बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
क्रान्तिकारी शचीन्द्र सान्याल का आत्म-चरित्र / 33
जिसने भारतीय सभ्यता की कर्म-कथा को भली भाँति नही समझा, उसके लिए
यह संभव नहीं कि कम्यूनिज्म के दोषों को वह ठीक-ठीक समझ सके । इसलिए
भारतीय सभ्यता के प्रति जिसका प्रेम नहीं है, मानव-सभ्यता की उन्नति के लिए
भारतीय सभ्यता की विशेष उपयोगिता है, इस बात पर जिसकी श्रद्धा नही है,
वह इस कार्यक्रम को ठीक-ठीक नहीं समझ सकता ।”
पर शचीन्द्र बाबू बड़े उदार स्वभाव के व्यक्ति थे । वह अपने पुराने साथियों
को अपनी-अपनी अन्तरात्मा के अनुकूल पथ ग्रहण करने के लिए प्रेरित करते थे ।
उनके कितने ही साथी मार्क्सवाद से प्रभावित होकर हृदय से साम्यवादी बन
चुके थे । श्री भगवानदास माहोर ने अपने एक पत्र मे लिखा है—"मैं कुछ दिनों
लखनऊ मे रहा था और तब बड़ी श्रद्धा-भक्ति से मै श्री शचीन्द्रनाथ सान्याल के
चरणों मे जाकर बैठता था । स्वभावतः देश की राजनीतिक गतिविधि पर ही
बातचीत होती थी । इसके पूर्व आठ-नौ साल जेल मे रहकर मैं जो कुछ थोड़ा-
बहुत अध्ययन कर पाया था उसके फलस्वरूप अन्य सशस्त्र क्रान्तिकारी साथियों
की भाँति मेरा भी विश्वास मार्क्सवाद पर जम गया था । अतः सैद्धान्तिक धरातल
पर न तो श्री सान्याल की बाते ही मैं पूरी तौर पर ग्रहण कर पाता था और न
इतना विद्या-बुद्धिबल ही मुझमे था कि मै अपनी बात ही उन्हें समझा सकता ।
वह अपनी बातें बड़े उत्साह से कहते थे, बहुत बोलते थे, लेकिन दूसरे को भी
बोलने को उत्साहित करते थे और उसकी बात बड़े सब्र मे सुनते थे । जो हार्दिक
प्रेम और वात्सल्य मुझे उनसे मिला वह मेरे लिए तो अमूल्य निधियों मे से है।
उसी समय उन्होने बड़े ही स्वाभाविक और हार्दिक स्नेह से मुझे कहा था—
“तुम्हारा और मन्मथ का स्थान स्वभावतः साम्यवादी पार्टी मे है, तुम इधर-
उधर क्यों भटकते हो ?”
अण्डमन से भारतवर्ष लौटने का जो वृत्तान्त सान्याल बाबू ने लिखा है, वह
बड़ा हृदयस्पर्शी है । वह लिखते हैं—मैं चलकर घर नही आया, बल्कि दौड़ता
हुआ घर पहुँचा। क्या हृदयावेग की आकर्षण शक्ति पृथ्वी की मध्याकर्षण शक्ति
की तरह है, कि अण्डमन से जब चले तब से लेकर घर पहुँचने तक इस आकर्षण
का वेग बढ़ता ही गया और घर के पास आकर आखिर मुझे दौड़ना ही पड़ा !
मकान के नीचे के कमरे का जंगला खुला हुआ था। मैं मुहूर्त-भर जंगले के सामने
आकर खड़ा हो गया । कई एक युवक वहाँ लेटे हुए थे। इनमे मेरे दो भाई
रवीन्द्र और जितेन्द्र भी थे। रवीन्द्र मुझे देखते ही हर्षोत्फुल्ल स्वर से चिल्ला उठे
—“अरे दादा हैं।” रवीन्द्र बिस्तरे से ऐसे उठ पड़े, मानो नीचे से किसी ने ज़ोर
का धक्का देकर उन्हे ऊपर फेंक दिया हो। घूमकर दरवाजे होते हुए अन्दर
आए एव हरएक को छाती से ज़ोर से लिपटा लिया । मेरी यह नई ज़िन्दगी
थी। मेरे नये जन्म का यह आरम्भ था ।
"जिस रोज़ मैं घर पहुँचा उसके पहले दिन ही मेरे कनिष्ठ भ्राता का उप-
नयन संस्कार हो चुका था । घर में किसी को पता न था कि मैं आज यहाँ आकर
34 / बन्दी जीवन
पहुँचूँगा। मैंने सबसे पूछा, "माताजी कहाँ हैं?"
माताजी दूसरे मकान में कुछ काम से गई हुई थीं। मैं पूछताछ कर ही रहा
था कि इतने में वह आ गईं। मुझे देखते ही आनन्द के मारे रो पड़ीं और कहने
लगीं—"बेटा मेरे, आ गए हो। मेरे बेटा, आ गए हो।" और मेरे सिर पर, मेरे
कन्धे पर और माथे पर हाथ फेरने लग गईं। फिर कहने लगीं, "जाने कितनी
मुसीबत तुमने झेली।"
सान्याल बाबू के आत्मचरित के कितने ही अंश बड़े हृदयबेधक हैं और कितने
ही बड़े विचारोत्तेजक। खेद है कि स्थानाभाव से हम उन्हें यहाँ नहीं दे सकते।
उन्होंने अपना सर्वस्व भारतीय स्वाधीनता के लिए अर्पित कर दिया यहाँ तक कि
अपनी अत्यन्त प्रिय पुस्तकों को भी अण्डमन में अपने साथियों को भेंट कर आए
और सिर्फ एक बाइबिल अपने साथ लाए। सान्याल बाबू को इस बात का हार्दिक
दुःख रहा कि देश के नेताओं ने विप्लववादियों के कार्य का उचित मूल्यांकन नहीं
किया। उनका यह आत्म-चरित स्वयं विप्लववादियों और शासनारूढ़ पार्टी के
नेताओं के लिए एक सन्देश है—एक चुनौती है !
विप्लववादियों का इतिहास
विप्लववादियों का यह कर्तव्य है कि बिना किसी की प्रतीक्षा किए अखिल
भारतीय पैमाने पर विप्लववादियों के इतिहास का मसाला संग्रह कर दें और
केवल देशी भाषाओ मे ही नही, अंग्रेजी में भी उसे छपा दें। यह कैसे दुर्भाग्य की
बात है कि हमारे यहाँ कोई भी ऐसा स्थान नही जहाँ यह सब मसाला एकत्र
मिल सके ? सुना है कि पूना में श्री जी० वी० केतकर साहब ने बहुत कुछ मसाला
संग्रह किया है और नागपुर के श्री बाल शास्त्री हरदास ने मराठी और अंग्रेजी मे
एक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ इस विषय पर लिखा है। अभी हाल में देवता स्वरूप भाई
परमानन्द के जामाता श्री धर्मवीर ने लाला हरदयालजी का एक खोजपूर्ण जीवन
चरित्र लिखा है और बंगाल .में तो अनेक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ प्रकाशित हो चुके हैं।
दक्षिण भारत के विप्लववादियो का वृतान्त यहाँ उत्तर भारत क पाठकों को
बहुत ही कम मालूम है। अभी उस दिन एक दक्षिण भारतीय ने हमसे कहा—
"क्या आप लोग यह समझ बैठे हैं कि क्रान्ति का सम्पूर्ण कार्य उत्तर भारत में ही
हुआ था?"
