बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
मालवीयजी ने सब बातें सुन लीं और आखिर में कहा कि मुझे लिखकर
रजिस्ट्री पत्र द्वारा सब बातें सूचित करो। मैंने गोरखपुर जाकर वैसा ही किया
था। Acknowledgement due की रसीद तो मुझे मिल गई। लेकिन मालवीय
जी ने राजनीतिक बन्दियों की मुक्ति के लिए एक आवाज़ भी नहीं उठाई।
जितेन्द्र मुकर्जी एवं मेरे भाइयों का कहना था कि आजकल युक्त प्रदेश में
उदीयमान नेता पण्डित जवाहरलालजी नेहरू हैं। यदि वे राजनीतिक क़ैदियों का
प्रश्न उठाएँ तो कुछ काम हो सकता है।
मैं बनारस में दो ही दिन ठहरा और फिर गोरखपुर चला गया। मेरे साथ
मेरे सर्वकनिष्ठ भाई भूपेन्द्रनाथ थे। बनारस षड्यंत्र के मामले में आजन्म काले-
पानी की सजा के अतिरिक्त मेरे ऊपर यह भी दण्ड था कि मेरी तमाम जायदाद
छीन ली जाय। बनारस में जिस मकान में हम लोग रहते थे वह मेरी आजी का
मकान था। मुझे सज़ा होने के बाद पुलिसवालों ने इस मकान को अपने क़ब्ज़े में
कर लिया था। मकान के साथ बिस्तरे आदि भी, जो कुछ मकान में थे, पुलिस के
ही व्यवहार में आए। अर्थात् जो पुलिस वाले रखवाली के तौर पर उस मकान
में रहते थे, वही वह सब सामान अपने इस्तेमाल में ले आए। उस समय में मेरी
माताजी, मेरी आजी, मेरी मौसी एवं मौसी की पाली हुई एक लड़की और मेरा
सबसे छोटा भाई मेरे पकड़े जाने के बाद सब यहीं घर में रह गए थे। जब पुलिस
ने मकान को अपने क़ब्ज़े में कर लिया तो इनके रहने के लिए स्थान न रहा।
ऐसी विकट परिस्थिति में मेरे मामा इन सबको गोरखपुर ले आए। जब मैं काले-
पानी से छूटकर आया तो मेरे भाई, मां इत्यादि गोरखपुर में मेरे मामा के पास
ही थे। मेरी आजी मेरे चाचा के पास चली गई थी।
गोरखपुर से मैं एक दफे पं० जवाहरलालजी से मिलने आया। राजनैतिक
बन्दियों के विषय में और विशेषकर कालेपानी में स्थित घोर दुर्दिन में पड़े हुए
बहुत-से लम्बी सजा पाये हुए राजबन्दियों के प्रति जवाहरलालजी की दृष्टि मैंने
आकर्षित की। जवाहरलालजी सब बातें सुनकर यह कह उठे—"हम लोग तो
स्वयं ही जेल जाने का इन्तज़ाम कर रहे हैं और आप दूसरों को छुड़ाने की बातें
कर रहे हैं।" मैं उनके मुंह की तरफ ताकता ही रह गया और सोचने लगा कि मैं
इनसे और क्या कहूँ। मैंने यह समझ लिया अपने ही आदमी हुए बगैर दूसरों के
दुःख को समझना सहज नहीं है। यदि जवाहरलालजी अपने दल के आदमी होते
तो वे मेरी प्रार्थना के महत्त्व को अनुभव कर पाते। और शायद यह भी बात थी
कि जब सरकार के साथ झगड़ा ही करना है तो फिर सरकार से किसी बात के
लिए अनुरोध कैसे किया जाय। मैं बहुत नाउम्मेद हो गया।
सितम्बर, सन् 1920 में कलकत्ता में स्पेशल कांग्रेस हुई। भारत के प्रत्येक
राजनीतिक नेता की दृष्टि उस समय महात्माजी के Non-cooperation प्रस्ताव
पर लगी हुई थी। वहाँ भी कुछ काम नहीं बना। कांग्रेस में तो हम कुछ कर
नहीं पाए लेकिन दूसरे मुक्त राजबन्दियों को साथ लेकर मैं लाला लाजपतराय
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के पास गया। ऑल इण्डिया पोलिटिकल सफरर्स कांफ्रेन्स में सभापति का आसन
सुशोभित करने के लिए उनसे अनुरोध किया। लाजपतरायजी राजी हो गये।
उनके सभापतित्व में इण्डियन एसोसिएशन के हाल में ऑल इण्डिया पोलिटिकल
सफरर्स कांफ्रेंस हुई। इस कांफ्रेन्स को बुलाने में प्रसिद्ध बैरिस्टर श्री बी० सी०
चटर्जी एवं कलकत्ता के पुराने क्रांतिकारी नेताओं की विशेष सहायता मिली
थी।
बहुतों ने वक्तृता दी। किसी की वक्तृता हृदयग्राही थी और किसी की शुष्क।
स्व० श्यामसुन्दर चक्रवर्ती ने हृदयावेग से गद्गद होकर सबसे लंबी स्पीच दी,
लेकिन उनकी स्पीच मर्मस्पर्शी नहीं हुई। वक्तृता देते-देते वे सभापति के शरीर
के ऊपर आ गिरते थे। भूल जाते थे कि सभापति के आसन पर कोई बैठा है।
पंडित मदनमोहन मालवीयजी ने जो वक्तृता दी उससे क्रांतिकारियों के प्रति
सहानुभूति रखनेवाले बहुत कुछ असन्तुष्ट हो गए। इसके प्रत्युत्तर में कलकत्ता के
बैरिस्टरगण जे० एन० राय, बी० सी० चटर्जी इत्यादि ने मालवीयजी को कुछ
बातें सुनाईं। लेकिन इस कांफ्रेंस में स्वर्गीय एनीबेसेण्ट महोदया ने जो मर्मस्पर्शी
एवं ओजस्विनी वक्तृता दी थी, उसकी तुलना की वक्तृता जीवन-भर में और
नहीं मिली। उस दिन यह पता चला कि वाग्मी किसे कहते हैं। वे दृश्य जीवन में
भूले नहीं जा सकते, मानो एक श्वेत प्रस्तर-मूर्ति जीवन्त होकर निश्चल रूप में
खड़ी है, कभी-कभी हाथ और सिर थोड़ा-थोड़ा हिल जाता है, केवल ओठ चल रहे
हैं। और उस प्रस्तरमूर्ति के मुख से मानो स्वयं सरस्वती हृदयग्राहिणी भाषा
उद्गीर्ण कर रही है। मालवीयजी लज्जित हो गए। तमाम हाल में मानो बिजली
का संचार हो गया। लाला लाजपतरायजी ने सभापति के आसन से यहाँ तक
भी कह डाला कि इन राजबन्दियों में ऐसे आदमी भी हैं जिनके जूते के फ़ीते
खोलने लायक यहाँ के लाटसाहब भी नहीं। मीटिंग समाप्त होने के बाद मालवीयजी
ने apology (क्षमा-याचना) के तौर पर कुछ कहा, जिसका आशय यह था कि
उनके कहने का मतलब तो यह-वह कुछ और था इत्यादि। इस प्रकार से राज-
बन्दियों के लिए कुछ प्रोपेगैण्डा किया गया।
उसी साल नागपुर मे जो कांग्रेस हुई, उसमें घटनाचक्र से मै Subjects
Committee (विषय-निर्वाचिनी समिति) में पहुँच गया। महात्माजी के असह-
योग आन्दोलन के कारण राजनीतिक barometer बहुत ही चढा हुआ था।
सरकार के साथ जब झगडा मोल लिया जा रहा था तब कैसे उसी सरकार से यह
अनुरोध किया जाय कि राजबन्दियो को छोड़ दो। मैंने स्व० विपिनचन्द्रपालजी
से बहुत अनुरोध किया कि कुछ तो हमें करना ही चाहिए। मेरे कहने पर विपिन-
चन्द्र ने एक प्रस्ताव तैयार किया। मैं उसी प्रस्ताव पर राजी हो गया और उसे
विषय निर्वाचिनी (Subject Committee) समिति से पास करवा लिया।
नागपुर कांग्रेस के अधिवेशन में भी स्व० विपिनचन्द्रपाल ने इस प्रस्ताव को रखा
और इसका अनुमोदन दूसरों के साथ मैंने किया। जीवन में सर्वप्रथम आम सभा में
बन्दी साथियों की चिन्ता / 221
इसी मौके पर मैंने व्याख्यान दिया था। इस कांग्रेस में बीस हज़ार के क़रीब डेली-
गेट्स थे। मैं ही ऐसा सर्वप्रथम बगाली था जिसने कांग्रेस में हिन्दी में वक्तृता दी
हो। आजकल के हिन्दू महासभा के सभापति बैरिस्टर श्रीयुत् विनायक दामोदर
सावरकरजी के छोटे भाई श्रीनारायण दामोदर सावरकर के पास मैं मंच पर
बैठा हुआ था। व्याख्यान देने के बाद जब मैं डा० सावरकर के पास लौट आया
तो उन्होंने मुझसे कहा कि तुम्हारे व्याख्यान से लोग रो पड़े हैं। प्रस्ताव का पूरा
मसविदा मुझे इस वक्त याद नहीं है। संभव है ऐसा रहा हो—This congress
