बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
कुछ पूरक तथ्य / 387
रेशमी पत्र
मुस्लिम क्रान्तिकारी दल के सम्बन्ध मे अब केवल उन 'रेशमी पत्रों' की बात
कहनी शेष रह जाती है, जिनके नाम से सिडीसन कमेटी ने इस संगठन की अपनी
रिपोर्ट में चर्चा की है। रिपोर्ट में कहा गया है, कि अगस्त सन् 1916 में यह षड्यन्त्र
उद्घाटित हुआ, जो सरकारी कागजात में 'सिल्क लैटर्स केस' कहा गया है। यह
पत्र पीले रेशमी कपड़ों पर बहुत साफ और सुन्दर अक्षरों मे लिखे गए थे। इनके
साथ मौलाना महमूद उलहसन के नाम मुहम्मद मियाँ अंसारी का भी एक पत्र
था, जिसमे उन्होने अपनी कारगुजारियों का पूरा विवरण दिया था। आजाद हिन्द
सरकार के खतों में, मरकार के संगठन की संपूर्ण म्थिति और उसके पदाधिकारिगियों
के नाम थे। इसके अतिरिक्त एक 'ईश्वरीय सेना' बनाने की योजना थी, जिसमे
भारतीय मुस्लिम नौजवान भरती किये जाने थे। मौलाना महमूद उलहसन उमके
प्रधान सेनापति नियुक्त किये गए थे।
मौलवी उबेदुल्ला साहब ने यह 'रेशमी पत्र' अब्दुलहक नामक व्यक्ति को
दिये थे कि वह इनको शेख अब्दुर्रहीम (आचार्य कृपलानी के बड़े भाई) तक पहुँचा
दे । यह अब्दुलहक साहब एक नव मुस्लिम थे और जिहाद के जोश मे लाहौर
से भागकर काबुल पहुँचे थे। उन्होंने भारत आकर यह पत्र अपने एक मित्र हक-
नवाज खा को दे दिए और हकनवाज खां ने इन पत्रो को अपने पिता खानबहा-
दुर अल्लाहवाज खा के सुपुर्द कर दिया। राजभक्ति के जोश मे अल्लाहवाज खां
इन खतों को पंजाब के गवर्नर सरमाईकेल ओडायर के पास ले गए और इस प्रकार
सरकार को यह सम्पूर्ण योजना ज्ञात हो गई। इसके पश्चात शेख अब्दुर्रहीम भाग-
कर टर्की पहुँच गए और बहुत दिनों तक भारतीय स्वाधीनता के निग कार्य कग्ने
हुए वही उनका देहान्त हो गया ।
आजाद हिन्द सरकार द्वाग भारत पर आक्रमण
काबुल की आज़ाद हिन्द मरकार ने इमके बाद भारत पर आक्रमण कग्ने की
योजना बनाई और सरहद के आज़ाद कबीलों मे से इमके लिए लगभग छः हजार
सैनिक एकत्रित किए। जर्मनी और टर्की की मरकार का भी इस आक्रमण-योजना
की सूचना दी गई और बताया तो यह जाता है कि जर्मन सैनिकों की एक टुकड़ी
भी इनकी सहायता को काबुल भेजी गई। किन्तु जब आजाद हिन्द सरकार के छः
हजार सैनिक सरहद पर अंग्रेज सरकार से मोर्चा जमाये हुए थे, तभी फ्रांस के
रणक्षेत्र में जर्मनी का पतन हो गया और उसे सन्धि के लिए विवश होना पड़ा।
अंग्रेजों के हाथ इससे बहुत मजबूत हो गए और आजाद हिन्द मरकार के सैनिकों
की स्थिति बहुत कमज़ोर हो गई। इन सैनिकों में से बहुत-से व्यक्ति गोलियों से
मारे गए। कुछ पकड़कर फांसी पर चढ़ा दिये गए और कुछ विदेशों में ही भटक
भटककर मर गए। इसके बाद आज़ाद हिन्द सरकार और फ़ौज तोड़ दी गई और
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यह विराट् प्रयास सहस्रों देशभक्तों, की आहुतियों की कहानी मात्र बनकर समाप्त
हो गया ।
हबीबुल्ला खां की हत्या
क़ाबुल में भारतीय क्रान्तिकारियों की इस असफलता का मुख्य कारण
मौलाना उबेदुल्ला सिन्धी ने तत्कालीन अमीर हबीबुल्ला खां को बताया है । डा०
भूपेन्द्रनाथ दत्त आदि क्रान्तिकारियों ने जो उस समय बर्लिन में काम कर रहे थे,
इसका कारण यह बताया कि जर्मनों ने अमीर को जितनी सहायता करने का
आश्वासन दिया था, वह पूरा नहीं हुआ । किन्तु हमें मौलाना उबेदुल्ला की बात
अधिक प्रामाणिक जान पड़ती है । इन सब घटनाओं के कुछ ही दिन पश्चात्
'जमायते सियासिया' के एक सदस्य द्वारा अमीर हबीबुल्ला की राजनीतिक हत्या
भी इस बात को प्रमाणित करती है कि अमीर अंग्रेजों से मिले हुए थे ।
अफ़गानिस्तान का भारत पर आक्रमण
काबुल के अंग्रेज-अमीर विरोधी राजनीतिक संगठन में भारत से गये हुए
मुस्लिम क्रान्तिकारियों का भारी प्रभाव था, यह तो स्पष्ट ही है । अमीर हबीबुल्ला
के छोटे भाई नसरुल्ला खां और पुत्र अमानुल्ला खां भी अमीर के विरोधी थे । यह
इसी से प्रकट है कि काबुल की आजाद हिन्द सरकार के भंग होने के पश्चात् उसके
जो सदस्य काबुल सरकार द्वारा गिरफ्तार कर लिये गए या निर्वासित कर दिये
गए, अमीर की हत्या के पश्चात् वे सभी न केवल मुक्त हो गए, बल्कि उनमें से
अनेक को उच्च सरकारी पद भी दिये गए । सम्भवतः अमीर की हत्या की योजना
में भारतीय क्रान्तिकारियों का भी हाथ था ।
अमीर हबीबुल्ला खां की हत्या के संदेह में जनरल नादिर खां भी गिरफ्तार
किये गए थे, जो उस समय अफगानिस्तान की सेना के उप-सेनापति थे । मौलाना
उबेदुल्ला सिन्धी के जनरल नादिर खां से बहुत अच्छे सम्बन्ध थे किन्तु वे प्रकट
रूप से जनरल नादिर खां से बहुत कम मिलते थे । अमीर हबीबुल्ला खां के पश्चात्
जब उनके पुत्र अमानुल्ला खां गद्दी पर बैठे, तो जनरल नादिर खां को रिहा कर
दिया गया और उनके एक भाई हाशिम खान को एक उच्च सरकारी पद पर
प्रतिष्ठित कर दिया गया ।
भारत की आज़ाद हिन्द सरकार के प्रधान राजा महेन्द्रप्रताप अमानुल्ला खां
के प्रगाढ़ मित्र थे । मौलवी उबेदुल्ला सिन्धी को भी अमानुल्ला खां बहुत मानते
थे । उधर जनरल नादिर खां के प्राइवेट सेक्रेटरी मौलाना जफर हुसैन थे, जो
आज़ाद हिन्द सरकार के एक महत्त्वपूर्ण पद पर थे । इस पृष्ठभूमि में जब हम
गद्दी पर बैठते ही अमानुल्ला खां को भारत पर चढ़ाई करते देखते हैं और साथ
ही सरहद पर बसे हुए आजाद कबीलों और तुरंगजई के हाजी साहब को इस युद्ध
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में अफ़गानिस्तान की मदद करते हुए पाते हैं, तो हम समझ सकते हैं कि काबुल-
स्थित भारत के क्रान्तिकारी अभी तक अपने कार्य मे लगे हुए थे और इस आक्र-
मण की योजना में उनका महत्त्वपूर्ण हाथ था।
सन्धि
इस अवसर पर अंग्रेजो ने भारी कूटनीतिज्ञता दिखाई और अफगानिस्तान
सरकार की महत्त्वपूर्ण शर्तें स्वीकार करके समझौता कर लिया। इस आक्रमण के
समय अफ़गान फ़ौजों की कमान स्वयं जनरल नादिर खां कर रहे थे। यह आक्रमण
29 मई सन् 1919 को हुआ और 8 अगस्त, 1919 को अंग्रेजो की अफ़गानिस्तान
से सन्धि हो गई। इस सन्धि के सम्बन्ध मे ब्रिटेन के राजनीतिज्ञ आर्नल्ड टायनबी
ने कहा था, “अमीर ने अपनी पराजय के पुरस्कार मे, जो कुछ वह चाहता था,
पा लिया और भारत सरकार को अफ़गानिस्तान की परराष्ट्र नीति पर से, जिस
पर उसका चालीस वर्ष से अधिकार था, अपना हाथ हटाना पडा।” अंग्रेजो ने
अपनी ओर से इस सन्धि के समय एक यह शर्त भी अफगानिस्तान से स्वीकार
करा ली थी कि मौलवी उबेदुल्ला आदि को काबुल मे राजनीतिक कार्य नही करने
दिया जायगा। इस प्रतिबन्ध से विवश मौलवी उबेदुल्ला काबुल मे सभी प्रकार की
सुविधाएं होते हुए भी 22 अक्तूबर, 1922 को रूस चले गए। इस आक्रमण और
सन्धि ने उनके सम्मुख यह तथ्य प्रकट कर दिया था कि अफगानिस्तान जैसा छोटा
देश अंग्रेज सरकार के सम्मुख अधिक दिनो तक नही ठहर सकता।
