बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगया, इसमें भी सन्देह नहीं है। कभी-कभी किसी विशेष जोशीले सरकार-भक्त
अधिकारी ने जब कांग्रेसी आन्दोलनकारियों पर भीषण अत्याचार करके कांग्रेस
वालों को बहुत आतंकित कर दिया, तब किसी क्रान्तिकारी की एक धमकी-भरी
चिट्ठी से ही उक्त अधिकारी सही रास्ते पर आ गया, इसके उदाहरण भी मौजूद
हैं। अन्त मे सन् 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन का अहिंसा की परिधि से
निकलकर हिंसात्मक रूप ग्रहण कर लेना यह सिद्ध करता है कि विप्लवियों का
न तो 'आतंकवाद' व्यर्थ हुआ और न हमारे राष्ट्रीय आन्दोलन ने 'हिंसा-अहिंसा'
के तत्त्वचिन्तन का ही चिन्ता की। अंग्रेजों को भारत से हटाने का मुख्य श्रेय यदि
आजाद हिन्द फौज के संगठन को नही, तो आजाद हिन्द फ़ौज के बन्दियों की
रिहाई के आन्दोलन को तो है ही, जिसने फ़ौजों को भी ब्रिटिश विरोधी बना
दिया था। गांधीजी की अहिंसात्मक रणनीति के कारण भारत का ब्रिटिश विरोधी
जन-आन्दोलन प्रत्यक्ष और संगठित रूप से चलता रहा और उसी के बल
पर आजाद-हिन्द फ़ौज की रिहाई का आन्दोलन इस रूप में किया जा सका,
यह तथ्य भी हमारी आंखो से ओझल नही होना चाहिए। भारत की स्वाधीनता
का श्रेय इन दोनों ही प्रकार के आन्दोलनो को है; किन्तु त्याग, कष्ट-सहन का
पलड़ा विप्लवियों का ही भारी है, यह निर्विवाद सत्य है।
श्री शचीन्द्र की शेष कहानी
श्री शचीन्द्र ने 'बन्दी जीवन' की कहानी सन् 1920 में कालेपानी से मुक्ति
के बाद घर आने, विवाह करके क्रान्तिकारी कार्यों के लिए पत्नी-पुत्री सहित चट-
गांव जाने और फिर लौटकर उत्तर प्रदेश में आ जाने की चर्चा के माथ ही समाप्त
कर दी है। इसी बीच उन्होंने शेष क्रान्तिकारी राजबन्दियों की रिहाई के लिए जो
उद्योग किया, उसकी चर्चा तो पूर्ण रूप से की है किन्तु क्रान्तिकारी दल को पुन-
र्गठित करने के लिए क्या कुछ किया, इसका केवल आभास मात्र ही दिया है।
'बन्दी जीवन' के तृतीय भाग में यह सब ब्योरा है, जो श्री शचीन्द्र ने सन् 1937-
38 में कांग्रेस मंत्रिमण्डलों द्वारा रिहा किए जाने के पश्चात् कानपुर के 'प्रताप'
पत्र मे धारावाहिक रूप से लिखा था। उस समय भी देश में अंग्रेज सरकार थी,
इसलिए श्री शचीन्द्र यथातथ्य विवरण दे भी नही सकते थे। इसीलिए उन्होंने
'काकोरी षड्यन्त्र' का विवरण भी नही दिया, जिसमें उनके चार साथियों को
फांसी हुई और श्री शचीन्द्र को आजीवन कालेपानी का दंड मिला था।
श्री शचीन्द्र ने सन् 1920 में कालेपानी से लौटकर जिस दिन भारत भूमि पर
पैर रक्खा, ठीक उसी दिन से वे क्रान्तिकारी दल के पुनर्गठन में प्रवृत्त हो गए थे।
इस समय तक उत्तर प्रदेश का क्रान्तिकारी संगठन विच्छिन्न हो चुका था। बंगाल
का प्रमुख क्रान्तिकारी दल 'ढाका अनुशीलन समिति' उसके बहुत से सदस्यों के
जेल जाने से निर्बल था। श्री बारीन्द्र का 'युगान्तर दल', जो प्रथम महायुद्ध के
पूर्व ही 'चन्दननगर दल' के रूप में परिवर्तित हो गया था, और जिसके एक नेता