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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 118, कुल 408 में से

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पृष्ठ 118

116 / बन्दी जीवन

लिए दादा ने मुझसे एकदम काशी छोड़ देने को कहा। हमारा यह नियम था कि
धर-पकड़ आरम्भ होने पर तुरन्त ही हम पहले का बन्दोबस्त जड़ से बदल देते थे,
अर्थात् मनुष्य के मन का हम पूरी तरह कभी विश्वास न करते थे, क्योंकि हम
जानते थे मनुष्य अपने मन को आप ही ठीक-ठीक नहीं पहचानता, इसलिए किसी
के पकड़े जाने पर हम उसी क्षण सावधान हो जाते थे।
इसी समय काशी में पुलिस की निगरानी ऐसी कड़ी हो गई कि कोई भी नया
बंगाली पुलिस की नजर बचाकर आ ही न सकता था। बंगाली टोले के हर
मुहल्ले में पुलिस हरएक घर जाकर पता लगाती थी कि वहाँ कोई नया बंगाली
तो नहीं आया। चन्दननगर और बंगाल में रासबिहारी को पहचानने वाले खुफिया
पुलिस के जितने कारिन्दे थे सबको काशी के भिन्न-भिन्न स्टेशनों पर पहरे पर
नियुक्त किया गया था। चौबीस घण्टा ऐसा ही पहरा रहता था। इसके अलावा
काशी में जो लोग पुलिस की विष-दृष्टि में पड़ चुके थे उनके ऊपर भी जहाँ तक कड़ा
पहरा रखना पुलिस के लिए सम्भव था, उसमें पुलिस जरा भी कसर न छोड़ती
थी। जो भी बंगाली काशी में आते उन सभी का नाम-धाम पुलिस लिख लेती,
और फिर मकान पर जाकर पता लगाती कि उनकी बात सच है या नहीं। इस
प्रकार पुलिस काशी में रासबिहारी की टोह लेती थी। और ऐसी भीषण अवस्था
में भी रासबिहारी बेखटके काशी आ पहुँचे थे।
हम कुछ लोग पहले से ही सावधान थे। बहुत थोड़े समय ही घर पर टिकते
थे। अधिक समय जिस जगह रहते थे उसे दल के कुछ आदमियों को छोड़कर
कोई न जानता था। और रासूदा ही घर-घर जाकर रात को हमारा पता लेते थे।
क्योंकि रासबिहारी को काशी में कोई बहुत पहचानता न था। काशी में हमारा
खूब अच्छा दल था, इसीलिए रासबिहारी ऐसी अवस्था में काशी मे अनायास एक
महीने से ऊपर रह सके थे। रासबिहारी को पकड़ने के लिए ब्रिटिश गवर्नमेण्ट ने
कमर कस ली, और काशी के दल को बचाने के लिए रासबिहारी ने भी कमर
कस ली। काशी के युवक लोग चुपचाप घरों में बैठे और रासबिहारी ही घर-घर
जाकर पूछ-ताछ करने लगे। किसे किस उपाय से काशी से बाहर भेज दें। प्रत्येक
युवक के निकट जाकर रासबिहारी रोज़ यही बात ठीक करते। पहले मैं काशी
छोड़कर चला गया, फिर एक और मित्र ने भी काशी छोड़ दी। इसी तरह धीरे-
धीरे बहुत लोग काशी से खिसककर बंगाल आ गए। जो युक्तप्रदेश के थे वे
अपना शहर छोड़कर दूसरे शहर में जाकर रहे, जैसे काशी वाले लखनऊ गए
और लखनऊ वाले काशी आ गए।
मेरे बंगाल में खिसक आने के कुछ ही दिन बाद हमारे काशीवाले मकान की
खानातालाशी हुई, इसके थोड़े ही दिन बाद काशी के एक और युवक के घर की
खानातालाशी हुई, वे युवक उस समय काशी में ही थे, पर अपने घर पर न रहते
थे। तड़के तीन बजे पुलिस ने घर घेर लिया, पर सबेरे व्यर्थ मनोरथ होकर लौट
गई ! रासबिहारी के पास उस युवक ने सुना कि उनके घर की खाना-तलाशी