बलूच और क्रान्तिकारी
श्री शचीन्द्र ने अपनी पुस्तक के द्वितीय भाग मे 'बर्मा की कहानी' शीर्षक
अध्याय के अन्तर्गत बलूच सेना के विद्रोह की झांकी दी है, जिसमें सैकड़ों बलूच
सैनिकों और उनके अफसरों को भारी दण्ड सहना पड़ा। इस संदर्भ में कई बातें
ध्यान मे रखने योग्य हैं। प्रथम तो यह कि बलूचिस्तान की सीमाएँ सरहदी पठानों
के प्रदेश की सीमाओं से लगी हुई हैं, जिनकी अंग्रेज विरोधी परम्पराओं और
भावनाओं पर हम ऊपर प्रकाश डाल चुके हैं। इसके अतिरिक्त मदरसा देवबन्द
के क्रान्तिकारियों का संगठन सिन्ध में भी था और वहाँ अनेक छोटे-छोटे मदरसे
इन लोगों ने स्थापित कर रखे थे, जिनके द्वारा निरन्तर अंग्रेज विरोधी प्रचार
होता रहता था। यह भी अब प्रकट हो गया है कि बर्मा में बलूच सेना ने जिस गदर
पार्टी के कार्यकर्ताओं के प्रोत्साहन पर विद्रोह किया था, उसी गदर पार्टी के अनेक
कार्यकर्ता ईरान के रास्ते बलूच प्रदेश की सीमा पर जा पहुंचे थे और उन्होंने
एक बड़े बलूच सरदार जिहान खां को अपनी ओर मिला लिया था। इन लोगों
ने इस बलूच प्रदेश में आजाद हिन्द सरकारी बनाई थी और बलूचियों की एक
सेना भी संगठित कर ली थी, जिससे अंग्रेज सेनाओं की अनेक झड़पें हुई थीं। इसके
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बाद अंग्रेजों ने बलोचों के अमीर को अपनी ओर मिला लिया और फिर उसी ने
क्रान्तिकारी बलूच सेना पर आक्रमण किया । परिणामस्वरूप बलूच सेना भंग हो
गई और क्रान्तिकारियों को वहाँ से बड़ी कठिन स्थिति में भागना पड़ा । कुछ
क्रान्तिकारी अंग्रेजों के हाथों में भी पड़ गए, जो वहीं गोलियों से उड़ा दिये गए ।
इतिहासकारों के लिए यह अन्वेषण का विषय है कि ईरान-बलूचिस्तान की सीमा
पर होनेवाली इन हलचलों का बर्मा के बलूच-विद्रोह से कुछ सम्बन्ध था या नहीं।
अली अहमद सिद्दीक़ी
'बर्मा की कहानी' शीर्षक अध्याय में ही श्री शचीन्द्र ने अलीअहमद सिद्दीक़ी
के सम्बन्ध में भी कुछ पंक्तियां लिखी हैं। इन श्री अलीअहमद सिद्दीक़ी से सन्
1950-51 में इन पंक्तियों का लेखक भी मिला था। श्री सिद्दीक़ी उस समय इला-
हाबाद म्यूनिसिपैलिटी के वाटरवर्क्स विभाग में थे। उनसे बात करने पर मालूम
हुआ कि वे मैडिकल मिशन के साथ टर्की पहुँचते ही क्रान्तिकारी दल में दीक्षित
हो गए थे । श्री शुएब क़ुरैशी जो भोपाल के और बाद में बड़े प्रतिष्ठित राष्ट्रीय
मुस्लिम नेता बने, उसके सहयोगी थे । एक मजेदार बात उन्होंने यह बताई कि जब
वे कुछ ज़रूरी और गोपनीय काग़ज़ात लेकर मिस्र से भारत को चले, तो जर्मन
सरकार के एक गुप्तचर ने उनको चेतावनी दी कि भारत पहुँचते ही आप गिरफ़्तार
कर लिए जाएँगे । श्री सिद्दीक़ी इससे बड़े परेशान हुए, क्योंकि जो काग़ज़ात उनको
भारत पहुँचाने थे, उनको वे किसी भी प्रकार नष्ट नहीं करना चाहते थे और न
अंग्रेजों के हाथों में पड़ने देना चाहते थे । तभी जहाज़ में उनको एक मुस्लिम फ़क़ीर
मिला, जो प्रतिवर्ष भीख माँगने के लिए मलाया आदि देशों में घूमा करता था ।
श्री सिद्दीक़ी ने उस फ़क़ीर को समझाया कि यदि वह भारत में घूमे तो उसे अधिक
धन मिल सकता है । श्री सिद्दीक़ी ने उस फ़क़ीर को यह भी बताया कि ये एक
ज़रूरी काम से तुरन्त मलाया पहुँचना चाहते हैं, अतः फ़क़ीर यदि उनसे टिकट
परिवर्तन कर ले और उनका सामान भारत में उनके घर पहुँचा देने का वायदा
करे, तो वह उसके टिकट से मलाया चले जाएं और फ़क़ीर हिन्दुस्तान चला जाय ।
उन दिनों पासपोर्ट इत्यादि की कठिनाई थी नहीं, अतः फ़क़ीर शायद सामान के
लालच से तैयार हो गया और उसने टिकट बदल लिया । सिद्दीक़ी साहब ने काग-
ज़ात तो अपने पास रख लिए और अपना तमाम सामान फ़क़ीर के सुपुर्द कर दिया ।
इसके बाद वह मलाया जा पहुँचे । फकीर बम्बई पहुँचते ही गिरफ़्तार हो गया
और वर्षों पश्चात् जब सिद्दीक़ी साहब भारत के किसी जेल में थे, वह फ़क़ीर एक
राजनीतिक क़ैदी के रूप में ही सिद्दीक़ी साहब से मिला । क्रान्तिकारी आन्दोलन
के इतिहास में ऐसी मनोरंजक घटनाएँ भी अनेकों हुई हैं ।
श्री सिद्दीक़ी साहब ने बताया कि उनके दल में हिन्दू-मुस्लिम प्रश्न को कोई
स्थान नहीं था । सभी देश की स्वाधीनता के दीवाने थे और टर्की सरकार की राज्य
-शक्ति का सहारा पाकर भारतीय फ़ौजों के विद्रोह द्वारा अंग्रेजों से मुक्ति का स्वप्न
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देखते थे । मलाया और बर्मा में उनके संगठन का पर्याप्त विस्तार हो गया था किंतु
कुछ भारतीयो ने गद्दारी करके सम्पूर्ण भेद अंग्रेज़ो को बता दिया और भारतीय
क्रान्तिकारी समय से पूर्व ही गिरफ्तार कर लिये गए । सेनाओं पर भी भारी दमन
किया गया, जो सर्वथा गोपनीय रखा गया । सैकड़ो सिपाही और अफ़सर चुप-
चाप मौत के घाट उतार दिये गए, जिससे उनकी छूत दूसरी फ़ौजों को भी न लग
जाय ।
मुखबिर कुमुदनाथ मुखर्जी
श्री शचीन्द्र ने इन गद्दारों में बैकोक के एक बगाली वकील साहब का उल्लेख
किया है किन्तु उनका नाम नही दिया है । पता लगता है कि इन बंगाली वकील
साहब का नाम कुमुदनाथ मुखर्जी था । यह वकील साहब जो किसी समय गदर पार्टी
के कार्यकर्ताओ से बडी देशभक्ति की डीगे हाँकते थे, उस रुपये को हजम कर जाने
की खातिर जो बैकोक के जर्मन कौसिल ने इनके द्वारा बगाल के क्रान्तिकारियों
को भेजा था, अंग्रेजों से जा मिले । उनके द्वारा शघाई, स्याम और बर्मा में होने-
वाली क्रान्तिकारी योजनाओं का आभास भारत सरकार को मिल गया और इसी-
लिए वह सब कुछ नही हो सका, जिसे श्री सिद्दीकी इत्यादि करना चाहते थे ।
पंजाब के कृपालसिंह की भाँति इन मुखर्जी ने सब गुड़गोबर कर दिया ।
बंगाल मे विद्रोह की तैयारी
रहस्योद्घाटन के भय से श्री शचीन्द्र यह बात भी बचा गए हैं कि जब उत्तर
भारत में श्री रासबिहारी और गदर पार्टी के सदस्य इतने विराट् विद्रोह की
तैयारी मे जुटे हुए थे, तब बगाल के क्रान्तिकारी क्या कर रहे थे ? श्री मन्मथनाथ
गुप्त ने अपनी पुस्तक 'भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन का इतिहास' में एक अन्य
क्रान्तिकारी श्री पाकड़ासी की एक पुस्तक का निम्न उद्धरण दिया है, जो इस
सम्बन्ध मे पर्याप्त प्रकाश डालता है और यह प्रकट करता है कि बगाल मे उन
दिनों किस प्रकार की तैयारी चल रही थी। श्री पाकड़ासी लिखते हैं, 'नेतागण
ढाका से लेकर लाहौर तक विद्रोह की तैयारी में लगे हुए थे । ढाका मे उन दिनों
सिख सेना थी । लाहौर के षड्यन्त्रकारी सिख सैनिको ने ढाका के सिखों के साथ
सम्पर्क स्थापित करने के लिए परिचय पत्र भेज दिए । ढाका के क्रान्तिकारी नेता
अनुकूल चक्रवर्ती उन पत्रों को लेकर ढाका के सिख सैनिको से मिले ।... सिख
सैनिक विद्रोह की बात सुनकर शिरकत करने के लिए उत्सुक हो गए ।' ...
