बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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रिहाई की सूचना
वह दिन आज भी मुझे खूब याद है। जाड़े का मौसम था, और था सन्
1920 का फरवरी महीना। मैं सेल्यूलर जेल के अस्पताल मेंबीमार पड़ा था। एक
क़ैदी-अफ़सर ने आकर मुझे इत्तिला दी कि जेलर साहब आपको दफ्तर में बुला
रहे हैं। सुनते ही सिर से पैर तक आग लग गई। फिर वही बात, फिर वही
दृश्य, फिर वही झगडे की नौबत दिखाई देने लगी। क्योंकि पोर्ट ब्लेयर की सेल्यूलर
जेल में प्रायः ऐसा हुआ करता था कि जेल के अधिकारीगण, क़ैदी-अफ़सर
से लेकर जेलर और सुपरिटेण्डेण्ट तक, वहाँ के राजनैतिक बन्दियों को मौका-
बेमौका, जायज-नाजायज तरीकों से तंग करना चाहते थे। और ऐसे अवसरों
पर जेल के अधिकारीगणों के साथ राजबन्दियों का खूब झगड़ा हो जाता था।
कभी-कभी इन झगड़ो के परिणाम में राजबन्दियों की मृत्यु तक हो गई है। ये
सब बातें अण्डमन के जेल-जीवन के अन्तर्गत आती हैं। लेकिन ये सब बातें किसी
दूसरे स्थान पर लिखने की इच्छा है। यहाँ इतना ही कह देना पर्याप्त है कि मेरे
समय में, और मेरे अण्डमन जाने के पहले भी, उच्च पदस्थ राजकर्मचारियों की
प्रेरणा से ही अण्डमन के जेल अधिकारी राजबन्दियों से इस प्रकार कठोर व्यव-
हार करते थे। इसलिए जब उस क़ैदी अफ़सर ने आकर मुझे जेलर साहब का
हुक्म सुनाया और यह कहा कि जेलर साहब आपको दफ्तर में बुला रहे हैं तो मेरे
मन में स्वतः ही एक विरोध की भावना पैदा हो गई कि मैं तो अस्पताल की
चारपाई पर बीमार पड़ा हूँ फिर भी, इस हालत में भी, जेलर साहब मुझे दफ्तर
में बुला रहे है। फ़ौरन ही मुझे यह ख्याल हुआ कि मुझे अपमानित और तंग
करने के लिए ही जेलर ने ऐसा हुक्म दिया है। यदि मैं नहीं जाता हूँ तो जेलर से
झगडा होता है, और यदि जाता हूँ तो मेरा अपमान होता है; और यदि झगड़े
को बचाने के लिए मैं इस अपमान को भी सह लेता हूँ तो मैं अपने मित्रों की दृष्टि
में गिर जाता हूँ। क्षण-भर के लिए इन सब भावनाओं ने मेरे मन में एक कठिन
समस्या पैदा कर दी। लेकिन उसी क्षण मैंने इन समस्याओं की मीमांसा भी कर
ली। मैंने उस क़ैदी अफ़सर से कहा कि मैं बहुत कमजोर हूँ दफ्तर नहीं जा
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सकता । वह क़ैदी चला गया, लेकिन थोड़ी ही देर में फिर वापस आया और कहा
कि बहुत जरूरी काम है, जेलर साहब आपको दफ्तर में ही बुला रहे हैं। यह सुन-
कर मुझे बड़ी चिन्ता हुई । तरह-तरह के खयाल दौड़ने लगे; कहीं ऐसा तो नहीं
हुआ कि कोई मेरी लिखी हुई गुप्त चिट्ठी पकड़ा गई हो या कोई नया झगड़ा तो
नहीं खड़ा हो गया । बात क्या है कि मैं अस्पताल में बीमार पड़ा हूँ फिर भी
दफ्तर में ही बुलाने पर इस क़दर ज़ोर है। लेकिन मुझे ज्यादा सोचने का मौका
न था । उस दिन मुझे बुखार न था, और न मैं इतना कमजोर ही था कि दफ्तर
तक जा न सकता। ऐसे अवसरों पर घर में तो यह सवाल ही नहीं पैदा होता कि
आवश्यकता पड़ने पर बिस्तर से उठकर किसी से मिलने जाएँ या न जाएँ। यहाँ
तो आत्म-सम्मान का सवाल था। असली बात तो यह थी कि एक राजबन्दी को
बीमार अवस्था में कैसे कोई जेलर दफ्तर बुला सकता है।' अब तो झगड़े की
नौबत साफ नज़र आई, परन्तु मैंने सोचकर निश्चित किया कि झगड़ा नही करना
चाहिए। क्योंकि अभी थोड़े ही दिन पहले काफ़ी झगड़ा हो चुका था। अतः मैं
जितना दुर्बल था उससे कही अधिक दुर्बल बनकर धीरे-धीरे जेलर के दफ्तर
की ओर चल पड़ा । जब जेलर के सामने पहुँचा तो उसने बड़ी प्रसन्नतापूर्वक
दोस्ताने के तौर पर आदर के साथ अपनी कुर्सी के पास एक बेंच पर बैठने को कहा !
