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सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

विश्वासघात और निराशा / 97
सैनिक की सहायता से कृपालसिंह का सम्भवतः फरवरी महीने में इस दल में प्रवेश
हुआ था। किन्तु इसके कुछ ही दिन बाद कृपालसिंह की गतिविधि पर बहुत लोगों
को सन्देह हो गया। तब कुछ नेताओं की सलाह हुई कि उस पर हरदम नज़र
रहनी चाहिए। इसका फल यह हुआ कि दो-चार दिन में ही इसका पुलिस के
हाकिमों के पास प्रतिदिन एक निर्धारित समय पर आना-जाना देख लिया गया।
इधर विप्लव का झण्डा खड़ा करने को दो-चार दिन की देर रह गई थी, इसलिए
सोचा गया कि इस दशा में यदि इसे दुनिया से हटा दिया जाय तो ऐसी विकट
गड़बड़ मच सकती है जिससे कि शायद हमारे अन्तिम मनोरथ की सिद्धि में बेढब
विघ्न आ पड़े। इस आशंका के मारे इस काँटे को निकालने का कुछ भी उद्योग
नहीं किया गया। ऐसी दशा में पूर्व बंगाल वाले उसे दुनिया के झंझटों से छुड़ाये
बिना कभी न मानते। अस्तु, बाद में पता चला कि विप्लव के लिए जो दिन मुकर्रर
किया गया था उसकी खबर पुलिस को लग चुकी है, क्योंकि कृपालसिंह से वह
दिन छिपाया नहीं गया था। अतएव निश्चय हुआ कि कृपालसिंह अब घर से बाहर
न जाने पावे और विप्लव की तारीख इक्कीस फरवरी के बदले उन्नीस फरवरी—
यानी दो दिन पहले—कर दी गई। किन्तु दुर्भाग्य से हो या होनहार के कारण
हो—कुछ भी कहिए—इस नई तारीख की सूचना छावनी में दे आने का काम
जिन्हें सौंपा गया था उन्होंने उक्त संवाद छावनी में पहुँचकर जब रासबिहारी से
कहा, "छावनी में उन्नीस फरवरी की इत्तिला दे आया" तब कृपालसिंह वहीं बैठा
हुआ था। कृपालसिंह का हाल सब लोगों को मालूम न था। शायद यह घटना
अट्ठारह-फरवरी की है। उसी दिन दोपहर के समय जब भोजन करने के लिए सब
लोग इधर-उधर चले गए तब कृपालसिंह ने वहाँ से टरक जाना चाहा। किन्तु
उस पर नज़र रखने के लिए जिनकी नियुक्ति कर दी गई थी उन्होंने उसका हाथ
पकड़कर खींच-तान नहीं की, बल्कि हर वक्त उसके साथ बने रहे। कृपालसिंह
ने मकान के बाहर आते ही देखा कि भेदिया पुलिस का एक आदमी साइकिल पर
उसी ओर आ रहा है। उससे कृपालसिंह की मुलाकात होते ही उन्नीस फरवरी
की इत्तला पुलिस को मिल गई और इसके कुछ घण्टे बाद धर-पकड़ शुरू हो गई।
जिस मकान में कृपालसिंह था उसमें सात-आठ गिरफ्तारियाँ हुईं। इसमें कुछ
मुखिया भी थे। जिस मकान में रासबिहारी रहते थे उसका पता दो-एक मुखियों
के सिवा और किसी को मालूम न था, क्योंकि जिनसे मिलने-जुलने की ज़रूरत
होती थी उनसे रासबिहारी अन्यान्य मकानों में ही मिलते थे। इधर मेगज़ीन पर
देशी सिपाहियों के बदले गोरों का पहरा हो गया। शहर के अंग्रेज़ वालण्टियर
फ़ौजी तैयारी से लैस कर दिये गए। उन सबको कैम्प बनाकर रहने का हुक्म हो
गया। युद्ध के समय चौकन्ने होकर रहने की जिस प्रणाली को 'पिकेट' करना कहते
हैं, उस प्रणाली से गोरे सिपाही और वालण्टियर लोग पहरा देने लगे। हथियार-
बन्द गोरे सिपाहियों की टोलियाँ फ़ौजी ढंग से बस्ती-भर में चक्कर लगाने लगीं।
लाहौर, दिल्ली, फिरोजपुर सभी जगह ऐसा ही हुआ। लोगों ने समझा कि इस

98 / बन्दी जीवन
फ़ौजी तैयारी का कारण यूरोपीय युद्ध का कोई खटका होगा। देशी सिपाहियों के
मन में घबराहट छा गई (उन्हीं के जो कि गुप्त-योजना में थे) इधर विप्लव की
तारीख़ दो दिन पहले कर देने से देहात के सब लोग अपने-अपने निर्दिष्ट स्थानो
में एकत्र नहीं हो सके। सिर्फ़ करतारसिंह सत्तर-अस्सी आदमियों के साथ
फिरोजपुर की छावनी में, जैसा कि पहले निश्चय हो चुका था, पहुँच गए। उस
समय वहाँ भी वही हाल था जैसा लाहौर में हो रहा था—मेगजीन देशी सिपाहियों
को हटाकर गोरों के अधिकार में दे दी गई थी और उस पर गोरे सिपाही बड़ी
मुस्तैदी से पहरा दे रहे थे। किन्तु करतारसिंह को लाहौर की नई घटना का कोई
समाचार नहीं मिला था।
बारकों में ऐसी चौकसी रहने पर भी करतारसिंह आकर काली पलटन के
हवलदार से मिले। हवलदार ने कहा कि अब कुछ दिन तक इन्तज़ार किये बिना
हम लोग कुछ भी नहीं कर सकते, क्योंकि ऐसी दशा में यदि कुछ किया जायगा
तो सत्यानाश हो जायगा, इससे करतारसिंह ने समझ लिया कि इस बार अब कुछ
होने की आशा नहीं। उन्होंने ताड़ लिया कि दो-चार दिन में कैसी दशा हो जाने
वाली है। उन्होंने कई तरह सैनिकों को समझाने का असफल उद्योग किया कि
यदि आज इसी दम कुछ न किया जायगा तो फिर और कुछ होने का नहीं, यही
पहला और आखिरी मौक़ा है। परन्तु सिपाहियों ने अंग्रेज़ पहरेदारों की ओर
उँगली से इशारा करके कहा कि इस समय कुछ कर गुज़रने की कोशिश बिलकुल
बेकार होगी। आँखों देखते भला मक्खी कैसे निगली जा सकती है, जान-बूझकर
कैसे आग में कूदा जाय ? उस दिन भारतवासियों के हाथ में यदि उपयुक्त परि-
माण में अस्त्र-शस्त्र होते तो ऐसा विश्वासघात हो जाने पर भी भारत में विप्लव
किसी के रोके न रुक सकता था। अथवा यदि पहले से ही शिक्षित और उपयुक्त
मनुष्य विप्लव की दीक्षा लेकर फ़ौजों में भर्ती होते तो भी उस समय की विप्लव
की तैयारी व्यर्थ न जाती। उस दिन लाचार होकर करतारसिंह को खाली हाथ
लौट जाना पड़ा। देहात के आदमी अपने-अपने घर को चले गए। करतारसिंह
लाहौर पहुँचे। अब सारे पंजाब में धड़ाधड़ गिरफ्तारियाँ होने लगीं। जो लोग
पकड़े जाते थे उनमें से कोई-कोई भंडाफोड़ करके और भी दस-पाँच साथियों का
नाम-धाम प्रकट करने लगे। इस प्रकार कभी-कभी गोरी फ़ौज किसी गाँव को जा
घेरती और तब बहुत-से आदमी एक ही जगह गिरफ़्तार कर लिए जाते। भार-
तीय सिपाहियों के मन में एक तरह की बेचैनी देख पड़ी। रावलपिंडी की एक
काली पलटन बरखास्त कर दी गई। लाहौर में जहाँ-तहाँ खानातालाशियाँ और
गिरफ़्तारियाँ होने लगीं। किसी सिक्ख पर ज़रा-सा भी सन्देह होते ही उसे सीधा
थाने में पहुँचाया जाता था। इसी तरह पकड़-धकड़ होने में कभी-कभी दोनों तरफ़
से गोली चल जाती थी। दो ही चार दिन में मामला इस तरह संगीन हो गया।
अब दल में परस्पर एक-दूसरे पर विश्वास करना कठिन हो गया।—करतारसिंह
बुद्धिमान युवक थे। लाहौर आते ही वे सीधे रासबिहारी के डेरे पर पहुँचे और