sends its message of hope and sympathy to all political prisi-
oners incorcerated in the different Jails of India and in the
distant Andamans islands अर्थात् "भारतवर्ष की विभिन्न जेलों में एवं
अण्डमान के सुदूर टापू में जो भारतीय राजबन्दी पडे सड रहे हैं उनके लिए यह
कांग्रेस की महासभा सहानुभूतिपूर्ण ओर आशा का सन्देश भेजती है।" इसके बाद
प्रस्ताव में कुछ और भी शब्द थे जो कि मुझे याद नहीं हैं। मेरी और श्री विपिन-
चन्द्रपालजी की सलाह में यह प्रस्ताव बना था एवं स्व० देशबन्धु चितरंजनदासजी
की सहायता से यह प्रस्ताव कांग्रेस से पास हुआ। विजयराघवाचार्यजी ने जो
कांग्रेस के सभापति थे मुझे पाँच मिनट-मात्र का समय दिया था। अण्डमन से देश
लौट आते ही बम्बई में डाक्टर सावरकरजी को मैंने पत्र भेज दिया था और
लिखा था कि राजबन्दियों की मुक्ति के लिए कुछ करना चाहिए। इसके बाद
डाक्टर सावरकर और मैं दोनों सुरेन्द्रनाथ बनर्जी के पास गए। सुरेन्द्रनाथजी ने
पहले तो यह कहा कि हमें तो तुम लोग गाली दिया करते हो। इसके जवाब में
हमने उनको यक़ीन दिलाया कि राजनैतिक बन्दियों के लिए उन्होंने जितना काम
किया है उतना और किसी ने नहीं किया है। बात सच भी थी। हृदय से जो
बात कही जाती है उसका असर भी होता है। सुरेन्द्रनाथजी ने सब नोट इत्यादि
कर लिया। यहाँ पर एक बात कह देना आवश्यक है कि हम दोनों सुरेन्द्रनाथजी
के पास विनायक दामोदर सावरकरजी के विषय में ही कहने गए थे।
राजबन्दियों की रिहाई के लिए मैंने जो कुछ किया वह कुछ भी नहीं था।
ब्रिटिश गवर्नमेण्ट ने ही जिसे चाहा, उसे छोड़ा। महात्मा गांधी के सत्याग्रह
आन्दोलन के कारण भारत के राजबन्दियों का प्रश्न दब-सा गया। भारत के राज-
नीतिक वातावरण में स्वाधीनता के प्रश्न ने अभी भारतीयों के हृदय को जरा भी
बेचैन नहीं किया था। यही कारण था कि जिन लोगों ने भारतवर्ष को स्वाधीन
करने के लिए अपने जीवन को निछावर कर दिया था उसके लिए भारतवासी एक
प्रकार से उदासीन थे। आज भी भारत की दशा कुछ अधिक आशाप्रद नहीं है।
आज भी भारत के गष्ट्रीय कार्यकर्ताओं के मन में स्वाधीनता की चाह नहीं पैदा
हुई है। अरविन्द और तिलक के समय में स्वाधीनता का ही प्रश्न अन्तिम रूप से
राष्ट्रीय कार्यकर्ताओं के सामने जीवन का ध्येय बन गया था। यही कारण है कि
बगाल का क्रान्तिकारी आन्दोलन तीस साल तक दमन-चक्र चलनेपर भी दब नहीं
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सका। आखिरकार बंगाल के गवर्नर भारत के लाट साहब एवं इंग्लैण्ड के मंत्रियों
को मजबूर होकर यह कहना पड़ा था कि जब तक उन्हें बंगाल की जनता की
सहायता नहीं मिलती है तब तक वे क्रान्तिकारी आन्दोलन को दबा नहीं सकते।
बनारस में मालवीयजी से मिलने के बाद मैं और जितेन्द्र मुकर्जी सीधे कल-
क्टर के यहाँ चले गए। ऊपर लिख चुका हूँ कि छूटने के समय मुझे जो सर्टि-
फिकेट मिला था उसमें एक हिदायत यह थी कि अपने स्थान पर पहुँचने पर जिला
कलक्टर को मैं इत्तला दे दूँ कि मैं कालेपानी से वापस आ गया हूँ। इसी हिदायत
के मुताबिक मैंने जिला-कलक्टर को अपने आने की इत्तला कर दी। कलक्टर ने
कहा कि पुलिस सुपरिटेण्डेण्ट को इत्तला दे दो। यह बात बहुत बुरी मालुम हुई,
लेकिन आखिर पुलिस सुपरिटेण्डेण्ट के दफ्तर पर चले गए। लेकिन वहाँ पर
असिस्टेण्ट पुलिस सुपरिटेण्डेण्ट ही मिले। उनको भी मैंने अपने आने की इत्तला
कर दी। उन्होंने कहा कि सुपरिटेण्डेण्ट अभी नहीं हैं। मैंने कहा कि वह हों, या
न हों मैंने अपना फ़र्ज अदा कर दिया और अब मैं जा रहा हूँ। उन्होंने मेरा
नाम और पता नोट कर लिया। नतीजा यह हुआ कि मेरे ऊपर पहरा लग
गया। जहाँ तक मुझे याद है, अण्डमन से लौटकर बनारस में सिर्फ़ एक दिन
रहा। दूसरे दिन अपने कनिष्ठ भाई भूपेन्द्र को लेकर गोरखपुर चला आया।
गोरखपुर में दो-चार महीने पड़ा रहा। यह दो-चार महीने मैंने निश्चिन्त होकर
कुछ आराम से बिताए। लेकिन प्रतिदिन मेरे मन में यह खटकता रहा कि आखिर
मैं उचित रूप से जीवन व्यतीत कर रहा हूँ या नहीं। मैं प्रतिदिन यह अवसर
ढूंढ रहा था कि फिर कैसे नये सिरे से कार्य आरम्भ करूँ। मैं एक दफा कलकत्ता
जाना चाहता था, लेकिन पास में पैसा न था। गोरखपुर से एक साप्ताहिक पत्र
'स्वदेश' नाम से निकलता था। उसके सम्पादक श्री दशरथजी द्विवेदी से मैंने
परिचय प्राप्त कर लिया। बहुत इशारे से मैंने एक दिन उनसे अपनी मनोभिलाषा
व्यक्त की। कलकत्ता जाने की इच्छा प्रकट करते हुए मैंने उनसे सहायता माँगी।
मुझे आशा तो मिली, लेकिन सहायता नही मिली। इसी बीच मे मैं एक दिन
इलाहाबाद पंडित जवाहरलालजी से मिलने के लिए गया एवं अण्डमन की दशा
लिखकर रजिस्ट्री द्वारा पं० मदनमोहन मालवीयजी के पास भेजी। इन सबका
जो कुछ परिणाम हुआ उसे मैं पहले बता चुका हूँ। किसी कार्यवश एक दिन
बनारस गया। वहाँ पर अपने पुराने साथी श्री प्रियनाथ भट्टाचार्य एवं श्री सुरेश-
चन्द्र भट्टाचार्य से मिला। इन लोगों से मैंने संगठन-कार्य का प्रस्ताव किया। इसके
थोड़े ही दिनों के अनन्तर सी० आई० डी० के डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल मिस्टर
बिगैन के पास से मेरे भाई के पास इत्तला आई कि मैं फिर संगठन की बातचीत
चला रहा हूँ। मुझे आश्चर्य हुआ। बाद को पता चला कि प्रियनाथ भट्टाचार्य
ने छूटने के पहले ही एक लम्बा इकरारनामा पुलिस को दे दिया था। इसके बाद
से मैं फिर कभी प्रियनाथ से नही मिला।
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मि० सैण्ड्स और बैरिस्टर चटर्जी
बनारस षड्यन्त्र के मामले में हम चार भाइयों में से तीन गिरफ्तार हो चुके
थे । मेरे तीसरे भाई जितेन्द्र को दो साल की सजा भी हो गई थी । मेरे मझले
भाई रवीन्द्रनाथ अदालत से तो बरी कर दिये गए थे, लेकिन बाद को गोरखपुर
में अपने मकान में नज़रबन्द कर दिये गए । जितने दिनों के बाद में अण्डमन से
लौटकर आया उतने दिनों में जितेन्द्र ने एन्ट्रेंस और इण्टरमीडिएट पास करके
बी० ए० में पढ़ना शुरू कर दिया । रवीन्द्रनाथ बी० ए० में पढ़ने के लिए जाने
वाले थे या चले गए थे, यह मुझे ठीक-ठीक याद नहीं । अण्डमन जाने के पहले
मैं बी० एस-सी० के प्रथम वर्ष में पढ़ रहा था । अब छूटने के बाद मैंने भी चाहा
कि बी० ए० पाम कर लूं । मेरे भाई और माताजी की इच्छा न थी कि मैं
बी० ए० पढ़ूँ । लेकिन मेरे अत्यन्त आग्रह करने पर वे राजी हो गए । मन में यह था
कि कॉलेज में पढ़ने से मुझे नौजवानों से मिलने का प्रचुर अवसर मिलेगा । कुछ यह
भी इच्छा थी कि बी० ए० की डिग्री ले लूं शायद भविष्य में कुछ काम आए ।
