बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचेम्सफोर्ड सुधार और असहयोग / 231
दिन हुए थे। अलीपुर बम केस में श्री अरविन्द घोष की पैरवी करते समय उनमें
कुछ-कुछ क्रान्तिकारी भावनाएं आने लगी थीं।
तिलक और दास माण्टेगू-चेम्सफोर्ड सुधारों को ठुकराना भी नहीं चाहते थे
और उसे पूर्ण रूप से स्वीकार भी नहीं करना चाहते थे। मोतीलालजी तो पहले
मॉडरेट थे लेकिन उनके ऊपर उनके पुत्र का प्रभाव क्रमशः बढ़ रहा था। इन सब
विभिन्न नेताओं की परस्पर विरोधी मनोवृत्ति के संघर्ष में आकर भारत की
राजनीति एक विचित्र मार्ग पर चल पड़ी थी। महात्मा गांधी की मनोवृत्ति न तब
क्रान्तिकारी थी और न अब ही है। लेकिन उनके महान् व्यक्तित्व के कारण
भारत की राजनीति पर उन्हीं का प्रभाव सबसे अधिक है।
महात्माजी के नेतृत्व में यह तय हो गया कि माण्टेगू-चेम्सफोर्ड सुधार एकदम
ठुकरा दिया जाय। बंगाल के क्रान्तिकारियों में से अधिकांश की यह राय थी कि
इस नये सुधार को जहाँ तक हो सके, काम में लाया जाय। बी० सी० चटर्जी की
भी यही राय थी। लेकिन इस समय मुक्त राजबन्दीगणों ने एक साथ बैठकर
किसी नीति का निर्णय नही किया था। अभी कुछ प्रभावशाली क्रान्तिकारी नेता
मुक्त नही हुए थे। भारत के राजनीतिक आन्दोलन का नेतृत्व इसी समय से
क्रमशः महात्मा गांधी के हाथ में अनिवार्य रूप से जा रहा था। क्रान्तिकारीगण
इस बात को पसन्द नही कर रहे थे। सी० आर० दास भी महात्मा जी के पक्ष
में नही थे। तिलक, पाल, सी० आर० दास, लाजपतराय इत्यादि पुराने गर्म दल
के नेतागण महात्माजी के साथ नही थे।
अण्डमन से लौटने के बाद मैंने उत्तर भारत में जो क्रान्तिकारी आन्दोलन
की सृष्टि की थी उसको समझने के लिए एक ओर तो उस समय की राजनीतिक
परिस्थिति को समझना आवश्यक है, दूसरी ओर कुछ ऐसी बातें हैं जिनका बिना
समझे 1920 के बाद के विप्लववादी आन्दोलन को समझना कुछ कठिन है।
इसका एक कारण यह है कि भारत का विप्लववादी आन्दोलन किसी एक ही
संस्था के द्वारा परिचालित नही हो रहा था। सन् 1920 के बाद मैने किस तरह
से फिर क्रान्तिकारी आन्दोलन के कार्य को हाथ मे लिया, इसको समझने के लिए
यह जानना भी आवश्यक है कि मैंने किसी पुरानी संस्था के साथ मिलकर काम
किया या नही, और यदि किसी संस्था के साथ मैने सहयोग किया तो उस संस्था
के बारे मे भी कुछ बातें जान लेना आवश्यक है। इसके अतिरिक्त यह भी समझ
लेना चाहिए कि भारत के गुप्त आन्दोलन मे भी कुछ दलबन्दियां थी और इन
दलबन्दियों के कारण मनुष्य के चरित्र मे कितनी ही त्रुटियां अनिवार्य रूप से आ
जाती हैं। इसका परिचय मिलने से भी कुछ लाभ होगा।
अब थोडी-सी पुरानी बातें बतला देना आवश्यक है। सन् 1908 में
कलकत्ता मे मेरे पूज्य पिताजी की मृत्यु हुई थी। सन् 1909 से मैं बनारस मे
रहने लग गया। जब मैं कलकत्ता मे रहता था तभी प्रसिद्ध अनुशीलन समिति की
कलकत्ता शाखा में भरती हो गया था। बनारस मे आकर मैंने इस समिति की