विश्वासघात और निराशा / 99

किसी भी स्थान पर नहीं गए । क्योंकि रासबिहारी वाले मकान को बहुत कम
आदमी जानते थे, इसलिए वह सबसे अधिक सुरक्षित था । उस समय रासबिहारी
बड़ी उदासी से एक खाट पर मुर्दे की तरह पड़े थे । करतारसिंह भी चुपचाप उनकी
बगल में पड़ी हुई एक खाट पर लेट रहे । थकावट के मारे उनका शरीर शिथिल
हो रहा था । दोनों ही चुप थे । उनके उस म्लान मौन से मर्म की बड़ी ही निदा-
रुण पीड़ा प्रकट होने लगी । हम में से कितने लोगों को जीवन में उतनी बड़ी चोट
सहनी पड़ी है ? जिसकी कल्पना जितनी अधिक बड़ी होती है, भाव की सघनता
और गम्भीरता जिसकी जितनी ही अधिक होती है, उसको जीवन में उतनी ही
भारी चोट भी लगती है । उनकी कितनी बड़ी आशा छिन्न-भिन्न हो गई ? उनका
विराट् आयोजन बात की बात में धूल में मिल गया । ऐसी दशा में शिक्षित मन
का भाव भी बहुत-कुछ बदल जाता है, फिर सिपाहियों के मन पर यदि विषम
आतंक का भाव अपना अधिकार जमा ले तो इसमें विचित्रता कुछ भी नहीं । दोनों
नेताओं ने सोचा कि यूरोपीय महासमर की उलझन के दिनों में भी—ऐसा बढ़िया
सुभीता रहने पर भी, विप्लव दल सारी तैयारी करके भी कुछ नहीं कर सका ।
कौन जाने अब फिर कब ऐसा मौका मिलेगा ! —किन्तु यह भयंकर चोट खाकर
भी वे फिर कमर कसकर काम में लग गए । उनके हृदय की असीम आशा, हृदय
का बल मानो घटना चाहता ही नहीं था। इसी से वे फिर नये उत्साह से घोर
अन्धकारावृत भारत-आकाश के एकान्त कोने में अपने वक्षःस्थल की दीप-शिखा
के ही बल और भरोसे पर उस हताशाच्छन्न जीवन-मार्ग पर फिर आगे बढ़े। उनके
दिल में बड़ी गहरी चोट लगी थी किन्तु इससे उनके हाथ-पैर फूल नहीं गए। इतने
बड़े मानसिक बल की मर्यादा को समझने वाले हममें कितने मनुष्य हैं ? वीर की
इज्जत करना वीर ही जानता है, इसी से भारत के विप्लवकारी दल को अंग्रेज़
जिस दृष्टि से देखते थे, या देखते हैं, उस दृष्टि से उस दल को कितने भारतवासी
देख सकते हैं ? भारतीय विप्लवपन्थी दल को भारतवासियों ने सदा उपेक्षा की
दृष्टि से देखा है। यह लापरवाही भारतीय विप्लवकारी दल की छाती को, एक
बड़ी वज़नदार चट्टान की तरह, बड़ी बेदर्दी से दबाया करती थी। उक्त दल की
ऐसी अवज्ञा ओर किसी ने भी नहीं की। इस दल को जिनसे सबसे अधिक सहानु-
भूति की आशा थी उन्हीं ने उसकी लानत-मलामत की है, किन्तु इतने पर भी दल
ने हिम्मत नहीं छोड़ी। इस दलवालों के प्राण मानो किसी स्वप्नलोक की कल्पना
से भरपूर थे; अपने प्राणों की पूंजी के सिवा इन्हें और किसी का भरोसा न था—
विप्लव की यह तैयारी बेकार तो हो गई थी किन्तु सफलता-निष्फलता की कसौटी
से किसी भी आन्दोलन पर विचार करना ठीक नहीं। इस आन्दोलन पर विचार
करने के लिए यह देखना चाहिए कि इस आन्दोलन के पीछे कितने बड़े आदर्श
की कल्पना थी और इस आदर्श को प्राप्त करने के लिए कितने व्यक्तियों ने प्राणों
की बाजी लगाकर कहाँ तक त्याग अंगीकार किया था। ऐसी-ऐसी बातों पर
ध्यान देकर ही इस आन्दोलन पर विचार किया जाना चाहिए। किस आदर्श की

100 / बन्दी जीवन
प्रेरणा से जाग्रत होकर भारत के युवकों ने हथेली में जान लेकर यह खेल खेला
तथा यूरोपीय महायुद्ध छिड़ने से पहले भारत में विप्लव करने की इच्छा रखने
वाला दल इसके लिए कैसी तैयारी कर रहा था, और पंजाब में गदर का उद्योग
निष्फल हो जाने के पश्चात् भारत के इस विप्लवपन्थी दल का क्या स्वरूप
हो गया था, इन बातों पर इस पुस्तक के अगले भागों में विचार करने की
इच्छा है।

द्वितीय भाग

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1
पहली निष्फलता के बाद
पंजाब की विप्लव योजना भले ही विफल हो गई हो किन्तु इतने से ही
भारत में विप्लव की चेष्टा शान्त नहीं हुई । एक-एक करके विप्लवियों की सभी
चेष्टाएँ व्यर्थ हुईं, एक-एक दो-दो करके कितने लोगों ने फांसी के तख्ते पर जान
न्योछावर कर दी, क़ैदखानों मे बन्दी होकर उनके कितने साथी तिल-तिल करके
प्राणों की बलि देने लगे और इसके कारण कितने ही परिवार बरबाद हो गए,
कितनों ही की माताएँ ये सब दृश्य अधिक न सह सकीं और पागल हो गईं, कितनों
ही के पिताओं की सरकारी नौकरी चली जाने से उनका परिवार ग़रीबी की
चक्की में पिसकर आश्रय की खोज में दर-दर फिरने लगा, समाज के अन्दर एक
मर्मवेधी अन्तर्नाद गहरा उठा, किन्तु विप्लवियों का दल फिर भी न दहला । क्यों
ऐसा हुआ ?
भारत के इतिहास में प्रायः देखा गया है कि किसी अच्छे नेता की अधीनता
में भारतवासियों ने कितनी ही बार वीरता दिखाकर भारत का मुख उज्ज्वल
किया है, कितनी बार असम्भव को सम्भव कर दिखाया और सारे संसार को
चकित कर दिया है, किन्तु भारत के दुर्भाग्य से ज्योंही यहाँ नेता का अभाव हुआ,
त्योंही फिर देश ने घोर निद्रा में मग्न होकर ऐसा रूप धारण कर लिया कि फिर
सहसा यह विश्वास नही होता कि यही भारत वह भारत है,—अतीत काल की
कीर्ति मानो उम समय भ्रम-सा दिखाई देने लगती है । इसी से हम देखते हैं कि
रणजीतसिंह के बाद खालसा समाज में वैसे किसी और शक्तिशाली पुरुष का
आविर्भाव न होने से सिक्ख जाति फिर सिर उठा ही नहीं सकी, राणा राजसिंह
के बाद राजपूताना मर-सा गया और महाराज छत्रसाल के बाद बुन्देलखण्ड ने
म्लान मौनता धारण कर ली । ऐसा होने का कारण है भारत की पूर्व सुकृति के
बल से कभी-कभी यहाँ भाग्यशाली महापुरुषों का आविर्भाव हो जाता है तो भी
प्रत्येक जीवन जिस प्रकार पुरुष-परम्परा में अपना प्रवाह बनाये रखता है उस
प्रकार भारत की जीवन प्रतिष्ठा नहीं होती है इसीलिए¹ यहाँ एक महापुरुष के

  1. मध्यकाल में आकर भारतीय राष्ट्र की जीवनधारा क्षीण हो जाती है, एक सतत प्रवाह के
    साथ नहीं बहती यह ठीक है। भारतीय राष्ट्र के समूचे जीवन के लिए यह नहीं कहा जा
    सकता। भारतीय इतिहास में Stagnation का यह काल शायद आज समाप्त हो रहा
    है। यह एक इतिहास का गहरा प्रश्न है जिस पर यहाँ पूरा विचार नहीं हो सकता।

