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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 115, कुल 408 में से

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पृष्ठ 115

काशी अंचल की कहानी / 113
यदि सिगापुर भारत के अन्दर की कोई जगह होती तो भारत की अवस्था अत्यन्त
भयानक रूप धारण कर लेती, इसमें सन्देह नहीं । जिस समय सैकड़ों पल्टनें विदेश
के युद्ध-क्षेत्र में रोज ही भेजी जाती हों उस समय विप्लव शुरू हो जाने पर सचमुच
अधिकांश देशी पल्टनें हमारी ओर आ जातीं। हमारी यह आशा एकदम निर्मूल
या भ्रमपूर्ण न थी। सभी पल्टनों से हमें आशा का संवाद मिला हो, यह बात भी
न थी । एक तरफ जहाँ एक सिक्ख पल्टन के सिपाहियों ने हमारे दल के एक तरुण
युवक के मुंह से विप्लव नजदीक होने की खबर पाकर आग्रह और उत्साह के साथ
उसी रात पल्टन के मुखियों को बुलाकर गुप्त रूप से एक बैठक करके तय किया
था कि पहले वे जरूर कुछ न करेंगे, पर सचमुच विप्लव शुरू हो जाने पर वे निश्चय
ही विप्लव में साथ देंगे, वहाँ दूसरी तरफ एक ओर जगह की मुसलमान पल्टन ने
यह उत्तर दिया था कि "तुम क्या हमको बिलकुल बच्चा समझते हो ? अंग्रेजों
के साथ युद्ध करना क्या लड़को का खेल है ? तुम्हारी तरफ कोई नवाब या राजा-
महाराजा है ? जब नहीं है तो तुम्हें रुपये से मदद कौन देगा ? इसके अलावा
विप्लव शुरू होते ही वायरलेस टेलीग्राफी (बेतार के तार) पर उसी समय भारत
के चारों ओर खबर चली जायगी और थोड़े दिनों मे चारों ओर की फ़ौज
तुम्हारे ऊपर आ पडेगी। इस अवस्था में क्या तुम किसी तरह टिक सकोगे ?
तुम्हारे हाथ में अस्त्र-शस्त्र ही कितने हैं ? तुम्हारी सामरिक शिक्षा-दीक्षा ही क्या
है ? ये बाते क्या सोच देखी हैं ? हम लोग न बच्चे हैं न पागल, ऐसी बातें फिर
हमारे नज़दीक कहने मत आना, हाँ, अगर सचमुच विप्लव शुरू हो गया तो अवश्य
हम लोग भी देशवासियों के विरुद्ध न चलेंगे, किन्तु देखना, होगा कुछ भी नही,
इत्यादि ।"
उस समय सिक्ख लोगों में जैसी उत्तेजना और उत्साह देखा गया था, वैसा
उत्साह केवल पंजाबी मुसलमानों और पठानो मे ही कुछ हद तक देखा है। भारत
की अनेक जातियों के साथ मिल-जुलकर समझ सका हूँ कि सिक्खों के समान
मजबूत, समर्थ और भावुक जाति भारत मे कोई नही है। सिक्ख लोग जैसे सहज
रूप से जितने थोड़े समय में उत्तेजित हो उठते हैं वैसी सहजता से भारत की
और कोई जाति उत्तेजित नही हो उठती। रासबिहारी जब विप्लव का उद्योग व्यर्थ
हो जाने पर पंजाब छोड़कर फिर काशी की ओर लौट रहे थे तब ट्रेन में एक सिक्ख
सैनिक के साथ उनकी बातचीत हुई। साधारण बातें होते-होते प्रसंगवश भारत
की वर्तमान अवस्था की बात आई । इतने थोडे समय की बातचीत से ही वह
सिक्ख इतना उत्तेजित हो उठा कि रासबिहारी के साथियों को डर हुआ कि कहीं
कुछ अनर्थ न हो जाय क्योकि ट्रेन के कमरे मे और भी कई तरह के लोग हैं, यह
भूलकर उस सिक्ख ने उत्तेजित स्वर में कहना शुरू कर दिया था कि वह देश के
लिए जरूर प्राण देगा। जो हो, बड़ी मुश्किल से उन्होंने उस यात्रा में छुटकारा
पाया।
इस विषय में सब बंगालियों को दोष देते हैं। बंगाली भी बेशक बड़ी भावुक