इलाहाबाद जाने के पहले मेरे एक आत्मीय के पास जो कि रिश्ते में मेरे मामू
लगते थे, डिप्टी इन्स्पेक्टर जनरल ऑफ़ पुलिस सैण्ड्स साहब के पास से एक चिट्ठी
आई थी, जिसमें लिखा था कि शचीन्द्र को कालेपानी से लौटने पर अवश्य मेरे
पास एक दिन भेज दें ।
यहाँ पर सैण्ड्स साहब के बारे मे दो शब्द कह देना नितान्त आवश्यक है ।
आप ही के तत्वावधान में बनारम षड्यन्त्र केस चला था । मैनपुरी षड्यन्त्र केस
भी आप ही के जिम्मे था । मुझे सजा हो जाने के बाद माताजी ने सरकार के पास
माफ़ी का एक आवेदन-पत्र भेज दिया था; लेकिन सरकार की तरफ से यह जवाब
मिला था कि अभी छोड़ा नही जा सकता । इसके बाद जब सन् 1919 के
दिसम्बर महीने में सम्राट् के मुंह से राजबन्दियों को छोड़ने की घोषणा हुई तो
सैण्ड्स साहब ने कलकत्ता के प्रसिद्ध बैरिस्टर बी० सी० चटर्जी साहब से यह
कहा कि अब शचीन्द्र की माता से माफ़ी का आवेदनपत्र देने के लिए कह दीजिए,
मैं उमके लिए सिफारिश कर दूंगा । बी० सी० चटर्जी उस समय मैनपुरी केस
की अपील की पैरवी के लिए आये हुए थे। मेरे छूटने की कहानी दूसरे स्थान पर
बतलाई जा चुकी है ।
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मैनपुरी केस के कुछ फरार व्यक्तियों के छुटकारे के लिए भी सैण्ड्स साहब
ने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की। उन्होंने सबसे कहला दिया कि फरार व्यक्ति
आत्म-समर्पण कर दें हम उन्हें छुड़वाने का प्रबन्ध कर देंगे। इस प्रकार से मैनपुरी
के क़रीब-क़रीब सब कैदी कुछ शर्तों पर छोड़ दिए गए। लेकिन एक व्यक्ति पं०
देवनारायणजी सैण्ड्स साहब से तो मिले लेकिन उन्होंने कोई शर्त कबूल नहीं की।
तब सैण्ड्स साहब ने कहा कि मैं आपको गिरफ्तार नहीं करूँगा, क्योंकि आप
अपनी खुशी से मेरे पास आए हैं। हम लोगों ने आपको नहीं ढूँढ़ा था। आपकी
जहाँ खुशी हो, चले जा सकते हैं। मैं आपको चले जाने का काफ़ी मौक़ा दूंगा।
लेकिन मेरी सलाह है कि आप हमारी शर्तों को मान लें।
आखिर में यह तय हुआ था कि पं० देवनारायणजी अपने स्थान पर जाकर
रहेंगे; पुलिस उन्हें गिरफ्तार नहीं करेगी; और इस बीच में सैण्ड्स साहब अपने
ऊपरवालों से यह तय करेंगे कि पं० देवनारायणजी को बिना शर्त छोड़ दिया जा
सकता है या नहीं; नहीं तो उन्हें भाग जाने का काफ़ी मौक़ा दिया जाएगा। ऐसी
सूरत में देवनारायणजी ने सैण्ड्स साहब से एक चिट्ठी ले ली थी जिसमें यह
हिदायत थी कि पुलिस उन्हें गिरफ्तार न करे। इसके बाद न तो उन्हें किसी ने
गिरफ्तार ही किया और न उन्हें कोई हुक्म ही मिला। आधुनिक भारत के
इतिहास में इस प्रकार का शायद यही एक ऐसा दृष्टान्त है और सम्भवतः सैण्ड्स
साहब को छोड़कर आज तक ऐसा व्यवहार और किसी ने नही किया। लेकिन यह
भी बात सच है कि असहयोग आन्दोलन के सिलसिले में चौरी-चौरा में पुलिस
की तरफ से जो बीभत्स काण्ड हुआ था वह भी सैण्ड्स साहब के ही हुक्म से हुआ
था लेकिन चौरी-चौरा के मामले में प्रजा की तरफ से भी पुलिस के ऊपर जो
कुछ हुआ था उसी के कारण पुलिसवाले उत्तेजित हो गए थे और इस उत्तेजना
के आवेश में दोनों ही तरफ से ज्यादतियां हुईं।
खैर, कुछ भी हुआ हो, अण्डमन से लौटने के बाद एक दफा मुझे सैण्ड्स साहब
से मिलने जाना ही था। गोरखपुर में आने के बाद जाँच करने पर मालूम हुआ
कि सैण्ड्स साहब खुफिया विभाग से अलग होकर साधारण विभाग में डिप्टी
इंस्पेक्टर जनरल के पद पर हैं और इस समय फैज़ाबाद में हैं। फैज़ाबाद में मेरे
एक बड़े पुराने मित्र आचार्य नरेन्द्रदेव भी रहते थे। सैण्ड्स साहब से मिलने का
मैंने यही अच्छा अवसर समझा। सैण्ड्स साहब से मिलने के बहाने नरेन्द्रदेवजी
से भी मिल लूंगा।
मैं फैज़ाबाद चला गया और सैण्ड्स साहब से मिला। मुझे क़रीब दस मिनट
तक एक कमरे में ठहरना पड़ा। बगल के कमरे में सैण्ड्स साहब एक डकैती के
मामले की तहकीकात कर रहे थे। इतनी शान्तिपूर्वक बातचीत हो रही थी कि
किसी को यह पता भी नहीं चल सकता था कि कमरे में कोई है भी। जब सैण्ड्स
साहब हमसे मिले तो बड़ी भद्रतापूर्वक शिष्टाचार के साथ हाथ-मे-हाथ मिलाकर
मुझे अपने पास बैठाया और कहा कि रस्सी को एक तरफ आप लोग खींच रहे थे
[Header] मि० सैण्ड्स और बैरिस्टर चटर्जी / 225
और दूसरी तरफ हम लोग । अब रस्सी-खिंचाई खत्म हो गई। अब आगे चलकर
क्या करने का इरादा है ? मेरी सलाह है कि खेती का काम करो, जो कुछ करो
उसमें अगर मेरी मदद की ज़रूरत है तो मुझे बतलाना, मैं मदद करने के लिए
तैयार हूं।" मैने सैण्ड्स साहब से कहा था, "मैं पढ़ना चाहता हूं और आप इतना
कर दीजिए कि मुझे किसी कालेज में भर्ती होने में दिक्कत न पड़े।" मैंने देखा
सैण्ड्स साहब को यह बात ज्यादा पसन्द नहीं आई। लेकिन मेरे मुंह पर तो
उन्होंने यही कहा, "मेरी मदद से यदि तुम कॉलेज में भर्ती हो सको तो मैं मदद
करने के लिए तैयार हूं। लेकिन कॉलेज के अधिकारियों पर मेरा कोई अधिकार
नहीं है।" मैंने कहा, "पुलिस की तरफ से बाधा आने पर किसी कॉलेज में भर्ती
नहीं किया जा सकता।" सैण्ड्स साहब ने कहा, "इतना हम कर देंगे कि पुलिस
की तरफ से बाधा न आए।" मैं मन-ही-मन समझ गया कि मेरे लिए कॉलेज में
भर्ती होना आसान नहीं है। इसके बाद मैं नरेन्द्रदेवजी से मिलने चला गया।
जब मैं सन् 1910 और 1911 में क्वींस कालेज में पढ़ता था, तभी से नरेन्द्रदेवजी
से मेरी जान-पहचान है।
कई कारणों से मैं गोरखपुर छोड़ना चाहता था। मेरे तीसरे भाई जितेन्द्र ने
जब बी० ए० पास कर लिया तब सभी ने सलाह दी कि जितेन्द्र को अब एम० ए०
'पढ़ना चाहिए। जितेन्द्र एम० ए० पढ़ने के लिए कतई राजी नहीं हुआ। संयोग-
वश जितेन्द्र को इलाहाबाद मे एग्लो-बंगाली मिडिल स्कूल में हेडमास्टरी मिल
गई। जहाँ तक मुझे याद है, जितेन्द्र ने इस पद पर साल-भर तक काम किया।
इसके थोड़े ही दिन पहले मैं कॉलेज मे भर्ती होने के लिए इलाहाबाद आया था।
मैंने म्योर सेन्ट्रल कॉलेज मे नाम भी लिखा लिया था लेकिन दो ही दिन के बाद
प्रिंसिपल साहब ने मुझे दफ्तर मे बुलाया और कह दिया कि तुम इस कॉलेज मे
नहीं लिए जा सकते। मैंने संण्ड्स साहब की दुहाई दी लेकिन कुछ बस न चला।
मुझे कुछ खुशी भी हुई और कुछ दुःख भी हुआ । दुःख होना तो स्वाभाविक ही
था, लेकिन मन-ही-मन खुशी भी इसलिए हुई कि चलो इम्तहान देने से छुट्टी
मिली। कही फेल हो जाते तो दुर्दशा की सीमा न रहती। फिर कायस्थ पाठशाला
के प्रिंसिपल डा० ताराचन्द से जाकर मिले । मालूम हुआ कि प्रिंसिपल तारा-
चन्द लाला हरदयाल के साथी हैं एव उनकी उनसे रिश्तेदारी भी है।
मैं जिन विषयों को साथ-साथ लेना चाहता था वे मुझे कायस्थ पाठशाला मे
