बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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सरल, सीधे, स्वदेश प्रेमी और निर्भीक थे। उन्हें विशेष रूप से विप्लव के मार्ग
पर लाने को सुभाष बाबू ने मुझसे कहा। मैं भी खूब घनिष्ठता से उनसे मिला
और भावी विप्लव के बारे में उनसे चर्चा की। मेरे साथ चर्चा करने के बाद
उनकी हिचकिचाहट दूर हो गई और वे सशस्त्र क्रान्ति के पथ के पूर्ण विश्वासी
बन गए।
"....सेना वाहिनियों में प्रभाव फैलाने के बारे में मैंने अकबरशाह से बात
की। उन्होंने पठान सेना-वाहिनियों की मुख्य छावनियों की जानकारी पाने की
सलाह दी और कहा—'मैं उन लोगों में प्रभाव डालने का प्रयत्न करूँगा। पठान
सैनिक भारत की स्वतन्त्रता के संग्राम का विरोध नहीं करेंगे।' अफ़गानिस्तान
की राह से विदेश जाने के लिए भारत का सीमान्त पार करवा देने का कोई
प्रबन्ध करने की बात पूछने पर उन्होंने कहा, कि दुभाषिये के सहारे से प्रबन्ध
करना सम्भव होगा। उन्होंने यह भी कहा कि पैदल जाने में बहुत समय लगेगा
और कष्ट भी बहुत होगा। घोड़े पर जाना आसान होगा, लेकिन खर्च बहुत
पड़ेगा।'"
उपरोक्त उद्धरण से नेताजी सुभाष के भारत से बाहर जाने की योजना पर
एक नया प्रकाश पड़ता है। श्री चक्रवर्ती ने यह भी लिखा है कि दिल्ली के लाला
शंकरलाल को सुभाष बाबू ने जापान इसीलिए भेजा था कि वे ब्रिटिश शत्रु देशों
से इस सम्बन्ध में बात कर आएँ। इधर सेनाओं में भी विद्रोह का प्रचार हो रहा
था। 'कलकत्ते में सिक्ख नेता सरदार निरंजनसिंह 'गालिब' की मार्फत एक सिक्ख
वाहिनी हमारे सम्पर्क में आ गई थी। उनके कई प्रतिनिधि सुभाष बाबू से मिले
थे। सुभाष बाबू ने कर्मपद्धति के बारे में उनसे बातें करके उनको निकट भविष्य
में तैयार रहने को कहा था।' इस प्रकार विदेशों में स्थित भारतीय क्रान्तिकारी
सभी द्वितीय महायुद्ध प्रारम्भ होते ही सक्रिय हो गए थे। यह श्री सुभाष की
अन्तिम गिरफ्तारी से पहले की बात है। इस गिरफ्तारी से पूर्व ही श्री सुभाष ने
सीमाप्रान्त के रास्ते भारत से बाहर जाने की योजना बना ली और भारत तथा
विदेशों में स्थित भारतीय सिपाहियों से सम्पर्क स्थापित करना प्रारम्भ कर दिया
था। वे विदेशों से आनेवाले किसी सन्देश की प्रतीक्षा में थे, अन्यथा इसी समय
बाहर चले गये होते। सरकार ने इसी बीच उनको गिरफ्तार कर लिया किन्तु
अनशन करके श्री सुभाष ने अपने को मुक्त करा लिया और फिर विदेश में सूचना
मिलते ही भारत से बाहर चले गए। निस्संदेह यह सब इसीलिए सम्भव हो सका
कि विदेशों में भारतीय क्रान्तिकारी बड़ी सावधानी से इसकी पृष्ठभूमि बना चुके
थे।
जो भारतीय विप्लववादी विदेशो में थे, उनमें अनेक अन्य देशों के क्रान्ति-
कारियों से बड़े अच्छे सम्बन्ध बनाये हुए थे। काबुल के क्रान्तिकारी संगठन
'जमायते सियासिया' पर भारतीय क्रान्तिकारियों के प्रभाव पर हम पर्याप्त
प्रकाश डाल चुके हैं। एशिया के अन्य ऐसे देशों में, जो अंग्रेजों के दास या अर्ध-