"मैमनसिंह और राजशाही के सुस्ल नामक जंगल में क्रान्तिकारी संध्या के
बाद क़वायद करते थे । आक्रमण और रणकौशल सीखने के लिए सब लोग प्रयास
करने लगे । जिलों में बंदूकें चुराने की होड़ मच गई । चारों तरफ़ अफ़वाह फैला
दी गई कि अब की बार मैट्रिक्यूलेशन और विश्वविद्यालय की दूसरी परीक्षाएँ
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नहीं होंगी।"
श्री गुप्त ने अपने ग्रन्थ में एक अन्य स्थान पर लिखा है, "बंगाल के क्रान्ति-
कारी समझते थे कि संख्या की दृष्टि से उनके साथ इतने काफ़ी आदमी हैं, जो
बंगाल की फ़ौजों को समझ ले सकते हैं, किंतु वे बाहर से आनेवाली फ़ौजों से डरते
थे। इसी उद्देश्य को दृष्टि में रखकर क्रान्तिकारियों ने यह निश्चय किया कि
बंगाल में आनेवाली तीन मुख्य रेलों को, उनके पुलों को उड़ाकर बेकार कर दिया
जाय। यतीन्द्रनाथ के ऊपर मद्रास से आनेवाली रेल का भार दिया गया, वे
बालासोर से इस काम को अंजाम देने वाले थे। भोलानाथ चटर्जी बी० एन०
आर० का भार लेकर चक्रधरपुर चले गए। सतीश चक्रवर्ती ई० आई० आर०
का पुल उड़ाने के लिए गए। नरेन चौधरी और फणीन्द्र चक्रवर्ती को यह काम
सौंपा गया कि वे हटिया जाएं। वहां एक जत्था इकट्ठा होनेवाला था। हटिया मे
वे इस जत्थे की सहायता से पूर्व बंगाल के जिलों पर क़ब्ज़ा करने वाले थे, और
वहां से वे कलकत्ता पर चढ़ आनेवाले थे। नरेन भट्टाचार्य और विपिन गागुली
के नेतृत्व में कलकत्ता दल पहले तो कलकत्ता के आस-पास अस्त्र-शस्त्र तथा
अस्त्रागारों पर क़ब्ज़ा करनेवाला था, फिर फोर्ट विलियम पर धावा बोलने
वाला था तथा कलकत्ता पर अधिकार जमानेवाला था। 'मावेरिक' जहाज़ पर
आनेवाले जर्मन अफ़सरों पर यह भार था कि वे पूर्व बंगाल मे रहें, वहां फ़ौजें
इकट्ठी करें, फिर बाकायदा उन्हें सैनिक शिक्षा दें।"
रासबिहारी का भारत-त्याग
देश-विदेशों में होने वाली यह विराट् तैयारियां असफल हो गईं और
श्री रासबिहारी बोस को भारत छोड़कर बाहर जाना पड़ा। श्री शचीन्द्र ने
लिखा है कि अप्रैल, 1915 में श्री रासबिहारी ने भारत से प्रस्थान किया। यहाँ कुछ
स्मृतिभ्रम मालूम होता है क्योंकि श्री रासबिहारी ने अपने एक लेख में भारत
छोड़ने की तिथि 12 मई, 1915 बताई है। श्री रासबिहारी ने एक जापानी
जहाज पर पी० एन० टैगोर के नाम से यह यात्रा की। उन दिनों श्री रवीन्द्रनाथ
टैगोर के जापान जाने की सूचनाएं अखबार में निकली थीं, अतः श्री रासबिहारी
ने कुछ ऐसा प्रदर्शित किया कि वे श्री रवीन्द्रनाथ के ही परिवार के हैं और उनकी
यात्रा का प्रबन्ध करने के लिए जापान जा रहे हैं। उस समय श्री रासबिहारी के
सिर पर एक लाख का इनाम था। वे पकड़े जाते तो अवश्य ही अंग्रेज उनको
फांसी पर चढ़ा देते। पर वे सकुशल जापान जा पहुंचे। उनके जापान पहुंच जाने
पर अंग्रेजों को जब यह सब ज्ञात हुआ तो उसने जापान सरकार पर यह दबाव
डाला कि वह श्री रासबिहारी को गिरफ्तार करके अंग्रेजों के हवाले कर दे।
जापान सरकार इसके लिए तैयार भी हो गई किन्तु रासबिहारी के जापानी मित्रों
ने ऐसा नहीं होने दिया। अनेक दिनों तक जापान में भी रासबिहारी को भारत से
भी अधिक छिपकर रहना पड़ा। कुछ दिनों पश्चात् यह बाधाएं दूर हो गईं और
कुछ पूरक तथ्य / 393
श्री रासबिहारी जापान के नागरिक बन गए ।
द्वितीय विश्वयुद्ध के समय श्री रासबिहारी पुनः कार्यक्षेत्र मे उतरे । जैसे ही
जापान ने अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध घोषणा की, श्री रासबिहारी ने जापान स्थित
भारतीयों का एक संगठन बनाकर भारत की स्वाधीनता के लिए प्रयास प्रारम्भ
किया । गदर पार्टी के कुछ कार्यकर्ता और बंगाल क्रान्तिकारी दल के कुछ सदस्यों
ने इस कार्य में श्री रासबिहारी की सहायता की । आजाद हिन्द फौज के प्रारम्भिक
संगठन मे उन्होंने महत्त्वपूर्ण भाग लिया था। इसके पश्चात् जब श्री सुभाष बोस
जापान जा पहुँचे, तो रासबिहारी ने नेतृत्व उनके हाथों में सौंप दिया । जनवरी
सन् 1945 मे श्री रासबिहारी का टोकियो में देहान्त हो गया ।
विदेशों में भारतीय विप्लववादी
श्री शचीन्द्र ने विदेशों मे भारतीय विप्लववादियो के कार्यों का वर्णन भी
अपनी पुस्तक के द्वितीय भाग के अन्तर्गत किया है । इस अध्याय मे उनके कार्य
की एक अति संक्षिप्त झाँकी ही आ सकती थी और फिर ऐसी बातें न लिखने की
विवशता भी थी जो उस समय तक प्रकट नहीं हुई थी और जिनकी सूचना से
अंग्रेज शासकों को लाभ पहुँच सकता था । वास्तव मे, जो भारतीय देशभक्त
विदेशों मे कार्य करते रहे, उनका लेखा-जोखा तैयार करना अतिदुस्तर कार्य है ।
उनका सम्पूर्ण कार्य अत्यन्त गोपनीय होता था । किसी भी सरकार की प्रामा-
निकता उनके पास थी नही। अपने परिवार और साथियों से दूर रहकर नितान्त
अभाव-ग्रस्त अवस्था मे इनको कार्य करना पड़ता था । अनेक भारतीय और
विदेशी गुप्तचर इनको घेरे रहते थे और सबसे बडी कठिनाई यह थी कि एक दिन
जिस राष्ट्र को वह अंग्रेजो का शत्रु समझकर वहाँ आश्रय ग्रहण करते थे तथा
अपना केन्द्र बनाते थे, वही किसी दिन भी आन्तरिक अथवा विदेशी राजनीतिक
उलट से विवश होकर अंग्रेजो का मित्र और इनका शत्रु बन जाता था । ये लोग
हजारों की संख्या मे थे, जिनमें से अधिकतर वही, अपनी मातृभूमि से दूर, काल
कवलित हो गए। अनेकों को विदेशों के कारावास मे भी भयानक यंत्रणाएँ सहन
करनी पड़ीं । फिर भी इनमे से अधिकांश ब्रिटिश सरकार द्वारा उत्पन्न की गई
बाधाओं और उसके द्वारा दिए गए प्रलोभनों को जीतकर अपने मार्ग पर आरूढ़
रहे । न जाने कब वह समय आएगा, जब इन लोगों के कार्यों का ब्योरा उनके
सम्मुख आ सकेगा, जिनकी स्वतन्त्रता के लिए उन्होने ऐसे कष्ट सहन किए थे ।
अभी कुछ दिन पहले हमारी सरकार इस कार्य में प्रवृत्त होती दिखाई दी थी ।
केन्द्र और राज्यो में इसके लिए कमेटियाँ भी बनीं । बजट भी मंजूर हुए । कुछ
कार्य आगे बढ़ा भी किन्तु फिर पता नहीं लगा कि क्या हुआ ? इलाहाबाद की
हिन्दुस्तानी कल्चर सोसाइटी ने भी एक बार इस काम को हाथ मे लिया था,
जिसका एक कार्यकर्ता इन पंक्तियों का लेखक भी था । यह तो काम में हाथ
डालने के बाद मालूम हुआ कि सरकार के अतिरिक्त, करोड़ों रुपया व्यय किए
394 / बन्दी जीवन
बिना कोई दूसरा संगठन यह कार्य प्रामाणिक रूप से नहीं कर सकता।
यह बात ध्यान में रखने की है कि विदेशों में कार्य करनेवाले भारतीय
विप्लववादियों में अनेक असाधारण बौद्धिक क्षमता के व्यक्ति थे। इनमें से कुछ
तो अन्य राष्ट्रों में उच्च सरकारी पदों पर पहुँच गए। ये लोग यदि चाहते और
इस क्रान्ति मार्ग पर आरूढ़ न होते तो अपने देश में भी पर्याप्त यश, मान और
धन अर्जित कर सकते थे। फिर भी मातृभूमि की स्वाधीनता के लिए उन्होंने
कष्टों और यातनाओं से भरे हुए मार्ग को ही चुना और अपने लक्ष्य के लिए