नहीं मिले। फिर भी मैं भर्ती हो गया। लेकिन दो-चार दिन के बाद छोड़ दिया।
कारण, मुझे अभिप्रेत विषयो का संयोग न मिलने से पढ़ने में उत्साह नहीं मिला।
संभव है, फेल होने का भय भी मन मे छिपा हो।
इसी समय से मैने सर्वान्तःकरण से क्रान्तिकारी दल के पुनः संगठन का काम
प्रारम्भ कर दिया। यह पहले ही बतला चुका हूँ कि अण्डमन से लौटते ही बनारस
में हमारे पुराने साथी श्री जितेन्द्रचन्द्र मुकर्जी हम से आकर मिले। मैं जानता था
कि जितेन्द्रचन्द्र मुकर्जी क्रान्तिकारी दल में सम्मिलित नहीं होंगे। इन्ही के छोटे
226 / बन्दी जीवन
भाई श्री धीरेन्द्रचन्द्र मुकर्जी इलाहाबाद में पढ़ते थे। ये बी० एस-सी० प्रशंसा के
सहित पास करके अब एम० ए० में अर्थशास्त्र लेकर पढ़ने लग गए थे। उनमें
अब राजनीतिक कार्यों में भाग लेने के लिए प्रबल उत्साह पैदा हुआ था। जितेन्द्र
की तरह धीरेन्द्र भी इलाहाबाद में मुझसे मिलने आए। एक ग्राहक को पाकर
दूकानदार जैसे खुश होता है या जैसे किसी चिड़िया को देखकर बाज प्रलुब्ध
होता है, वैसे ही धीरेन्द्र को देखकर मैं मन-ही-मन में प्रसन्न हुआ और प्रलुब्ध
हुआ। मैंने देखा कि सशस्त्र विप्लव आन्दोलन के प्रति धीरेन्द्र को उतना उत्साह
नहीं है जितनी सहानुभूति उनकी अहिंसात्मक असहयोग के प्रति थी। फिर
भी मैंने आशा नहीं छोड़ी। भविष्य में इनके बारे में बहुत कुछ कहना है, इसलिए
यहाँ पर इसकी उपक्रमणिका-मात्र कर दी। जैसे किसी अच्छे ग्राहक को पाकर
भी जब दुकानदार बिक्री नहीं कर पाता है या बाज जैसे अपने शिकार को सामने
पाकर भी कभी-कभी चूक जाता है और विफल मनोरथ हो खिन्न होता है, उसी
प्रकार धीरेन्द्र को अपने दल में सम्मिलित न कर पाने के कारण मैं मन में बहुत
खिन्न हुआ। मैं गोरखपुर वापस लौट आया।
कालेपानी जाने के पहले मैं एक प्रकार से छात्र-जीवन ही व्यतीत कर रहा
था। कमाने की फिक्र नहीं थी। घर का खाता था। मनमाना काम किया करता
था। अब कालेपानी से लौटने के बाद मैंने अपने को उम्र में भी कुछ बड़ा पाया
और दायित्व-बोध भी मैं पहले से कहीं अधिक मात्रा में अनुभव करने लगा।
जीवन में अब ही सर्वप्रथम मैंने यह अनुभव किया कि अपने भोजनाच्छादन के
लिए अब मुझे अपने उपार्जन पर ही निर्भर करना पड़ेगा। मेरी अवस्था इस
समय क़रीब सत्ताईस वर्ष की थी। अर्थोपार्जन के लिए आज तक मैंने अपने को
तैयार नहीं किया था। अब मुझे एक तरफ तो अर्थोपार्जन रूपी संकट का सामना
करना पड़ रहा था, दूसरी तरफ मेरा यह प्रबल आग्रह था कि मैं अपने जीवन के
स्वप्न को वास्तविक जगत् में रूप-दान करूँ। अण्डमन से लौटने के बाद यह
समस्या जैसे गम्भीर रूप से दिखलाई पड़ी थी आज अठारह साल के बाद भी
वही समस्या और भी कठिन एवं गम्भीर रूप में जीवन-पथ में आकर खड़ी हुई
है।
इसी समय सैकड़ों की संख्या में बंगाल के नज़रबन्द कैदी छूटने लगे। इन
सबके सामने भी यही समस्या थी। कलकत्ता हाईकोर्ट के प्रसिद्ध बैरिस्टर श्रीयुत
बी० सी० चटर्जी ने इस समस्या को हल करने के लिए कुछ रुपये इकट्ठे किए
थे। एक बड़ा-सा मकान किराए पर लिया गया था। राजबन्दीगण मुक्त हो-होकर
इस मकान में आकर ठहरते थे। दोनों समय भोजन का अच्छा प्रबन्ध था। यहाँ
पर महीना-पन्द्रह दिन तक लोग ठहर सकते थे। बंगाल के विभिन्न जिलों से
राजबन्दी यहाँ आकर ठहरते थे। श्रीयुत बी० सी० चटर्जी साहब एवं यंगमेन्स
क्रिश्चियन एसोसिएशन की तरफ से यह व्यवस्था की गई थी। आगे चलकर
अर्थोपार्जन के लिए भी इनकी तरफ से सहायता मिलती थी। अखबार में ये सब
मि० सैम्बुड्स और बैरिस्टर चटर्जी / 227
बातें पढ़कर मैं भी बेनियापुकुर लेन में स्थित इस मकान में आकर उपस्थित हुआ ।
बंगाल के तमाम राजबन्दियों से यहाँ पर मिलने का अवसर मिला । यहाँ पर
बीसियों राजबन्दी ऐसे मिले जिनको देखकर मन में किसी प्रकार की भी आशा
का संचार नहीं हुआ । एक ही समय में इस मकान में कम-से-कम पचास राजबन्दी
ठहरते थे । सब जगह मैं घूम-घूमकर देखा करता था कि ये राजबन्दी किस तरह
जीवन व्यतीत कर रहे हैं, क्या सोचते हैं, क्या बातें करते हैं। इनमें से अधिकांश
को मैंने ऐसा पाया कि इनके बारे में मैं यही सोचता रहा कि आखिर यह क्यों
और कैसे राजबन्दी हुए थे। बहुतेरे पुराने साथियों से भी मैं मिला, भविष्य के
बारे में बहुत बातचीत भी हुई, लेकिन सबके सामने वही कठिन समस्या थी जो
कि मेरे सामने थी । फिर भी मैंने यह अनुभव किया कि जैसे प्रबल बाढ़ के कारण
स्रोतस्विनी नदी का पानी प्रचण्ड वेग से बहकर ग्राम और जनपद में बाधा पाकर
ठहर जाता है, उसी प्रकार से विप्लववाद का प्रबल प्रवाह अभी थोड़ी देर के लिए
बाधा पाकर ठहर गया है । समय और अवसर मिलने पर जिस प्रकार बाँध के
टूटने पर बाढ़ आ जाती है उसी प्रकार बंगाल में फिर क्रान्ति की लहर चारों
दिशा में उमड़ पड़ेगी । जिस प्रकार बाढ़ के कारण गृहस्थ विस्थापित हो जाता है
और कहीं ठहरने का आश्रय ढूँढ़ा करता है उसी प्रकार से मुक्ति पाकर विप्लव-
वादी राजबन्दीगण जन-कोलाहलपूर्ण संसार में आकर अपने को नितान्त आश्रय-
हीन अनुभव कर रहे थे । कहीं पर टिकने का, ठहरने का स्थान ढूँढ़ रहे थे ।
पिछले युग में जो लोग विप्लववादी आन्दोलन के कर्णधार थे, जैसे वारीन्द्र
और उपेन्द्रनाथ उनके समान बुद्धि-शक्ति सम्पन्न, विचारशील, प्रतिभावान,
मस्तिष्क परिचालन में तत्पर, शक्तिशाली लेखक एवं कार्यकुशल नेता मैंने अपने
युग में और किसी को नहीं देखा । अण्डमन में बैठे हुए एक दिन वारीन्द्र ने परि-
पूर्ण अवज्ञा के शब्दों में तिरस्कारपूर्वक आँख-मुँह बनाकर यह कहा था : “जो
रास्ता मैंने एक मर्तबा दिखलाया, बंगाल आज भी इतने दिनों तक उसी एक रास्ते
का अनुसरण करता आया । आज भी बंगाल के विप्लववादी कोई नया रास्ता
नहीं निकाल पाए ।” बात कुछ ज्यादा झूठ न थी ।
अभी मेरे पुराने साथियों में से सब नहीं छूटे थे । जो लोग छूट गए थे उनसे
मैं मिला । लेकिन मुझे सन्तोष नहीं हुआ । पहली बात तो यह थी कि जिनसे मैं
मिला, वे पुराने कार्यकर्त्ता तो अवश्य थे, लेकिन मेरे साथ उनके ताल्लुकात गहरे
न थे ।
जब मैं अण्डमन से छूटकर आया था तो श्रीयुत बी० सी० चटर्जी साहब ने
मुझसे एक बात कही थी जिसका उल्लेख यहाँ कर देना आवश्यक है । मैंने
अण्डमन से एक चिट्ठी में ऐसा लिखा था कि यदि ब्रिटिश सरकार भारतवासियों
को यथार्थ में यह मौका देती है कि हम अपने देश की भलाई के लिए जो ठीक
समझें उसे कर सकें तो गुप्त षड्यन्त्र के द्वारा खून-खराबी के रास्ते से आग को
लेकर हम खिलवाड़ क्यों करें। चटर्जी साहब ने मुझसे यह कहा था कि “ब्रिटिश
