भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 323, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्दी, बारिश, धूप, लू और कोहरे में रात-दिन किसानों को काम करते देखते
हैं। लेकिन वे बेचारे रूखी-सूखी रोटी खाकर गुज़ारा कर रहे हैं – और क़र्ज़ के
नीचे दबे हुए हैं। तब क्या हम तड़प नहीं उठते? उस समय हमारे दिलों में आग
नहीं भड़क उठती? तब भी क्या हमें किसी की आवश्यकता रह जाती है जो
आकर यह बताये कि इस व्यवस्था को बदलने का प्रयास करो। जब हम नित्य
प्रति देखते हैं कि श्रमिक भूखे मरते हैं और निठल्ले बैठकर खाने वाले आनन्द
मना रहे हैं, तो क्या हम इस आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था की गड़बड़ियाँ
अनुभव नहीं कर सकते? जब हम देखते हैं कि दिनोदिन अपराध बढ़ रहे हैं,
जनता की हालत रोज़-ब-रोज़ दयनीय होती जा रही है, तब क्या हमें बाहरी
उपदेशकों की आवश्यकता है जो हमें आकर समझायें कि क्रान्ति की
आवश्यकता है...करोड़ों मनुष्यों को जिन्हें हमने अछूत कहकर दूर किया हुआ है
उनकी दर्दनाक स्थितियाँ देखकर क्या क्रोध नहीं आता? करोड़ों (लोग) दुनिया
का बहुत विकास कर सकते हैं, वे जन-सेवा कर सकते थे, लेकिन आज वे हम
पर भार महसूस होते हैं। उनकी इस स्थिति में सुधार के लिए, उन्हें पूर्ण रूप
से मनुष्य बनाने के लिए और कुओं की जगत पर चढ़ाने-मात्र के लिए क्या
आन्दोलनों की ज़रूरत नहीं है? क्या उन्हें ऐसी अवस्था में लाने की आवश्यकता
नहीं थी कि वे हमारी तरह कमा-खा सकें? इसके लिए क्या सामाजिक और
आर्थिक नियमों में क्रान्ति आवश्यक नहीं है? क्या पंजाब तथा हिन्दुस्तान के
नौजवानों में स्वयं कुछ अहसास करने की कोई शक्ति शेष नहीं बची? उनके
सीने में क्या दिल नहीं धड़कता? क्या उनके दिलों में मानवता नहीं है? नहीं तो
फिर क्यों कहा जाता है कि विदेशियों ने आकर उन्हें उकसाया है। हाँ, हम यह
स्वीकारते हैं कि रूसी क्रान्ति ने दुनिया के समक्ष एकदम नये विचार रखे हैं।
हम मानते हैं कि जिन बातों का हल शायद अभी हम स्वयं नहीं सोच सकते,
रूसी विद्वानों ने उम्रभर कष्ट सहते हुए, तिल-तिल कर जीवन समाप्त करते हुए
उनके बारे में अपने विचार दुनिया के सामने रखे। क्या उन्हें उसका कोई लाभ
नहीं मिलना चाहिए? क्या उनसे विचारों की समानता भी उकसावा है? तब तो
लाला जी को मैजिनी ने देश के नौजवानों को गुमराह करके देशसेवा के काम
में जुटाया हुआ था!
प्रश्न यह है कि आजकल, 1928 में, क्या दुनिया को फ़्रांसीसी क्रान्ति से
कोई सबक सीखना और उसे अपना आदर्श बनाना चाहिए या आज नये वातावरण
में नये विचारों से पूर्ण रूसी क्रान्ति को? क्या लाला जी की यह मंशा है कि
अब अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध ही क्रान्ति की जाये और शासन की बागडोर अमीरों
के हाथों में दी जाये? करोड़ों जन इसी तरह नहीं, इससे भी अधिक बुरी
स्थितियों में पड़ें, मरें और तब फिर सैकड़ों बरसों के खून-ख़राबे के पश्चात
नौजवान भारत सभा और राष्ट्रीय नेतृत्व का मूल्यांकन / 317