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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 117, कुल 408 में से

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पृष्ठ 117

काशी अंचल की कहानी / 115-
उस कार्य में साथ देना होगा। साथियों ने सब सुना। विप्लव रुक गया यह
समझ लिया, तो भी दो-तीन दिन बड़ी उत्कण्ठा में कटे। जो हुआ सो एकदम
आशा के विपरीत रहा हो ऐसा भी नहीं, कारण यह कि इस व्यर्थता की आशंका
बड़े जोर से पहले ही दिल में उठी थी, इसलिए पायोनियर की खबर सुनकर हम
मानो मौन स्वर से बोल उठे—"यही तो कहते थे कि इतनी जल्दी क्या भारत का
भाग्य पलट जायगा !"—दो-तीन दिन में ही लाहौर में तांगे की दुर्घटना का
समाचार अखबार में पढ़ा, हममें से बहुतों ने सोचा कही भाग जानेवाले व्यक्ति
रासबिहारी ही न हों किसी-किसी ने कहा नहीं, रासबिहारी निश्चय ही वहां न
थे कारण कि रासबिहारी का भाग्य बड़ा उज्ज्वल है, उनका भाग्य ही उनकी
रक्षा करता है, इसीलिए विपत्तियों के मुंह में वे कभी नहीं पड़ सकते। इसके
सिवाय अखबार में तो साफ ही लिखा है कि तांगे के यात्री सिक्ख थे। इस प्रकार
रासबिहारी का भला-बुरा सोचते-सोचते हमारे दिन कटने लगे। क्योंकर और
कितने दिन तक रासबिहारी बेखटके काशी आ पहुंचेंगे इसी भावना में हम अस्थिर
होकर दिन गिनने लगे। पंजाब की दुर्बलता के कारण काशी के दल को भी
कही चोट न लगे इसी आशंका में हम कई आदमी घर पर बिलकुल न रहते थे,
केवल बीच-बीच में घर आकर खबर ले जाते थे कि पुलिस का उत्पात बढ़ रहा
है या घट रहा है। उस समय भी घर पर बराबर पुलिस का पहरा था। उनकी
आंखों में धूल डालकर ही सब काम करना होता था। काशी मे हम लोग इसी
प्रकार दिन काटने लगे।
इधर पंजाब से करतारसिंह और हरनामसिंह काबुल की ओर रवाना हुए।
राह में उन्हें न जाने क्या सूझी कि वे फिर सिपाहियों में विप्लव का प्रचार करने
के लिए छावनी में घुस पड़े। इस समय जगह-जगह सिपाहियों में धर-पकड़
आरंभ हो गई थी। इसलिए स्वभावतः उनके बीच एक आतंक-सा छाया देख
पड़ता था। इस अवस्था में सिपाहियों के बीच फिर प्रचार करने जाना करतार-
सिंह के लिए हरगिज उचित न था। फलतः सिपाहियों ने ही करतारसिंह को
पकड़वा दिया। उन्हें लाहौर लाया गया। जंजीरों में जकड़े हुए करतारसिंह की
तरुण मुखश्री में वीरत्व की ऐसी महिमा झलकती थी कि उस मूर्ति को देखकर
शत्रु-मित्र सभी एक साथ मुग्ध हो जाते थे। भाई परमानन्द ने अपनी 'आप बीती'
नामक पुस्तक में उस दृश्य का मर्मस्पर्शी भाषा में वर्णन किया है। ऊंचे दर्जे के
अंग्रेज राज्याधिकारी भी वीर को उपयुक्त मर्यादा देने मे प्रायः त्रुटि नहीं करते।
पिछले विप्लव युग की कहानी देखते हुए साधारण रूप से यह कहा जा सकता है
कि अंग्रेज राज्याधिकारी विप्लवियों के वीरत्व और गुणों पर बहुधा मुग्ध हो
उठा करते थे।
इधर एकाएक एक दिन सुना, रासूदा काशी आ गए। रासूदा से भेंट होने
पर पंजाब की सब अवस्था मालूम हो गई। एक तो पंजाब का समाचार बंगाल में
देना आवश्यक था, दूसरे मेरा काशी मे ठहरना किसी तरह अभीष्ट न था, इस-