104 / बन्दी जीवन
बाद दूसरे महापुरुष का आविर्भाव सम्भव नहीं हो पाता ।
किन्तु इस बार के इस नवीन युवकों के विप्लव आन्दोलन की विशेषता
यह थी कि यह आन्दोलन किसी का मुंह नहीं देखता रहा । देश के गण्यमान्य
लब्धप्रतिष्ठ नेता लोग जब एक रास्ते पर चल रहे थे, तब यह गुमनाम गरीब
युवकों का सम्प्रदाय सैकड़ों विपदाओं में डगमगाये बिना अनेक बाधाओं और
कष्टों में हिम्मत हारे बिना, देश के नेताओं के विरुद्ध ही नहीं, प्रत्युत उनके द्वारा
निषिद्ध मार्ग में जाते हुए हिचकिचाता न था। महामति तिलक ने जेल से बाहर
आकर पुराने आदर्शों में भ्रम देखा और अपना मत बदल लिया, और अन्त में
देश छोड़कर जर्मनी जाने का संकल्प भी प्रकट किया । मनीषी विपिनचन्द्र भी
इंग्लैंड से वापस आकर अपनी सारी शक्ति के प्रयोग से यह प्रचार करने लग गये
कि पूर्ण स्वाधीनता का आदर्श भारत के लिए सुविधाजनक न होगा । ऋषि
अरविन्द राजनैतिक क्षेत्र से छुट्टी लेकर भगवान् की लीला के उपयुक्त आधार
बनने के लिए तपस्या करने लगे, और पूर्ण योग के आदर्श का, गृहस्थ और
संन्यासी जीवन में सामंजस्य की कल्पना का, तथा यह जगत् मिथ्या नहीं, उसी
सर्वशक्तिमान् का विलास ही है, लीलामय का लीलाक्षेत्र है, इत्यादि बातों का
प्रचार करने लगे । भारत के राजनैतिक क्षेत्र में उस समय उल्लेख योग्य और
कोई प्रभावशाली नेता नहीं रहे। इन्हीं कुछ नेताओं ने भारतवर्ष में पूर्ण स्वाधीनता
के आदर्श का पहले प्रचार किया था। उसी के फलस्वरूप समाज में जो प्राणों
की स्फूर्ति हुई, उसी नवजागरण की तरंग आज भी भारत के हृदय को विचित्र
प्रेरणा से स्पन्दित कर रही है। इनमें से दो जनों ने तो पुराने आदर्श को छोड़ ही
दिया; तीसरे ने मौन साध लिया । भारत के राजनैतिक क्षेत्र में कोई और पथ-
दर्शक न रहा । पर भारत के प्राण तो जाग चुके थे, उनमें गति आ चुकी थी ।
जहाँ जीवन है वहाँ प्राण तो पथ-प्रदर्शक होते हैं । अपने अन्तरात्मा की ओर ही
लक्ष्य रखकर जिन्होंने जीवन-पथ की यात्रा की थी, भारत के उन युवकों ने अपना
मत नहीं बदला । वे देश के नेताओं से सलाह लेकर तो इस काम में नहीं उतरे थे,
और न कभी इन नेताओं पर उन्होंने भरोसा ही रक्खा था। नेताओं ने जिन
आदर्शों का प्रचार किया था उन आदर्शों को पाने के लिए जो कुछ करना उचित
था सो उन्होंने कभी किया नहीं । भारत के लब्धप्रतिष्ठ विख्यात नेताओं में से
दो-एक को छोड़कर सबके विषय में कहा जा सकता है कि वे जिस बात को अपनी
विवेचना से उचित समझते हैं उसे कहते नहीं हैं और अनेक बार जो कहते हैं
सो करते नहीं हैं । अर्थात् जिस आदर्श का वे प्रचार करते हैं उसे कार्य में परिणत
करने को जितना अग्रसर होना चाहिए उतना अग्रसर वे नहीं होते ।
किन्तु भारत के उन नवयुवकों के विषय में यह बात नहीं कही जा सकती ।
देश के अधिकांश नेता, हम स्वयं क्या कुछ कर सकते हैं या नहीं कर सकते यही
देखकर फैसला देते हैं कि देश के लिए क्या कार्यक्रम उचित है, क्या अनुचित ;
किन्तु हमारे युवक जो कुछ सिद्धान्त तय करते हैं उसमें क्या कर सकते हैं, क्या

पहली निष्फलता के बाद / 105

नहीं कर सकते, इस बात की चर्चा नहीं रहती। बल्कि हमें क्या करना उचित है
यही उनके नजदीक सबसे बड़ी बात होती है। युवकों के मन की अवस्था ऐसी थी
या है इसी कारण उनमें से ही विप्लवियों का आविर्भाव सम्भव हुआ है। और
ठीक इसी कारण विप्लवी लोग जीवन-पथ में अग्रसर होते समय किसी बड़े नेता
का मुंह ताकते न रहते थे और न सफलता-निष्फलता का हिसाब जाँचा करते थे।
जिस चरित्र-बल के रहने से जीवन की समस्त व्यर्थताओं के बीच मनुष्य आदर्श-
भ्रष्ट नहीं होता, सम्पद-विपद में, सफलता-निष्फलता में, जीवन की सब अवस्थाओं
में जिस चरित्र-बल के जोर पर मनुष्य अपने आदर्श को लिये हुए डटा रहता है,
विप्लवियों के बीच वैसे चरित्र वाले लोग जिस परिमाण में पाये जाते हैं, विप्लव
दल के बाहर कुछ एक महाप्राण नेताओं को छोड़कर वैसे बलिष्ठ-चरित्र के आदमी
पाना दुर्लभ है। और विप्लव दल मे वैसे चरित्र का अभाव न था इसी कारण
विषम विपत्ति के दिनों में भी वे चंचल नही होते और पथ को दुर्गम देखकर वे
लोग कभी पीछे नही हटते । इसीलिए पंजाब की विप्लव चेष्टा के नष्ट हो जाने
पर भी भारत मे विप्लव का प्रयत्न उसी तरह चलता रहा ।
अपने दल के विश्वासघात के कारण पंजाब मे दो सौ आदमी पकड़े गए ।
पंजाब का विप्लव दल इस प्रकार प्रायः नष्ट हो गया। जो जीवन-मरण के खेल
के साथी थे, अब वे प्रायः सभी सरकार के क़ैदी हो गए। जीवन रहते भी मानो
वे मर से गए। पग-पग पर प्रमाणित होने लगा कि यह आग के साथ खेलना है।
आज जो हमारा साथी था कल वही पुलिस के पंजे में फँस जाता है। आज जो
विश्वासी था कल वह विपत्ति मे पड़कर कर्तव्याकर्तव्य भूल जाता है, जीवन का
आदर्श क्षुद्र-स्वार्थ के नीचे दब जाता है। विप्लवियों के जितने केन्द्र थे एक-एक
करके प्राय. सभी प्रकट हो गए। लाहौर के मुहल्ले-मुहल्ले मे खानातलाशी और
घर-पकड़ होने लगी। कही एक घर मे बम मिला, कही तार काटने के औजार
आदि। रासबिहारी जिस बैठक में रहते थे वह बैठक दो-चार आदमियो के सिवाय
किसी की जानी न थी इसी कारण तब ही वे निरापद रहे। पर हालात रोज
बदल रहे थे। कब क्या होता कुछ कहा नही जा सकता था—फिर नये सिरे से
विप्लव की आयोजना होने लगी। पहले तीन सिक्खों को लाहौर से बाहर भेजने
का संकल्प हुआ। ताँगा करके ये तीन सिक्ख जा रहे थे। सड़क के एक मोड़ पर
पुलिस ने ताँगा रोका, कारण—कि ये सिक्ख थे, सिक्ख देखते ही पुलिस ने ताँगा
रोककर कहा, एक बार उन्हें थाने जाना होगा और फिर उनका नाम-धाम आदि
लिखा जाने पर वे अपनी जाने की जगह जा सकेंगे। उनके पास रिवाल्वरें थीं।
इसके अलावा वे जानते थे कि पुलिस को पूर्ण सन्तोषजनक उत्तर वे दे न सकेंगे।
कहाँ से आते हैं, कहाँ जाते हैं यह बतलाना उनके लिए उस समय सम्भव न था;
आखिरकार थाने जाने का अर्थ ही था, अथाह समुद्र के तल मे डूब जाना। इस
दशा मे बगैर कुछ कहे-सुने पकड़े न जाकर एक बार उन्होने अन्तिम बार भाग्य-
परीक्षा कर देखी ! रिवाल्वर की गोली खाकर पुलिस के कई आदमी मरे और

