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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 234, कुल 408 में से

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पृष्ठ 234

232 / बन्दी जीवन
एक शाखा अपने यहाँ खोल दी। इस अनुशीलन समिति का इतिहास लिखने की
आवश्यकता यहाँ नहीं है। इतना ही कह देना पर्याप्त है कि बंगाल की अनुशीलन
समिति की दो शाखाएँ थीं—एक का केन्द्र था ढाका, दूसरी का केन्द्र था
कलकत्ता। मैं कलकत्ता केन्द्र के अन्तर्गत था। बनारस में जब मैं इस समिति की
शाखा खोल चुका था तो पहले अलीपुर काँन्सपरेसी के बाद बंगाल की सरकार
ने इस समिति को अनियमित घोषित कर दिया था। इसलिए हमें भी बनारस
की समिति का नाम बदल देना पड़ा। अनुशीलन समिति से बदलकर अब इसका
नाम हो गया युवक सम्मेलन। लेकिन भीतर-ही-भीतर मैं कलकत्ता की अनुशीलन
समिति से सम्बन्ध रखना चाहता था। लेकिन घटना-चक्र के फेर में ऐसा हो नहीं
पाया।
उधर बारीन्द्र आदि के प्रयत्न विफल हो जाने के बाद उसी संस्था के जो
अवशिष्ट आदमी थे उनके कार्यक्रम का केन्द्र कलकत्ता के पास फ्रांसीसी बस्ती
चन्द्रनगर बन गया था। इस केन्द्र से आजकल के प्रसिद्ध नेता श्री रासबिहारी
बोस देहरादून पहुँचे। श्री रासबिहारी अपनी कार्यकुशलता के द्वारा पंजाब में
एक अच्छा दल बना चुके थे।
ढाका अनुशीलन समिति के नेता श्री पुलिनबिहारीदास थे। पुलिनबिहारी
को सात साल की कालेपानी की सजा हो गई थी। पुलिनबिहारी के बाद ढाका
अनुशीलन समिति के जो लोग नेता के स्थान में काम कर रहे थे, उन्होंने अपने
काम की गरज से चन्द्रनगर के दल के साथ सहयोग से काम करना प्रारम्भ कर
दिया। इस समय चन्द्रनगर दल के नेता थे श्रीशिरीषचन्द्र घोष और मोतीलाल
राय। ढाका अनुशीलन समिति मोतीलालराय के साथ मिलकर काम तो करती थी
लेकिन उस समिति के नेतागण अपने दल के संगठन को सम्पूर्ण रूप से स्वतन्त्र
रखे थे। चन्द्रनगर का दल बंगाल में कुछ बड़ा न था। लेकिन रासबिहारी ने
पंजाब में अपना पूरा-पूरा संगठन किया था।
संयोगवश घूमते-घूमते मैं चन्द्रनगर के दल में आकर शामिल हो गया था। मैं
पछाहँ में रहता था, इसलिए रासबिहारी के अधीन मुझे रखा गया। श्री रास-
बिहारी एक अत्यन्त कार्यकुशल नेता थे। चन्द्रनगर में बम बनाने का केन्द्र था,
इन सब कारणों से ढाका अनुशीलन समिति के साथ रासबिहारी का अत्यन्त
घनिष्ठ सम्बन्ध हो गया था और रासबिहारी के जरिए से ढाका अनुशीलन समिति
के मुख्य-मुख्य कार्यकर्त्ताओं के साथ मेरा भी घनिष्ठ परिचय हो गया था। यह
सब होने में समय लगा था। ढाका अनुशीलन समिति के साथ चन्द्रनगर के दल
का जो सहयोग हो रहा था उसकी एक शर्त यह थी कि उत्तर भारत में ढाका
समिति स्वतन्त्र रूप से अपने किसी आदमी को नहीं भेजेगी। उत्तर भारत में जो
काम होगा उसका समस्त उत्तरदायित्व रासबिहारी पर रहेगा। यदि ढाका
समिति के कुछ आदमी रहें तो उनका भी सम्बन्ध रासबिहारी के साथ ही रहेगा,
ढाका के साथ नहीं। मैं ढाका समिति के कुछ सदस्यों के जरिए से चन्द्रनगर के