: 228 / बन्दी जीवन
सरकार सचमुच ऐसा अवसर हमें देगी इसलिए अब तुम्हारा कर्त्तव्य है कि सच्चे
दिल से माण्टेगू के सुधार को लेकर काम करो और गुप्त षड्यन्त्र के रास्ते को
त्याग दो। इसी आशा से और इसी विश्वास से सरकार ने तुम्हें छोड़ दिया है।"
मैंने जवाब में यह कहा था कि "विनायक दामोदर सावरकर ने भी तो अपनी
चिट्ठी में ऐसी ही भावना प्रकट की थी जैसीकि मैंने की है तो फिर सावरकर
को क्यों नहीं छोड़ा गया और मुझी को क्यों छोड़ा गया ? यदि आपकी बात सत्य
होती तो सावरकर को भी छोड़ना चाहिए था। मैं तो यह समझता हूँ कि मेरे
छूटने और सावरकरजी के न छूटने में दो बातें हैं। एक तो यह कि बंगाल के
जनमत ने मेरे जैसे राजनीतिक बन्दियों को छुड़ाने के लिए प्रबल आग्रह किया था।
राजबन्दियों की रिहाई के मूल में यही बात बहुत बड़ी थी। लेकिन महाराष्ट्र में
उतना तीव्र आन्दोलन नहीं हुआ जैसाकि बंगाल में हुआ। दूसरी बात सावरकरजी
के न छूटने में यह थी कि सावरकरजी और उनके दो-चार साथियों की गिरफ्तारी
के बाद महाराष्ट्र में क्रान्तिकारी आन्दोलन समाप्त-सा हो गया था। इसलिए
सरकार को यह डर था कि यदि सावरकर इत्यादि को छोड़ दिया जाय तो ऐसा
नहो कि फिर महाराष्ट्र में क्रान्तिकारी आन्दोलन प्रारम्भ हो जाए। इसके अतिरिक्त
एक बात यह भी थी कि सावरकरजी के द्वारा इग्लैंड के एक अंग्रेज़ की हत्या हुई
थी। इस पर ब्रिटिश सरकार को विशेष क्रोध था। राजबन्दियों की मुक्ति के
समय सरकार ने यह नीति बना ली थी कि जिन पर किसी की हत्या करना या
डकैती करने का अपराध लगाया गया था उन्हें न छोड़ा जाय। इस नीति के
अनुसार भी सावरकर नही छोड़े जा सकते थे। कारण उन पर हत्या करने का
अपराध लगाया गया था।" चटर्जी साहब ने इस पर यह कहा था कि "बात
असल में यह है कि मरहठों के ऊपर अंग्रेजों का बिल्कुल विश्वास नही है। बंगालियों
के ऊपर अंग्रेज़ी सरकार यह भरोसा कर रही है कि बंगाली जैसा कहेंगे, वैसा
करेंगे लेकिन मरहठे ऐसा कभी नहीं कर सकते।" इस बात को सुनकर मैंने मन-
ही-मन कुछ लज्जा अनुभव की और हँसा भी। लज्जा इसलिए अनुभव की कि
राजनीतिक दृष्टि से चटर्जी साहब महाराष्ट्र को उच्च स्थान दे रहे थे और
बंगालियों को भ्रम से ऐसा स्थान दे रहे थे कि राजनीतिक दृष्टि से दूरदर्शितापूर्ण
नहीं कह सकते। हँसा इसलिए कि चटर्जी साहब भी समझ रहे हैं कि अंग्रेज़
सरकार हमें अपने आदर्श को प्राप्त करने के लिए पूर्ण अवकाश देगी। मैं जानता
था कि ब्रिटिश सरकार कभी भी यह मौका नहीं देगी, इसलिए हमें अवश्य क्रांति
का मार्ग ग्रहण करना ही पड़ेगा और खुले तौर पर मैंने चटर्जी साहब से यह कहा
भी था कि यदि ब्रिटिश सरकार हमें पूरा मौका देती है, अपने देश को उस सीमा
तक पहुँचाने के लिए जिस सीमा तक अंग्रेजों ने अपने देश में अपने राष्ट्र को
पहुँचाया है तभी एकमात्र उसी अवस्था में ही यह बात भी सही होगी कि सशस्त्र
क्रांति के मार्ग को छोड़कर भी हम आगे बढ़ सकते हैं।
अबकी बार फिर जब कि मैं बेनियापुकुर के मकान में ठहरा हुआ था तो चटर्जी
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चेम्सफोर्ड सुधार और असहयोग
जेल में बैठे हुए भी हम यह देख रहे थे कि माण्टेगू-चेम्सफोर्ड सुधार के बारे
में हमारे नेताओं में तीन प्रकार की मनोवृत्ति दिखाई दे रही थी। एक तो
मदनमोहन जी मालवीय इत्यादि नरम मनोवृत्तिवा' नेतागण यह चाहते थे कि
बिना किसी प्रकार की कोई उलझन पैदा किये पूर्ण शक्ति से इस सुधार को काम
में लाया जाय। दूसरी मनोवृत्ति के कुछ नेता यह चाहते थे कि इस सुधार को
एकदम ठुकरा दिया जाय। तीसरी मनोवृत्तिवाले कुछ ऐसे नेता भी थे जो कि
इस नए सुधार से फायदा तो उठाना चाहते थे लेकिन वे यह भी चाहते थे कि पूर्ण
स्वतन्त्रता के आदर्श को प्राप्त करने के लिए भी राजनीतिक आन्दोलन को ऐसे
मार्ग पर चलाया जाय जिससे देशवासी इस नये सुधार से सन्तुष्ट न होकर आगे
बढ़ने के लिए तैयार हों।
जेल में बैठे-बैठे विभिन्न प्रदेश के राजबन्दियों में यह हाड़ लगी रहती थी
कि कौन-सा प्रान्त सबसे उग्र मनोवृत्ति का परिचय देता है, अर्थात् माण्टेगू-चेम्स-
फोर्ड के सुधार को कौन-सा प्रान्त सबसे उग्र रूप में ठुकराता है। इस बात को
देखने के लिए अण्डमन के राजबन्दियों में विशेष उत्सुकता रहती थी। कभी-कभी
क्रान्तिकारी होने पर भी हम यह भूल जाते थे कि इन नये सुधारों को ठुकरा देना
एक बात है और उनका सदुपयोग करना और बात है।
अण्डमन से लौटकर हमारे सामने वही प्रश्न फिर आ खड़ा हुआ। बी० सी०
चटर्जी साहब उन व्यक्तियों में से थे जो क्रान्तिकारी आन्दोलन की आवश्यकता
समझते थे, लेकिन इन नए सुधारों को ठुकरा देना नही चाहते थे। महात्मा गांधी
एक समय बिलकुल मॉडरेट थे, लेकिन समय के फेर से वे क्रमशः मॉडरेट नीति
को त्याग रहे थे। सम्भव है आज भी महात्मा गांधी मॉडरेट मनोवृत्ति को सम्पूर्ण-
तया त्याग नहीं पाए हों। सी० आर० दास क्रान्तिकारी न होने पर भी क्रान्ति-
कारियों के प्रति गहरी सहानुभूति रखते थे। उन्हें यह सहानुभूति जितनी उनके
त्याग को देखकर होती थी उतनी ही राजनीतिक दृष्टि से भी होती थी, क्योंकि
वे यह समझते थे कि क्रान्तिकारी आन्दोलन के कारण भारत के दूसरे सब आन्दो-
लनों को बल पहुँचता है। तिलक और सी० आर० दास क़रीब-क़रीब एक ही
मनोवृत्ति के थे। सी० आर० दास को अभी राजनीति में आए हुए थोड़े ही
चेम्सफोर्ड सुधार और असहयोग / 231
दिन हुए थे। अलीपुर बम केस में श्री अरविन्द घोष की पैरवी करते समय उनमें
कुछ-कुछ क्रान्तिकारी भावनाएं आने लगी थीं।
तिलक और दास माण्टेगू-चेम्सफोर्ड सुधारों को ठुकराना भी नहीं चाहते थे
और उसे पूर्ण रूप से स्वीकार भी नहीं करना चाहते थे। मोतीलालजी तो पहले
मॉडरेट थे लेकिन उनके ऊपर उनके पुत्र का प्रभाव क्रमशः बढ़ रहा था। इन सब
विभिन्न नेताओं की परस्पर विरोधी मनोवृत्ति के संघर्ष में आकर भारत की
राजनीति एक विचित्र मार्ग पर चल पड़ी थी। महात्मा गांधी की मनोवृत्ति न तब
क्रान्तिकारी थी और न अब ही है। लेकिन उनके महान् व्यक्तित्व के कारण
भारत की राजनीति पर उन्हीं का प्रभाव सबसे अधिक है।
महात्माजी के नेतृत्व में यह तय हो गया कि माण्टेगू-चेम्सफोर्ड सुधार एकदम
ठुकरा दिया जाय। बंगाल के क्रान्तिकारियों में से अधिकांश की यह राय थी कि
इस नये सुधार को जहाँ तक हो सके, काम में लाया जाय। बी० सी० चटर्जी की
भी यही राय थी। लेकिन इस समय मुक्त राजबन्दीगणों ने एक साथ बैठकर
किसी नीति का निर्णय नही किया था। अभी कुछ प्रभावशाली क्रान्तिकारी नेता
मुक्त नही हुए थे। भारत के राजनीतिक आन्दोलन का नेतृत्व इसी समय से