106 / बन्दी जीवन
घायल हुए। तीन सिक्खों में से केवल एक को ही पकड़ा न जा सका, एक को एक
रास्ता चलते मोटे मुस्टंडे मुसलमान ने धर गिराया, तीसरे को पुलिस ने ही
पकड़ा। मुसलमान ने जिनको पकड़ा उनका नाम था जगतसिंह। सिक्खों में भी
उन दैत्याकार जगतसिंह के मुकाबले का कोई न था। वे जैसे बलवान् और साहसी
थे उनका शरीर भी ठीक वैसा ही दैत्य का-सा था। पुलिस के साथ यह कांड
करके वे पुलिस की आंख से बचकर निकल गए थे, किन्तु पूरी तरह बे-खटके होने
से पहले ही रास्ते के एक नलके से जल पीकर वे शान्ति से जब अपना मुंह पोंछ
रहे थे, उस समय उनकी अपेक्षा भी बलवान् एक मुसलमान ने आकर दोनों हाथों
से उनके दोनों पैर इस तरह जोर से दबाकर पकड़ लिए कि जगतसिंह फिर हिल न
सके। जगतसिंह धक्का न संभाल सके और गिर पड़े। मुकदमे में जगतसिंह
को फांसी हुई। इस प्रकार रासबिहारी के कुछ विश्वस्त आदमी फिर पकड़े गए।
यथासमय यह समाचार रासबिहारी के पास पहुँचा। उस समय सारे लाहोर शहर
में उन्हें आश्रय देनेवाला कोई नहीं था। उनका दल उस समय एकदम टूट गया
था। उनके साथी-सहायकों में से उस समय तक कुछ गुमनाम सिख युवक ही
बचे थे। अपार समुद्र के मध्य में मानो वे उस समय पालविहीन डोंगी पर किसी
तरह बह रहे थे। जो पुलिस वाले मरे और घायल हुए वे भारतवासी थे, जो
पकड़े गए, फांसी पर चढ़े या जेल में सड़ने लगे वे भी भारतवासी थे और इनमें
आपस में कोई द्वेष, कोई विरोध न था !
इस समय के कुछ पहले ही मुसलमानों के बीच भी विप्लव का षड्यन्त्र
आरम्भ होता है। आगे इस मुसलमान् जागृति की विस्तृत आलोचना करनी
होगी, इसलिए अभी यहाँ इतना ही कहना यथेष्ठ है कि तुर्की-इटालियन युद्ध के
बाद से भारतीय मुसलमानों में एक नई चेतना का संचार होता है। किन्तु हमारे
दल के साथ मुसलमान दल का संयोग होता है ठीक उस समय से, जिस समय की
कहानी अब हम सुना रहे हैं। उनके साथ परामर्श करके रासबिहारी ने ठीक
किया कि अब काबुल जाकर ही पहले आश्रय लेना होगा और वही ठहरकर
भारत की विप्लव चेष्टा को नियन्त्रित करना होगा। उन्होंने एक मौलवी से
कलमा पढ़ना सीखा। खालिस मुसलमान के वेश में ही काबुल जाना तय पाया।
कुछ सिख नेता भी रासबिहारी के साथ जाते। सब ठीक हो चुका था, और दो-
एक दिन में ही यात्रा करनी होती, जब एक दिन दोपहर को रासबिहारी बोल
उठे, "नही भाई, काबुल जाना अब नही होता, मुझे जान पड़ता है कि इस समय
काबुल की ओर जाने से विपत्ति आने की सम्भावना है, दूसरी ओर लाहोर में
भी अब घड़ी-भर और देर करने की इच्छा नहीं होती, दिल कहता है इस समय
देर करने से जरूर आफ़त आएगी। रासबिहारी के दिल में जब जो आता था
कभी उससे उलटा न करते थे। इसलिए उसी वक्त ठीक कर डाला कि उसी
दिन रात की गाड़ी से रवाना होंगे। काशी के दो युवक इस समय उनके पास
थे। एक का नाम था. विनायकराव कापले, वे मराठा थे पर बहुत दिन काशी

पहली निष्फलता के बाद / 107
में रहे थे, दूसरे युवक का नाम हमारे समझने की सुविधा के लिए धरा जाता है,
गंगाराम । यह बहुत दिन तक फ़रार रहे। रासबिहारी और विनायकराव रात
को आठ बजे की गाड़ी से रवाना हुए। तय हुआ कि गंगाराम कुछ सिक्ख नेताओं
को लेकर दो-एक दिन बाद काशी आएँगे । करतारसिंह, हरनामसिंह और दूसरे
कई सिक्ख नेताओं ने काबुल जाना ठीक किया।
रासबिहारी जिस मकान में रहते थे वही मकान सबकी अपेक्षा बेखटक था,
क्योंकि इसका पता बहुत लोगों को न था। जिन सब मकानों पर वे भिन्न-भिन्न
लोगों से मिलते-जुलते थे, उन सब मकानों से इस समय कोई सम्बन्ध न रखा जाय,
रासबिहारी का यह विशेष अनुरोध था। किन्तु यह होने पर भी गंगाराम रास-
बिहारी को स्टेशन पर पहुँचाकर लौटते समय एक बार उसी पुराने मकान को
झाँककर देखने गए, उनकी इच्छा थी यदि खटका न देखा तो अपने बहुत-से
कपड़े-लत्ते जो उस मकान में थे लेते आएँगे । किन्तु पुलिस ने पहले से ही इन सब
मकानों के चारों ओर अपने आदमी रख छोड़े थे । गंगाराम ने उस मकान के
निकट जाकर झाँका ही था कि पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया।
पकड़े जाने के कुछ दिन के अन्दर ही गंगाराम ने पुलिस के नजदीक सब बातें
मान ली । उनके इज़हार से पुलिस ने उस मकान का सुराग भी पा लिया जिसमें
रासबिहारी अन्तिम बार ठहरे थे । उस मकान की खाना‌तलाशी लेने पर पुलिस
को उनके हाथ के लिखे दो-एक कागज़ भी मिले। इससे पहले जिन्होंने इज़हार
दिये थे उनसे ही पुलिस को पता लग चुका था कि रासबिहारी फिर पंजाब आए
थे और इसी लाहौर में थे। गंगाराम को पाकर उन्होंने यह भी सुन लिया कि
भयंकर धर-पकड़ के समय भी रासबिहारी लाहौर में ही थे । पुलिस यह भी
जान गई कि रासबिहारी काशी से आए थे और फिर काशी वापस चले गए हैं।
मौत के मुंह से इसी प्रकार रासबिहारी कई बार बचे थे। इससे बहुत दिन
पहले की बात है, एक दफे और रासबिहारी इसी लाहौर में आए थे, उस समय
तक वे देहरादून ही में नौकरी करते थे, कुछ दिन की छुट्टी ली थी और दिल्ली
होकर लाहौर की तरफ दल का काम-काज देखने आए थे। इधर दिल्ली में
खाना‌तलाशी और गिरफ्तारियां आरम्भ हो गईं। रासबिहारी इस बारे में कुछ
भी न जानते थे । दिल्ली की खाना‌तलाशी के फलस्वरूप पुलिस को दीनानाथ
नामी लाहौर के एक युवक का सन्धान मिला, एक आदमी के मकान पर रास-
बिहारी का ट्रंक और कपड़े-लत्ते आदि भी मिल गए। किन्तु लाहौर में रासबिहारी
ठीक किस जगह हैं इसका सुराग पुलिस को न मिला। तो भी दीनानाथ का
ठिकाना पुलिस को मिल गया और लाहौर मे उसे पकड़ लिया गया। तब भी
रासबिहारी लाहौर में थे । दीनानाथ जिस दिन पकड़ा गया उससे अगले दिन
शाम के समय डी० ए० वी० कालेज के बोर्डिंग के एक विद्यार्थी ने रासबिहारी के
पास आकर उन्हें दीनानाथ की गिरफ़्तारी की खबर दी। तब तक उन्हें यह
खबर न मिली थी। सबकी सलाह से तय पाया कि उसी रात रासबिहारी लाहौर