मैं तो एक तूफान का इन्तज़ार कर रहा था। यह दृश्य देखकर कुछ चकित्-सा
रह गया । और अभी बैठा भी न था कि जेलर एकाएक कहने लगा, “Cheer up
man, you are released”—‘‘क्या सुस्त हो यार मौज करो, अब तो तुम छूट
गए।” मुझे इस अवसर पर यह संवाद सुनने की आशा न थी यद्यपि मुझे यह
दृढ़ विश्वास था कि थोड़े ही दिनों के अन्दर छूट अवश्य जाऊँगा । 18 अगस्त
सन् 1916 को मैं कालेपानी पहुँचा था। उस दिन से ही मैं सदा यह कहा करता
था कि अपने अट्ठाइसवें साल की अवस्था में मैं अवश्य छूट जाऊँगा । ऐसी
कोई शक्ति नही है जो उस निश्चित समय के बाद भी मुझे जेल में रख सके ।
उस समय कालेपानी में कोई ऐसा राजबन्दी न था जो इस बात को न जानता
हो और जिसने इस बात को लेकर मेरी हँसी न उड़ाई हो । मेरे इस दृढ़
विश्वास के मूल में भृगुसंहिता की एक भविष्यवाणी थी जिसके बारे में अन्य स्थान
पर कुछ लिखूँगा। महायुद्ध शान्त हो जाने के बाद जब मामूली क़ैदियों को तो
बहुत-कुछ माफ़ी दे दी गई थी और राजबन्दियों में से कुछ से यह कहा गया था
कि साल पीछे एक महीने की माफ़ी तुम लोगों की क़ैद में की गई, तब तो अवश्य
मेरे मन में कुछ नाउम्मीदी-सी आ गई थी। इस अवस्था में जेलर ने मुझे मुक्ति
का संवाद सुनाया। लेकिन यह संवाद सुनकर मेरे मन में कुछ विशेष उल्लास
नहीं पैदा हुआ क्योंकि मुझे कुछ ऐसा प्रतीत हुआ कि छूटना तो मुझे था ही, जो
अवश्य होना था वही तो हुआ मानो यह कोई असाधारण बात न थी। इसलिए
मैंने बहुत शान्तिपूर्वक अपनी मुक्ति का संवाद सुना। मेरे इस अस्वाभाविक
शान्त भाव को देखकर जेलर ने कहा, “What is the matter with you
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young man ? It seems you do not want to go home. Cheer-up
man you are released"—"अरे ! तुम्हें हो क्या गया है ? मालूम पड़ता
हैं कि तुम घर नहीं जाना चाहते । बात क्या है ? तुम खुश क्यों नहीं हो रहे हो ?