शहीद हो गए। हमारे देश के लिए यह कितनी वेदनात्मक स्थिति है कि आज
उनमें से अधिकांश का नाम भी हम नहीं जानते। यही नहीं, बल्कि जिन लोगों ने
विदेशों में रहते समय साहित्य रचना की, उनका प्रकाशित साहित्य भी हमारे
पास उपलब्ध नहीं है। अब पता लगा है कि श्री रासबिहारी बोस ने जापानी
भाषा में सात ग्रन्थ लिखे हैं। मौलवी बर्कतुल्ला, श्री वीरेन्द्र चट्टोपाध्याय, मैडम
कामा, श्यामजी कृष्ण वर्मा, ला० हरदयाल इत्यादि अनेकों ने भी समय-समय
पर ग्रन्थ, पुस्तिकाएं, लेख इत्यादि लिखे, इन लोगों ने अनेक पत्र भी निकाले,
पर आज भारतीयों के लिए उनमें से एक भी तो उपलब्ध नहीं है। भारत
सरकार चाहे तो अपने दूतावासों के द्वारा यह कार्य करा सकती है। अनेक
विदेशी राजनीतिक महानुभावों ने अपनी पुस्तकों में इन भारतीय क्रान्तिकारियों
का प्रसंगवश जो विवरण दिया है, हमारे दूतावास उनका संग्रह भी कर सकते
हैं, पर यह सब नहीं हो रहा और न इसकी मांग ही की जा रही है। शायद किसी
देश के लिए अपने देशभक्तों के प्रति कृतघ्नता की यह चरम सीमा है। इतिहास
की क्षति तो है ही।
विदेशों में भारतीय जासूस
अंग्रेज सरकार इन लोगों पर कितनी कड़ी नजर रखती थी, इसका एक
उदाहरण उर्दू के प्रसिद्ध लेखक काजी अब्दुल गफ्फार खां ने मुझे सुनाया था।
उन्होंने बताया कि एक बार वे डा० अंसारी और हकीम अजमल खां के साथ पेरिस
में थे। वहाँ किसी के द्वारा इन लोगों को सन्देश मिला कि श्री एम० एन० राय
की पत्नी एलेनराय इनसे भेंट करना चाहती हैं। भेंट सर्वथा गुप्त होनी थी, अतः
पेरिस के एक भारतीय मुस्लिम व्यापारी का घर इसके लिए निश्चित किया गया।
उस व्यापारी की क्रौकरी की एक बड़ी दूकान थी। भारत की स्वाधीनता और
राष्ट्रीय आन्दोलन के प्रति उसकी निष्ठा देखकर ही उसका स्थान विश्वासपात्र
समझा गया। फिर भी सावधानी के लिए न तो उसे एलेनराय का नाम बताया
गया और न उसे वार्ता में सम्मिलित ही किया गया। इतना ही नहीं, बल्कि वार्ता
के समय उसके परिवार का कोई भी व्यक्ति मकान में नहीं था। निश्चित समय
पर एलेनराय आईं और वार्ता करके चली गईं। इसके पश्चात् ये लोग, (डा०
अंसारी, हकीम अजमल खां, काजी अब्दुलगफ्फार) टर्की गए। टर्की देखने की
[कुछ पूरक तथ्य / 395]
इच्छा जताकर वह मुस्लिम व्यापारी भी इनके साथ हो गया। वहाँ ये लोग
राजकीय अतिथि माने गए। टर्की सरकार का एक बड़ा अधिकारी इनकी सेवा में
नियुक्त हुआ। उस अधिकारी ने एक दिन काजी अब्दुलगफ्फार को बताया कि
उनके साथ आया हुआ पेरिस का भारतीय व्यापारी अंग्रेजों का ज सूस है और
इसीलिए सुरक्षा की दृष्टि से मुस्तफा कमालपाशा से उनकी भेंट नहीं कराई गई।
इतना ही नहीं, बल्कि जब काज़ीसाहब भारत लौटे तो भारत सरकार के एक
उच्च गुप्तचर अधिकारी, शायद खानबहादुर असगरहुसैन ने उस वार्ता को
अक्षरशः सुना दिया जो एलेनराय और इन लोगों के बीच हुई थी। इस घटना से
कई बातें सामने आती हैं। एक तो यह कि ब्रिटिश सरकार ने अपने जासूसों को
विदेशों में भारतीय व्यापारियों के रूप में भी बसा रक्खा था और उन पर अन-
गिनत रुपया खर्च करती थी। फिर दूसरे देशों की सरकारे भी अपने जासूसो द्वारा
इन भारतीय जासूसों की गतिविधियोंपर नज़र रखती थी। तीसरी बात यह कि
जो वार्ता इतनी सावधानी और गोपनीयता के साथ हुई, वह भी या तो कमरे मे
छिपे किसी यंत्र के द्वारा अथवा अन्य किसी प्रकार सरकार को ज्यों-की-त्यों ज्ञात
हो गई। इससे हम विदेश-स्थित भारतीय क्रान्तिकारियो की कठिनाइयो का
किंचित् अनुमान लगा सकते हैं।
श्री जवाहरलाल नेहरू ने विदेशी सरकारों के जासूसो के सम्बन्ध मे एक
दिलचस्प घटना का अपनी आत्मकथा मे उल्लेख किया है। उन्होंने लिखा है,
"मेरे एक अमेरिकन दोस्त उन दिनों पेरिस में रहते थे। उनसे एक दिन फ्रांस की
खुफिया पुलिस के एक अधिकारी मिलने आए। वह महज़ दोस्ताना तरीके पर
कुछ मामलो की बाबत पूछने आए थे। जब वह साहब अपनी बाते पूछ चुके तो
उन अमेरिकन से बोले, 'आपने मुझे पहचाना या नही, मैं तो आपसे पहले भी
मिल चुका हूँ।' अमेरिकन ने उन्हें बड़े गौर से देखा, लेकिन उन्हें मजूर करना
पडा कि मुझे याद नही आता कि मैने आपको कब और कहाँ देखा है। तब खुफिया
पुलिस के साहब ने बताया कि मैं आपसे ब्रूसेल्स कान्फ्रेंस मे नीग्रो प्रतिनिधि की
हैसियत से मिला था। उस समय अपने हाथ-मुंह वगैरह मैंने बिलकुल काले रंग
लिए थे।"
इसी ब्रूसेल्स कान्फ्रेंस मे मौलाना बर्कतुल्ला आदि भारतीय क्रान्तिकारी भी
सम्मिलित थे। इस तरह भारतीय देशभक्तो को प्रत्येक कदम पर धोखे और छल
से सावधान रहना पड़ता था। बहुत बार तो अपने नजदीकी साथी भी धोखा दे
जाते थे।
396 / बन्दी जीवन
भारतीय क्रान्तिकारियों द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय संकट
विदेशों में स्थित भारतीय क्रान्तिकारी सर्वथा असफल ही नहीं हुए, उन्होंने
अनेक बार ब्रिटिश सरकार को भारी संकट में डाल दिया था। प्रथम विश्वयुद्ध
के समय काबुल की आजाद हिन्द सरकार ने जो मिशन रूस भेजा था, जिसे
ताशकन्द के गवर्नर ने गिरफ्तार करके वापस अफ़गानिस्तान पहुँचा दिया, उस
मिशन के सम्बन्ध में मौलाना उबेदुल्ला ने अपनी पुस्तक में लिखा है, "यह मिशन
बेकार साबित नहीं हुआ, इससे रूस और अंग्रेज़ सरकार की एकता में किसी
सीमा तक कठिनाई उत्पन्न हो गई, जिसे हल करने के लिए लार्ड किचनर को
यात्रा करनी पड़ी।"
अफ़गानिस्तान में भारतीय क्रान्तिकारियों के कारण राजनीतिक उलट-फेर
और भारत पर अफ़गान आक्रमण की चर्चा हम ऊपर कर आए हैं। यहाँ पर इस
सम्बन्ध में इतना उल्लेख कर देना आवश्यक है कि सन् 1919 की पराजय के
प्रतिशोधस्वरूप जब 1929 में अंग्रेजों ने अमानुल्ला के खिलाफ बगावत करा दी
और अपने एक गोइन्दे बच्चा सक्का को गद्दी पर बैठा दिया, तो जनरल नादिर खां
को बच्चा सक्का के विरुद्ध भारतीय क्रान्तिकारियों से बड़ी भारी मदद मिली
थी। इन क्रान्तिकारियों का ही यह प्रभाव था कि जब बच्चा सक्का का एजेण्ट
अमामदीन चाराघारी पेशावर पहुँचा, तो उसके विरुद्ध इतने जुलूस और सभाएँ
तथा अन्य प्रदर्शन पेशावर के पठानों ने किए कि अमानुल्ला खां की सरकार के ट्रेड
एजेण्ट मरदार अब्दुल हकीम खां ने, इन प्रदर्शनों से साहस पाकर, बच्चा सक्का
सरकार के एजेण्ट को चार्ज देने से इन्कार कर दिया और अंग्रेज़ सरकार उन
पर दबाव डालने का साहस नहीं कर सकी। इसके बाद पेशावर के पठानों ने
ब्रिगेडियर जान मुहम्मद के घर पर हमला कर दिया, जहाँ बच्चा सक्का सरकार
का एजेण्ट ठहरा हुआ था। बड़ी कठिनाई से वहाँ उस एजेण्ट की जान बच सकी।
अपने विरुद्ध ऐसा प्रबल लोकमत देखकर बच्चा सक्का का यह एजेण्ट वापस
लौट गया और जब नया एजेण्ट आया, तो उस पर भी भीड़ ने हमला किया
और जिस मकान में वह था, उसको पर्याप्त हानि पहुँचाई।