108 / बन्दी जीवन
छोड़ दें। रासबिहारी दिल्ली चले गए। इस तरह सलाह-मशविरा करते-करते
रात अधिक हो जाने पर वह विद्यार्थी बोर्डिंग में वापस न गया, जिस मकान पर
रासबिहारी थे वह रात उसने भी वहीं काट दी। सबेरे पुलिस ने वही मकान घेर
लिया। तीन युवक गिरफ्तार हुए पर रासबिहारी न पकड़े गए। दीनानाथ जिस
दिन पकड़ा गया उसके अगले दिन रात के समय उसने सब बातें खोल दीं। यदि
एक दिन पहले वह मुखबिर हो जाता तो रासबिहारी भी पकड़ लिए जाते।
इधर फिर दिल्ली आकर रासबिहारी अमीरचन्द के मकान की ओर जाने
को ही थे कि राह में उन्होंने थाने के नजदीक अमीरचन्द के मकान वाले नौकर
को कहीं जाते देखा। उन्हें जरा सन्देह-सा हुआ, नौकर को बुलाकर पूछा अमीर-
चन्द कहाँ है। नौकर मालिक के दोस्त को पहचानकर बड़ी हड़बड़ाहट से बोल
उठा—"बाबू हमारे मकान पर न जाएँ, मालिक को पुलिस पकड़ ले गई है, मैं
उनके लिए थाने पर खाना ले जा रहा हूँ!" रासबिहारी के हाथ में उस समय
जो रुपया-पैसा था उससे कलकत्ते तक का रेल का टिकट खरीदा जा सकता था।
वे फिर स्टेशन लौटकर एकदम सीधा चन्दननगर चले आए। उस दिन से रास-
बिहारी का अज्ञातवास आरम्भ होता है। तब से "Thou art but a wander-
ing voice" (तू एक उड़ती-फिरती आवाज है) की तरह यह पकड़ा, वह पकड़ा
होने पर भी मानो उनका पता नहीं मिलता। इस प्रकार बार-बार विपत्ति से
उद्धार पाकर भी वे फिर उसी विपत्ति में पड़ते रहे।

2
काशी अंचल की कहानी
काशी में बैठे-बैठे हम पंजाब की दुरवस्था की बात कुछ भी न जान पाए
थे । तो भी कुछ दिन तक पंजाब का कोई संवाद न पाने पर हम कुछ चिन्तित
होने लगे । रासबिहारी इस बार जब पहले पंजाब गए थे तब कह गए थे कि जल्दी
ही पंजाब से कुछ सिक्ख कार्यकर्त्ताओं को भेज देंगे, क्योंकि सिक्खों की पल्टन में
यदि सिक्ख ही जाकर काम करें तो खूब फल हो । पंजाब से जब करतारसिंह
आदि एक बार काशी आए थे तब उनकी ज़बानी भी सुना था कि रासूदा¹ शीघ्र
ही कुछ सिक्खों को इधर भेजना चाहते हैं । उस समय तक कानपुर, लखनऊ,
'फैजाबाद (अयोध्या) आदि शहरों में हमारे आदमी नहीं गए थे। विप्लव ठीक
कब आरम्भ होगा, यह संवाद एक आदमी हमारे पास ले आया था, और इसके
बाद हमें पंजाब का और कोई संवाद नहीं मिला था। पंजाब से कुछ लोग
सीधे फैजाबाद ज़रूर आए थे, एवं कानपुर और लखनऊ में भिन्न-भिन्न समय
'पर पंजाब से ही लोग भेजे गए थे । इधर हम लोग काशी की छावनी में आने-
जाने लगे । 21 फरवरी सन् 1915 रविवार को विप्लव शुरू होने की बात थी,
हम शनिवार रात तक काशी की छावनी में गए थे । उधर पंजाब में विप्लव की
तारीख 21 से हटाकर 19 कर दी गई थी उसका हमेंकुछ भी पता न था। शनिवार
रात को भी काशी की पल्टन के हवलदार और नायब हवलदार आदि ने हमें
आश्वासन दिलाया था कि विप्लव आरम्भ हो जाने पर वे निश्चय ही विप्लव दल
का साथ देंगे ।
किन्तु इस समय कई विचारों ने हमें एकदम चंचल कर दिया था । हम
लोग सोचते थे कि अंग्रेजों के विरुद्ध विप्लव करने जा रहे हैं, और यदि सचमुच
विप्लव आरम्भ हो गया तो अपने परिवारों को कहाँ किस दशा में रक्खा
जाएगा । विप्लव आरम्भ होने पर विप्लवी दल को दिल्ली ले जाकर दूसरे
विप्लवी दल के साथ मिलाना होगा। उस अवस्था में यदि अंग्रेज़ी फ़ौज आकर
काशी पर दखल करे तो हमारे परिवारों की क्या अवस्था होगी ? इस भावना

  1. बड़े भाई को बँगला में दादा कहते हैं, उसका संक्षेप 'दा' भी हो जाता है !

110 / बन्दी जीवन
ने हमें थोड़ा व्याकुल नहीं किया।
विप्लव सचमुच शुरू हो जाने पर पल्टन के सिपाहियों को तथा शहर के
गुंडों को संयत शासन के अधीन रखना कितना कठिन काम होगा, यह भी हम
भूल न गए थे, विप्लव के समय सैकड़ों-हजारों परिवारों के मंगल-अमंगल का
उत्तरदायित्व भी हमीं लोगों के सिर पर था, यह बात भी कभी हमारे ध्यान से
नहीं हटी । किन्तु विप्लव जब करना ही था तब समस्याएँ चाहे कितनी कठिन
क्यों न हों इनका समाधान भी हमें करना ही था ।
और भी एक विचार ने हमें उससमय चिन्तित किया था। हम सोचते थे कि
यदि दूसरे स्थानोंमें विप्लव आरम्भ हो जाय और हमारे यहाँ न हो, तब हम लोगों
की, जो पहले से ही पुलिस की विष-दृष्टि में पड़ चुके थे, क्या गति होगी ? और
दूसरे स्थानों में विप्लव आरम्भ हुआ कि नहीं, यह भी जानेंगे कैसे ? इस अवस्था
में अन्यान्य केन्द्रों की पक्की बात जाने बिना काशी की पल्टन को उभार देना
युक्ति-संगत होगा कि नही, यह हम सोचकर तय न कर पाए थे । हम जानते थे
कि काशी में हमारे अपने दल को जो कुछ शक्ति थी उससे हम काशी की अंग्रेज
छावनी पर हमला कर सकते थे । ऐसी अवस्था में देशी पल्टन को भी कोई एक
पक्ष अवश्य लेना पड़ता, और हमारा विश्वास था कि देशी पल्टन हमारी तरफ
ही योग देगी। इस तरह हम जानते थे कि इच्छा हो तो हम काशी में विप्लव का
सूत्रपात कर सकते हैं। किन्तु और स्थानों की बात जाने बिना, विशेषतः पंजाब
की बात जाने बिना कुछ करने की हिम्मत न होती थी । यदि अपने दल में काफ़ी
तादाद में अस्त्र-शस्त्र रहते तो भी ऐसा करने की हिम्मत हो जाती । जो हो इन
सब भावनाओं के बाद हमने तय किया था कि रेलवे स्टेशन और तार-घर के
पास जांच-पड़ताल करके ही हमें इस बात का संशय दूर करना होगा कि पजाब
की ओर से तार आने में कुछ गोल-माल हुआ है कि नही। यदि तार न आया
तो जान लेंगे कि वहाँ कुछ गोलमाल शुरू हो गया है, विचार था कि विप्लव शुरू
होने के कुछ पहले ही सब तरफ तार काट दिए जाएँगे । हमें स्टेशन पर ट्रेनों के
आने-जाने में भी गोलमाल होने की आशा थी ।
हमने स्थिर किया था कि इस प्रकार अन्य स्थानों की बात जानकर ही
काशी की अंग्रेजी पल्टन पर आक्रमण करेंगे और रात के समय समर्थ अंग्रेज पुरुषों
को जेल में डालकर जेल के कैदियों को मुक्त कर देंगे । हमने समझा था कि
जेल के क़ैदी इस तरह हमारी मदद से छूट जाएँगे तो उनमें से कुछ तो ज़रूर
हमारा साथ देंगे । तब तक हम जेल न गए थे, इसलिए जेलों की अवस्था कुछ भी
न जानते थे। यह तो अब जान पाया है कि यह आशा कैसी बड़ी दुराशा थी।
जो हो, हमारा मतलब यह था कि आधी रात को मेगज़ीन और खजाना हाथ में
करके कुछ लोगों को एकदम इलाहाबाद और दानापुर की ओर विप्लव की
खबर के साथ भेज देते, और सवेरा होने पर आम खुली सभा बुलाकर शहर के
धनी लोगों से धन-संग्रह करके शहर के युवकों से वालण्टियर होने का अनुरोध