उनके इस कथन में व्यंग्य के साथ सत्य का अंश भी था। हम लोग चम्पाकर्मन
पिल्ले और श्री पिंगले को भूल ही गए ! कुछ दिन पूर्व सुप्रसिद्ध क्रान्तिकारी
डा० खानखोजे ने हमसे कहा था, "मुझे इस बात से अत्यन्त दुःख है कि सुप्रसिद्ध
क्रान्तिकारी आचारियर का स्वर्गवास बम्बई में अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति में
हुआ। वह अपने कमरे मे कई दिन तक मरे हुए पड़े रहे और जब उनकी लाश से
बदबू निकलने लगी तब लोगों को पता चला कि कोई व्यक्ति मर गया है ! बम्बई
कारपोरेशन के नौकर उन्हें वहाँ से घसीट ले गए और इस प्रकार उस महान
क्रान्तिकारी शचीन्द्र सान्याल का आत्म-चरित / 35-
क्रान्तिकारी का अन्तिम संस्कार हुआ, जो बर्लिन कमेटी में भी था, रूस की भी
जिसने यात्रा की थी और विप्लववादियों के इतिहास के एक अध्याय का जो
निर्माता था ।”
कितने व्यक्तियों को इस बात का पता है कि श्री रासबिहारी बोस ने
जापानी भाषा में सोलह ग्रन्थ लिखे हैं, जिनमें पन्द्रह अब भी उपलब्ध हैं ? हमें
यह बात खेदपूर्वक कहनी पडती है कि हमारे शासकों ने—हम लोगों ने—इस
विषय की ओर यथोचित ध्यान नही दिया। पर अब वक्त आ गया है कि हम
लोग अपनी नीति पर पुनर्विचार कर लें। स्वार्थ की दृष्टि से भी हमारे लिए यह
आवश्यक है कि हम विप्लववादियों के ऋण को स्वीकार करें और उनकी कीर्ति-
रक्षा के लिए प्रयत्न भी करे। ईमानदारी का भी यही तकाज़ा है।
आयरलैंड का उदाहरण अनुकरणीय
आयरलैंड ने अपने शहीदों के लिए जो कुछ किया है क्या उस तरह का कार्य
हम लोग अपने देश मे नही कर सकते ? श्रीयुत चमनलाल पत्रकार ने डबलिन-
स्थित शहीदो के अजायबघर का वृत्तान्त नवम्बर सन् 1939 के 'विप्लव' मे
लिखा था। उनके शब्द सुन लीजिए—"आयरलैंड के राष्ट्रीय वीरो का यह
स्मारक आयरलैंड की पार्लमिण्ट के विशाल भवन मे कायम है। इस अजायबघर
मे मुल्क की आज़ादी की लडाई मे भाग लेनेवाले वीरो और उस युद्ध की घटनाओं
की स्मृतियो का एक बहुत प्रभावशाली सग्रह है। इसमे उन वीरो की आदमकद
मूर्तियां है, वे वर्दियां हैं, जिन्हें पहनकर उन्होने अपनी लड़ाइयाँ लडीं । उनके
हथियार हैं, चिह्न, बैज, झण्डे इत्यादि भी है। उनकी लिखी पुस्तके, उनके
व्याख्यान, ऐलान तथा पत्र इत्यादिः खूब सुरक्षित ढंग से रखे हुए है। आयरलैंड
के स्त्री-पुरुष, वृद्ध और बच्चे वहाँ पहुँचकर और उन स्मृति-चिह्नों को देखकर
राष्ट्रीयता का पाठ पढ़ते हैं। जिन जनरल राजर्म केसमेट को अंग्रेजो ने फांसी दी
थी, उनके जीवन की सम्पूर्ण गाथा आपको यहाँ देखने को मिलेगी। प्रथम महा-
युद्ध मे उन्होने जर्मनी की सहायता से एक आयरिश सेना तैयार की थी और
जहाज द्वारा वह आ ही रहे थे कि जहाज अंग्रेजो के हाथ पड गया। केसमेट को
फाँसी हुई पर राष्ट्रीय अजायबघर मे वह अब भी जिन्दा है।
‘कीर्तिर्यस्य स जीवति ।’
इस अजायबघर मे आयरलैण्ड के प्रसिद्ध शहीद टेरेंस मॅकस्विनी का भी
चित्र मिलेगा, जिन्होने 74 दिन का अनशन करके अपने प्राण दिए थे। जनरल
माइकेल कोलिन्स की भी मूर्ति विद्यमान है। हैरी बोलैण्ड सुप्रसिद्ध बीर सेनापति
डी० वेलेरा के सेक्रेटरी थे। एक सकट के समय वह अपने जूते के तले मे छिपा
कर एक पत्र डी० वेलेरा के लिए ले गए थे। वह मार डाले गए; पर उनका वह
जूता अब भी सुरक्षित है। इस सग्रहालय मे आपको वीर बालक केवनबेरी का
वृत्तान्त मिलेगा, जिसे फांसी दी गई थी। उसकी उम्र 18 वर्ष की थी। कही
36 / बन्दी जीवन
आपको क्रान्तिकारियों द्वारा प्रकाशित ऐलानों का संग्रह मिलेगा, तो कहीं राष्ट्रीय
हुंडी । कहीं 'माउण्ट जोय' जेल में भूख हड़ताल करने वालों की मूर्तियां खड़ी हैं,
तो कहीं आयरिश शहीदों के चित्र के ऐलबम । और तो और उन शहीदों द्वारा
व्यवहार में लाई जाने वाली चीजें भी संग्रह कर ली गई हैं—यथा उनकी अंगू-
ठियां, प्याले और पेंसिल इत्यादि । जगह-जगह गोलियों से छिदे कपड़े तथा
टोपियाँ रखी हुई हैं ।"
क्या इस प्रकार का कोई सग्रहालय हम लोग दिल्ली में स्थापित नही कर
सकते ? उसके लिए सर्वोत्तम स्थान दिल्ली की सेण्ट्रल जेल थी, जहाँ चार
क्रान्तिकारियो को फाँसी लगी थी, पर अदूरदर्शिता के कारण वह भी नष्ट कर
दी गई ! पर सरकार की प्रतीक्षा में बैठे रहने में हम अपने-आपको पंगु ही बना
लेगे, इसलिए हम लोग जो कुछ स्वय कर सकते है, उसे कर दें ।
—बनारसीदास चतुर्वेदी
प्रथम भाग
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1
आत्म-समर्पण योग
कलकत्ता के राजा बाज़ार मुहल्ले में एक छोटा-सा दोमंजिला खपरैल का
मकान था। ग़रीबों का-सा घर जँचता था। इसमें ट्राम-कंडक्टर या इसी श्रेणी
के लोग रहते थे। इसी मकान के ऊपरवाले एक कमरे में श्री शशांकमोहन हाजरा
नामक एक युवा पुरुष रहते थे। जिस समय वह गिरफ्तार किये गये उस
समय उनके कमरे में बम के ऊपरी खोल मिले और ऐसे लेख भी बरामद हुए
जिनमें योगाभ्यास की विधि थी। अदालत मे मुक़दमा चलते समय किसी ने भी
इन लेखो को महत्त्वपूर्ण नही समझा; कहा गया कि ये लेख असल मे लोगों को
फँसाने के लिए हैं। लोगों को गुमराह करने का यह एक जरिया है। लेकिन मै
जानता हूँ कि असल में बात ऐसी थी नही। हम लोगो ने सचमुच ही अपने
जीवन मे इस साधन (योगाभ्यास) को ग्रहण किया था। हम लोग सिर्फ मुंह से
ही न कहते थे कि भगवान् सभी कामो के नियन्ता हैं, बल्कि सचमुच हृदय से,
गम्भीर श्रद्धा के साथ, इस बात पर हम विश्वास भी करते थे। हम अपनी गरज
के लिए, अपना काम साधने के लिए ही कुछ भगवान् को न घसीटते थे, किन्तु
भगवान् के अधिनायकत्व की आलोचना और भावना में कितने ही दिन और
रात्रियां तक हमने बिताईं।
भारत की छाती पर जो यह महान् आन्दोलन हुआ और हो रहा है, यह
भगवान् की इच्छा से ही हुआ और हो रहा है; यही हम लोगों का विश्वास है।
जिस भाव की अव्यर्थ प्रेरणा से भारत के सैकड़ों नवयुवक मृत्यु को सहर्ष चुनौती
देकर बड़ी-बड़ी कठिन विपत्तियों के मुख मे भी बड़ी आन-बान के साथ कूदे थे,
और जिस प्रेरणा के बल से उन्होंने अपार दुःखों और लांछनों को पक्के संयमी की
भांति सहन किया था, उस भाव के प्लावन को क्या कोई विशेष व्यक्ति उपस्थित
कर सकता है ? या इसका स्थायित्व किसी व्यक्ति विशेष के मत, अथवा जीवन-
मरण पर अवलम्बित है ?