आज़ाद पठान क़बीलों की शक्ति को नादिर खां की सहायता के लिए एकत्रित
कर देना भी भारतीय क्रान्तिकारियों का ही कार्य था, जिसके बिना नादिर खां
की विजय असम्भव थी। उस समय तक नादिर खां भी यही प्रकट कर रहे थे कि
वह अमानुल्ला खां को गद्दी वापस दिलाने के लिए बच्चा-सक्का के विरुद्ध युद्ध में
उतरे हैं। भारतीय क्रान्तिकारियों का यह भी अनुभव था कि नादिर खां अंग्रेज़
विरोधी हैं। यह क्रान्तिकारी अंग्रेजों द्वारा अमानुल्ला खां के विरुद्ध रचे गए षड्यन्त्र
से पूरी तरह परिचित थे और उन्होंने अफ़गानिस्तान में विद्रोह होने से बहुत
पहले ही इसकी सूचना गांधीजी और कांग्रेस के अन्य नेताओं को दे दी थी।
इसका प्रमाण यह है कि सन् 1928 में कलकत्ता कांग्रेस का अधिवेशन समाप्त
कुछ पूरक तथ्य / 397
करके जब गांधीजी तथा महादेव देसाई लौट रहे थे, तो उन्होंने सीमाप्रांत के
राष्ट्रीय मुस्लिम नेता आगा लाला बादशाह, अनीगुल खान और अब्दुल करीम
भी उसी गाड़ी से सफर कर रहे थे। इस अवसर पर गांधीजी ने इन नेताओं से कहा
था, "अफ़गानिस्तान में शीघ्र ही अंग्रेज़ अमानुल्ला खां के शासन के विरुद्ध विद्रोह
आरम्भ कराने वाले हैं। अंग्रेजों का षड्यन्त्र यह है कि अमानुल्ला को हटाकर
अपने किसी पिट्ठू को गद्दी पर बैठा दिया जाए। आप लोगों को इस पर दृष्टि
रखनी चाहिए और अमानुल्ला की सहायता करनी चाहिए। भारत का हित भी
इसी बात में है।" भारतीय क्रान्तिकारियों ने इस प्रकार अमानुल्ला खां के पक्ष
में लोकमत तैयार किया और यद्यपि वे अमानुल्ला खा को नही बचा सके, किन्तु
बच्चा सक्का भी क़ाबुल की गद्दी पर नही रह सका और इस प्रकार अंग्रेज अपने
षड्यंत्र में पूरी तरह सफल नही हो सके। इससे ईरान आदि देशों के स्वतन्त्रता
आन्दोलन को जो लाभ पहुँचा, वह भी सर्व-विदित है। भारत को तो लाभ हुआ
ही।
भारत छोड़ने से पूर्व श्री सुभाष की सेनाओं से सम्पर्क
द्वितीय विश्वयुद्ध मे विदेश प्रवासी भारतीय क्रान्तिकारियों ने जो कार्य किया,
उससे भारत को स्वाधीनता प्राप्त करने मे बहुत महत्त्वपूर्ण सहयोग मिला।
आज़ाद हिन्द सरकार और आज़ाद हिन्द फ़ौज के निर्माण मे सर्व प्रथम प्रयास
रासबिहारी बोम, स्वामी सत्यानन्दपुरी (जो बगाली क्रान्तिकारी दल के पुराने
सदस्य थे) और प्रीतमसिंह (गदर' पार्टी के पुराने कार्यकर्ता) ने किया था। प्रायः
ऐसा समझा जाता है कि श्री सुभाष बोस ब्रिटिश सरकार के दमन पाश से बचने
के लिए भारत से चले गए और फिर विदेशो मे जाकर उन्हें यह सूझा कि भारतीय
फ़ौजो के बन्दी सिपाहियों का सगट- करके अंग्रेज़ों के विरुद्ध लड़ा जाय। किन्तु
यह धारणा सही नही है। श्री सुभाष जब कांग्रेस मे पृथक् हुए थे और फारवर्ड
ब्लाक स्थापित करके देश-भर मे दोग करके प्रवार कार्य कर रहे थे, उस समय
भी उनके मस्तिष्क मे यही योजना थी। इस दौर' में उनके साथ श्री त्रैलोक्यनाथ
चक्रवर्ती भी किसी दूसरे नाम से थे, जो बंगाल के क्रान्तिकारी दल के प्रभावशाली
नेता थे और जिनका उल्लेख श्रो शचीन्द्र ने भी प्रशंसात्मक शब्दों में एक-दो
स्थान पर अपनी पुस्तक मे किया है। श्री चत्रवर्ती ने लिखा है कि सन् 1940 में
जब श्री सुभाष बोस के सभापतित्व मे दिल्ली मे छात्र सम्मेलन हुआ था तभी
लाला शंकरलाल के घर पर फारवर्ड ब्लाक की कार्यकारिणी बैठक भी हुई थीं।
इस बैठक मे मै भी सम्मिलित हुआ था। उक्त बैठक में जो नेता सम्मिलित हुए
थे, उनमे सीमाप्रान्त के नेता अकबरशाह भी थे। ...उपस्थित नेताओं में जिन
लोगों को सुभाषबाबू विप्लव मनोवृत्ति का समझते थे, उनसे घनिष्ठता से मिलाने
और विचार-विमर्श करने के उद्देश्य से मेरा परिचय करा देते थे। अकबरशाह
के बारे में सुभाष बाबू की ऊंची धारणा थी। वे सुभाष बाबू के विशेष भक्त और
३९४ / क्रान्ति जीवन
सरल, सीधे, स्वदेश प्रेमी और निर्भीक थे। उन्हें विशेष रूप से विप्लव के मार्ग
पर लाने को सुभाष बाबू ने मुझसे कहा। मैं भी खूब घनिष्ठता से उनसे मिला
और भावी विप्लव के बारे में उनसे चर्चा की। मेरे साथ चर्चा करने के बाद
उनकी हिचकिचाहट दूर हो गई और वे सशस्त्र क्रान्ति के पथ के पूर्ण विश्वासी
बन गए।
"....सेना वाहिनियों में प्रभाव फैलाने के बारे में मैंने अकबरशाह से बात
की। उन्होंने पठान सेना-वाहिनियों की मुख्य छावनियों की जानकारी पाने की
सलाह दी और कहा—'मैं उन लोगों में प्रभाव डालने का प्रयत्न करूँगा। पठान
सैनिक भारत की स्वतन्त्रता के संग्राम का विरोध नहीं करेंगे।' अफ़गानिस्तान
की राह से विदेश जाने के लिए भारत का सीमान्त पार करवा देने का कोई
प्रबन्ध करने की बात पूछने पर उन्होंने कहा, कि दुभाषिये के सहारे से प्रबन्ध
करना सम्भव होगा। उन्होंने यह भी कहा कि पैदल जाने में बहुत समय लगेगा
और कष्ट भी बहुत होगा। घोड़े पर जाना आसान होगा, लेकिन खर्च बहुत
पड़ेगा।'"
उपरोक्त उद्धरण से नेताजी सुभाष के भारत से बाहर जाने की योजना पर
एक नया प्रकाश पड़ता है। श्री चक्रवर्ती ने यह भी लिखा है कि दिल्ली के लाला
शंकरलाल को सुभाष बाबू ने जापान इसीलिए भेजा था कि वे ब्रिटिश शत्रु देशों
से इस सम्बन्ध में बात कर आएँ। इधर सेनाओं में भी विद्रोह का प्रचार हो रहा
था। 'कलकत्ते में सिक्ख नेता सरदार निरंजनसिंह 'गालिब' की मार्फत एक सिक्ख
वाहिनी हमारे सम्पर्क में आ गई थी। उनके कई प्रतिनिधि सुभाष बाबू से मिले
थे। सुभाष बाबू ने कर्मपद्धति के बारे में उनसे बातें करके उनको निकट भविष्य
में तैयार रहने को कहा था।' इस प्रकार विदेशों में स्थित भारतीय क्रान्तिकारी
सभी द्वितीय महायुद्ध प्रारम्भ होते ही सक्रिय हो गए थे। यह श्री सुभाष की
अन्तिम गिरफ्तारी से पहले की बात है। इस गिरफ्तारी से पूर्व ही श्री सुभाष ने
सीमाप्रान्त के रास्ते भारत से बाहर जाने की योजना बना ली और भारत तथा
विदेशों में स्थित भारतीय सिपाहियों से सम्पर्क स्थापित करना प्रारम्भ कर दिया
था। वे विदेशों से आनेवाले किसी सन्देश की प्रतीक्षा में थे, अन्यथा इसी समय
बाहर चले गये होते। सरकार ने इसी बीच उनको गिरफ्तार कर लिया किन्तु
अनशन करके श्री सुभाष ने अपने को मुक्त करा लिया और फिर विदेश में सूचना
मिलते ही भारत से बाहर चले गए। निस्संदेह यह सब इसीलिए सम्भव हो सका
कि विदेशों में भारतीय क्रान्तिकारी बड़ी सावधानी से इसकी पृष्ठभूमि बना चुके
थे।
जो भारतीय विप्लववादी विदेशो में थे, उनमें अनेक अन्य देशों के क्रान्ति-
कारियों से बड़े अच्छे सम्बन्ध बनाये हुए थे। काबुल के क्रान्तिकारी संगठन
'जमायते सियासिया' पर भारतीय क्रान्तिकारियों के प्रभाव पर हम पर्याप्त
प्रकाश डाल चुके हैं। एशिया के अन्य ऐसे देशों में, जो अंग्रेजों के दास या अर्ध-
कुछ पूरक तथ्य / 399
दास थे, भारतीय क्रान्तिकारियों ने उल्लेखनीय कार्य किया। उदाहरण के लिए
