बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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इच्छा जताकर वह मुस्लिम व्यापारी भी इनके साथ हो गया। वहाँ ये लोग
राजकीय अतिथि माने गए। टर्की सरकार का एक बड़ा अधिकारी इनकी सेवा में
नियुक्त हुआ। उस अधिकारी ने एक दिन काजी अब्दुलगफ्फार को बताया कि
उनके साथ आया हुआ पेरिस का भारतीय व्यापारी अंग्रेजों का ज सूस है और
इसीलिए सुरक्षा की दृष्टि से मुस्तफा कमालपाशा से उनकी भेंट नहीं कराई गई।
इतना ही नहीं, बल्कि जब काज़ीसाहब भारत लौटे तो भारत सरकार के एक
उच्च गुप्तचर अधिकारी, शायद खानबहादुर असगरहुसैन ने उस वार्ता को
अक्षरशः सुना दिया जो एलेनराय और इन लोगों के बीच हुई थी। इस घटना से
कई बातें सामने आती हैं। एक तो यह कि ब्रिटिश सरकार ने अपने जासूसों को
विदेशों में भारतीय व्यापारियों के रूप में भी बसा रक्खा था और उन पर अन-
गिनत रुपया खर्च करती थी। फिर दूसरे देशों की सरकारे भी अपने जासूसो द्वारा
इन भारतीय जासूसों की गतिविधियोंपर नज़र रखती थी। तीसरी बात यह कि
जो वार्ता इतनी सावधानी और गोपनीयता के साथ हुई, वह भी या तो कमरे मे
छिपे किसी यंत्र के द्वारा अथवा अन्य किसी प्रकार सरकार को ज्यों-की-त्यों ज्ञात
हो गई। इससे हम विदेश-स्थित भारतीय क्रान्तिकारियो की कठिनाइयो का
किंचित् अनुमान लगा सकते हैं।
श्री जवाहरलाल नेहरू ने विदेशी सरकारों के जासूसो के सम्बन्ध मे एक
दिलचस्प घटना का अपनी आत्मकथा मे उल्लेख किया है। उन्होंने लिखा है,
"मेरे एक अमेरिकन दोस्त उन दिनों पेरिस में रहते थे। उनसे एक दिन फ्रांस की
खुफिया पुलिस के एक अधिकारी मिलने आए। वह महज़ दोस्ताना तरीके पर
कुछ मामलो की बाबत पूछने आए थे। जब वह साहब अपनी बाते पूछ चुके तो
उन अमेरिकन से बोले, 'आपने मुझे पहचाना या नही, मैं तो आपसे पहले भी
मिल चुका हूँ।' अमेरिकन ने उन्हें बड़े गौर से देखा, लेकिन उन्हें मजूर करना
पडा कि मुझे याद नही आता कि मैने आपको कब और कहाँ देखा है। तब खुफिया
पुलिस के साहब ने बताया कि मैं आपसे ब्रूसेल्स कान्फ्रेंस मे नीग्रो प्रतिनिधि की
हैसियत से मिला था। उस समय अपने हाथ-मुंह वगैरह मैंने बिलकुल काले रंग
लिए थे।"
इसी ब्रूसेल्स कान्फ्रेंस मे मौलाना बर्कतुल्ला आदि भारतीय क्रान्तिकारी भी
सम्मिलित थे। इस तरह भारतीय देशभक्तो को प्रत्येक कदम पर धोखे और छल
से सावधान रहना पड़ता था। बहुत बार तो अपने नजदीकी साथी भी धोखा दे
जाते थे।