मौज करो, अब तो तुम छूट गए।" मैं मुस्कराने लगा । मैं अपने स्थान पर वापस
चला आया । धीरे-धीरे मुक्ति पाने का उल्लास मेरे मन में बढ़ता गया । अस्प-
ताल में जिस जगह मैं रहता था उसके नीचे ही एक नम्बर की बैरक का आँगन
था । इस आँगन में वीरेन्द्र, उपेन्द्र, हेमचन्द्र इत्यादि प्रसिद्ध पुराने क्रान्तिकारी
स्वयं अपना भोजन बनाया करते थे । भारतवर्ष में जो सर्वप्रथम क्रान्तिकारी
षड्यन्त्र का मुकदमा चला था उसी मानिकतल्ला बम केस में इन सबने
आजीवन कालेपानी की सजा पाई थी । कुछ दिन अण्डमन में रहने के बाद मुसी-
बत उठाते-उठाते ये लोग दुर्बल चित्त हो गए थे । मेरे सामने कालेपानी मे राज-
बन्दियों के माथ जेल-अधिकारियों के जितने संघर्ष हुए और उसके परिणामतः
जितनी भूख-हड़तालें एवं काम बन्द रखने की हड़तालें हुईं उनमें से किसी में भी
इन लोगों ने किसी प्रकार का भाग नहीं लिया था, बल्कि मेरी नज़रों मे ये
लोग जेल-अधिकारियों के विश्वासपात्र बन गये थे । इनकी धारणा थी कि
इन सब हड़तालो में भाग न लेने से एवं जेल-अधिकारियों के पक्ष मे रहने से
सम्भव है, छूटने में बहुत-कुछ सहायता मिले । इसलिए इन लोगों ने अन्य
राजबन्दियों के विरुद्ध जाकर हमेशा जेल-अधिकारियों का ही पक्ष लिया था ।
इन सब बानो से राजत्रन्दियों की श्रद्धा इनकी तरफ से हट गई थी । इधर
ये लोग भी यह ममझते थे कि जेल-अधिकारियों से हमेशा संघर्ष करने का
परिणाम क्या होता है । यह इन दूमरे राजबन्दियों को तभी मालूम पडेगा ऐन
वक़्त पर, जब उनकी रिहाई के प्रश्न पर विचार करने का अवसर आएगा ।
परन्तु मैने तो जिस दिन मे कालेपानी मे कदम रखा था, उमी दिन से लेकर
मुक्ति पाने के दिन तक हमेशा जेल-अधिकारियों के खिलाफ़ राजबन्दियों का
पक्ष ही अपनी सामर्थ्य के अनुसार ग्रहण किया था। इसलिए जब मुक्ति का
आनन्दप्रद समाचार मुझे मिला तो मेरे दिल में सर्वप्रथम यही इच्छा हुई कि इन
दूरदेश सावधान राजबन्दियों को जाकर अपनी मुक्ति की बात सुनाऊँ और यह
समझा दूँ कि राजनीति के मार्ग में दूरदेश और सावधान रहने से ही हमेशा लाभ
नहीं होता है । मन में यही भाव भरे हुए, जेलर के पास से लौटकर मैं सीधा
बरामदे में आकर खड़ा हो गया और उपेन्द्रनाथ को बुलाकर अपनी मुक्ति की
बात सुनाई । उपेन्द्रनाथ आए, मेरी बात सुनी, मुझे बधाई दी या न दी, मुस्कुरा-
राहट की रेखा चेहरे पर आई भी न थी कि उन्होंने सिर नीचा कर लिया और
मुँह लटकाकर वापम लौट गए । मैं अपनी चारपाई पर लौट आया । आज साढ़े
अठारह वर्ष के बाद मुझे यह याद नहीं है कि चारपाई पर आकर मैंने क्या सोचा
और उस समय मेरे दिल पर क्या गुजरी । इतना अवश्य याद है कि मैं मुक्ति
का संवाद पाकर चंचल नहीं हुआ था । केवल एक भावना सर्वोपरि मुझे विकल
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कर रही थी। मैं यही सोचकर परेशान हो रहा था कि कैसे मैं अपने साथियों के
सामने आकर खडा हूँगा। जिस क्षण मैंने यह सुना कि मैं मुक्त हो गया हूँ बस