जब मैं निरा बच्चा ही था तभी से मेरे हृदय में स्वदेश का उद्धार करने का
संकल्प जाग्रत रहता था। यह संकल्प मुझे किसी से प्राप्त नहीं हुआ। उस छोटी-
सी ही उम्र में किसने मेरे रोम-रोम में इस संकल्प को भर दिया था ? बचपन से
ही मैं इस विषय की आलोचना अपने छोटे भाइयों से करता आया हूँ। उस समय
40 / बन्दी जीवन
तो स्वदेशी आन्दोलन भी उपस्थित न हुआ था। यह केवल मेरे ही मन की दशा
न थी। वयस्क होने पर जब मैंने और-और लोगों से बातचीत की तब मुझे पता
लगा कि मेरे-जैसे और भी बहुतेरे लोग देश में विद्यमान हैं। मुझे तो यही लगता
है कि भगवान् अपने अभीष्ट को सिद्ध करने के लिए पहले ही से तैयारी करते आ
रहे हैं।
हमने जो आध्यात्मिक साधना ग्रहण की थी, एक शब्द में उसे आत्मसमर्पण
योग कहा जा सकता है। भक्ति-योग अथवा प्रेमसाधन से इनका घनिष्ठ सम्बन्ध
है। मैं भगवान् को प्यार करता हूँ, इतना प्यार करता हूँ कि उसके सिवा अन्य
किसी वस्तु को अपना नही कह सकता। मैं जो कुछ करता हूँ, वास्तव में वह मैं
स्वयं नहीं करता, मैं तो केवल निमित्त-मात्र हूँ। भगवान् स्वयं मेरे द्वारा उन
कार्यों को सम्पन्न करते हैं। वेदान्त में इस मत का पर्याप्त पोषण किया गया है।
जगत् में शक्ति एक ही है, अतएव जो कुछ इस संसार में होता है सब उस शक्ति
का ही खेल है। परन्तु जगत् को हम माया नही समझते, वरन् उस भगवान् की
लीला मानते हैं। हमने निज जीवन में, देश में तथा जगत् में उसी एक शक्ति की
लीला देखने तथा अनुभव करने की चेष्टा की थी।
2
पूर्व परिचय
1906-1907 ईसवी मे बंगाल मे जो क्रान्त की लहर चल रही थी वह बंगाल
तक ही सीमित न रही। कुछ बंगाल के अनुकरण में, और कुछ बंगाल की प्रेरणा
से, इस समय भारत मे कई स्थानो पर विप्लव-केन्द्रस्थापित हो गये थे। इसी के
फलस्वरूप काशी, दिल्ली और लाहौर मे विप्लव-केन्द्रो की सृष्टि हुई।
मै दिल्ली बम-केस के बाद से ही कहानी आरम्भ करूँगा। उससे पूर्व बंगाल
के बाहर क्रान्तिकारियो ने जो कार्य किए, जनसाधारण को उसका कुछ ज्ञान न
था। दिल्ली षड्यन्त्र के मुकदमे मे लाला हरदयाल और श्री रासबिहारी बसु के
नाम विख्यात हुए। लाला हरदयाल उस समय अमेरिका में थे किन्तु रासबिहारी
घोर सकट के सयय मे भी सन् 1915 तक भारत मे ही रहे। वह बगाल के बाहर
के क्रान्ति कारी दल के नेता थे। उनको साधारणतः हम दादा या रासूदा कहते थे।
दिल्ली षड्यन्त्र के मुकदमे के आरम्भ होने के पहले से ही रासबिहारी
फरार हो चुके थे। उनको पकडने के लिए कई पुरस्कारों की घोषणा हो चुकी
थी। प्रत्येक बडे रेलवे स्टेशन पर उनका फोटो टाँगा गया था और उनको पकड-
वाने वाले को साढे सात हजार रुपया पुरस्कार दिया जायगा, इसकी भी घोषणा
प्रकाशित की गई थी। किन्तु पूरा प्रयत्न करने पर भी सरकार उनको किसी
तरह पकड न मकी।
बहुत सोच-विचार के बाद मेरे परामर्श से रासबिहारी ने काशी मे रहना
निश्चित किया। वह काशी मे मेरे साथ प्रायः एक वर्ष तक रहे। उस ममय उनके
ससर्ग से मैने जो आनन्द पाया था उमे मैं भूल नही सकता। इतने अरसे मे मैने
उनको शायद कभी भी दुखी नही देखा। हाँ, जिस दिन दिल्ली षड्यन्त्र के मुक़दमे
के फैसले के अनुसार चार व्यक्तियों को फाँसी का हुक्म हुआ उस दिन एकान्त
मे उनको अश्रुपात करते देखा था।
रासूदा जितने दिन काशी में रहे उतने दिन मैंने भारतवर्ष के भिन्न-भिन्न
स्थानों के लोगों को उनसे मिलते देखा था। राजपूताना, पंजाब और दिल्ली से
लेकर सुदूर पूर्व बंगाल तक के लोग उनके पास आते थे। वह जब तक काशी में
रहे तब तक युक्त प्रदेश (उत्तर प्रदेश) तथा पंजाब के भिन्न-भिन्न स्थानों में
विप्लव केन्द्रों की स्थापना में लगे रहे। उसी का यह परिणाम हुआ कि एक ही
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वर्ष में हमारा दल पर्याप्त शक्तिशाली हो गया और उसी का यह फल था कि
यूरोपीय महायुद्ध जब प्रारम्भ हुआ तब हम खूब जोर से काम कर सके थे ।
सन् 1915 भारत में चिरस्मरणीय रहेगा । इस साल विप्लव की जितनी
बड़ी तैयारी अकारथ गई उतनी बड़ी तैयारी सन 1857 के गदर के पश्चात्,
पंजाब में कूका विद्रोह के सिवा और हुई कि नहीं इसमें सन्देह है । इस षड्यन्त्र-
कारी दल के गिरफ्तार हो जाने पर 'भारत-रक्षा' क़ानून गढ़ा गया था । उस समय
के होम-मेम्बर क्रैडक साहब ने, भारतीय व्यवस्थापिका सभा में उक्त कानून का
प्रस्ताव उपस्थित करते समय जो वक्तृता दी थी, उसमें कहा था— “We
had anarchism for a long time in Bengal but the situation in
the Punjab was serious; in Bengal it was less so.” उस समय सच-
मुच भारत की दशा बहुत ही नाजुक हो गई थी । हां, बंगाल के सम्बन्ध में क्रैडक
साहब की अभिज्ञता उस समय बहुत ही कम थी । कुछ दिन के पश्चात् उक्त साहब
ने स्वीकार किया था कि पंजाब के विप्लवकारियों के साथ बंगाल के विप्लव-
पन्थी दल के सम्बन्ध-सूत्र में सरकार की पहले जो धारणा थी उसमे परिवर्तन
हो गया है ।
उत्तर भारत के विप्लव सम्बन्धी कई मुक़दमों में बहुतेरी बातें प्रकट हो चुकी
हैं । बहुत लोग समझते हैं कि इन बातों में सचाई कम है । बहुतों ने मुझसे कहा
भी था कि 'पुलिस ने अपना दिमाग लडाकर झूठा मुक़दमा बनाकर खड़ा कर
दिया है, वास्तव में वैसा कुछ देश में किया ही नही गया है ।' ऐसे लोगो की बातें
सुनने से मैं दिल में जल-भुन जाता था । सोचता था कि देशवासियो का अपनी
शक्ति का विश्वास यहाँ तक लुप्त हो गया है कि वे यह समझ ही नही सकते कि
