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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 401, कुल 408 में से

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पृष्ठ 401

कुछ पूरक तथ्य / 399

दास थे, भारतीय क्रान्तिकारियों ने उल्लेखनीय कार्य किया। उदाहरण के लिए
ईरान में श्री अम्बाप्रसाद सूफी आदि ने स्वयं अंग्रेजों के विरुद्ध हो रहे युद्ध में
सक्रिय भाग लिया। श्री डा० खानखोजे भी लगभग तीन वर्ष तक ईरानी सेना
मे मम्मिलित होकर अंग्रेजों से लड़े। श्री प्रमथनाथ दत्त भी ईरान की क्रान्तिकारी
सेना मे सम्मिलित होकर अंग्रेजों से लड़ते रहे और ईरानी सेना के हार जाने
पर लगभग तीन वर्ष तक एक ईरानी कबीले में छिपे रहे। रूस की सोवियत
सरकार की सहायता से उस समय बड़ी कठिनाई से उनका उद्धार हो सका। श्री
एम० एन० राय तो चीन में साम्यवादी क्रान्ति का संचालन करने के लिए अन्त-
र्राष्ट्रीय साम्यवादी संगठन की ओर से भेजे गए थे। बर्मा के क्रान्तिकारियों मे से
जनरल-आंगसान आदि श्री रासबिहारी आदि के सम्पर्क मे थे। गदर पार्टी के
कुछ नेताओं का सम्पर्क नए चीन के पिता डा० सनयातसेन से था। लेनिन और
ट्राटस्की, स्टालिन के सम्पर्क में तो अनेकों भारतीय क्रान्तिकारी रहे। मुस्तफा
कमालपाशा का भी अनेक भारतीय क्रान्तिकारियों से सम्पर्क रहा। इस प्रकार
भारतीय क्रान्तिकारियों ने महत्त्वपूर्ण अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध स्थापित कर रखे थे।
यह दूसरी बात है कि भारत को स्वाधीनता कुछ इस प्रकार और ऐसे रूप में
मिली, जिसके कारण इन सम्बन्धों से विशेष लाभ नही उठाया जा सका।

भारत के राष्ट्रीय नेता और क्रान्तिकारी

भारतीय क्रान्तिकारियों की अपने देश के राष्ट्रीय आन्दोलन में क्या स्थिति
रही और राष्ट्रीय नेताओ से उनके सम्बन्धो पर भी श्री शचीन्द्र ने यहाँ-वहाँ
थोड़ी-सी चर्चा अपनी इस पुस्तक में की है। अन्य क्रान्तिकारियों ने भी अपनी
पुस्तकों और संस्मरणों में इस प्रश्न पर विचार किया है। इसमें सन्देह नही कि
मातृभूमि की स्वाधीनता के लिए सर्वस्व त्याग का जैसा आदर्श विप्लवियों ने
जनता के सम्मुख रक्खा, वैसा आदर्श कांग्रेस आन्दोलन के कार्यकर्ता नहीं रख
सके। किन्तु ऐसा होना स्वाभाविक था। विप्लवी आन्दोलन में जो व्यक्ति सम्मि-
लित होते थे, वे समाज के सबसे अधिक साहसी और निर्भय युवक थे, जो पहले से ही
फाँसी, कालापानी की सम्भावनाओं को हृदयगम करके इस रास्ते पर पैर बढ़ाते
थे। इनमें से जिनका मनोबल टूट जाता था, वे एप्रूवर (इकबाली गवाह) इत्यादि
बन जाते थे। कांग्रेस आन्दोलन में फाँसी, कालापानी की सम्भावनाएँ नही थी।
शायद इसीलिए कांग्रेस का आन्दोलन जन-आन्दोलन भी बन सका। फिर भी
कांग्रेस आन्दोलन से सहानुभूति रखने वाली जनता और साधारण कार्यकर्ता
विप्लवियों के प्रति अधिक श्रद्धावान थे, इसमें सन्देह नहीं है। आज भी अनेक
भूतपूर्व विप्लवी अपने क्रान्तिकारी जीवन की याद दिलाकर चुनाव जीतते देखे
जाते हैं, जो प्रमाणित करता है कि जनता उनके कष्ट-सहन के प्रति आज भी
श्रद्धावान है। स्वयं डाक्टर पट्टाभि ने अपने ग्रन्थ 'कांग्रेस का इतिहास' में स्वी-
कार किया है कि एक समय सरदार भगतसिंह भारतीय जनता में महात्मा गांधी