ईरान में श्री अम्बाप्रसाद सूफी आदि ने स्वयं अंग्रेजों के विरुद्ध हो रहे युद्ध में
सक्रिय भाग लिया। श्री डा० खानखोजे भी लगभग तीन वर्ष तक ईरानी सेना
मे मम्मिलित होकर अंग्रेजों से लड़े। श्री प्रमथनाथ दत्त भी ईरान की क्रान्तिकारी
सेना मे सम्मिलित होकर अंग्रेजों से लड़ते रहे और ईरानी सेना के हार जाने
पर लगभग तीन वर्ष तक एक ईरानी कबीले में छिपे रहे। रूस की सोवियत
सरकार की सहायता से उस समय बड़ी कठिनाई से उनका उद्धार हो सका। श्री
एम० एन० राय तो चीन में साम्यवादी क्रान्ति का संचालन करने के लिए अन्त-
र्राष्ट्रीय साम्यवादी संगठन की ओर से भेजे गए थे। बर्मा के क्रान्तिकारियों मे से
जनरल-आंगसान आदि श्री रासबिहारी आदि के सम्पर्क मे थे। गदर पार्टी के
कुछ नेताओं का सम्पर्क नए चीन के पिता डा० सनयातसेन से था। लेनिन और
ट्राटस्की, स्टालिन के सम्पर्क में तो अनेकों भारतीय क्रान्तिकारी रहे। मुस्तफा
कमालपाशा का भी अनेक भारतीय क्रान्तिकारियों से सम्पर्क रहा। इस प्रकार
भारतीय क्रान्तिकारियों ने महत्त्वपूर्ण अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध स्थापित कर रखे थे।
यह दूसरी बात है कि भारत को स्वाधीनता कुछ इस प्रकार और ऐसे रूप में
मिली, जिसके कारण इन सम्बन्धों से विशेष लाभ नही उठाया जा सका।
भारत के राष्ट्रीय नेता और क्रान्तिकारी
भारतीय क्रान्तिकारियों की अपने देश के राष्ट्रीय आन्दोलन में क्या स्थिति
रही और राष्ट्रीय नेताओ से उनके सम्बन्धो पर भी श्री शचीन्द्र ने यहाँ-वहाँ
थोड़ी-सी चर्चा अपनी इस पुस्तक में की है। अन्य क्रान्तिकारियों ने भी अपनी
पुस्तकों और संस्मरणों में इस प्रश्न पर विचार किया है। इसमें सन्देह नही कि
मातृभूमि की स्वाधीनता के लिए सर्वस्व त्याग का जैसा आदर्श विप्लवियों ने
जनता के सम्मुख रक्खा, वैसा आदर्श कांग्रेस आन्दोलन के कार्यकर्ता नहीं रख
सके। किन्तु ऐसा होना स्वाभाविक था। विप्लवी आन्दोलन में जो व्यक्ति सम्मि-
लित होते थे, वे समाज के सबसे अधिक साहसी और निर्भय युवक थे, जो पहले से ही
फाँसी, कालापानी की सम्भावनाओं को हृदयगम करके इस रास्ते पर पैर बढ़ाते
थे। इनमें से जिनका मनोबल टूट जाता था, वे एप्रूवर (इकबाली गवाह) इत्यादि
बन जाते थे। कांग्रेस आन्दोलन में फाँसी, कालापानी की सम्भावनाएँ नही थी।
शायद इसीलिए कांग्रेस का आन्दोलन जन-आन्दोलन भी बन सका। फिर भी
कांग्रेस आन्दोलन से सहानुभूति रखने वाली जनता और साधारण कार्यकर्ता
विप्लवियों के प्रति अधिक श्रद्धावान थे, इसमें सन्देह नहीं है। आज भी अनेक
भूतपूर्व विप्लवी अपने क्रान्तिकारी जीवन की याद दिलाकर चुनाव जीतते देखे
जाते हैं, जो प्रमाणित करता है कि जनता उनके कष्ट-सहन के प्रति आज भी
श्रद्धावान है। स्वयं डाक्टर पट्टाभि ने अपने ग्रन्थ 'कांग्रेस का इतिहास' में स्वी-
कार किया है कि एक समय सरदार भगतसिंह भारतीय जनता में महात्मा गांधी
400 / बन्दी जीवन
की ही भाँति लोकप्रिय थे। श्री चन्द्रशेखर आजाद के इलाहाबाद में पुलिस की
गोलियों से मारे जाने के बाद जनता ने जिस प्रकार उस वृक्ष की पूजा की, जिसके
नीचे श्री आजाद शहीद हुए थे तथा इससे बहुत पहले कन्हाईलाल दत्त के जुलूस
में विशाल जन समूह का सम्मिलित होना इस बात का प्रतीक है कि विप्लवियों
के प्रति राष्ट्रीय विचारों की जनता में सदैव प्रबल आकर्षण रहा और वह इनको
भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम का सच्चा 'वीर' समझती रही।
जहाँ तक कांग्रेस के नेताओं का सम्बन्ध है, अधिकांश से विप्लवी नेताओं की
कभी अच्छी तरह पट नही सकी। वास्तव में कांग्रेस के अधिकांश नेता विप्लवियों
के आतंकवादी मार्ग को राष्ट्रीय आन्दोलन की बाधा समझते थे। वे इस बारे में
बहुत सचेत रहते थे कि कहीं सरकार उनका सम्बन्ध आतंकवादी आन्दोलन से सिद्ध
न कर दे। कांग्रेस जो बड़ी कठिनाई से आवेदन-पत्रों और प्रार्थना-प्रस्तावों की
परिधि से निकलकर सविनय अवज्ञा के मार्ग पर आई थी, सरकार को भीषण
आत्म दमन का कोई भी अवसर नही देना चाहती थी। फिर भी शनैः-शनैः
कांग्रेस के कुछ नेताओं के मत में हम परिवर्तन होता हुआ देखते हैं। श्री शचीन्द्र
को शिकायत है कि वे जब कालापानी से लौटे तो मोतीलालजी, देशबन्धु दास,
मालवीयजी, जवाहरलाल नेहरू ने उनकी बातों पर, यहाँ तक कि राजनीतिक
बन्दियों की रिहाई के लिए आन्दोलन करने की प्रार्थना पर भी उचित ध्यान
नहीं दिया। इनमें से श्री मोतीलालजी के सम्बन्ध में हम एक अन्य क्रान्तिकारी
मनमोहन गुप्त के संस्मरणों में पढ़ते हैं कि वे एक हस्तलिखित क्रान्तिकारी बुले-
टिन के मूल्य-स्वरूप मोतीलालजी से पांच सौ रुपये लाए थे और वे प्रायः उनको
कुछ न कुछ देते रहते थे। श्री चन्द्रशेखर आजाद, यशपाल आदि को भारत से
बाहर जाने के लिए जवाहरलालजी द्वारा धन प्राप्त हुआ था, यह स्वयं यशपालजी
ने अपनी पुस्तक में लिखा है। देशबन्धु चित्तरंजनदास के सम्बन्ध में श्री त्रैलोक्य-
नाथ चक्रवर्ती ने लिखा है कि जब वे क्रान्तिकारी कार्यों के अपराध में जेल की
सजा काट रहे थे, उन दिनों ही देशबन्धु भी असहयोग आन्दोलन में जेल आए।
इस जेल प्रवास के समय एक कांग्रेसी ने देशबन्धु से यह शिकायत की कि विप्लवी
क़ैदी असहयोगी बन्दियों को कांग्रेस के विरुद्ध भड़काते हैं, तो देशबन्धु ने उत्तर
दिया था, “इनकी बातें अब मुझे याद आती हैं, तो मेरा सारा घमंड चूर हो
जाता है।” इससे प्रकट होता है कि दास बाबू भी इनको पर्याप्त आदर की दृष्टि
से देखते थे।
विप्लवी आन्दोलन ने कांग्रेस आन्दोलन के मार्ग में बाधा खड़ी नहीं की,
शक्ति ही दी, ऐसा प्रायः सभी राष्ट्रीय कार्यकर्ताओं का अनुभव है। 'जब यह लोग
फाँसी पर चढ़ सकते हैं, कालापानी जा सकते हैं, तो क्या हम वर्ष-छह महीने
की सजा भी नहीं काट सकते,' यह भावना बहुत-से युवकों को कांग्रेस आन्दोलन
में खींच लाई, इसमें सन्देह नहीं है। भारत की अंग्रेज सरकार ने विप्लवियों पर
जो अत्याचार किए, उसके कारण भी जनमत अंग्रेज सरकार का विरोधी बनता
गया, इसमें भी सन्देह नहीं है। कभी-कभी किसी विशेष जोशीले सरकार-भक्त
अधिकारी ने जब कांग्रेसी आन्दोलनकारियों पर भीषण अत्याचार करके कांग्रेस
वालों को बहुत आतंकित कर दिया, तब किसी क्रान्तिकारी की एक धमकी-भरी
चिट्ठी से ही उक्त अधिकारी सही रास्ते पर आ गया, इसके उदाहरण भी मौजूद
हैं। अन्त मे सन् 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन का अहिंसा की परिधि से
निकलकर हिंसात्मक रूप ग्रहण कर लेना यह सिद्ध करता है कि विप्लवियों का
न तो 'आतंकवाद' व्यर्थ हुआ और न हमारे राष्ट्रीय आन्दोलन ने 'हिंसा-अहिंसा'
के तत्त्वचिन्तन का ही चिन्ता की। अंग्रेजों को भारत से हटाने का मुख्य श्रेय यदि