उनके स्वजातियो में ऐसा कुछ करने का सामर्थ्य है । किन्तु अन्दर के क्षोभ के
कारण मन की बातें खुलकर न कह सकता था, इससे जलन और भी अधिक होती
थी ।¹ 'कोमागाता मारू' नामक जहाज के सिक्ख यात्रियों को कनाडा की भूमि
में पैर न रखने देने के कारण उनके मन मे जो आग प्रज्वलित हुई थी उसकी
चिनगारियाँ जब चारों ओर उड़ रही थी, तब भारत के एक प्रान्त में बैठे हुए हम
लोग आशा की वेदना से चंचल होकर असहनशील की भांति ताक रहे थे ।
- इस स्थान में पुलिस के कार्यों के सम्बन्ध में दो-चार और बाते कह देना उचित है ।
ऊपर जो कुछ कहा गया है उससे कोई सज्जन यह न समझ ले कि पुलिस जो राजनीतिक
मुक़दमे करती है । वे सब सम्पूर्णतया सत्य होते हैं । पुलिस मुक़दमे बनाने के लिए कई
मिथ्या कथाएँ गढ़ती है और ऐसे ही कई बार सर्वथा निर्दोष व्यक्तियों को भी मुक़दमों में
फँसा देती है । काशी षड्यन्त्र में जिन पर मुक़दमा चलाया गया था और जिनको सजा
दी गई थी उनमें से कई सर्वथा निर्दोष थे । मैं ऐसे कई राजनीतिक मुक़दमों के बारे में
जानता हूँ जिनमें अभियुक्त व्यक्ति बिलकुल निर्दोष थे । लखनऊ राजनीतिक हत्या के
मुकदमे में श्रीयुत सुशीलचन्द्र लाहिड़ी को फाँसी हुई थी किन्तु कइयों की सम्मति में वह
वास्तविक अपराधी नहीं थे ।
पूर्व परिचय / 43
पंजाब में जो हमारे दल के लोग थे उनसे कह दिया गया था कि 'कोमागाता मारू'
के यात्री ज्योंही देश में आएँ उन्हें फौरन दल में भरती कर लिया जाय ।
किन्तु 'कोमागाता मारू' के यात्रियों के भारत की वसुन्धरा पर पैर रखते ही
एक दुर्घटना हो गई । परन्तु इससे हमारी आशा और भी सबल होने लगी ।
देखते-देखते कनाडा और कैलिफोर्निया से सिक्खों के दल के दल देश में आने लगे ।
ये लोग भारत को आते समय रास्ते में, स्थान-स्थान पर उतरकर, पुलिस और
फौज मे नियुक्त सिक्खों के बीच विप्लवाग्नि भड़का रहे थे। ये लोग बहुत दिन
से भारत से बाहर परदेश में थे । इस कारण ये प्रायः यह न जानते थे कि गुप्त
रूप से विप्लव योजना किस प्रकार की जाती है। यही कारण है कि ये लोग
प्रत्येक जहाज और बन्दर मे गदर की आग फैलाते चले आ रहे थे । उसका फल
यह हुआ कि भारत सरकार खूब चौकन्नी हो गई । जैसे-जैसे सिक्खों के दल
स्वदेश में आकर जहाज से उतरने लगे, तैसे-तैसे सरकार की ओर से उनकी यथा-
रीति अभ्यर्थना होने लगी। इस प्रकार एक दल के कोई तीन सो यात्रियो को सीधा
मुलतान जेल मे भेज दिया गया । इनमे से बहुतो के पास काफी धन था, इन्होने
अमेरिका में लगातार कई वर्ष परिश्रम करके जो उपार्जन किया था उसे ये साथ
लाए थे। उनके उस घोर परिश्रम से उपार्जित धन को सरकार ने ज़ब्त कर लिया ।
बेचारो के घरवाले ताकते ही रह गये कि परदेश से दो पैसे आएँगे तो महीने-
भर सुख से पेट-भर भोजन कर लेगे । इनमे से एक सिक्ख के पास कोई तीस
हज़ार रुपये थे ।
बहुतेरे ऐसे थे जो अपनी सारी गाढ़ी कमाई कैलिफोर्निया-स्थित 'युगान्तर
आश्रम' को अर्पण कर आये थे । जितने दल सरकार की तीखी नजर मे बच गये
थे वे पजाब जाकर दलबद्ध होने लगे । सिक्खो के धर्म-मन्दिर गुरुद्वारा कहे जाते
है। इनमे सिक्खो के पुरोहित रहते है। सिक्ख लोग इन्हें ग्रन्थीजी कहते है। प्रत्येक
गुरुद्वारे म एक ग्रन्थीजी रहते है । विप्लवपन्थी सिक्खो के सम्मिलन केन्द्र ये ही
धर्म-मन्दिर थे । मैं ऐसे ही एक गुरुद्वारे मे बैठा था कि एक सिक्ख ने आकर खबर
दी कि 'अमुक-अमुक व्यक्तियो को गुरुद्वारे मे जाते देख मै उनमे भेट कर आया
हूँ ।' थोडी ही देर मे देखा कि उस जमात के मुख्य-मुख्य व्यक्ति उस गुरुद्वारे मे
आ गए जहाँ कि मैं बैठा था । रुपये-पैसे की चर्चा निकलते ही उन्होने तुरन्त सोने
की गोल-गोल बड़ी-बडी चकतियां मेरे आगे रख दी, ये अमेरिका मे प्रचलित सोने
के सिक्के थे । हिसाब लगाने पर कोई हज़ार रुपये के हुए । प्रत्येक दल ने ऐसा ही
किया । गदर के कार्य में इन लोगो को जिस प्रकार दिल खोलकर अपनी गाढी
कमाई का धन दान करते देखा है, वैसा दृश्य बगाल मे देखने को नही मिला ।
इसमें सन्देह नही कि ऐसा उत्साह और आन्तरिकता उन्ही सिक्खों मे थी जो कि
अमेरिका की यात्रा कर आये थे । और यह बात भी है कि पजाब के अधिवासियों
ने प्रायः इन लोगों के साथ सहानुभूति प्रकट नही की । हाँ, पठान और सिक्ख
सैनिको के साथ इन लोगो का विशेष हेल-मेल था। इसके सिवा सिक्ख जाति मे
44 / बन्दी जीवन
परस्पर एक-दूसरे के प्रति सहानुभूति और समवेदना-जनित एकता भारत की
अन्यान्य जातियों की अपेक्षा बहुत अधिक है।
जो लोग अमेरिका से लौटकर आये थे उनमें अधिकतर ऐसे लोग थे जो कि
वहाँ कुलीगिरी किया करते थे। इनमें जिनके पास से तीस हज़ार रुपये ज़ब्त कर
लिए गये थे वह कैलिफोर्निया में खेती करके धनवान् हुए थे। इनका नाम था
सरदार ज्वालासिंह।
इन लोगों के बहुत-से रिश्तेदार और भाई-बन्धु भारत की फौज मे नौकर थे।
देश में आते ही इन लोगों ने सैनिकों के साथ गुप्त अभिसंधि करनी शुरू कर
दी। उसी समय बंगाल के साथ पंजाब का सम्बन्ध जुड़ गया। अन्य अनेक गुण
होने पर भी पंजाब के लोगों में संगठन की वैसी योग्यता न थी जैसीकि बंगाल-
वालों में थी। बंगाल के साथ उनका संयोग हो जाने पर बड़े अच्छे ढंग से काम
होने लगा। उत्तर भारत की प्रायः सभी छावनियों में हमारे दल के आदमी आने-
जाने लगे। उत्तर-पश्चिम अंचल के बन्नू से लेकर दानापुर तक कोई भी छावनी
अछूती न रखी गई। प्रायः सभी रेजिमेंटों ने वचन दिया था कि पहले वे लोग
