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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 404, कुल 408 में से

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पृष्ठ 404

402 / बन्दी जीवन
रासबिहारी बोस थे, लगभग किंकर्तव्यविमूढ़ था। पंजाब में 'गदर पार्टी' के नेता
या तो जेल में थे और या विदेशों में खिसक गए थे। कांग्रेस गांधीजी के प्रभाव में
आ चुकी थी और जलियांवाला बाग हत्याकांड से उत्पन्न रोष का गांधीजी असह-
योग आन्दोलन में उपयोग करने की तैयारी कर चुके थे। मुस्लिम क्रान्तिकारी
दल गोपनीय आतंकवाद की व्यर्थता अनुभव करके प्रकट जन-आन्दोलन के मार्ग
पर चल चुका था और 'खिलाफत' की रक्षा के नाम पर देश की मुस्लिम जनता का
अंग्रेजों से संघर्ष कराने की भूमिका तैयार कर रहा था। भारत की जनता को
नया राजनीतिक दर्शन, नये नेता और नई रणनीति प्राप्त हो रही थी।
बंगाल के क्रान्तिकारी असहयोग आन्दोलन का विरोध कर रहे थे किन्तु श्री
शचीन्द्र ने इसमें योग नहीं दिया। गांधीजी के इस आन्दोलन से उनको स्वतन्त्रता
प्राप्ति की आशा तो नहीं थी किन्तु इस आन्दोलन के माध्यम से जन-जागरण के
महत्त्व को वे हृदयंगम कर सके थे। सम्भवतः वे समझ गए थे कि आन्दोलन अस-
फल होगा। इसीलिए असहयोग आन्दोलन से वे तटस्थ रहे। 'न निन्दा, न प्रशंसा'
की नीति ग्रहण कर वे यहाँ-वहाँ घूमकर क्रान्तिकारी दल का संगठन करने लगे।
बंगाल के सभी क्रान्तिकारी दलों का पारस्परिक सहयोग हो या एक संगठन बन
जाय, इसके लिए उन्होंने विशेष उद्योग किया। क्रान्तिकारी संगठन के प्रति देश
के युवकों का ध्यान आकर्षित करने के लिए ही उन्होंने इस समय बंगाली भाषा
की एक पत्रिका में लेखमाला प्रारम्भ की, जिसमें सन् 1914-15 के कार्यों का विव-
रण था। यही लेखमाला बाद में 'बन्दी जीवन' के प्रथम-द्वितीय भाग के रूप में
पुस्तकाकार प्रकाशित हुई और क्रान्तिकारी संगठन के नये रंगरूटों की पाठ्य-
पुस्तक बन गई। न जाने कितने युवक अकेली इस पुस्तक के पारायण से ही अनु-
प्राणित होकर क्रान्तिकारी दल में प्रविष्ट हुए। इस प्रकार श्री शचीन्द्र असहयोग
काल में अपने शरीर और बुद्धि का सम्पूर्ण उपयोग क्रान्तिकारी संगठन के लिए
करते रहे;
कुछ दिनों बाद असहयोग आन्दोलन असफल होकर समाप्त हो गया। इसकी
प्रतिक्रियास्वरूप देश में साम्प्रदायिक विद्वेष और बलवों की हवा बह चली।
बड़े-बड़े तथाकथित राष्ट्रीय नेता इस हवा में बहकर हिन्दू-मुस्लिम द्वेष के प्रचारक
बन गए। स्वदेश की स्वाधीनता की बात पीछे पड़ गई। कुछ लोग चरखा और
सूत में उलझ गए, कुछ को धारासभाओं की कुर्सियाँ पुकारने लगीं। राष्ट्रीय
आन्दोलन के लिए यह बड़े संकट का समय था।
श्री शचीन्द्र इस ससय पंजाब से बंगाल तक राष्ट्रीय विचारों के युवकों को
खोज-खोजकर उनको एक संगठन में पिरोने लगे। इसी समय क्रान्तिकारी दल
का ध्यान मजदूर संगठन की ओर गया। जमशेदपुर में मजदूर यूनियन बनी और
उसके सभापति बनाये गए श्री देशबन्धुदास की पत्नी के भाई और कलकत्ता के
प्रसिद्ध बैरिस्टर श्री एस० एन० हलदार। श्री शचीन्द्र भी वहाँ जाकर काम करने
लगे। किन्तु कुछ ही दिन बाद श्री शचीन्द्र ने जमशेदपुर का कार्य छोड़ दिया और