आजाद हिन्द फौज के संगठन को नही, तो आजाद हिन्द फ़ौज के बन्दियों की
रिहाई के आन्दोलन को तो है ही, जिसने फ़ौजों को भी ब्रिटिश विरोधी बना
दिया था। गांधीजी की अहिंसात्मक रणनीति के कारण भारत का ब्रिटिश विरोधी
जन-आन्दोलन प्रत्यक्ष और संगठित रूप से चलता रहा और उसी के बल
पर आजाद-हिन्द फ़ौज की रिहाई का आन्दोलन इस रूप में किया जा सका,
यह तथ्य भी हमारी आंखो से ओझल नही होना चाहिए। भारत की स्वाधीनता
का श्रेय इन दोनों ही प्रकार के आन्दोलनो को है; किन्तु त्याग, कष्ट-सहन का
पलड़ा विप्लवियों का ही भारी है, यह निर्विवाद सत्य है।
श्री शचीन्द्र की शेष कहानी
श्री शचीन्द्र ने 'बन्दी जीवन' की कहानी सन् 1920 में कालेपानी से मुक्ति
के बाद घर आने, विवाह करके क्रान्तिकारी कार्यों के लिए पत्नी-पुत्री सहित चट-
गांव जाने और फिर लौटकर उत्तर प्रदेश में आ जाने की चर्चा के माथ ही समाप्त
कर दी है। इसी बीच उन्होंने शेष क्रान्तिकारी राजबन्दियों की रिहाई के लिए जो
उद्योग किया, उसकी चर्चा तो पूर्ण रूप से की है किन्तु क्रान्तिकारी दल को पुन-
र्गठित करने के लिए क्या कुछ किया, इसका केवल आभास मात्र ही दिया है।
'बन्दी जीवन' के तृतीय भाग में यह सब ब्योरा है, जो श्री शचीन्द्र ने सन् 1937-
38 में कांग्रेस मंत्रिमण्डलों द्वारा रिहा किए जाने के पश्चात् कानपुर के 'प्रताप'
पत्र मे धारावाहिक रूप से लिखा था। उस समय भी देश में अंग्रेज सरकार थी,
इसलिए श्री शचीन्द्र यथातथ्य विवरण दे भी नही सकते थे। इसीलिए उन्होंने
'काकोरी षड्यन्त्र' का विवरण भी नही दिया, जिसमें उनके चार साथियों को
फांसी हुई और श्री शचीन्द्र को आजीवन कालेपानी का दंड मिला था।
श्री शचीन्द्र ने सन् 1920 में कालेपानी से लौटकर जिस दिन भारत भूमि पर
पैर रक्खा, ठीक उसी दिन से वे क्रान्तिकारी दल के पुनर्गठन में प्रवृत्त हो गए थे।
इस समय तक उत्तर प्रदेश का क्रान्तिकारी संगठन विच्छिन्न हो चुका था। बंगाल
का प्रमुख क्रान्तिकारी दल 'ढाका अनुशीलन समिति' उसके बहुत से सदस्यों के
जेल जाने से निर्बल था। श्री बारीन्द्र का 'युगान्तर दल', जो प्रथम महायुद्ध के
पूर्व ही 'चन्दननगर दल' के रूप में परिवर्तित हो गया था, और जिसके एक नेता
402 / बन्दी जीवन
रासबिहारी बोस थे, लगभग किंकर्तव्यविमूढ़ था। पंजाब में 'गदर पार्टी' के नेता
या तो जेल में थे और या विदेशों में खिसक गए थे। कांग्रेस गांधीजी के प्रभाव में
आ चुकी थी और जलियांवाला बाग हत्याकांड से उत्पन्न रोष का गांधीजी असह-
योग आन्दोलन में उपयोग करने की तैयारी कर चुके थे। मुस्लिम क्रान्तिकारी
दल गोपनीय आतंकवाद की व्यर्थता अनुभव करके प्रकट जन-आन्दोलन के मार्ग
पर चल चुका था और 'खिलाफत' की रक्षा के नाम पर देश की मुस्लिम जनता का
अंग्रेजों से संघर्ष कराने की भूमिका तैयार कर रहा था। भारत की जनता को
नया राजनीतिक दर्शन, नये नेता और नई रणनीति प्राप्त हो रही थी।
बंगाल के क्रान्तिकारी असहयोग आन्दोलन का विरोध कर रहे थे किन्तु श्री
शचीन्द्र ने इसमें योग नहीं दिया। गांधीजी के इस आन्दोलन से उनको स्वतन्त्रता
प्राप्ति की आशा तो नहीं थी किन्तु इस आन्दोलन के माध्यम से जन-जागरण के
महत्त्व को वे हृदयंगम कर सके थे। सम्भवतः वे समझ गए थे कि आन्दोलन अस-
फल होगा। इसीलिए असहयोग आन्दोलन से वे तटस्थ रहे। 'न निन्दा, न प्रशंसा'
की नीति ग्रहण कर वे यहाँ-वहाँ घूमकर क्रान्तिकारी दल का संगठन करने लगे।
बंगाल के सभी क्रान्तिकारी दलों का पारस्परिक सहयोग हो या एक संगठन बन
जाय, इसके लिए उन्होंने विशेष उद्योग किया। क्रान्तिकारी संगठन के प्रति देश
के युवकों का ध्यान आकर्षित करने के लिए ही उन्होंने इस समय बंगाली भाषा
की एक पत्रिका में लेखमाला प्रारम्भ की, जिसमें सन् 1914-15 के कार्यों का विव-
रण था। यही लेखमाला बाद में 'बन्दी जीवन' के प्रथम-द्वितीय भाग के रूप में
पुस्तकाकार प्रकाशित हुई और क्रान्तिकारी संगठन के नये रंगरूटों की पाठ्य-
पुस्तक बन गई। न जाने कितने युवक अकेली इस पुस्तक के पारायण से ही अनु-
प्राणित होकर क्रान्तिकारी दल में प्रविष्ट हुए। इस प्रकार श्री शचीन्द्र असहयोग
काल में अपने शरीर और बुद्धि का सम्पूर्ण उपयोग क्रान्तिकारी संगठन के लिए
करते रहे;
कुछ दिनों बाद असहयोग आन्दोलन असफल होकर समाप्त हो गया। इसकी
प्रतिक्रियास्वरूप देश में साम्प्रदायिक विद्वेष और बलवों की हवा बह चली।
बड़े-बड़े तथाकथित राष्ट्रीय नेता इस हवा में बहकर हिन्दू-मुस्लिम द्वेष के प्रचारक
बन गए। स्वदेश की स्वाधीनता की बात पीछे पड़ गई। कुछ लोग चरखा और
सूत में उलझ गए, कुछ को धारासभाओं की कुर्सियाँ पुकारने लगीं। राष्ट्रीय
आन्दोलन के लिए यह बड़े संकट का समय था।
श्री शचीन्द्र इस ससय पंजाब से बंगाल तक राष्ट्रीय विचारों के युवकों को
खोज-खोजकर उनको एक संगठन में पिरोने लगे। इसी समय क्रान्तिकारी दल
का ध्यान मजदूर संगठन की ओर गया। जमशेदपुर में मजदूर यूनियन बनी और
उसके सभापति बनाये गए श्री देशबन्धुदास की पत्नी के भाई और कलकत्ता के
प्रसिद्ध बैरिस्टर श्री एस० एन० हलदार। श्री शचीन्द्र भी वहाँ जाकर काम करने
लगे। किन्तु कुछ ही दिन बाद श्री शचीन्द्र ने जमशेदपुर का कार्य छोड़ दिया और
फिर सन् 1924 मे कलकत्ते मे, प्रतुलचन्द्र गागुली और त्रैलोक्यनाथ चक्रवर्ती के
साथ मिलकर 'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन पार्टी' की स्थापना की। इस संस्था की
स्थापना का मुख्य उद्देश्य यह था कि उत्तर भारत मे केवल एक क्रान्तिकारी
सगठन कार्य करे, जिसके नेता श्री शचीन्द्र बनाये गए। इससे पहले ढाका अनु-
शीलन समिति के श्री योगेश चटर्जी भी उत्तर भारत मे सगठन कार्य कर रहे थे
और उन्होने श्री रामप्रसाद विस्मिल आदि को पुनः क्रान्तिकारी कार्यों मे प्रवृत्त
कर दिया था। श्री राजेन्द्र लाहिड़ी, जिनको काकोरी केस मे फाँसी हुई, श्री
शचीन्द्र के सहयोगी थे इन दिनो ही 'रिवोल्यूशनरी' नामक एक पर्चा रंगून से
पेशावर तक बाटा गया, जिसमे भारतीय जनता के सम्मुख सशस्त्र क्रान्ति की
आवश्यकता और उपयोगिता प्रकट की गई थी। एक ही दिन सम्पूर्ण देश मे पर्चा
वितरित करके क्रान्तिकारी देशवासियो को यह विश्वास दिलाना चाहते थे कि
उनका एक वृहत् सगठन स्थापित हो चुका है। भारत सरकार भी पर्चे बॉटने की
इस सगठन-व्यवस्था से बहुत आतंकित हुई थी और इस पर्चे की सबसे बड़ी उप-
योगिता यह थी कि साम्प्रदायिकता के उठते हुए तूफान मे इस प्रकार के कार्य जन-
साधारण को राष्ट्रीयता की ओर उन्मुख करते थे। काकोरी षड्यन्त्र के मुकदमे
मे सरकारी वकील ने श्री शचीन्द्र को ही 'रिवोल्यूशनरी' पर्चे का लेखक बताया
था। बाद मे इस पर्चे को डाक द्वारा भेजने के अपराध मे फरवरी, 1925 मे
शचीन्द्र पकडे गए और दो वर्ष की कैद का दड मिला। बगाल ऐसैम्बली मे क्रान्ति-