कुछ भी न करेंगे; हां, गदर शुरू हो जाने पर वे अवश्य ही विप्लवकर्ताओं से मिल
जाएँगे। सिर्फ लाहौर और फीरोजपुर की रेजिमेंटों ने सबसे पहले काम शुरू कर
देना स्वीकार किया था। आरम्भ में सरकार यह नही समझ सकी कि गुप्त
विप्लव योजनावाले इतनी गहरी नींव देकर काम शुरू कर रहे हैं। यदि ऐसा न
होता तो इतना अधिक काम हो ही न सकता। पंजाब के पुलिस विभाग के एक
मुसलमान डिप्टी सुपरिण्टेण्डेण्ट ने अपने एक मुखबिर को इस दल में शामिल करा
दिया था। अन्त मे उस कृपालसिंह ने ही कृपा करके सारी बातें प्रकट कर दी।
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सिक्ख दल का परिचय
इस दल में कृपालसिंह किस प्रकार भर्ती हो गया और उसने किस प्रकार,
कब सारी बातें प्रकट कर दी इसका उल्लेख यथास्थान किया जाएगा। अभी तो
इस सिक्ख दल का थोड़ा-सा परिचय देने की चेष्टा करता हूँ।
इस दल में कुछ कम मेम्बर न थे। उत्तरी अमेरिका और कनाडा से भिन्न-
भिन्न दलों में कोई छः-सात हज़ार सिक्ख देश में वापस आए थे। किन्तु सन्
1914 के Ingress Ordinance Act के अनुसार बहुतेरे लोग जेल में ठेल दिये
गए तथा और भी बहुतेरे लोग नज़रबन्द कर दिये गए जिससे वे अपना गाँव छोड़-
कर कही आ-जा न सकते थे। जो लोग नज़रबन्द थे उन्हें विप्लव-कार्य में सहायता
देने का विशेष अवसर नहीं मिला। क्योंकि सूर्यास्त और सूर्योदय के दरम्यान इन्हें
अपने घर पर मौजूद रहना पड़ता था। यह इसलिए कि क्या जाने पुलिस किस
समय इनकी जाँच करने पहुँच जाय। दिन निकल चुकने पर भी ये लोग अपने गाँव
से बाहर न जा सकते थे। किसी दूसरे गाँव का कोई भी व्यक्ति इनसे प्रकट रूप में
मिल-जुल न सकता था। बाद में जब काम अच्छे सिलसिले से होने लगा तब उनमें
से जिन-जिनको देश का काम करने की प्रबल इच्छा हुई वे पुलिस की नज़र बचा-
कर खिसक गए। अर्थात्, क्या पुलिस, क्या उनके घर के लोग और क्या रिश्तेदार
—किसी को उनकी खबर न मिलती थी।
जिस भाव को हृदय में लेकर ये दल भारत में आए थे, स्वदेश में पदार्पण
करने के पश्चात् ही उनमें से बहुतों का वह भाव बदल गया। अमेरिका से लौटे
हुए इन छः-सात हज़ार मनुष्यों में से कोई आधे लोग अपने घर-गृहस्थी के कामों
में जा फँसे। किन्तु अवशिष्ट सिक्ख बड़े उत्साह के साथ विप्लव कार्य में लगे रहे।
अमेरिका से लौटे हुए इन लोगो में अधिकांश सिक्ख ही थे। ऐसे लोग इने-
गिने ही थे जो कि सिक्ख न थे। शायद पचीस-तीस हों। वे प्रायः सब वयस्क थे।
बहुतों के स्त्री, परिवार और बाल-बच्चे सब कुछ थे। इनमें से बहुतों की उम्र
चालीस वर्ष से ऊपर थी। कुछ लोग तो बूढ़े थे। भाई निधानसिंह, भाई सोहन-
सिंह, भाई कालसिंह, भाई केहरसिंह —इनमें से किसी की उम्र पचास वर्ष से कम
नही थी।
दिल्ली षड्यन्त्र के मुक़दमे में जो लोग गिरफ़्तार हुए थे उनमें से कई एक
46 / बन्दी जीवन
उतरती उम्र के थे। अमीरचन्द की उम्र पचास से भी ऊपर थी। अवधबिहारी
भी जवानी पार कर चुके थे ।
बंगाल का विप्लवकारी दल ही ऐसा था जिसके प्रायः सभी सदस्य छात्र-
श्रेणी के बालक और नवयुवक थे। इनमें से अधिकांश लोगों को सांसारिक अभि-
ज्ञता एक प्रकार से थी ही नहीं। ज्यादातर ऐसे थे जिनकी उम्र सोलह से लेकर
बीस-बाईस वर्ष से अधिक न होगी। बंगाल में प्रायः यही दीख पड़ता है कि जो
लोग तीस के पार हुए उनका सारा उत्साह, समग्र उद्योग ठंडा पड़ जाता है, उस
समय वे किसी तरह अपनी गृहस्थी का काम चलाने के सिवा और किसी मसरफ़
के नहीं रह जाते। मालूम होता है कि बंगाल का जो कुछ आशा-भरोसा है वह
मानो स्कूल और कालेज के युवकों के तरुण मनों में ही आबद्ध है। किन्तु बंगाल
में काम करनेवालों की सांसारिक अभिज्ञता स्वल्प रहने पर भी, उनमें बहुतों के
तरुणवयस्क होने पर भी, उनमें एक ऐसी एकाग्र साधना देखी है जोकि बंगाल के
बाहर अन्यत्र देखने को नहीं मिली।
बंगालियों ने जब-जब जिस किसी काम में हाथ लगाया है तब-तब उसे प्राणों
की बाजी लगाकर किया है। इसी से देखता हूँ कि बौद्ध युग में बंगालियों ने
जिस प्रकार बौद्ध धर्म को अपनी नस-नस में प्रविष्ट कर लिया था वैसा और
किसी प्रदेश के लोगों ने नहीं किया तथा अन्त में जब अन्यान्य प्रदेश-वासियों ने
बौद्ध धर्म को बिलकुल छोड़ दिया था तब वे बंगालियों को कुछ-कुछ अवज्ञापूर्ण
दृष्टि से देखने लग गए थे, क्योंकि बंगाल उस समय भी बौद्ध धर्म को पहले की
भाँति हृदय से चिपकाये हुए था। फिर अंग्रेज़ी अमलदारी होने पर भी देखा कि
बंगालियों ने जिस प्रकार अपना सर्वस्व खोकर पाश्चात्य शिक्षा-दीक्षा और आचार-
व्यवहार को अपना लिया इस प्रकार और किसी भी प्रदेश ने नहीं अपनाया। इसे
बंगाल का गुण समझिए या दोष, किन्तु बंगाली जब जिसे ग्रहण करते हैं उसे
प्राणपण से अंगीकार करते हैं। इसी कारण वर्तमान युग में भी बंगालियों ने जब
जब देश-हित की ओर ध्यान दिया तब फिर वे दूसरी ओर दृष्टि नहीं डाल सके।
न फिर उन्होने शादी-ब्याह करके गृहस्थी चलाई और न उन्हें द्रव्य उपार्जन
करना भला लगा। उन्हें तो एकदम घर-द्वार छोड़कर बाहर निकल आना पड़ा।
इन युवकों में से बहुतों में मुझे एक अतीन्द्रिय भाव की प्रेरणा का आभास
मिला है—ये लोग सिर्फ आडम्बर करने में ही मस्त नहीं बने रहे। इन लोगों ने
देशसेवा-व्रत को एक प्रकार से साधना का अंग समझकर ही ग्रहण किया था।
इन लोगों के बीच एक इसी धारणा और भावना ने दृढ़ रूप से जड़ जमा ली थी
कि 'हम कैसे मनुष्यता को प्राप्त कर सकेंगे, हम किस प्रकार से चरित्रवान् हो
सकेंगे ?'