जेल मे रहते हुए भी उसी क्षण से मैं यह एकाएक अनुभव करने लगा कि मैं अब
इस जगह का रहनेवाला नही हूँ मानो मैं यहाँ अतिथि हूँ, दो घडी ठहर कर बाद
को चला जाऊँगा। मेरे और सब साथियो के चेहरे जब मुझे याद आए और
उनके आजन्म द्वीपान्तर वास का दंड उनके चेहरो पर लिखा देख रहा था तो
मेरे लिए यह दृश्य असहनीय हो गया। इस दृश्य को देखते हुए मै अपनी मुक्ति
के आनन्द से कुछ भी हर्षोत्फुल्ल नही हो पाया। मुझे इस समय याद नही कि उस
दिन मेरे साथ अस्पताल मे ओर भी कोई राजबन्दी थे या नही।
जेलर ने हमे बतलाया था कि अभी हमे करीब बीस दिन अण्डमन जेल मे ही
रहना पडेगा। कैदियो को ले जानेवाला जहाज अभी अन्यत्र गया हुआ है। यह
जहाज वापस आएगा तभी मुझे उस पर सवार कराया जाएगा, इन बीस दिनो
तक मुझे जेल के अन्दर ही रहना पडेगा। जेल का ही भोजन नसीब होगा और
दूसरे कैदियो की तरह रात को कोठरी मे ही सोना पडेगा। मैन एक बार यह
आग्रह किया था कि कम-से-कम एक दफा तो मुझे जेल के बाहर अण्डमन टापू
का दृश्य देखने का मौका दिया जाए। आजन्म कालेपानी की सजा लेकर आए,
चार साल तक जेल के अन्दर ही रहे, अब जन्मभूमि की तरफ लौटने के पहले
तो एक स्वाधीन व्यक्ति की तरह अण्डमन टापू को देखने का मौका मिले। लेकिन
मेरी प्रार्थना स्वीकार नही की गई। यह अजीब परिस्थिति थी कि मै रिहा भी
कर दिया गया था, लेकिन बीस दिन तक जेल के बाहर भी नहीं जा सकता था।
खाना, पीना, रहना जेल के अन्दर ही दूसरे कैदियो की तरह ही होना रहा।
आजन्म कालेपानी की सजा पाकर साल के प्रति दिन, प्रति घडी जिस सुअवसर
की बाट जोह रहा था वह दिन आ गया। लेकिन जब वह दिन आया तो वह
कल्पनातीत हर्ष मैने क्यो नही अनुभव किया ? इसका उत्तर आज भी मैं ठीक
तरह से नही दे सकता। दूसरे बहुत-से कैदियो को मैंने छूटते हुए देखा। उन
कैदियो के हर्षोद्वेग की सीमा नही रहती थी। वे आपे से बाहर हो जाते थे, स्वप्ना-
विष्टो की तरह विह्वल होकर वे इधर-उधर घूमा करते थे। मुझे ठीक मालूम
है कि मै विह्वल नही हुआ। सम्भव है कि अपने दूसरे साथियो की अवस्था को
सोचकर अनजाने ही मैं अपने हृदयावेग को सहज तरीके से सहन कर पाया।
ऐसी परिस्थिति मे अस्पताल को छोडकर अपनी बैरक मे मैं अपने साथियो के
बीच वापस आया।
अस्पताल से अपनी बैरेक मे लौटने तक जेल-भर मे यह समाचार फैल गया
कि भारत के सर्वप्रथम षड्यन्त्र केस के कैदी वारीन्द्र, उपेन्द्र एव हेमचन्द्र भी
छूट गये हैं। और वे भी मेरे साथ एक ही जहाज मे स्वदेश लौटेगे। उन्हे भी मेरी
तरह अभी बीस दिन तक और जेल मे ही रहना पडेगा।
बैरक मे पहुँचते ही मेरे सब साथी मेरे पास आ खडे हुए, चारो तरफ से मुझे
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घेर लिया और सब बातें पूछने लगे । अपने कल्पना-नेत्रों से जो चित्र मैंने देखा
था वही दृश्य मेरे सामने आया । अभी दो-एक दिन ही पहले जिन साथियों के
साथ हम अपने बन्धन के दिन बिता रहे थे, आज उन्हीं साथियों के बीच होते हुए
