बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकाशी अंचल की कहानी / 111
करते। उस समय काशी में हमारे बंगाली लोगों की कई खुली सभा-समितियाँ
थीं। काशी में जितने भले लड़के थे सभी इन समितियों के सदस्य थे। इन समि-
तियों के सदस्यों की संख्या कम-से-कम दो सौ पचास थी। ये सभी लिखने-पढ़ने,
स्वभाव और चरित्र एवं शारीरिक सामर्थ्य में काशी के बंगाली समाज के उज्ज्वल
रत्न थे। इसी से काशी के शिक्षित लोगों को हमारी इन समितियों से बड़ी
सहानुभूति थी। कालेजों के प्रोफेसर, स्कूलों के मास्टर, बड़े-बड़े चिकित्सक,
म्युनिसिपल कमिश्नर आदि अनेक बंगाली थे और इन सब के कोई-न-कोई
सम्बन्धी हमारी समितियों के सदस्य थे। अनेक पर्वों और मेलों पर काशी में यह
समिति के सदस्य लोग यात्रियो के आने-जाने और उनके स्नान आदि का ऐसा
बन्दोबस्त करते थे कि सब लोग चकित हो जाते थे। इन्हीं सब समितियों से
अनेक भले घरों की विपत्तिग्रस्त विधवाओं की अनेक प्रकार से सहायता की
जाती थी, बीमारी आदि के समय यही समितियों के सदस्य लोगों के घरों पर
जाकर सेवा-शुश्रूषा करते थे। काशी के गरीब छात्रों के लिखने-पढ़ने के बन्दो-
बस्त के लिए इन्ही समितियो के सदस्य लोग स्कूल आदि खोलते थे। इस तरह
इन सब समितियो का प्रभाव काशी के बंगाली समाज पर कुछ कम न था। इसी-
लिए हमने तय किया था कि विप्लव के समय काशी मे शान्ति और श्रृंखला रखने
का भार इन्ही समितियो के सदस्यो पर डाल दिया जायगा। इन समितियों के
सदस्यो ने यद्यपि गुप्त रूप से हमारे इस विप्लव के आयोजन मे साथ न दिया
था, किन्तु तो भी इनमे स्वदेश-प्रेम या सगठन-शक्ति कुछ साधारण न थी। इस
प्रकार प्रकट रूप से साहित्य और इतिहास की चर्चा करने के कारण तथा नित्य
नियमित व्यायाम का अभ्यास करने से इन समितियो के सदस्य लोग शहर की
शान्ति-रक्षा का भार उठाने के लि., अन्य सबसे अधिक उपयुक्त थे। हम आशा
करते थे कि विप्लव आरम्भ होने पर इनमे से और शहर के हिन्दुस्तानी युवकों
मे से भी निश्चय ही बहुत-से स्वेच्छा-सेवक मिलेगे जो आग्रहपूर्वक हमारे विप्लव
मे साथ देगे और ऐसे भी बहुत-से मिलेगे जो स्थानीय काम के लिए काशी मे
ही रह जाएँगे। उस दिन कल्पना की आंखो से जब देखते कि काशी की गली
मुहल्लो, राह-घाटो मे बंगाली स्वेच्छासेवक हाथ मे गोली-भरी पिस्तौल लिये
और कमर मे पैनी कृपाण लटकाये, दल बाँधे घूम रहे हैं तब गर्व से हमारी छाती
दस हाथ फूल उठती थी। हमने तय किया था कि अपने सब विप्लवियों के परि-
वारो का काशी के ही किसी एक स्थान मे इकट्ठा रहने का बन्दोबस्त कर दिया
जायगा। हमारे इन स्वेच्छा-सेवको का दल जिस प्रकार सारी काशी का अमन
क़ायम रखता उसी प्रकार हमारे परिवारों का भी ध्यान रखता।
हम यह भी जानते थे कि विप्लव आरम्भ होने के बाद सिपाही लोग ज्योंही
जान पाएँगे कि अस्त्र-शस्त्र जो कुछ है सो सब उन्ही के पास है और उनकी