किन्तु मुझे यह भाव दो-तीन सिक्खों के सिवा अन्य लोगों में नहीं दिखा।
युक्त प्रदेश के भी जिन विप्लवपन्थियों से मेरा हेल-मेल रहा है उनमें भी बंगाल
के आदर्श की बात छिड़ने पर दिखा है कि वे भी उसे प्राणपण से ग्रहण करने में
सिक्ख दल का परिचय / 47
समर्थ नहीं हुए, प्रत्युत उनके होंठों पर एक अविश्वास की मन्द मुस्कान ही देख
पड़ी है ।
सिक्खों में प्रचण्ड साहस और उत्साह था, इसके सिवा वे कष्ट भी खूब सह
सकते थे । उनकी विशाल गठी हुई देह, खूब चौड़ा सीना और सुसम्बद्ध कटिप्रदेश
सभी की दृष्टि को आकर्षित करते थे । उनके दाढ़ी और मूंछों से सुशोभित दृढ़ता-
व्यंजक चेहरे को देखकर बहुतेरे उत्पीडकों का दिल दहल जाता था । उनकी
चाल-ढाल से एक विशेष भाव प्रकट होता था । साफ मालूम होता था कि मानो
वे दोनों पैरों पर समान भार डालकर चलते हैं किन्तु बिना दाढ़ी-मूंछों वाले
कोमलांग सीधे-सादे नम्र बंगाली युवकों का चारित्र्य जिस भाँति एक उच्च आदर्श
पर गठित हुआ दिखता था वैसी बात इनमें न थी । इस बात को मैं साधारण
भाव से ही लिख रहा हूँ, क्योंकि व्यक्तिगत रूप से कतिपय सिक्खों के सम्बन्ध में
मेरी बहुत ही उच्च धारणा है । अपनी अंडमन—कालापानी—की कथा का
वर्णन करते समय मैं इस विषय की आलोचना करूँगा ।
शिक्षित कहने से हमारे मन में साधारणतया जो धारणा होती है उस दृष्टि
से कहना पड़ता है कि अमेरिका से लौटे हुए दलों में कोई भी शिक्षित न था ।
भारत के अन्यान्य प्रदेशवाले घर की आधी रोटी पर सन्तुष्ट रहकर बाहर जाने
का साहस नहीं करते किन्तु इनमें से बहुतों ने इस टुकड़े पर सब्र न करके सिर्फ
रुपया पैदा करने के लिए ही पंजाब को छोड़कर विदेश यात्रा की थी । सिगापुर,
पिनांग, स्याम, मलय प्रायद्वीप और चीन के अनेक स्थानों में इनकी गति-विधि
आरम्भ हुई । उधर कनाडा और उत्तर अमेरिका के भी अनेक स्थानों में ये लोग
इसी उद्देश्य से जा पहुँचे सिंगापुर, पिनांग और हांकांग में ये लोग खास करके
अंग्रेजों की फ़ौजों और मिलिटरी पुलिस में भर्ती हो गए थे । स्याम, मलय प्राय-
द्वीप और चीन के अनेक स्थानों में बहुतेरे सिक्ख कुलीगिरी भी करते थे । कुछ
लोग ठेकेदारी या ऐसा ही कुछ और स्वाधीन रोज़गार करते थे । किन्तु कनाडा
और अमेरिका में ये लोग प्रधानतया कुलीगिरी करते थे । वहाँ इनका यही पेशा
था । अमेरिका के किसी-किसी कारखाने में अमेरिकावासियों की अपेक्षा इन्हीं की
ज़्यादा क़दर थी । अमेरिकावासियों की अपेक्षा, ये अधिक काम करते थे इसलिए
इन्हें उजरत भी खासी मिलती थी । इसका फल यह होता था कि अक्सर
अमेरिकन मज़दूरों से इनका झगड़ा-बखेड़ा हो जाता था । मैंने इनसे सुना है कि
एक बार एक शहर में यह मनोमालिन्य इतना बढ़ गया कि एक प्रचण्ड विवाद
का श्रीगणेश हो गया । बस्तीभर में सिक्ख मज़दूर एक ओर और दूसरी ओर
उस शहर के सब अमेरिकन गोरे मज़दूर । खासी मार-पीट हुई, खूब लाठी चली,
किन्तु यह सब होने पर भी सरकार की ओर से सिक्खों पर कोई ज्यादती नहीं
हुई । भारत में यदि कहीं ऐसी घटना हो जाती तो यह मामला न जाने कैसा रंग
पकड़ता । अमेरिका से लौटे हुए ये सिक्ख लोग वैसे शिक्षित न होने पर भी प्रायः
सभी अपनी मातृभाषा में लिखित ग्रन्थ आदि पढ़ सकते थे और अपने गांव के
48 / बन्दी जीवन
सिक्खों की शिक्षा-दीक्षा आदि के सम्बन्ध में इन्हें अत्यन्त उत्साह था। ऐसी शिक्षा
के प्रचारार्थ उन अमेरिकावासी मजदूरपेशा सिक्खों ने ही अमेरिका से धन-संग्रह
करके कई बार दस-दस, पन्द्रह-पन्द्रह हज़ार की रकमें पंजाब को अर्पण की थीं।
अमेरिका की स्वाधीन आबहवा के बीच में रहने से और खासी आमदनी कर
सकने से उनमें आत्मसम्मान, मर्यादा और आत्मविश्वास का परिमाण बहुत कुछ
बढ़ गया था। इनमें से कई एक ने अमेरिका में रहकर कभी अपने वेश और
परिच्छेद को नही छोड़ा, बहुतेरे तो अपने हाथ से रसोई बनाकर भारतीय ढंग
पर ही आहार किया करते थे। देश से जब पहले-पहल ये लोग अमेरिका पहुँचे
तब शायद अंग्रेज़ी में एक भी बात न कह सकते थे किन्तु वहाँ पहुँचकर अजीब
किस्म की टूटी-फूटी अंग्रेजी बोलना इन्होंने सीख लिया। इनके मुँह से वह टूटी-
फूटी अंग्रेज़ी सुनने मे बड़ा मज़ा आता था। अमेरिका मे ऐसी ही अंग्रेज़ी बोलकर
ये अपनी भावनाएँ व्यक्त करते थे और उम्दा अंग्रेजी न जानने से इनके किसी
काम मे रुकावट न पड़ती थी और फिर इन्होंने धन भी खासा कमाया था। और
सबसे बड़ी बात तो यह थी कि अपने अमेरिका-प्रवास के फलस्वरूप इन लोगों
ने स्वदेश-सम्पर्क को नही तोड़ दिया था। ये करते तो थे अमेरिका में कुलीगिरी
या मज़दूरी, लेकिन यह जानने के लिए सदा व्यग्र रहते थे कि हमारे देश में कहाँ
क्या हो रहा है। उस समय बंगाल की नवजागरण की तरंग ने जिस प्रकार
भारत के अन्यान्य प्रदेशों में एक भाव की हिलोर पैदा कर दी थी उसी प्रकार
उसका हिलकोरा सुदूर अमेरिका मे स्थित भारतीयों के हृदय में भी लगा था।
जब भारत में गदर की चिनगारियाँ धीरे-धीरे इधर-उधर चारो ओर उड़ रही
थीं तब अमेरिका मे कुछ भारतीयों के जी-ही-जी मे वे धधककर जल रही थी।
इसी समय भाई करतार सिंह नामक एक तरुण युवा इनके साथ आकर सम्मिलित
हुए। ये उड़ीसा मे रेवेनशा कालेज की प्रथम श्रेणी की पढ़ाई समाप्त करके विशेष
कारण से अमेरिका चले गए थे। यद्यपि सिक्खो में ये सबसे कम उम्र के थे, फिर
भी इनकी अधिनायकता मे मैंने कितने ही बड़ी उम्र के सिक्खों को भी काम
करते देखा। इन्होंने अपने-जैसे विचार रखनेवाले दो-एक व्यक्तियों की सहायता
से एक सम्वादपत्र के निकालने का सकल्प किया। इसी समय पंजाब के स्वनाम
ख्यात देशभक्त लाला हरदयाल भारत में विप्लव करने की सारी आशाएँ छोड़-