काशी अंचल की कहानी / 111

करते। उस समय काशी में हमारे बंगाली लोगों की कई खुली सभा-समितियाँ
थीं। काशी में जितने भले लड़के थे सभी इन समितियों के सदस्य थे। इन समि-
तियों के सदस्यों की संख्या कम-से-कम दो सौ पचास थी। ये सभी लिखने-पढ़ने,
स्वभाव और चरित्र एवं शारीरिक सामर्थ्य में काशी के बंगाली समाज के उज्ज्वल
रत्न थे। इसी से काशी के शिक्षित लोगों को हमारी इन समितियों से बड़ी
सहानुभूति थी। कालेजों के प्रोफेसर, स्कूलों के मास्टर, बड़े-बड़े चिकित्सक,
म्युनिसिपल कमिश्नर आदि अनेक बंगाली थे और इन सब के कोई-न-कोई
सम्बन्धी हमारी समितियों के सदस्य थे। अनेक पर्वों और मेलों पर काशी में यह
समिति के सदस्य लोग यात्रियो के आने-जाने और उनके स्नान आदि का ऐसा
बन्दोबस्त करते थे कि सब लोग चकित हो जाते थे। इन्हीं सब समितियों से
अनेक भले घरों की विपत्तिग्रस्त विधवाओं की अनेक प्रकार से सहायता की
जाती थी, बीमारी आदि के समय यही समितियों के सदस्य लोगों के घरों पर
जाकर सेवा-शुश्रूषा करते थे। काशी के गरीब छात्रों के लिखने-पढ़ने के बन्दो-
बस्त के लिए इन्ही समितियो के सदस्य लोग स्कूल आदि खोलते थे। इस तरह
इन सब समितियो का प्रभाव काशी के बंगाली समाज पर कुछ कम न था। इसी-
लिए हमने तय किया था कि विप्लव के समय काशी मे शान्ति और श्रृंखला रखने
का भार इन्ही समितियो के सदस्यो पर डाल दिया जायगा। इन समितियों के
सदस्यो ने यद्यपि गुप्त रूप से हमारे इस विप्लव के आयोजन मे साथ न दिया
था, किन्तु तो भी इनमे स्वदेश-प्रेम या सगठन-शक्ति कुछ साधारण न थी। इस
प्रकार प्रकट रूप से साहित्य और इतिहास की चर्चा करने के कारण तथा नित्य
नियमित व्यायाम का अभ्यास करने से इन समितियो के सदस्य लोग शहर की
शान्ति-रक्षा का भार उठाने के लि., अन्य सबसे अधिक उपयुक्त थे। हम आशा
करते थे कि विप्लव आरम्भ होने पर इनमे से और शहर के हिन्दुस्तानी युवकों
मे से भी निश्चय ही बहुत-से स्वेच्छा-सेवक मिलेगे जो आग्रहपूर्वक हमारे विप्लव
मे साथ देगे और ऐसे भी बहुत-से मिलेगे जो स्थानीय काम के लिए काशी मे
ही रह जाएँगे। उस दिन कल्पना की आंखो से जब देखते कि काशी की गली
मुहल्लो, राह-घाटो मे बंगाली स्वेच्छासेवक हाथ मे गोली-भरी पिस्तौल लिये
और कमर मे पैनी कृपाण लटकाये, दल बाँधे घूम रहे हैं तब गर्व से हमारी छाती
दस हाथ फूल उठती थी। हमने तय किया था कि अपने सब विप्लवियों के परि-
वारो का काशी के ही किसी एक स्थान मे इकट्ठा रहने का बन्दोबस्त कर दिया
जायगा। हमारे इन स्वेच्छा-सेवको का दल जिस प्रकार सारी काशी का अमन
क़ायम रखता उसी प्रकार हमारे परिवारों का भी ध्यान रखता।
हम यह भी जानते थे कि विप्लव आरम्भ होने के बाद सिपाही लोग ज्योंही
जान पाएँगे कि अस्त्र-शस्त्र जो कुछ है सो सब उन्ही के पास है और उनकी

112 / बन्दी जीवन
सहायता बिना हम देश के साधारण लोग कुछ भी करने में असमर्थ हैं, तब स्वभावतः
ही वे सिपाही स्वेच्छाचारी हो जाएँगे। किन्तु दूसरी तरफ हमने यह भी सोच
लिया था कि एक बार विप्लव में साथ देने के बाद जब तक कोई एक फैसला न
हो जायगा तब तक ये सिपाही लोग निश्चिन्त न रह सकेंगे, और फलतः अपने
स्वार्थ के लिए ही विप्लव सफल बनाने की ओर ध्यान देना होगा, और इस प्रकार
बाधित होकर उन्हें देश के शिक्षित और दृढ़चित्त विप्लव-नेताओं के अधीन रहना
पसंद होगा। इसके अलावा मेगज़ीन हाथ में आते ही जितना जल्द हो सकता,
हम अपने आदमियों को हथियारबन्द कर डालते और तब हम लोग भी बिलकुल
निहत्थे न रहते।
युद्ध-नीति से हम बिलकुल अनभिज्ञ थे, इस तरफ जैसी शिक्षा का प्रबन्ध
करना उचित था वह हमने किया नहीं था। कारण यह कि जर्मन-युद्ध इतनी जल्दी
छिड़ जायगा और इतनी जल्दी खुले तौर से विप्लव शुरू करना होगा, यह हम
पहले से समझ न सके थे। जो हो, रासबिहारी के पंजाब जाने पर मैंने और मेरे
एक बन्धु विनायकराव कापले ने Encyclopaedia Britannica (अंग्रेज़ी विश्व-
कोष) लेकर Strategy और Warfare (समरनीति) विषयक लेख पढ़ना
आरम्भ किया, और इससे पहले भी अनेक पत्रिकाओं आदि में इस विषय पर जो
लेख निकलते थे वह भी हम बराबर पढ़ते रहते थे। इस प्रकार ये सब पोथियाँ
पढ़कर हम युद्ध-कुशल सेनापति न हो सकेंगे, यह हम जानते थे; Encyclopae-
dia में भी पढ़ा था कि generals are made in the field of battle (युद्ध-
क्षेत्र में ही सेनानायक तैयार होते हैं) और इतिहास में इसके अनेक दृष्टान्त भी
देखे थे। आजकल के ज़माने में भी ऐसे दृष्टान्तों का अभाव नहीं है, रूस के अभी
उस दिन के विप्लव का इतिहास देखने से भी इसके प्रमाण मिलते हैं। अस्तु, जो
भी हो, हम लोगों ने जो किया था वही लिखे देता हूँ, उससे यदि हमारी कुछ
नादानी का परिचय मिले तो लज्जित नहीं हूँ।
स्टेशन और तारघर का हालचाल देख आने के लिए 21 फरवरी रविवार
को मैं बाइक पर चढ़कर काशी कैंटूनमेंट के स्टेशन पर शाम के समय आया था।
स्टेशन पर आकर सुना कि उस समय तक ट्रेन अथवा टेलीग्राफ़ का कुछ भी गोल-
माल नहीं हुआ। उसी स्टेशन पर उसी दिन शाम के वक़्त पलटन के एक हवलदार
के आने की बात थी। उसकी बाट जोहते-जोहते प्लेटफार्म पर घूमते-फिरते दिल
में आई कि अख़बार खरीद कर पढ़ूँ। पायोनियर खरीदकर देखा लाहौर में घर-
पकड़ आरम्भ हो गई है और यूरोपियन फ़ौज शहर में पिकेट कर रही है, अर्थात्
लड़ाई के समय की तरह सावधान होकर डेरे डालकर पड़ी है। समझ गया, काम
कुछ उलट-पुलट हो गया है। झट शहर में लौट आया। हमें अब सन्देह नहीं रहा
कि इस बार की विप्लव योजना भी छिन्न-भिन्न हो गई। किन्तु ठीक उसी दिन
सिंगापुर में विप्लव शुरू हो जाता है। सिंगापुर के साथ सीधे तौर पर हम लोगों
का कोई सम्बन्ध न था, यह इतिहास एक और परिच्छेद में बतलाया जायगा।

