बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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जाति है, पर भाव के उन्माद में सिक्ख लोग घड़ीभर में जैसे एक असम्भव काण्ड
कर सकते हैं, वैसे भारत की और कोई जाति नहीं कर सकती । सिक्खों के
कहने और करने के बीच अन्तर बहुत थोड़ा रहता है। इसलिए मैं समझता हूँ कि
ऐसा कोई काम नहीं जिसे ये सिक्ख लोग उपयुक्त नेतृत्व में परिचालित होने पर
न कर सकें । सिक्ख समाज में आज केवल एक ही चीज़ का अभाव दीखता है और
उस अभाव को पूरा करने के लिए सिक्ख समाज इस प्रकार जाग्रत हो गया है कि
वह अभाव भी थोड़े ही दिनों में नहीं रहेगा । संसार की विचारधारा के साथ
रहने के लिए जैसी शिक्षा चाहिए सिक्ख समाज में वैसी शिक्षा का बिल्कुल अभाव
है और इस अभाव को दूर करने के लिए छोटे-छोटे सिक्ख जमींदार भी जैसी
आर्थिक सहायता करते हैं वैसा दृष्टान्त भारत की और किसी जाति में नहीं पाया
जाता । तो भी सिक्खों में संकीर्णता बड़ी है, इसलिए सिक्ख समाज के लिए वे
जो कुछ करते हैं उसका सौ में एक हिस्सा भी दूसरे समाजों के लिए नहीं कर
सकते । सिक्ख सम्प्रदाय में से बहुतों का विश्वास है कि यदि वे उपयुक्त-शक्ति
सामर्थ्य का उपार्जन कर लें तो फिर वे भारत में अपना साम्राज्य खड़ा कर
सकते हैं। जो हो, वे फिर एक साम्राज्य खड़ा कर सकें या न कर सकें, भविष्य
में यदि उनमें उपयुक्त शिक्षा का प्रचार न होगा तो भारत के भाग्य में बहुत
दुःख लिखे हैं, इसमें सन्देह नहीं ।
खैर, जाने दो इन बातों को, जो बात हम कह रहे थे उसे ही फिर कहें; कह
रहे थे कि किस तरह पंजाब की दुरवस्था की खबर हमने काशी में जान पाई थी ।
पायोनियर में यह कुसमाचार देखकर हमें बड़ी चोट लगी । हमें मालूम होने लगा
मानो हम भारतवासियों का कोई संकल्प भी अन्त तक नहीं रहता । हम जो
सोचेंगे, कुछ भी न होगा । अंग्रेज़ लोग जो करने की बात कहेंगे उसी में कृतकार्य
हो जाएँगे । न जाने विधाता का यह कैसा विधान है ।
भारतवासी का जीवन मानो केवल दूसरों के खेल की सामग्री है । उसको
अपनी मानो कोई साध, कोई वासना ही नहीं, या वह है भी तो मानो उसे पूर्ण
करने की शक्ति उसमें नहीं है । भारतवासी की सब चेष्टाओं का परिणाम मानो
केवल व्यर्थता से पूर्ण है, भारत का इतिहास भी वैसे एक विराट् व्यर्थता के कारण
उदास स्वर से भरा है। भारत के इतिहास की तरह भारत की विप्लव चेष्टा का
इतिहास भी एक सिरे से व्यर्थता का ही इतिहास है ।
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रेलबे स्टेशन से मुरझाया हुआ घर वापस आया । घर में अनेक साथी मेरी
प्रतीक्षा में बैठे थे । मुहल्ले-मुहल्ले में कुछ युवकों के दल भी हमारे आदेश की
प्रतीक्षा में थे। उन्हें विप्लव की बात मालूम न थी,पर इतना तो सब जानते थे कि
शायद कोई भी भीषण काण्ड हो सकता है जिससे जान हथेली पर रखकर उन्हें