छाडकर अमेरिकन सोशलिस्टों (साम्यवादियों) के साथ आत्मीयता स्थापित
करने का यत्न कर रहे थे। करतारसिंह और उनके मित्र इस अवसर पर हरदयाल
के पास ऐसे पत्र को प्रकाशित करने का प्रस्ताव लेकर उपस्थित हुए। स्वदेश-
प्रेमी हरदयाल तो ऐसे सुयोग की ताक में ही बैठे थे। उन्होंने खुशी-खुशी इस
काम को हाथ में ले लिया। इस प्रकार 'गदर' नामक विख्यात समाचारपत्र का
प्रकाशन होना आरम्भ हुआ, और धीरे-धीरे इसी ने 'गदर' पार्टी का संगठन कर
दिया। कैलीफोरनिया का युगान्तर आश्रम ही इसका केन्द्रस्थल था।
बीसवी सदी के महाभारत (प्रथम विश्वयुद्ध 1914-1919) के आरम्भ होने
सिक्ख दल का परिचय / 49
से पहले तक भारतीय विप्लववादियों का दल समझ ही न सका था कि अंग्रेजों
के साथ जर्मनी का विरोध इतनी जल्दी उपस्थित हो जाएगा । फलतः इनके
विप्लव की तैयारी भी इस ढंग से हो रही थी कि मानो दस-पन्द्रह वर्ष के अनन्तर
वास्तविक 'गदर' शुरू होगा । यही कारण है कि ये लोग महासमर छिड़ते समय
क्रान्ति के लिए पूरी तौर पर तैयार न थे । इसके सिवा अब तक के विप्लव-
कारी दल के साथ भारत से बाहरी देश के किसी भी क्रान्तिकारी दल का कहने
लायक कोई सम्बन्ध ही न था । इसका फल यह हुआ कि जब अमेरिका से क्रान्ति-
कारियों के दल-के-दल भारत में आने लगे तब भारत में स्थित क्रान्तिकारी
लोग उनके साथ दिल खोलकर ठीक समय पर सम्मिलित नही हो सके । यदि
ऐसा सम्मिलन हो जाता तो भारत का भाग्य आज कुछ और ही होता ।
अमेरिका प्रवासी विप्लवपथियो की समझ मे नही आया था कि अंग्रेजों के
साथ जर्मनो का युद्ध शीघ्र ही छिड़ जाएगा, इस कारण उनकी तैयारी और ही
ढग पर हो रही थी। वे समझते थे कि भारत से बाहर की किसी अन्य राजशक्ति
की सहायता लेकर युद्ध की तैयारी करनी होगी और इसी सकल्प को कार्य मे
परिणत करने के लिए बहुत कुछ आयोजन हो रहा था, परन्तु इनके लिए असमय
मे ही यूरोप मे रणचण्डी का नृत्य होने लगा । इसके लिए ये तैयार न थे और
सारा संकल्प एकदम विफल हो गया । अब इन्होने निश्चय किया कि गदरपार्टी के
दल-के-दल भारत मे पहुँचकर भारतीय सैनिको को अपने प्रभाव मे कर ले । बस,
क्रान्ति का यही एकमात्र उपाय निश्चित हो गया । हजारो सिक्ख विदेश मे पड़े
हुए अपने बोरिए-बँधने समेट-ममेटकर स्वदेश को रवाना हो गए ।
इधर भारत सरकार को इस पार्टी की बहुत-सी बातो का पता लग चुका था,
क्योकि इस पार्टी के मेम्बर लोग अमेरिका मे खुले खजाने सभाओ मे, भारत मे
गदर करने के सम्बन्ध मे व्याख्यान दिया करते थे । 'गदर' नामक पत्र भी
प्रकाश्य रूप मे मुद्रित होता था । सन् 1857 के महाविप्लव की दसवी मई एक
उत्सव मे परिणत की जाती थी । लाला हरदयाल पर अग्रेज़ सरकार की विशेष
उग्र दृष्टि थी । कई बार उनकी डायरी तक बडी सफाई से उडा ली गई । अन्त
मे जब उनको गिरफ्तार करने की सलाह हो रही थी तब एक अमेरिकन ने उन्हें
सावधान कर दिया । अतएव हरदयाल और अन्य भारतीयो ने अमेरिका से हट
जाने मे ही भलाई सोची ।
विभिन्न स्थानों के जर्मन एलची (कोन्सल) उस समय भारत मे विप्लव
मचा देने की इच्छा रखनेवालो की अनेक प्रकार से सहायता करते थे । अमेरिका
से लौटे हुए इन दलो ने उनसे मिलने-जुलने के अवसर को कभी खाली नही जाने
दिया ।
इस प्रकार कुछ व्यक्ति तो यूरोप की ओर चले गए और जो रह गए वे
भारत की ओर रवाना हुए। रास्ते मे यें लोग जहाँ-तहाँ अपना अभिप्राय प्रकट
कर दिया करते थे । इस प्रकार का एक दल जापान के बन्दर मे पहुँचा । यहाँ पर
50 / बन्दी जीवन
परमानन्द नामक एक छरहरे डील के युवा पुरुष इन लोगों में आ मिले। ये
बुन्देलखण्ड के निवासी थे। अण्डमन में इन्हें हम लोग छोटे परमानन्द कहते थे,
क्योंकि बड़े परमानन्द थे डी० ए० वी० कालेज लाहौर के भूतपूर्व अध्यापक भाई
परमानन्दजी। इन्हें भी लाहौर षड्यन्त्र के मामले में आजन्म कालेपानी की
सजा दी गई थी। पंजाब में सिक्खों के अभ्युत्थान के अवसर पर स्वदेश और
स्वधर्म के लिए जब निडर देशभक्तगण मुसलमानों के अत्याचार के आगे बेधड़क
बलिदान हो रहे थे—सिर दे देते थे लेकिन धर्म न देते थे—उस समय भाई
परमानन्द के एक पूर्वपुरुष ने आत्म-बलिदान की पराकाष्ठा दिखला दी थी। उस
समय उन्हें मुसलमानों ने आरे से चीरकर मारा था। उसी समय से सिक्खों में यह
खानदान 'भाई' नाम से विख्यात हो गया। सिक्खों में यह 'भाई' संज्ञा बड़ी
सम्मानसूचक है। इसलिए हम लोग सिक्ख मात्र को उनके नाम के साथ 'भाई'
शब्द लगाकर बुलाया करते थे।
सिक्खों के एक बड़े उत्साही नेता भाई भगवानसिंह थे। इनके व्याख्यान सुन-
सुनकर कितने ही सिक्ख, अपना काम-काज छोड़, विप्लव कार्य में सहायता करने
के लिए देश में लौट आए थे। ये लोग कुछ क्षणिक उत्तेजना में आकर, सर्वस्व
छोड़-छाड़कर, इस विप्लव-धर्म में दीक्षित नहीं हुए थे, वरन् इनमें सचमुच
देशसेवा की प्रेरणा जाग्रत थी। इस प्रकार से जो सिक्ख देश में लौट आए थे
उनमें बहुतों से मेरी बातचीत हुई थी। उससे मालूम हुआ कि वे सचमुच प्राणों
की प्रत्येक तह में—दिल के हर पहलू में—पराधीनता की जलन का अनुभव
करके विप्लव कार्य में सम्मिलित हुए थे। इनमें से कोई तो पिनांग की मिलिटरी
पुलिस में नियुक्त था, कोई हांगकांग में पहरेदार था और कोई सौदागरी करता
था। इस समय हांगकांग में सिक्खों की एक रेजिमेंट थी। इस रेजिमेंट पर भी
इन लोगों का आधिपत्य हो गया था।
भारत में लौटे हुए दल के अनेक व्यक्ति ऐसे थे जो कि अंग्रेज़ों की पलटनों में
सैनिक पद पर रह चुके थे। इनमें से किसी की सर्विस आठ वर्ष की, किसी की
दस वर्ष की और किसी-किसी की ग्यारह वर्ष की थी। इनमें कोई भी ऐसा सैनिक
न था जिसे तीन वर्ष से कम की अभिज्ञता हो, क्योंकि प्रत्येक सैनिक को कम से