भी कैसे उन्हें गैर समझने लगे मानो मैं और मेरे वे साथी दो अलग-अलग दुनिया
के निवासी हैं । यह बात कहने की न थी, हमसे प्रत्येक ने अपने मर्म स्थान में
इस बात का अनुभव किया । एक तरफ मुझमें आनन्द की दबी हुई आशा थी,
दूसरी तरफ वेदना की स्फुट व्यंजना। यह अजीब परिस्थिति थी अपने अनजान
में ही मैं यह अनुभव कर रहा था । अपने स्वाभाविक अभूतपूर्व कल्पनातीत
आनन्द को व्यक्त करना इस अवस्था में तो नितान्त अपराध ही हो गया । इस
प्रकार से अनजाने ही प्रतिक्षण अपने भावों को छिपाने का व्यर्थ प्रयास करता
रहा ।
सम्भव है, मेरे साथियो के मन मे बन्धन में पड़े रहने की वेदना के साथ
मुक्ति पाने की भी क्षीण आशा की झलक दिखलाई दी हो; सम्भव है कि
भविष्य में मुक्ति न पाने की आशंका से वे अत्यन्त वेदना का अनुभव कर रहे
हो ।
उनमे से जो सबसे कम उम्र का युवक था उसने मुझसे एक पुस्तक स्मृति-
चिह्न-स्वरूप मांगी। मैं उस समय सब-कुछ दे सकता था, मैंने सहर्ष अपनी पुस्तकों
में से एक पुस्तक उसे दे दी । इस प्रकार मैंने अपनी सब पुस्तकें सेल्यूलर जेल-
निवासी बहुत से राजबन्दियों को स्मृतिचिह्न-स्वरूप दे दीं । मेरे लिए पुस्तकों से
अधिक और कोई प्रिय वस्तु नहीं है । मैं कोई धनी व्यक्ति नहीं था । चौदह-
पन्द्रह वर्ष की अवस्था में ही मेरे पिता का देहान्त हो गया था । पिताजी इंश्यो-
रेंस इत्यादि मे कुछ छोड़ गए थे, उसी से हम चार भाइयों तथा मेरी विधवा माता
का निर्वाह हो रहा था। मुक्ति के बाद भी, इन पुस्तकों में से कुछ तो आजकल
अप्राप्य ही हैं, तथापि उनके लिए जो जीते-जी कब्र मे रह गए, उसी कब्र से
मुक्ति पाने के दिन मैं क्या न दे सकता था । केवल एक पुस्तक मैंने अपने पास
रख ली । वह पुस्तक थी, ईसाइयों की धर्म-पुस्तक — होली बाइबिल और इसमें
मेरे पिताजी के हस्ताक्षर थे । मैंने अपने साथियों को जो पुस्तकें दे दी थीं उनमें
से जिनके नाम मुझे याद हैं, वे हैं—
- Liberation of Italy by Countess Matrinengo ceseresco.
- Life of Voltaire by Morley.
- Life of Rousseau by Morley.
- Life of Gladstone by Morley.
- बुद्ध जीवनी—डॉ० रामदास सेन ।
6 दो-तीन वर्ष के भारतवर्ष और प्रवासी मासिक पत्रों की फाइलें ।
अन्य लगभग आठ-दस पुस्तकें भी थी, जिनका नाम मुझे इस समय याद नहीं
है। इनमें पहली पुस्तक आजकल लाइब्रेरियों में छोड़कर अन्यत्र नहीं मिल रही
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है। और बुद्ध-जीवनी दुष्प्राप्य है। वारीन्द्र और हेमचन्द्र के पास सौ-दो-सौ से
भी अधिक अति उत्कृष्ट पुस्तकें थीं। ये सब पुस्तकें वे अपने साथ वापस ले आए
थे। जहाज आने मे अभी कुछ दिन बाकी थे कि इतने में खबर आई कि सन्
1919 के पंजाब के मार्शल-ला मे सजा पाए कें दियो मे से अठारह कैदी रिहा किये
गए, ये भी सब मेरे ही साथ एक ही जहाज मे भारत वापस भेजे जाएँगे।
बैरक मे लौटने के बाद यह भी पता चला कि जिस दिनसुबह जेलर ने मुक्ति का
