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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 398, कुल 408 में से

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पृष्ठ 398

396 / बन्दी जीवन
भारतीय क्रान्तिकारियों द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय संकट
विदेशों में स्थित भारतीय क्रान्तिकारी सर्वथा असफल ही नहीं हुए, उन्होंने
अनेक बार ब्रिटिश सरकार को भारी संकट में डाल दिया था। प्रथम विश्वयुद्ध
के समय काबुल की आजाद हिन्द सरकार ने जो मिशन रूस भेजा था, जिसे
ताशकन्द के गवर्नर ने गिरफ्तार करके वापस अफ़गानिस्तान पहुँचा दिया, उस
मिशन के सम्बन्ध में मौलाना उबेदुल्ला ने अपनी पुस्तक में लिखा है, "यह मिशन
बेकार साबित नहीं हुआ, इससे रूस और अंग्रेज़ सरकार की एकता में किसी
सीमा तक कठिनाई उत्पन्न हो गई, जिसे हल करने के लिए लार्ड किचनर को
यात्रा करनी पड़ी।"
अफ़गानिस्तान में भारतीय क्रान्तिकारियों के कारण राजनीतिक उलट-फेर
और भारत पर अफ़गान आक्रमण की चर्चा हम ऊपर कर आए हैं। यहाँ पर इस
सम्बन्ध में इतना उल्लेख कर देना आवश्यक है कि सन् 1919 की पराजय के
प्रतिशोधस्वरूप जब 1929 में अंग्रेजों ने अमानुल्ला के खिलाफ बगावत करा दी
और अपने एक गोइन्दे बच्चा सक्का को गद्दी पर बैठा दिया, तो जनरल नादिर खां
को बच्चा सक्का के विरुद्ध भारतीय क्रान्तिकारियों से बड़ी भारी मदद मिली
थी। इन क्रान्तिकारियों का ही यह प्रभाव था कि जब बच्चा सक्का का एजेण्ट
अमामदीन चाराघारी पेशावर पहुँचा, तो उसके विरुद्ध इतने जुलूस और सभाएँ
तथा अन्य प्रदर्शन पेशावर के पठानों ने किए कि अमानुल्ला खां की सरकार के ट्रेड
एजेण्ट मरदार अब्दुल हकीम खां ने, इन प्रदर्शनों से साहस पाकर, बच्चा सक्का
सरकार के एजेण्ट को चार्ज देने से इन्कार कर दिया और अंग्रेज़ सरकार उन
पर दबाव डालने का साहस नहीं कर सकी। इसके बाद पेशावर के पठानों ने
ब्रिगेडियर जान मुहम्मद के घर पर हमला कर दिया, जहाँ बच्चा सक्का सरकार
का एजेण्ट ठहरा हुआ था। बड़ी कठिनाई से वहाँ उस एजेण्ट की जान बच सकी।
अपने विरुद्ध ऐसा प्रबल लोकमत देखकर बच्चा सक्का का यह एजेण्ट वापस
लौट गया और जब नया एजेण्ट आया, तो उस पर भी भीड़ ने हमला किया
और जिस मकान में वह था, उसको पर्याप्त हानि पहुँचाई।
आज़ाद पठान क़बीलों की शक्ति को नादिर खां की सहायता के लिए एकत्रित
कर देना भी भारतीय क्रान्तिकारियों का ही कार्य था, जिसके बिना नादिर खां
की विजय असम्भव थी। उस समय तक नादिर खां भी यही प्रकट कर रहे थे कि
वह अमानुल्ला खां को गद्दी वापस दिलाने के लिए बच्चा-सक्का के विरुद्ध युद्ध में
उतरे हैं। भारतीय क्रान्तिकारियों का यह भी अनुभव था कि नादिर खां अंग्रेज़
विरोधी हैं। यह क्रान्तिकारी अंग्रेजों द्वारा अमानुल्ला खां के विरुद्ध रचे गए षड्यन्त्र
से पूरी तरह परिचित थे और उन्होंने अफ़गानिस्तान में विद्रोह होने से बहुत
पहले ही इसकी सूचना गांधीजी और कांग्रेस के अन्य नेताओं को दे दी थी।
इसका प्रमाण यह है कि सन् 1928 में कलकत्ता कांग्रेस का अधिवेशन समाप्त