क्रमशः महात्मा गांधी के हाथ में अनिवार्य रूप से जा रहा था। क्रान्तिकारीगण
इस बात को पसन्द नही कर रहे थे। सी० आर० दास भी महात्मा जी के पक्ष
में नही थे। तिलक, पाल, सी० आर० दास, लाजपतराय इत्यादि पुराने गर्म दल
के नेतागण महात्माजी के साथ नही थे।
अण्डमन से लौटने के बाद मैंने उत्तर भारत में जो क्रान्तिकारी आन्दोलन
की सृष्टि की थी उसको समझने के लिए एक ओर तो उस समय की राजनीतिक
परिस्थिति को समझना आवश्यक है, दूसरी ओर कुछ ऐसी बातें हैं जिनका बिना
समझे 1920 के बाद के विप्लववादी आन्दोलन को समझना कुछ कठिन है।
इसका एक कारण यह है कि भारत का विप्लववादी आन्दोलन किसी एक ही
संस्था के द्वारा परिचालित नही हो रहा था। सन् 1920 के बाद मैने किस तरह
से फिर क्रान्तिकारी आन्दोलन के कार्य को हाथ मे लिया, इसको समझने के लिए
यह जानना भी आवश्यक है कि मैंने किसी पुरानी संस्था के साथ मिलकर काम
किया या नही, और यदि किसी संस्था के साथ मैने सहयोग किया तो उस संस्था
के बारे मे भी कुछ बातें जान लेना आवश्यक है। इसके अतिरिक्त यह भी समझ
लेना चाहिए कि भारत के गुप्त आन्दोलन मे भी कुछ दलबन्दियां थी और इन
दलबन्दियों के कारण मनुष्य के चरित्र मे कितनी ही त्रुटियां अनिवार्य रूप से आ
जाती हैं। इसका परिचय मिलने से भी कुछ लाभ होगा।
अब थोडी-सी पुरानी बातें बतला देना आवश्यक है। सन् 1908 में
कलकत्ता मे मेरे पूज्य पिताजी की मृत्यु हुई थी। सन् 1909 से मैं बनारस मे
रहने लग गया। जब मैं कलकत्ता मे रहता था तभी प्रसिद्ध अनुशीलन समिति की
कलकत्ता शाखा में भरती हो गया था। बनारस मे आकर मैंने इस समिति की
232 / बन्दी जीवन
एक शाखा अपने यहाँ खोल दी। इस अनुशीलन समिति का इतिहास लिखने की
आवश्यकता यहाँ नहीं है। इतना ही कह देना पर्याप्त है कि बंगाल की अनुशीलन
समिति की दो शाखाएँ थीं—एक का केन्द्र था ढाका, दूसरी का केन्द्र था
कलकत्ता। मैं कलकत्ता केन्द्र के अन्तर्गत था। बनारस में जब मैं इस समिति की
शाखा खोल चुका था तो पहले अलीपुर काँन्सपरेसी के बाद बंगाल की सरकार
ने इस समिति को अनियमित घोषित कर दिया था। इसलिए हमें भी बनारस
की समिति का नाम बदल देना पड़ा। अनुशीलन समिति से बदलकर अब इसका
नाम हो गया युवक सम्मेलन। लेकिन भीतर-ही-भीतर मैं कलकत्ता की अनुशीलन
समिति से सम्बन्ध रखना चाहता था। लेकिन घटना-चक्र के फेर में ऐसा हो नहीं
पाया।
उधर बारीन्द्र आदि के प्रयत्न विफल हो जाने के बाद उसी संस्था के जो
अवशिष्ट आदमी थे उनके कार्यक्रम का केन्द्र कलकत्ता के पास फ्रांसीसी बस्ती
चन्द्रनगर बन गया था। इस केन्द्र से आजकल के प्रसिद्ध नेता श्री रासबिहारी
बोस देहरादून पहुँचे। श्री रासबिहारी अपनी कार्यकुशलता के द्वारा पंजाब में
एक अच्छा दल बना चुके थे।
ढाका अनुशीलन समिति के नेता श्री पुलिनबिहारीदास थे। पुलिनबिहारी
को सात साल की कालेपानी की सजा हो गई थी। पुलिनबिहारी के बाद ढाका
अनुशीलन समिति के जो लोग नेता के स्थान में काम कर रहे थे, उन्होंने अपने
काम की गरज से चन्द्रनगर के दल के साथ सहयोग से काम करना प्रारम्भ कर
दिया। इस समय चन्द्रनगर दल के नेता थे श्रीशिरीषचन्द्र घोष और मोतीलाल
राय। ढाका अनुशीलन समिति मोतीलालराय के साथ मिलकर काम तो करती थी
लेकिन उस समिति के नेतागण अपने दल के संगठन को सम्पूर्ण रूप से स्वतन्त्र
रखे थे। चन्द्रनगर का दल बंगाल में कुछ बड़ा न था। लेकिन रासबिहारी ने
पंजाब में अपना पूरा-पूरा संगठन किया था।
संयोगवश घूमते-घूमते मैं चन्द्रनगर के दल में आकर शामिल हो गया था। मैं
पछाहँ में रहता था, इसलिए रासबिहारी के अधीन मुझे रखा गया। श्री रास-
बिहारी एक अत्यन्त कार्यकुशल नेता थे। चन्द्रनगर में बम बनाने का केन्द्र था,
इन सब कारणों से ढाका अनुशीलन समिति के साथ रासबिहारी का अत्यन्त
घनिष्ठ सम्बन्ध हो गया था और रासबिहारी के जरिए से ढाका अनुशीलन समिति
के मुख्य-मुख्य कार्यकर्त्ताओं के साथ मेरा भी घनिष्ठ परिचय हो गया था। यह
सब होने में समय लगा था। ढाका अनुशीलन समिति के साथ चन्द्रनगर के दल
का जो सहयोग हो रहा था उसकी एक शर्त यह थी कि उत्तर भारत में ढाका
समिति स्वतन्त्र रूप से अपने किसी आदमी को नहीं भेजेगी। उत्तर भारत में जो
काम होगा उसका समस्त उत्तरदायित्व रासबिहारी पर रहेगा। यदि ढाका
समिति के कुछ आदमी रहें तो उनका भी सम्बन्ध रासबिहारी के साथ ही रहेगा,
ढाका के साथ नहीं। मैं ढाका समिति के कुछ सदस्यों के जरिए से चन्द्रनगर के
चेम्सफोर्ड सुधार और असहयोग / 233
दल में आ पहुँचा । ऊपर कही शर्त के अनुसार मुझे भी रासबिहारी के अधीन
रहकर काम करना पड़ा ।
उस समय ढाका अनुशीलन समिति के सबसे बड़े-बड़े कार्यकर्त्ता थे :
श्री प्रतुलचन्द्र गंगोली, श्री त्रैलोक्यनाथ चक्रवर्ती, श्री नरेन्द्रनाथ सेन, श्री रमेश-
चन्द्र आचार्य, श्री रमेशचन्द्र चौधरी और श्री नलिनीकिशोर गुह । इनमें से एक
नरेन्द्रसेन को छोड़कर और सबसे मैं खूब परिचित था ।
अण्डमन मे जाने के पहले गिरफ्तारी के दिन तक, मेरे साथ ढाका अनुशीलन
समिति का अच्छा सहयोग था । यह बात तो थी कि रासबिहारी के जापान चले
जाने के बाद ढाका अनुशीलन समिति के बचे-बचाए नेताओ ने अपनी सब बाते
मुझे बता दी थी । लेकिन उनके आचरण से मुझे यह अनुभव हो रहा था कि मुझे
पूर्ण रूप से अपनी सब बातें बताने मे ये धीरे-धीरे क्रमशः आगे बढ़ रहे थे । अतः
उत्तर भारत का दल और ढाका अनुशीलन समिति क्रमशः एक-दूसरे के साथ
अधिक-से-अधिक सहयोग करने के लिए आगे बढ़ रहे थे । ऐसी अवस्था मे ही मै
गिरफ्तार हो गया था । अब अण्डमन से लौटने के बाद ढाका समिति के नेताओ
के साथ भली प्रकार से विचार-विमर्श करने के पहले मैं कोई अलग कार्यक्रम
बनाना नही चाहता था ।
बनारस केस मे गिरफ्तार होने के बहुत पहले भी मैंने बहुत दफा बगाल के
विभिन्न क्रान्तिकारी दलों को मिलाने की बहुत चेष्टा की थी, लेकिन कृतकार्य
नही हुआ था । अब अण्डमन से लौटने के बाद भी मैंने फिर चाहा कि भारत के
समस्त क्रान्तिकारी दल एक साथ मिलकर एक शक्तिशाली संगठन बनाएं ।
बेनियापुकुर के मकान मे रहते समय बगाल के विभिन्न क्रान्तिकारी नेताओ के
साथ मैं मिलता रहा । दूसरे दलो के प्रमुख नेताओ मे से मै जिन्हें अच्छी तरह से
जानता था, वे थे श्री जदुगोपाल मुकर्जी, श्री विपिनचन्द्र गगोली, श्री मनोरंजन
गुप्त, श्री अरुणचन्द्र गुह इत्यादि । उस समय एम० एन० राय नरेन्द्रनाथ
भट्टाचार्य के नाम से परिचित थे । ये सब उस समय बगाल के प्रसिद्ध क्रान्तिकारी
श्री यतीन्द्रनाथ मुकर्जी के अधीन काम कर रहे थे । अण्डमन से छूटने के बाद मैं