संवाद सुनाया था, उमी दिन करीब दम-ग्यारह बजे जेल के सुपरिटेण्डेण्ट ने
वारीन्द्र, हेमचन्द्र और उपेन्द्र को भी उनके मुक्त होने का संवाद सुनाया
था। वारीन्द्र और हेमचन्द्र हमेशा दफ्तर आया-जाया करते थे। जेल के अन्दर
एक छोटा-सा छापाखाना था। इसका सब काम वागीन्द्र के सुपुर्द किया गया
था। जेल मे जिल्दसाजी का काम भी होता था। यह काम हेमचन्द्र के सुपुर्द था।
अपने काम के सिलसिले मे ये हमेशा दफ्तर आते
रिहाई की सूचना / 195
तब मेरी शादी अवश्य होनी ही है। मुझे अभी भी भारतीय फलित-ज्योतिष में
विश्वास है। मैं इसे कुसंस्कार नहीं समझता। और यदि यह कुसंस्कार हो भी तो
क्या हानि है; मुसीबतों के दिनों में तो मुझे इस संस्कार ने सहारा ही दिया।
गिरफ़्तार होने के पहले मेरी मां ने मुझे बतलाया था कि मेरी जन्मपत्री
बनारस के प्रसिद्ध भृगुसंहितावालों को दिखलाई गई थी। उन्होंने मेरे जीवन के
अतीत, वर्तमान एवं भविष्य के बारे में जो कुछ बतलाया वह अक्षरशः सबका
सब सही निकला। मेरी गिरफ़्तारी का समय, शत्रु-परिवेष्ठित रहने का काल,
मुक्ति पाने एवं विवाह का समय, पुनः गिरफ़्तारी होने का काल, ये सबकी सब
बातें मैंने बिलकुल सही पाईं। फ़रार हालत में अदूर भविष्य में विवाह होने की
सम्भावना से अपने दिल को मैंने इस तरह तसल्ली दी कि आख़िर यह सब झंझट
और मुसीबत के दिन शीघ्र ही व्यतीत हो जाएँगे, नहीं तो शादी कैसे सम्भव हो
सकती है। जिस दिन मां के मुंह से मैंने यह सब भविष्यवाणी की बातें सुनी थीं
उसी दिन से मैं मन-ही-मन शादी के लिए तैयार हो गया था। इसके पहले हज़ारों
कोशिशें होने पर भी एवं हज़ारों प्रलोभन दिलाने पर भी मैं शादी के लिए तैयार
नहीं हुआ था। लेकिन भविष्यवाणी के कारण फ़रार हालत में विवाह की
भावना सुखकर भी थी और यह सब प्रकार के फ़सादों से निष्कृति पाने का
इंगित भी था। मन में सोचा, चलो अब क्या है, विवाह कर ही लेंगे। अनिर्दिष्ट
काल के लिए फ़रार रहना और सुनिर्दिष्ट काल के अन्दर विवाह होना भला यह
भी कोई समस्या है जिसकी मीमांसा में कोई परेशानी हो सकती है ! इस मनो-
वृत्ति से कालेपानी में मुसीबत के दिन बिताने में मुझे बहुत सहायता मिली।
आजन्म कालेपानी की सज़ा कोई दिल्लगी तो है नहीं। कितने ही राजबन्दी
इस बोझ से दब से गये थे। मानो सर्वांग पर किसी ने रोलर-सा चला दिया हो।
ऐसी अवस्था में विचारे वारीन्द्र और उनके साथी झूठे आश्वासन पर भी भरोसा
करने लगे थे। और अन्य राजबन्दीगण मजबूरी का नाम सब्र, इस कहावत को
अक्षरशः सिद्ध कर रहे थे।
दुर्भाग्यवश जिस सुपरिटेण्डेण्ट ने रिहाई का दिलासा दिलाया था, उसी ने
युद्धावसान का दिन मनाने के अवसर पर वारीन्द्र वग़ैरह को दफ़्तर में बुलाकर
यह हुक्म सुना दिया कि सरकार ने तुम्हारी सज़ा में साल पीछे एक महीना माफ़ी
दे दी है। और हम लोगों को जो अभी तक जेल के अधिकारियों के साथ झगड़ते
आए थे, बुलाकर यह हुक्म सुनाया गया कि यदि हम और साल-भर ठीक चाल-