काशी अंचल की कहानी / 113
यदि सिगापुर भारत के अन्दर की कोई जगह होती तो भारत की अवस्था अत्यन्त
भयानक रूप धारण कर लेती, इसमें सन्देह नहीं । जिस समय सैकड़ों पल्टनें विदेश
के युद्ध-क्षेत्र में रोज ही भेजी जाती हों उस समय विप्लव शुरू हो जाने पर सचमुच
अधिकांश देशी पल्टनें हमारी ओर आ जातीं। हमारी यह आशा एकदम निर्मूल
या भ्रमपूर्ण न थी। सभी पल्टनों से हमें आशा का संवाद मिला हो, यह बात भी
न थी । एक तरफ जहाँ एक सिक्ख पल्टन के सिपाहियों ने हमारे दल के एक तरुण
युवक के मुंह से विप्लव नजदीक होने की खबर पाकर आग्रह और उत्साह के साथ
उसी रात पल्टन के मुखियों को बुलाकर गुप्त रूप से एक बैठक करके तय किया
था कि पहले वे जरूर कुछ न करेंगे, पर सचमुच विप्लव शुरू हो जाने पर वे निश्चय
ही विप्लव में साथ देंगे, वहाँ दूसरी तरफ एक ओर जगह की मुसलमान पल्टन ने
यह उत्तर दिया था कि "तुम क्या हमको बिलकुल बच्चा समझते हो ? अंग्रेजों
के साथ युद्ध करना क्या लड़को का खेल है ? तुम्हारी तरफ कोई नवाब या राजा-
महाराजा है ? जब नहीं है तो तुम्हें रुपये से मदद कौन देगा ? इसके अलावा
विप्लव शुरू होते ही वायरलेस टेलीग्राफी (बेतार के तार) पर उसी समय भारत
के चारों ओर खबर चली जायगी और थोड़े दिनों मे चारों ओर की फ़ौज
तुम्हारे ऊपर आ पडेगी। इस अवस्था में क्या तुम किसी तरह टिक सकोगे ?
तुम्हारे हाथ में अस्त्र-शस्त्र ही कितने हैं ? तुम्हारी सामरिक शिक्षा-दीक्षा ही क्या
है ? ये बाते क्या सोच देखी हैं ? हम लोग न बच्चे हैं न पागल, ऐसी बातें फिर
हमारे नज़दीक कहने मत आना, हाँ, अगर सचमुच विप्लव शुरू हो गया तो अवश्य
हम लोग भी देशवासियों के विरुद्ध न चलेंगे, किन्तु देखना, होगा कुछ भी नही,
इत्यादि ।"
उस समय सिक्ख लोगों में जैसी उत्तेजना और उत्साह देखा गया था, वैसा
उत्साह केवल पंजाबी मुसलमानों और पठानो मे ही कुछ हद तक देखा है। भारत
की अनेक जातियों के साथ मिल-जुलकर समझ सका हूँ कि सिक्खों के समान
मजबूत, समर्थ और भावुक जाति भारत मे कोई नही है। सिक्ख लोग जैसे सहज
रूप से जितने थोड़े समय में उत्तेजित हो उठते हैं वैसी सहजता से भारत की
और कोई जाति उत्तेजित नही हो उठती। रासबिहारी जब विप्लव का उद्योग व्यर्थ
हो जाने पर पंजाब छोड़कर फिर काशी की ओर लौट रहे थे तब ट्रेन में एक सिक्ख
सैनिक के साथ उनकी बातचीत हुई। साधारण बातें होते-होते प्रसंगवश भारत
की वर्तमान अवस्था की बात आई । इतने थोडे समय की बातचीत से ही वह
सिक्ख इतना उत्तेजित हो उठा कि रासबिहारी के साथियों को डर हुआ कि कहीं
कुछ अनर्थ न हो जाय क्योकि ट्रेन के कमरे मे और भी कई तरह के लोग हैं, यह
भूलकर उस सिक्ख ने उत्तेजित स्वर में कहना शुरू कर दिया था कि वह देश के
लिए जरूर प्राण देगा। जो हो, बड़ी मुश्किल से उन्होंने उस यात्रा में छुटकारा
पाया।
इस विषय में सब बंगालियों को दोष देते हैं। बंगाली भी बेशक बड़ी भावुक

114 / बन्दी जीवन
जाति है, पर भाव के उन्माद में सिक्ख लोग घड़ीभर में जैसे एक असम्भव काण्ड
कर सकते हैं, वैसे भारत की और कोई जाति नहीं कर सकती । सिक्खों के
कहने और करने के बीच अन्तर बहुत थोड़ा रहता है। इसलिए मैं समझता हूँ कि
ऐसा कोई काम नहीं जिसे ये सिक्ख लोग उपयुक्त नेतृत्व में परिचालित होने पर
न कर सकें । सिक्ख समाज में आज केवल एक ही चीज़ का अभाव दीखता है और
उस अभाव को पूरा करने के लिए सिक्ख समाज इस प्रकार जाग्रत हो गया है कि
वह अभाव भी थोड़े ही दिनों में नहीं रहेगा । संसार की विचारधारा के साथ
रहने के लिए जैसी शिक्षा चाहिए सिक्ख समाज में वैसी शिक्षा का बिल्कुल अभाव
है और इस अभाव को दूर करने के लिए छोटे-छोटे सिक्ख जमींदार भी जैसी
आर्थिक सहायता करते हैं वैसा दृष्टान्त भारत की और किसी जाति में नहीं पाया
जाता । तो भी सिक्खों में संकीर्णता बड़ी है, इसलिए सिक्ख समाज के लिए वे
जो कुछ करते हैं उसका सौ में एक हिस्सा भी दूसरे समाजों के लिए नहीं कर
सकते । सिक्ख सम्प्रदाय में से बहुतों का विश्वास है कि यदि वे उपयुक्त-शक्ति
सामर्थ्य का उपार्जन कर लें तो फिर वे भारत में अपना साम्राज्य खड़ा कर
सकते हैं। जो हो, वे फिर एक साम्राज्य खड़ा कर सकें या न कर सकें, भविष्य
में यदि उनमें उपयुक्त शिक्षा का प्रचार न होगा तो भारत के भाग्य में बहुत
दुःख लिखे हैं, इसमें सन्देह नहीं ।
खैर, जाने दो इन बातों को, जो बात हम कह रहे थे उसे ही फिर कहें; कह
रहे थे कि किस तरह पंजाब की दुरवस्था की खबर हमने काशी में जान पाई थी ।
पायोनियर में यह कुसमाचार देखकर हमें बड़ी चोट लगी । हमें मालूम होने लगा
मानो हम भारतवासियों का कोई संकल्प भी अन्त तक नहीं रहता । हम जो
सोचेंगे, कुछ भी न होगा । अंग्रेज़ लोग जो करने की बात कहेंगे उसी में कृतकार्य
हो जाएँगे । न जाने विधाता का यह कैसा विधान है ।
भारतवासी का जीवन मानो केवल दूसरों के खेल की सामग्री है । उसको
अपनी मानो कोई साध, कोई वासना ही नहीं, या वह है भी तो मानो उसे पूर्ण
करने की शक्ति उसमें नहीं है । भारतवासी की सब चेष्टाओं का परिणाम मानो
केवल व्यर्थता से पूर्ण है, भारत का इतिहास भी वैसे एक विराट् व्यर्थता के कारण
उदास स्वर से भरा है। भारत के इतिहास की तरह भारत की विप्लव चेष्टा का
इतिहास भी एक सिरे से व्यर्थता का ही इतिहास है ।
: 2 :
रेलबे स्टेशन से मुरझाया हुआ घर वापस आया । घर में अनेक साथी मेरी
प्रतीक्षा में बैठे थे । मुहल्ले-मुहल्ले में कुछ युवकों के दल भी हमारे आदेश की
प्रतीक्षा में थे। उन्हें विप्लव की बात मालूम न थी,पर इतना तो सब जानते थे कि
शायद कोई भी भीषण काण्ड हो सकता है जिससे जान हथेली पर रखकर उन्हें