इन सब परिचित नेताओ से मिला था ।
एक तरफ महात्मा गांधी अपने सत्याग्रह आन्दोलन के लिए तैयारी कर रहे
थे । दूसरी तरफ बगाल के क्रान्तिकारी नेतागण अपने लेख और पुस्तकादि द्वारा
क्रान्ति की भावना फैलाने का प्रयत्न कर रहे थे । श्री अरविन्द के बाद बंगाल मे
उल्लेख-योग्य नेता खुले आन्दोलन मे और कोई नही रह गए थे । सी० आर०
दास, विपिनचन्द्रपाल, व्योमकेश चक्रवर्ती और कुछ हद तक बी० सी० चटर्जी
और श्याम सुन्दर चटर्जी भी खुले आन्दोलन मे यथाशक्ति भाग ले रहे थे । उधर
महाराष्ट्र मे तिलक एवं पजाब मे लाला लाजपतराय जीवित थे । श्री मदनमोहन
मालवीय की गिनती नरम दल वालों में थी । 'पं० जवाहरलाल नेहरू क्रमशः खुले
आन्दोलन मे भाग लेने लगे थे । पुत्र के प्रभाव के कारण मोतीलाल नेहरू भी
234 / बन्दी जीवन
क्रमशः उग्र दल की तरफ झुकने लगे थे ।
मेरी गिरफ्तारी के पहले ही महात्माजी भारत में आ चुके थे। उन्होंने खुले-
आम क्रान्तिकारियों से यह आवेदन किया था कि वे गुप्त मार्ग को छोड़कर यदि
महात्माजी के मार्ग में आ जायें तो देश का बहुत कल्याण हो। सन् 1919 के
सत्याग्रह आन्दोलन के बाद भारत के राजनीतिक क्षेत्र में महात्माजी ने अपना
एक विशिष्ट स्थान प्राप्त कर लिया था। जलियांवाला बाग की घटना के बाद
मोतीलाल नेहरू भी क्रमशः महात्माजी की तरफ झुक गए थे।
महात्माजी के व्यक्तिगत चरित्र के साथ न सी० आर० दास का ही मुका-
बिला हो सकता था और न मोतीलाल नेहरू का ही। उनके मुकाबले में विशिष्ट
चरित्रवान नेता अगर कोई थे तो वे लोकमान्य तिलक और लाला लाजपतराय
ही थे। विपिनचन्द्रपाल का प्रभाव उनकी व्यक्तिगत दुर्बलता के कारण बहुत
घट रहा था। इंग्लैण्ड से लौटने के बाद उनकी जो गिरफ्तारी हुई और उस
गिरफ्तारी के समय पालजी ने जो दुर्बलता दिखलाई इसके कारण उनका नेतृत्व
समाप्त-सा हो रहा था। सी० आर० दास में कुछ विशेषताएँ थीं जो कि क्रमशः
परिस्फुट होने लगीं।
श्रीयुत सी० आर० दास एक ओर बड़े भारी बैरिस्टर थे, दूसरी ओर वे
बड़े ही हृदयवान व्यक्ति थे। एक तरफ जैसे उन्होंने लाखों रुपये कमाए, दूसरी
तरफ वैसे ही उन्होंने दान में, दुःखी जनों की सहायता में, एवं भोग-ऐश्वर्य में भी
अपनी कमाई खूब खर्च की। उनके पिता बारह हज़ार रुपया कर्ज रखकर दुनिया
से चल बसे थे। कर्जदार सी० आर० दास से कानून की सहायता से यह रुपया
वसूल नहीं कर सकते थे। सी० आर० दास नेईमानदारी की गरज से, इन्सानियत
के तकाजे के कारण, विलायत में अपना अध्ययन समाप्त करने के बाद स्वदेश में
लौटकर कर्जदारों का तमाम रुपया धीरे-धीरे वापस कर दिया। सी० आर० दास
के चरित्र में जो दृढ़ता एवं बल था उसके मूल में पराये दुख से कातर होना एवं
न्यायनिष्ठा थी और उसके साथ अपने संकल्प को कार्यरूप में परिणत करने की
प्रबल शक्ति भी थी। पहले अलीपुर बम कॉन्सपरेसी केस के समय श्री अरविन्द
की पैरवी करते हुए भारत के क्रान्तिकारी आन्दोलन के साय सी० आर० दास का
कुछ परिचय हुआ था।
यदि चाहते तो श्री बी० सी० चटर्जी भी सन् 1920 से बंगाल के प्रसिद्ध
नेता बन जाते, लेकिन चटर्जी साहब राजनीतिक क्षेत्र में सी० आर० दास की
तरह अवतीर्ण नहीं हुए। श्री अरविन्द के बाद बंगाल में सी० आर० दास ने ही
राजनीतिक आन्दोलन को अपने हाथ में लिया।
बंगाल के खुले आन्दोलन के प्रमुख नेतागण भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन
के निन्दक नहीं थे। क्रान्तिकारी आन्दोलन के आतंकवाद के प्रति अन्तर में सहानु-
भूति रखते हुए भी ये लोग खुले तौर पर आतंकवाद की निन्दा तो करते थे, लेकिन
कटूक्ति नहीं करते थे। स्पष्ट मालूम होता था कि इन लोगों की सहानुभूति
चेम्सफोर्ड सुधार और असहयोग / 235
क्रान्तिकारी दल के प्रति है। और कभी-कभी तो क्रान्तिकारियों को फांसी होने
के अवसर पर खुले आन्दोलन के ये नेता इस प्रकार से समवेदना के साथ वीरत्व
की मर्यादा को अक्षुण्ण रखते हुए ऐसी ही आलोचना करते थे जिसके परिणामतः
क्रान्तिकारी भावना को प्रोत्साहन ही मिलता था।
भारत के दूसरे प्रान्तों में अभी तक खुला राजनीतिक आन्दोलन कहने लायक
कुछ भी नहीं हुआ था। सम्भवतः स्वर्गीय लाजपतराय के कारण पंजाब प्रान्त
बंगाल को छोड़कर भारत के अन्य प्रान्तों से अधिक जागृत था। इसलिए हम
देखते हैं कि पंजाब और बंगाल में क्रान्तिकारी आन्दोलन जैसा पनपा ऐसा और
किसी प्रान्त में नहीं पनपा। बम्बई प्रान्त में राजनीतिक जागरण यथेष्ठ था।
लेकिन लोकमान्य तिलक के बाद बम्बई प्रान्त में किसी उपयुक्त नेता का आविर्भाव
नहीं हुआ। लोकमान्य तिलक छः साल तक मण्डला में कैद रहे। इस बीच महा-
राष्ट्र और गुजरात ने भारत के राजनीतिक आन्दोलन में विशेष महत्त्वपूर्ण भाग
नहीं लिया। उद्योग-धन्धों की उन्नति बम्बई प्रान्त में जैसी थी ऐसी और किसी
प्रान्त में नहीं थी। लोकमान्य तिलक के नेतृत्व में महाराष्ट्र भारत के दूसरे प्रान्तों
से पीछे नहीं था। लेकिन तिलक के बाद उपयुक्त नेता न रहने के कारण महाराष्ट्र
एवं गुजरात की अग्रगति रुक-सी गई। युक्त प्रान्त में अभी पं० जवाहरलालजी
का अभ्युदय नहीं हुआ था। बिहार में अभी तक न कोई राजनीतिक आन्दोलन ही
हुआ था और न किसी प्रभावशाली नेता का ही आविर्भाव हुआ था। सम्भवतः
बिहार प्रान्त भारत में सबसे पिछड़ा हुआ प्रान्त था। मद्रास प्रान्त की हालत भी
बिहार से कुछ अधिक अच्छी न थी।
लेकिन जब से महात्माजी राजनीतिक क्षेत्र में अवतीर्ण हुए, भारत की
हालत एकदम पलट गई। अभी तक राजनीतिक और क्रान्तिकारी आन्दोलन के
कारण भारत में थोड़ी-बहुत जागृति हो चुकी थी। अण्डमन जाने के पहले युक्त
प्रान्त के शहर के आस-पास के देहातों में भी श्री अरविन्द का नाम मैंने सुना था।
बम पार्टी के नाम से भारत के क्रान्तिकारी आन्दोलन का परिचय जन साधारण
को प्राप्त हो चुका था।
इसके अतिरिक्त यूरोपियन महायुद्ध के कारण भी संसार-भर की हवा पलट
गई थी। भारत में भी आम जनता में इसका असर पहुँचा। इस अभूतपूर्व परि-
वर्तन का परिचय तब मिला जब महात्मा गांधी अपने कार्यक्रम को लेकर भारत
के राजनीतिक क्षेत्र में कूद पड़े।
महात्मा गांधी भारत के क्रान्तिकारियों के प्रति विशेष रूप से आकृष्ट हुए
थे। इनके त्याग और इनके साहस से महात्मा जी समझ गए थे कि ऐसे ही त्याग
और साहस के साथ यदि भारत के राजनीतिक नेतागण कार्यक्षेत्र में अवतीर्ण न
हुए तो उनके काम का असर प्रजा या सरकार पर कुछ भी नहीं पड़ेगा। क्रान्ति-
कारी आन्दोलन को दबाने के लिए रोलट कमेटी की एक भीषण योजना प्रकाशित
हो चुकी थी। महात्मा गांधी ने इस आयोजना के विरुद्ध तीव्र रूप से आन्दोलन