चलन दिखाएँ तो इसके बाद हम लोगों को भी साल पीछे एक महीने की माफ़ी
दी जायगी।
यह खबर सुनकर वारीन्द्र वग़ैरह को दिन में तारे दिखने लगे थे। और हम
सब खुश हुए थे।
मैं अपनी बात जितनी निश्चयतापूर्वक कह सकता हूँ, दूसरों के मन की बात
उतने निश्चयात्मक रूप से कैसे कह सकता हूँ ! महायुद्ध के अवसान पर अंग्रेज़ों
196 / बन्दी जीवन
ने जो खुशी मनाई उस सिलसिले में बर्मा के तमाम राजबन्दियों को सरकार ने
छोड़ दिया। दूसरे मामूली कैदियों में से भी पुराने कैदियों को छोड़ दिया। यह
सब देखकर भारत के राजबन्दियों के मन में कुछ नाउम्मीदी अवश्य हो गई थी,
तथापि मेरे मन में सांत्वना बनी रही। आशा की छलना से संसार-भर के मनुष्यों
का निर्वाह होता है। मेरी आशा तो सत्य के आधार पर बनी हुई थी तथापि यह
भी सच है की कभी-कभी निराशा के अंकुर ने मुझे भी चंचल किया था। भागते
हुए पक्षियों की छाया की तरह यह दुर्भावना आई और चली गई। मैं अपने पढ़ने में
लगा रहा। उन दिनों मिल की लिखी हुई 'प्रिंसपल्स ऑफ़ पॉलिटिकल एकॉनमी'
पढ़ रहा था। किताब पढ़ चुका था। इतने में एक दिन करीब तीन बजे शाम को
रायटर का तार छपने के लिए आया। तार की अधूरी भाषा से जाहिर हो रहा
था कि बादशाह ने राजबन्दियों की रिहाई के बारे में कुछ ऐलान किया है। बस,
उस दिन से लिखना-पढ़ना चौपट हो गया। सिवा एक चर्चा के कि कब छूटेंगे,
कौन छूटेगा, क्या होगा, क्या न होगा, और कोई बातें ही न रही। खाते-पीते,
लेटते-जागते हर घड़ी वही चर्चा और वही चिंता। बारीन्द्र दौड़-धूप करके दफ्तर
से 'बंगाली' नाम के अखबार की एक प्रति ले आए, जिसमें बादशाह की घोषणा
छपी हुई थी। वह पढ़कर जैसे आशा का संचार हुआ, वैसे ही दूसरी तरफ इस
दुर्दमनीय सन्देह ने भी हम सबको बेचैन कर दिया कि बादशाह की घोषणा में
यह तो अवश्य था कि ज्यादा-से-ज्यादा राजबन्दियों को छोड़ दिया जाय, लेकिन
इसके साथ यह भी एक वाक्य था कि 'भारत के बड़े लाटसाहब जिस किसी को
भी ऐसा समझें कि उसके छोड़ने से अभी उपद्रव की सम्भावना है, तो उसे वे नहीं
भी छोड़ सकते हैं।' अब हम लोगों में धुकधुकी पैदा हुई। जाने लाटसाहब किसे
क्या समझें। दुःस्वप्न की भयानक छाया की तरह यह विभीषिका हम लोगों के मन
में हर घड़ी बनी रही। हम लोगों में से अब किसी को चैन न रहा। लेकिन मेरी
आशा अब और बलवती हो गई। जब मैं पहले-पहल कालेपानी में आया था और
यहाँ के राजबन्दियों के साथ मैंने अपने अदूर भविष्य में छूटने की भविष्यवाणी के
बारे में बात की थी, तो सबों ने मेरी हँसी उड़ाई थी एवं उपेन्द्र वगैरह ने यह
कहा था कि 'अंग्रेजों की हुकूमत रहते हुए तो तुम छूट नही सकते।' इस पर मैंने
कहा था कि 'यदि मेरे छूटने के लिए अंग्रेजी हुकूमत का अन्त होना आवश्यक है,
तो अंग्रेजी हुकूमत का अन्त अवश्य होगा, क्योंकि मुझे छूटना तो अवश्य है ही।'
अवश्य ही ये सब बातें हँसी-मजाक के तौर पर होती थीं। दिल बहलाने का यह