काशी अंचल की कहानी / 115-
उस कार्य में साथ देना होगा। साथियों ने सब सुना। विप्लव रुक गया यह
समझ लिया, तो भी दो-तीन दिन बड़ी उत्कण्ठा में कटे। जो हुआ सो एकदम
आशा के विपरीत रहा हो ऐसा भी नहीं, कारण यह कि इस व्यर्थता की आशंका
बड़े जोर से पहले ही दिल में उठी थी, इसलिए पायोनियर की खबर सुनकर हम
मानो मौन स्वर से बोल उठे—"यही तो कहते थे कि इतनी जल्दी क्या भारत का
भाग्य पलट जायगा !"—दो-तीन दिन में ही लाहौर में तांगे की दुर्घटना का
समाचार अखबार में पढ़ा, हममें से बहुतों ने सोचा कही भाग जानेवाले व्यक्ति
रासबिहारी ही न हों किसी-किसी ने कहा नहीं, रासबिहारी निश्चय ही वहां न
थे कारण कि रासबिहारी का भाग्य बड़ा उज्ज्वल है, उनका भाग्य ही उनकी
रक्षा करता है, इसीलिए विपत्तियों के मुंह में वे कभी नहीं पड़ सकते। इसके
सिवाय अखबार में तो साफ ही लिखा है कि तांगे के यात्री सिक्ख थे। इस प्रकार
रासबिहारी का भला-बुरा सोचते-सोचते हमारे दिन कटने लगे। क्योंकर और
कितने दिन तक रासबिहारी बेखटके काशी आ पहुंचेंगे इसी भावना में हम अस्थिर
होकर दिन गिनने लगे। पंजाब की दुर्बलता के कारण काशी के दल को भी
कही चोट न लगे इसी आशंका में हम कई आदमी घर पर बिलकुल न रहते थे,
केवल बीच-बीच में घर आकर खबर ले जाते थे कि पुलिस का उत्पात बढ़ रहा
है या घट रहा है। उस समय भी घर पर बराबर पुलिस का पहरा था। उनकी
आंखों में धूल डालकर ही सब काम करना होता था। काशी मे हम लोग इसी
प्रकार दिन काटने लगे।
इधर पंजाब से करतारसिंह और हरनामसिंह काबुल की ओर रवाना हुए।
राह में उन्हें न जाने क्या सूझी कि वे फिर सिपाहियों में विप्लव का प्रचार करने
के लिए छावनी में घुस पड़े। इस समय जगह-जगह सिपाहियों में धर-पकड़
आरंभ हो गई थी। इसलिए स्वभावतः उनके बीच एक आतंक-सा छाया देख
पड़ता था। इस अवस्था में सिपाहियों के बीच फिर प्रचार करने जाना करतार-
सिंह के लिए हरगिज उचित न था। फलतः सिपाहियों ने ही करतारसिंह को
पकड़वा दिया। उन्हें लाहौर लाया गया। जंजीरों में जकड़े हुए करतारसिंह की
तरुण मुखश्री में वीरत्व की ऐसी महिमा झलकती थी कि उस मूर्ति को देखकर
शत्रु-मित्र सभी एक साथ मुग्ध हो जाते थे। भाई परमानन्द ने अपनी 'आप बीती'
नामक पुस्तक में उस दृश्य का मर्मस्पर्शी भाषा में वर्णन किया है। ऊंचे दर्जे के
अंग्रेज राज्याधिकारी भी वीर को उपयुक्त मर्यादा देने मे प्रायः त्रुटि नहीं करते।
पिछले विप्लव युग की कहानी देखते हुए साधारण रूप से यह कहा जा सकता है
कि अंग्रेज राज्याधिकारी विप्लवियों के वीरत्व और गुणों पर बहुधा मुग्ध हो
उठा करते थे।
इधर एकाएक एक दिन सुना, रासूदा काशी आ गए। रासूदा से भेंट होने
पर पंजाब की सब अवस्था मालूम हो गई। एक तो पंजाब का समाचार बंगाल में
देना आवश्यक था, दूसरे मेरा काशी मे ठहरना किसी तरह अभीष्ट न था, इस-

116 / बन्दी जीवन

लिए दादा ने मुझसे एकदम काशी छोड़ देने को कहा। हमारा यह नियम था कि
धर-पकड़ आरम्भ होने पर तुरन्त ही हम पहले का बन्दोबस्त जड़ से बदल देते थे,
अर्थात् मनुष्य के मन का हम पूरी तरह कभी विश्वास न करते थे, क्योंकि हम
जानते थे मनुष्य अपने मन को आप ही ठीक-ठीक नहीं पहचानता, इसलिए किसी
के पकड़े जाने पर हम उसी क्षण सावधान हो जाते थे।
इसी समय काशी में पुलिस की निगरानी ऐसी कड़ी हो गई कि कोई भी नया
बंगाली पुलिस की नजर बचाकर आ ही न सकता था। बंगाली टोले के हर
मुहल्ले में पुलिस हरएक घर जाकर पता लगाती थी कि वहाँ कोई नया बंगाली
तो नहीं आया। चन्दननगर और बंगाल में रासबिहारी को पहचानने वाले खुफिया
पुलिस के जितने कारिन्दे थे सबको काशी के भिन्न-भिन्न स्टेशनों पर पहरे पर
नियुक्त किया गया था। चौबीस घण्टा ऐसा ही पहरा रहता था। इसके अलावा
काशी में जो लोग पुलिस की विष-दृष्टि में पड़ चुके थे उनके ऊपर भी जहाँ तक कड़ा
पहरा रखना पुलिस के लिए सम्भव था, उसमें पुलिस जरा भी कसर न छोड़ती
थी। जो भी बंगाली काशी में आते उन सभी का नाम-धाम पुलिस लिख लेती,
और फिर मकान पर जाकर पता लगाती कि उनकी बात सच है या नहीं। इस
प्रकार पुलिस काशी में रासबिहारी की टोह लेती थी। और ऐसी भीषण अवस्था
में भी रासबिहारी बेखटके काशी आ पहुँचे थे।
हम कुछ लोग पहले से ही सावधान थे। बहुत थोड़े समय ही घर पर टिकते
थे। अधिक समय जिस जगह रहते थे उसे दल के कुछ आदमियों को छोड़कर
कोई न जानता था। और रासूदा ही घर-घर जाकर रात को हमारा पता लेते थे।
क्योंकि रासबिहारी को काशी में कोई बहुत पहचानता न था। काशी में हमारा
खूब अच्छा दल था, इसीलिए रासबिहारी ऐसी अवस्था में काशी मे अनायास एक
महीने से ऊपर रह सके थे। रासबिहारी को पकड़ने के लिए ब्रिटिश गवर्नमेण्ट ने
कमर कस ली, और काशी के दल को बचाने के लिए रासबिहारी ने भी कमर
कस ली। काशी के युवक लोग चुपचाप घरों में बैठे और रासबिहारी ही घर-घर
जाकर पूछ-ताछ करने लगे। किसे किस उपाय से काशी से बाहर भेज दें। प्रत्येक
युवक के निकट जाकर रासबिहारी रोज़ यही बात ठीक करते। पहले मैं काशी
छोड़कर चला गया, फिर एक और मित्र ने भी काशी छोड़ दी। इसी तरह धीरे-
धीरे बहुत लोग काशी से खिसककर बंगाल आ गए। जो युक्तप्रदेश के थे वे
अपना शहर छोड़कर दूसरे शहर में जाकर रहे, जैसे काशी वाले लखनऊ गए
और लखनऊ वाले काशी आ गए।
मेरे बंगाल में खिसक आने के कुछ ही दिन बाद हमारे काशीवाले मकान की
खानातालाशी हुई, इसके थोड़े ही दिन बाद काशी के एक और युवक के घर की
खानातालाशी हुई, वे युवक उस समय काशी में ही थे, पर अपने घर पर न रहते
थे। तड़के तीन बजे पुलिस ने घर घेर लिया, पर सबेरे व्यर्थ मनोरथ होकर लौट
गई ! रासबिहारी के पास उस युवक ने सुना कि उनके घर की खाना-तलाशी