere, but in social, economic and religious spheres also. I have
not much use for any man who comes and tells me that such and such thing
is said in Koran, Every thing unreasonable must be discarded even if they
find authority for it in the Vedas and Koran." (यानी) “प्रत्येक नौजवान को
विद्रोह करना चाहिए। राजनीतिक क्षेत्र में ही नहीं बल्कि सामाजिक, आर्थिक और
धार्मिक क्षेत्र में भी। मुझे ऐसे व्यक्ति की कोई आवश्यकता नहीं जो आकर कहे
कि फलाँ बात कुरान में लिखी हुई है। कोई बात जो अपनी समझदारी की परख
में सही साबित न हो उसे चाहे वेद और कुरान में कितना ही अच्छा क्यों न कहा
गया हो, नहीं माननी चाहिए।”
यह एक युगान्तकारी के विचार हैं और सुभाष के एक राजपरिवर्तनकारी के
विचार हैं। एक के विचार में हमारी पुरानी चीजें बहुत अच्छी हैं और दूसरे के
विचार में उनके विरुद्ध विद्रोह कर दिया जाना चाहिए। एक को भावुक कहा
322 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़