कारी आन्दोलन का दमन करने के लिए सरकार ने इन दिनो ही एक 'आर्डिनेन्स
एक्ट' प्रस्तुत किया। बगाल के तत्कालीन गृह सदस्य श्री स्ट्रीफेन्सन ने इस एक्ट
की आवश्यकता बताते हुए, अपने भाषण मे श्री शचीन्द्र और 'रिवोल्यूशनरी' पर्चे
की विशेष रूप से चर्चा की थी।
श्री शचीन्द्र जेल जाने से पूर्व ही उत्तर प्रदेश मे एक दृढ़ क्रान्तिकारी दल का
सगठन कर चुके थे। श्री भगतसिंह, चन्द्रशेखर आज़ाद आदि इसी समय क्रान्ति-
कारी दल मे प्रविष्ट हुए। इन दिनो दल की आर्थिक स्थिति अत्यन्त दुर्बल थी।
काकोरी काण्ड के शहीद श्री रामप्रसाद 'बिस्मिल' ने फाँसी की कोठरी मे जो
अपनी आत्मकथा लिखी है, उसमे दिये गए विवरण के अनुसार, "इस समय समिति
के सदस्यो की बड़ी दुर्दशा थी। चने मिलना भी कठिन था। सब पर कुछ न कुछ
कर्ज हो गया। किसी के पास साबुन कपडे तक न थे। कुछ विद्यार्थी बनकर धर्म
क्षेत्रो तक मे भोजन कर आते थे।" ऐसी स्थिति से विवश होकर दल ने डकैती
डालने का निश्चय किया। इन दिनो ही विदेशो से अस्त्र-शस्त्र प्राप्त करने का भी
कोई अच्छा सूत्र प्राप्त हो गया था। उसके लिए भी धन की आवश्यकता थी। इस
सब कारणो से लखनऊ के पास काकोरी स्टेशन पर रेल का खजाना लूटा गया। कुछ
लोग डकैती डालना गर्हित कार्य समझ सकते हैं। क्रान्तिकारी भी इसे अच्छा
नही समझते थे, लेकिन देश के कार्य के लिए भी धन की आवश्यकता तो होती ही
है। इससे पूर्व दान, चन्दा आदि से धन सग्रह करने का प्रयोग किया जा चुका था,
404 / बन्दी जीवन
जो सर्वथा असफल रहा था । अर्थ-समस्या सुलझाने के लिए सन् 1924 में ही,
अर्थात् श्री शचीन्द्र की गिरफ्तारी से कुछ पहले ही जाली नोट बनाने का भी
प्रयास क्रान्तिकारी कर चुके थे। श्री शचीन्द्र ने 'बन्दी जीवन' के तृतीय भाग में
एक स्थान पर जाली नोट बनाने के सम्बन्ध में थोड़ा आभास दिया है किन्तु यह
नोट कहाँ, कौन बनाता था, यह विवरण रहस्योद्घाटन के भय से नहीं दिया ।
जाली नोट बनाने का काम ढाका अनुशीलन समिति की ओर से पहले ढाका और
मैमनसिंह शहर में प्रारम्भ किया गया। दस रुपये और सौ रुपये के नोट के ब्लाक
किसी प्रकार क्रान्तिकारियों ने बनवा लिए थे। श्री दिनेशचन्द्र लाहिड़ी, त्रैलोक्य-
नाथ चक्रवर्ती आदि यह कार्य करते थे । इसके बाद बंगाल के सोनारंग गाँव में
प्रबोधदास गुप्त और शचीन्द्र चक्रवर्ती यह कार्य करते रहे। इन दोनों को इस
अपराध में पांच-पांच वर्ष का कारावास दंड भी मिला। यह जाली नोट इतने त्रुटि-
पूर्ण बनते थे कि तुरन्त पकड़ाई में आ जाते थे। इसीलिए अन्ततः डकैती द्वारा
धन संचित करने के लिए विवश होना पड़ा। काकोरी में ट्रेन लूटने से धन तो
मिला, किन्तु सरकार तुरन्त समझ गई कि यह डकैती राजनीतिक उद्देश्य से डाली
गई है। पहले दो-एक संदेहास्पद व्यक्ति गिरफ्तार किये गए । वे दुर्भाग्य से इतने
कमजोर निकले कि जो कुछ मालूम था, सब पुलिस के सामने उगल दिया । फिर
तो देशभर में गिरफ्तारियां हुईं। श्री शचीन्द्र जो पर्चा बाँटने के जुर्म में सजा भुगत
रहे थे, वह भी इस केस में घसीट लिये गए। सरकार ने लगभग दस लाख रुपया
व्यय करके इस मुकदमे को साबित कर दिया। श्री शचीन्द्र फिर एक बार काला-
पानी जा पहुँचे ।
सन् 1937-38 में शचीन्द्रबाबू काकोरी के अन्य राजबन्दियों के साथ कांग्रेस
मंत्रिमंडल द्वारा रिहा किये गए । उन्होंने फिर पूर्वानुंसार इलाहाबाद के एक पत्र
में अपने क्रान्तिकारी कार्यों का विवरण लिखना प्रारम्भ किया। इसके अतिरिक्त
भी कुछ लेखादि लिखे जो पुस्तकाकार प्रकाशित हुए। इसके पश्चात् द्वितीय महा-
युद्ध प्रारम्भ हो गया, तो सरकार ने उनको नजरबन्द कर दिया। इन दिनों उनका
स्वास्थ्य बहुत जर्जर हो गया था। इसी अस्वस्थता के आधार पर नजरबन्दी से
उनकी मुक्ति हुई। घर पर रहकर शचीन्द्रबाबू चिकित्सा कराने लगे । इसी समय
श्री त्रैलोक्यनाथ चक्रवर्ती उनसे बनारस जाकर मिले और श्री सुभाष बोस के
नेतृत्व में विद्रोह करने की योजना बताकर श्री शचीन्द्र से उसमें भाग लेने को
कहा। शचीन्द्र ने इसे स्वीकार कर लिया और परिवार की व्यवस्था करने के लिए
थोड़ा समय मांगा। वे यह व्यवस्था कर ही रहे थे कि क्षय रोग का आक्रमण उन
पर हो गया और सन् 1942 में भारत का यह महान् क्रान्तिकारी, अपनी आँखों
में स्वदेश की स्वाधीनता के सपने बसाए सदैव के लिए चिरनिद्रा में निमग्न हो
गया। अब उनके शौर्य पूर्ण जीवन की केवल स्मृति-भर शेष रह गई है।
RAJA RAMMOHUN ROY
LIBRARY FOUNDATION
उपहार स्वरूप
Gifted by
राजा राममोहन राय पुस्तकालय प्रतिष्ठान द्वारा
RAJA RAMMOHUN ROY
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BLOCK DD-34 SECTOR 1 SALT LAKE
CALCUTTA-700 064
शहीद ग्रंथ-माला
संपादक : बनारसीदास चतुर्वेदी
इस माला का मुख्य उद्देश्य भारतीय जनता को उन अमर शहीदों की बलिदान-
गाथाओं से परिचित कराना है जिन्होंने हँसते-हँसते स्वाधीनता की बलिवेदी पर
अपने प्राणों की आहुति दे दी, जिनकी कीर्ति देश के भावी सपूतों को सदा प्रेरणा
देती रहेगी। इस माला की पुस्तकों की मुख्य विशेषता इनकी प्रामाणिकता है।
भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन का इतिहास : मन्मथनाथ गुप्त
ब्रिटिश सरकार ने छपते ही यह पुस्तक जब्त कर ली थी। जब्ती के पश्चात्
इसके तीन संस्करण और हुए तथा इस विषय पर यह सारे भारतीय साहित्य में
सर्वाधिक प्रामाणिक ग्रंथ माना गया। यह इसका नवीन संस्करण है।
यश की धरोहर : (भगवानदास माहोर, सदाशिवराव मलकापुर, शिव वर्मा)
भारतीय क्रान्ति के यज्ञ मे अपने प्राणों की बलि देने वाले युवकों सरदार
भगतसिंह, राजगुरु, चन्द्रशेखर आजाद, नारायणदास खरे तथा सुखदेव के चिर-
स्मरणीय मार्मिक संस्मरण।
आत्मकथा : रामप्रसाद बिस्मिल
जेल में फाँसी से दो दिन पूर्व लिखी गई यह आत्मकथा हिन्दी की सर्वश्रेष्ठ
आत्मकथा है। यह आत्मकथा हाथ मे लेते ही हृदय मे एक सिहरन-सी होने लगती
है। भारत के सभी सार्वजनिक तथा व्यक्तिगत पुस्तकालयों में इस आत्मकथा का
होना अत्यंत आवश्यक है।
गणेश शंकर विद्यार्थी : (देवव्रत शास्त्री, भूमिका : जवाहरलाल नेहरू)
अमर शहीद गणेश शंकर विद्यार्थी की सजीव बलिदान गाथा, जो हमें
स्वतंत्रता और न्याय के लिए बड़े से बड़ा बलिदान देने को प्रेरित करती है।
बन्दी जीवन : शचीन्द्रनाथ सान्याल
गदर पार्टी का इतिहास : (प्रीतमसिंह पंछी)
इसमें बड़ी खोज के साथ यह दिखाया गया है कि अमेरिका में भारतीयों ने
गदर पार्टी का संगठन कैसे किया । उनके त्याग और बलिदान की कथा बड़े
रोमांचकारी शब्दों में लिखी गई है। यह ग्रंथ भारतीय स्वाधीनता-संग्राम के
इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है।
आत्माराम एण्ड संस
कश्मीरीगेट, दिल्ली-110006