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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 405, कुल 408 में से

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पृष्ठ 405

फिर सन् 1924 मे कलकत्ते मे, प्रतुलचन्द्र गागुली और त्रैलोक्यनाथ चक्रवर्ती के
साथ मिलकर 'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन पार्टी' की स्थापना की। इस संस्था की
स्थापना का मुख्य उद्देश्य यह था कि उत्तर भारत मे केवल एक क्रान्तिकारी
सगठन कार्य करे, जिसके नेता श्री शचीन्द्र बनाये गए। इससे पहले ढाका अनु-
शीलन समिति के श्री योगेश चटर्जी भी उत्तर भारत मे सगठन कार्य कर रहे थे
और उन्होने श्री रामप्रसाद विस्मिल आदि को पुनः क्रान्तिकारी कार्यों मे प्रवृत्त
कर दिया था। श्री राजेन्द्र लाहिड़ी, जिनको काकोरी केस मे फाँसी हुई, श्री
शचीन्द्र के सहयोगी थे इन दिनो ही 'रिवोल्यूशनरी' नामक एक पर्चा रंगून से
पेशावर तक बाटा गया, जिसमे भारतीय जनता के सम्मुख सशस्त्र क्रान्ति की
आवश्यकता और उपयोगिता प्रकट की गई थी। एक ही दिन सम्पूर्ण देश मे पर्चा
वितरित करके क्रान्तिकारी देशवासियो को यह विश्वास दिलाना चाहते थे कि
उनका एक वृहत् सगठन स्थापित हो चुका है। भारत सरकार भी पर्चे बॉटने की
इस सगठन-व्यवस्था से बहुत आतंकित हुई थी और इस पर्चे की सबसे बड़ी उप-
योगिता यह थी कि साम्प्रदायिकता के उठते हुए तूफान मे इस प्रकार के कार्य जन-
साधारण को राष्ट्रीयता की ओर उन्मुख करते थे। काकोरी षड्यन्त्र के मुकदमे
मे सरकारी वकील ने श्री शचीन्द्र को ही 'रिवोल्यूशनरी' पर्चे का लेखक बताया
था। बाद मे इस पर्चे को डाक द्वारा भेजने के अपराध मे फरवरी, 1925 मे
शचीन्द्र पकडे गए और दो वर्ष की कैद का दड मिला। बगाल ऐसैम्बली मे क्रान्ति-
कारी आन्दोलन का दमन करने के लिए सरकार ने इन दिनो ही एक 'आर्डिनेन्स
एक्ट' प्रस्तुत किया। बगाल के तत्कालीन गृह सदस्य श्री स्ट्रीफेन्सन ने इस एक्ट
की आवश्यकता बताते हुए, अपने भाषण मे श्री शचीन्द्र और 'रिवोल्यूशनरी' पर्चे
की विशेष रूप से चर्चा की थी।
श्री शचीन्द्र जेल जाने से पूर्व ही उत्तर प्रदेश मे एक दृढ़ क्रान्तिकारी दल का
सगठन कर चुके थे। श्री भगतसिंह, चन्द्रशेखर आज़ाद आदि इसी समय क्रान्ति-
कारी दल मे प्रविष्ट हुए। इन दिनो दल की आर्थिक स्थिति अत्यन्त दुर्बल थी।
काकोरी काण्ड के शहीद श्री रामप्रसाद 'बिस्मिल' ने फाँसी की कोठरी मे जो
अपनी आत्मकथा लिखी है, उसमे दिये गए विवरण के अनुसार, "इस समय समिति
के सदस्यो की बड़ी दुर्दशा थी। चने मिलना भी कठिन था। सब पर कुछ न कुछ
कर्ज हो गया। किसी के पास साबुन कपडे तक न थे। कुछ विद्यार्थी बनकर धर्म
क्षेत्रो तक मे भोजन कर आते थे।" ऐसी स्थिति से विवश होकर दल ने डकैती
डालने का निश्चय किया। इन दिनो ही विदेशो से अस्त्र-शस्त्र प्राप्त करने का भी
कोई अच्छा सूत्र प्राप्त हो गया था। उसके लिए भी धन की आवश्यकता थी। इस
सब कारणो से लखनऊ के पास काकोरी स्टेशन पर रेल का खजाना लूटा गया। कुछ
लोग डकैती डालना गर्हित कार्य समझ सकते हैं। क्रान्तिकारी भी इसे अच्छा
नही समझते थे, लेकिन देश के कार्य के लिए भी धन की आवश्यकता तो होती ही
है। इससे पूर्व दान, चन्दा आदि से धन सग्रह करने का प्रयोग किया जा चुका था,