236 / बन्दी जीवन
शुरू किया। इस आन्दोलन को शुरू करने के पहले चम्पारन में महात्माजी ने
अपनी शक्ति की परीक्षा कर ली थी। देखने में और कार्य में भी बिहार प्रान्त
भारत में सबसे पिछड़ा हुआ प्रान्त था। चम्पारन बिहार प्रान्त में ही था। इस
चम्पारन के जिले में महात्माजी ने सर्वप्रथम सक्रिय किन्तु शान्त विप्लव प्रारम्भ
किया था और यही देखा गया कि जिस प्रान्त को पिछड़ा हुआ समझा गया था
वह भी महात्माजी के नेतृत्व में सुप्रतिष्ठित ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध विद्रोह
करने को तैयार हो गया। महात्माजी ने अपने आत्म-चरित्र में इस बात को स्वी-
कार किया है कि सन् 1919 में पहली दफा व्यापक रूप से सत्याग्रह आरम्भ करने
के पहले महात्माजी पंजाब नहीं गए थे एवं उस प्रदेश में उन्होने अपने आन्दोलन
का कोई प्रचार भी नहीं किया था, इसलिए महात्माजी ने यह आशा नहीं की थी
कि पंजाब देश में भी उनका सत्याग्रह आन्दोलन जरा भी जोर पकड़ेगा। ये बातें
महात्माजी की आपबीती में मिलेंगी। युक्त प्रान्त में भी महात्माजी ने अपने
सिद्धान्त का कुछ भी प्रचार नहीं किया था। मुझे याद है, मेरे अण्डमन जाने के
पहले मोतीलालजी ने इलाहाबाद में महात्माजी के South Africa (दक्षिण
अफ्रीका) आन्दोलन के सिलसिले में सभा की थी। उस सभा में न अधिक आदमी
आये थे और न कोई जोश दिखलाई दे रहा था। लेकिन महायुद्ध के बाद महात्मा
जी जब अपने नवीन कार्यक्रम को लेकर मैदान में कूद पड़े तो समग्र भारत में
उनके आह्वान की सजीव प्रतिध्वनि सुनाई पड़ी। महात्माजी ने स्वीकार किया है
कि समग्र भारत ने जिस प्रकार से महात्माजी के आह्वान का उत्सुकता के साथ
प्रत्युत्तर दिया उसकी आशा उन्हें न थी। समग्र देश मानो उपयुक्त नेता की
अपेक्षा कर रहा था। महात्माजी जैसे महान् नेता यदि कार्यक्षेत्र में अवतीर्ण न
होते तो शायद ही भारत में आज की जैसी जागृति होती। उपयुक्त नेतृत्व के
कारण भारत की जन-शक्ति का परिचय मिला।
महात्माजी के आन्दोलन के प्रारम्भ होने के पहले ही भारत की जनता में
जागृति पैदा हुई थी। और यह जागृति उत्तरोत्तर ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध उग्र
से उग्र रूप धारण कर रही थी। यदि महात्माजी की तरह महाप्रतिभावान नेता
भी जनता के इस रुख के विरुद्ध जाते तो उन्हें भी पराजय स्वीकार करनी पड़ती।
इस बात का भी प्रमाण महात्माजी की आपबीती में ही है। जिस चम्पारन जिले
में महात्माजी अपना विद्रोह आन्दोलन सफल रूप से चला पाए उसी चम्पारन
जिले में जब महात्माजी ने अंग्रेज सरकार को मदद देने की गरज से अपने
आदमी भेजे तो जनता ने महात्माजी का साथ नहीं दिया। यहाँ तक कि महात्माजी
के आदमियों को गाँव-गाँव जाने के लिए कोई सवारी तक नहीं मिली। अर्थात्
जनता मे जागृति हो चुकी थी। महात्माजी ने उस जागृति से लाभ उठाया और
भारत का प्रभूत कल्याण किया। भारत के अन्य नेतागण ऐसा नहीं कर पाए। यही
महात्माजी की एक महान् विशेषता है।
1919 के व्यापक सत्याग्रह आन्दोलन के परिणामतः अमृतसर में जलियां-
चेम्सफोर्ड सुधार और असहयोग / 237
वाला बाग का नृशंस गोलीकांड हो गया। समस्त सभ्य संसार स्तब्ध रह गया।
अंग्रेजों के साथ अमेरिकनों की सन्धि थी। ऐसी परिस्थिति में ही भारत के हम
बहुत-से राजबन्दी मुक्त किये गए। इसी परिस्थिति में अण्डमन से मुक्त होकर मैं
भी भारत में वापस आया।
मुक्त राजबन्दियों में से बहुत-से राजनीति से अलग होकर गृहकार्य में लग
गए। लेकिन ऐसे भी बहुत-से रहे जिनका यह विश्वास बना रहा कि सशस्त्र
क्रान्ति को छोड़कर और किसी रास्ते से भारत को स्वतन्त्रता प्राप्त नहीं हो
सकती। बेनियापुकुर के मकान में रहते समय बंगाल के विभिन्न क्रान्तिकारी
दलों के सदस्यों से मैं मिला। लेकिन अभी तक बहुत-से क्रान्तिकारी नेतागण
मुक्त नहीं हुए थे। जैसे किसी विशाल नगर में आग लग जाय अथवा भीषण
बवंडर से यदि कोई शहर विध्वस्त हो जाय या यदि कोई प्रदेश भीषण बाढ़ के
कारण अस्त-व्यस्त हो जाय और कोई इन सब दुर्घटनाओं के बाद उन सब प्रान्तों
की जो दशा होती है उसे देखे, बस भारत के क्रान्तिकारी दलों की भी इन दिनों
वही अवस्था हो रही थी। जैसे भीषण भूकम्प के बाद पुनः निर्माण कार्य प्रारम्भ
होता है वैसे ही भारत में फिर से क्रान्तिकारी आन्दोलन का पुनर्गठन प्रारम्भ
हुआ।
7
जमशेदपुर में मजदूर संगठन
सन् 1920 में महात्माजी का सत्याग्रह आन्दोलन समाप्त हो जाने के बाद
ही मैंने 'पूर्ण रीति से विप्लव दल का संगठन प्रारम्भ किया था। लेकिन इसमें
कितनी उलझनों का सामना करना पड़ा उसका कुछ हाल यहाँ दे देना आवश्यक
है। जैसाकि मैंने पहले ही उल्लेख कर दिया है। मेरी तरह से दूसरे अनेक मुक्त
राजबन्दियों के सामने भी सबसे कठिन प्रश्न यही था कि कैसे अपनी आर्थिक
स्वतन्त्रता प्राप्त करें। कभी सोचा किताब की दुकान खोलें जिससे पढ़ने-लिखने की
फुरसत रहे। विप्लव के कार्य को चलाने के लिए किताबों की दुकान उपयोगी
होगी। लेकिन इसके लिए बहुत रुपयों की आवश्यकता थी। इसलिए इस ख्याल
को छोड़ना पड़ा। कभी सोचा छापाखाना खोलें। छापेखाने की सहायता से
प्रचार कार्य का भी काम खूब चलेगा। पुस्तकें भी प्रकाशित की जाएँगी। लेकिन
इसके लिए भी कम-से-कम दस हजार रुपयों की आवश्यकता थी। आखिरकार
इस ख्याल को भी छोड़ना पड़ा। फिर सोचा एक बिसातखाने की दुकान खोल
दें। सोचा कि शायद एक-दो हजार रुपये की लागत में ऐसी दुकान खोल सकते
हैं। पिता की कमाई के कुछ रुपये माँ के पास थे। मेरी माँ और मेरे सब भाई
मेरे ऊपर अत्यधिक जोर डाल रहे थे कि मैं किसी काम में लग जाऊँ। सी०
आई० डी० के डिप्टी इन्स्पेक्टर जनरल ने हमारे मामू को लिखा था कि मुझे ऐसे
काम में लगाया जाय कि जिससे दूसरे किसी उलझन मे पड़ने का अवकाश ही
न मिले। इसलिए सी० आई० डी० जी० यह चाहते थे कि मेरे लिए जमीन ले
ली जाय और मैं खेती के काम में लगा दिया जाऊँ। मैंने इस काम को स्वीकार
नहीं किया। आखिर बिसातखाने की दुकान खोलने की ठहरी। वह कहाँ खोली
जाए ? यदि मौके का स्थान न मिले तो दुकान का खोलना ही व्यर्थ है।
बिसातखाने की दुकान के लिए मौका ढूंढते-ढूंढ़ते कलकत्ता शहर को छान
डाला। सुबह से शाम तक जगह की तलाश में घूमते थे। घूमते-घूमते थक जाते
थे। एक दिन क्लान्त होकर दिल में ऐसा ख्याल पैदा हुआ कि यदि मैं औरत
होती तो मेरे लिए जीविका उपार्जन करने का कम-से-कम एक रास्ता तो खुला
रहता ही जैसाकि मैने कलकत्ता की बीसों सड़कों के जंगले पर बैठी हुई औरतों
को देखा था। मेरी आँखों में आँसू आ जाते थे। मैं सोचा करता था आखिर