कम तीन वर्ष तक नोकरी करने की शर्त करनी पड़ती है। इनमें से बहुतेरों का
काम मशीनगन चलाना था और कुछ लोग तोपखाने में भी काम कर चुके थे।
भारत में लौटने के मार्ग में पुलिस विभाग के कर्मचारियों ने इन लोगों से
पूछा था कि आखिर तुम लोग हिन्दुस्तान किसलिए जा रहे हो? तो इनमें से
किसी ने कहा कि विवाह करने जाता हूँ और किसी ने कहा कि घर छोड़े बहुत
दिन हो गए, इसलिए देश को जा रहा हूँ। ऐसे ही ऐसे कारण बतला दिए थे।
फिर अदालत में मुकदमे के वक्त जब न्यायकर्ता इनसे हिन्दुस्तान में आने का कारण
पूछते तब भी ये लोग प्रायः वैसे ही उत्तर देते थे जो कि ऊपर दिए गए हैं।
सिर्फ एक व्यक्ति ने दूसरे ढंग का उत्तर दिया था। न्यायकर्ता ने अभियुक्त से
सिक्ख दल का परिचय / 51
पूछा, "तुम देश में किसलिए आए थे ?" इसका उत्तर दिया था कि "यह हमारा
स्वदेश जो है।" इन पंजाबी ब्राह्मण का नाम जगतराम था। ये 'गदर' पत्रिका
के सम्पादन विभाग में काम करते थे।
अमेरिका से आये हुए सिक्खों में उत्साह तो अदम्य था किन्तु काम करने की
रीति उन्हें मालूम ही न थी। न इसका कोई केन्द्र था और न कोई शाखा ही।
किसी-किसी की अधीनता में बीस-पचीस मनुष्य रहते थे। उसे इन बीस-
पचीस आदमियों का सरदार कहा जाता था। ये सरदार कभी एकत्र हो जाते थे
और कभी कुछ दिनों तक इनकी परस्पर भेंट ही न होती थी। असल बात यह कि
सम्मिलित रूप में काम करने की एक प्रणाली का इनमें अभाव था। इसका कारण
यही था कि इनका कही केन्द्र न था। इस प्रकार देश में बिलकुल अव्यवस्थित
रूप से कितने लोग गड़बड़ मचा रहे थे यह कौन जानता है। जो लोग मुलतान
जेल में कैद थे वे भी यही कहते थे कि अब शीघ्र ही बलवा होगा और इससे हम
झटपट रिहाई पा जाएँगे। इमका फल यह हुआ कि ये भिन्न-भिन्न जेलों में बाँट
दिए गए। समानधर्मा और एक ही भाव के भावुक बहुत लोगों के एक स्थान में
रहने से जो आनन्द प्राप्त होता है वह आनन्द भी इनसे छिन गया।
इन सब दलों ने भारत में आते ही बंगाल के गुप्त विप्लव दल का पता
लगाना आरम्भ कर दिया। किन्तु पहले से ही किसी के साथ जान-पहचान न
रहने के कारण पात्र-अपात्र का विचार किए बिना ही ये लोग पंजाब में विद्रोह
की बातें कहने लगे। इस समय कलकत्ता की मामूली सड़कों पर भी मैंने सुना था
कि पंजाब मे विप्लव की तैयारी हो रही है। 'भारत रक्षा' क़ानून बनाते समय
हार्डिज साहब ने इम बात का उल्लेख किया था।
इसी समय करतारसिंह ने आकर बंगाल के किसी सुपरिचित, लब्धप्रतिष्ठ
सार्वजनिक नेता से मुलाक़ात की। उन्होने करतारसिंह को उपदेश दिया कि तुम
अपने संकल्प और सुभीते के अनुसार काम करते जाओ, बंगाल तो ठीक समय पर
तुम्हारी सहायता करेगा ही। अब यह कहने में कोई बाधा नही है कि ये व्यक्ति
सर सुरेन्द्रनाथ बनर्जी थे।
इस समय इन्हें थोड़े-बहुत हथियारों की ज़रूरत हुई। यद्यपि इस विप्लव का
प्रधान अवलम्ब पंजाबी सैनिकों के दल थे, तथापि आत्मरक्षा करने के लिए यथा-
सम्भव प्रत्येक कार्यकर्त्ता को सशस्त्र रखने की इच्छा से कुछ रिवाल्वर इत्यादि की
आवश्यकता हुई। इस उद्देश्य की सिद्धि के लिए श्रीयुत जगतराम कुछ रुपये देकर
काबुल की ओर भेजे गए और यही से कारागार की यन्त्रणाओं ने उनका पल्ला
पकड़ लिया। बेचारे जगतराम पेशावर मे ही पकड़ लिए गए और आगे चलकर
अण्डमन में मुझे उनके दर्शन हुए थे।
छोटे परमानन्द को भी इन लोगों ने इसी काम के लिए बंगाल भेजा था पर
ये भी खाली हाथ लौट आए।
4
पंजाब यात्रा
इस विप्लव की तैयारी के समय काशी में, बाहरी लोगों से मुलाक़ात करने
के लिए खास-खास मकान थे। पंजाब से जो लोग मुलाक़ात करने आते थे वे
पहले ऐसे ही खास मकान में पहुँचाए जाते थे। वहाँ से खबर मिलने पर दूर से
आगन्तुक व्यक्ति को छिपकर पहचान लिया जाता था। तब, सन्देह न रहने पर,
उससे भेंट की जाती थी। मैं उस दिन काशी में ही था जब पंजाबी दल का एक
मनुष्य वहाँ के विप्लव की तैयारी का समाचार लेकर हमारे पास आया। जब
उसके मुंह से सुना कि विप्लव के लिए दो-तीन हज़ार सिक्ख कमर कसे तैयार
बैठे हैं तब हमारा अन्तरतम पुरुष आनन्द से थिरकने लगा । पजाब के कार्यकर्ताओं
ने आगन्तुक व्यक्ति द्वारा कहला भेजा था कि रासबिहारी की हमें बहुत ज़रूरत
है। दिल्ली षड्यन्त्र के फ़रार असामी प्रसिद्ध कर्मवीर रासबिहारी का नाम उस
समय अमेरिका तक में विश्रुत हो चुका था। इन लोगों ने अमेरिका में ही इनका
नाम सुना था।
कई कारणों से उस समय रासबिहारी पंजाब न जा सके, इसलिए पहले वहाँ
मेरा ही भेजा जाना तय हुआ ताकि जब मैं पंजाब की दशा अपनी आँखों देख
आऊँ और सबको वहाँ का हाल बताऊँ तब आगे का कर्तव्य निर्धारित हो।
पहले ही निश्चित हो गया था कि मैं जालन्धर शहर में जाकर सिक्खों के
नेताओं से भेंट करूँगा। उस समय नवम्बर का महीना खत्म होने को था।
पश्चिम में ठण्ड का मौसम था। उसी शीतकाल के प्रातःकाल लुधियाना में गाड़ी
पहुँचते ही देखा कि मेरे मित्र के परिचित एक सिक्ख युवक हम लोगों की प्रतीक्षा
कर रहे हैं। मित्र ने इनसे मेरा परिचय करा दिया। यही करतारसिंह थे। वह
गाड़ी में सवार होकर हमारे साथ जालन्धर की ओर रवाना हुए। रास्ते में थोड़ी-
बहुत बातें हुईं। उनसे मालूम हुआ कि इस समय लुधियाना में दो-तीन सौ मनुष्य
एकत्र हुए हैं। जुदा-जुदा काम करने के लिए ये लोग विभिन्न दिशाओं में भेजे
जाएँगे। ये लोग गुरुद्वारे में अध्ययन करने के बहाने एकत्र होते थे।
उस दिन की बात मुझे आज खासी स्मरण है। गाड़ी के उस डिब्बे में हम
कई आदमी एकत्र हुए थे, किन्तु सभी के मन का भाव कई तरह का था। हम
तीनों व्यक्ति बीच-बीच में एकाध बात कर लेते थे सही, किन्तु हृदय में न जाने