एक तरीका था। इसी सिलसिले में बारीन्द्र और उपेन्द्र ने उल्लासकर की कही
हुई एक बात सुनाई थी कि अब बड़े कठिन आदमियों से पाले पड़े हैं, ये हमारे हाड़
खाएँगे, मांस खाएँगे, चमड़े से डुगडुगी बजाएँगे। बादशाह का ऐलान होने के
बाद मैंने इन लोगों से कहा, 'कहो अब कैसी रही !' फिर कुछ दिन ऐसे ही बीते।
न कोई छूटा, न छाटा। न लिखने-पढ़ने में मन बहले और न काम करने में ही
दिल लगे। इतने में एक दिन बारीन्द्र ने आकर खबर सुनाई कि चीफ कमिश्नर
रिहाई की सूचना / 197
के पास मेरे भाई का एक तार आया है जिसमे पूछा गया है कि क्या राजबन्दी
शचीन्द्रनाथ छूट गए ? फिर आशा और निराशा के झूले मे हम लोग झूलने लगे ।
फिर कही कुछ नही । शायद इस दर्मियान एक सिख राजबन्दी छूट गया । मैं
अस्पताल मे चला गया । गाखिर अम्पताल मे ही मुझे यह बात बहुवाछित शुभ-
सवाद मिला ।
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कालेपानी से विदाई
जहाज़ की इन्तज़ारी करते-करते वे बीस दिन भी बीत गए। जहाज़ में चढने
के दिन जितने क़रीब आए, उतने ही एक आनन्द के साथ एक उतनी ही काली
छाया भी मन को घेरे रहती थी। हर घड़ी मेरे मन में यही ख्याल बना रहता
था कि कैसे मैं अपने साथियों को इस संकटपूर्ण स्थान में असहाय अवस्था में छोड़-
कर जाऊँ ! सबसे मैंने यह वादा किया कि देश में पहुँचते ही उन लोगों को छुड़ाने
के लिए मैं भरसक प्रयत्न करूँगा। मानो, मेरे पास यही एक बात थी जिससे मैं
अपने साथियों को सांत्वना दे सकता था।
इस समय भाई परमानन्द एकाएक कोठरी में बन्द कर दिये गए थे। यह
वही परमानन्द है, जो आजकल हिन्दू महासभा के महा कट्टर नेता है। सुनने में
आया था कि पंजाब के अखबारों में परमानन्दजी की धर्मपत्नी ने परमानन्दजी
के बारे में कुछ छपवाया था। इसी कारण से उन्हें कालेपानी में दिन-रात कोठरी
मे बन्द कर दिया गया था। अपने साथियों से मैंने यह भी वादा किया कि भाई
परमानन्दजी के बारे में भी देश वापस लौटकर मैं जो कुछ कर सकूँगा, करूँगा।
एक दिन प्रातःकाल जाने की तैयारी होने लगी। मैंने यह अच्छी तरह से देखा
कि पंजाब के मार्शल-लॉ के अठारह बन्दी एवं वारीन्द्र और हेमचन्द्र तथा उपेन्द्र
खुशी से फूले नही समा रहे थे। मुझे तो अपने आंसू पीकर हट जाना पड़ा। मानो
बादल उमड रहे हो, पानी गिरने ही वाला है। जेल से छूटने पर जो कपडे दिए
जाते है, वे हमे दिये गए। वारीन्द्र ने अपने छूटने की आशा में पहले ही कुछ कपड़े
मँगा लिये थे। उसमे से मुझे उन्होंने एक धोती और एक कोट दिया। मेरा ख्याल
है कि उन्होने मुझे तीन रुपये भी दिए थे। बाकी खर्च तो सरकार का ही था।
छूटते समय भी दो-दो करके हम सब छूटनेवालों को कतार में खड़ा कर दिया
गया। छूटने के दिन भी डिसिप्लिन के साथ फाटक की तरफ चले। जिस दिन मैं
कालेपानी आया था, उस दिन भी मुंह पर हंसी थी, जी में रुआंसा था। आज
छूटने के दिन भी मुंह पर हँसी थी, जी में रुआंसा था। मुझे खूब याद है जिस
दिन सर्वप्रथम मैं कालेपानी पहुँचा उस दिन मेरे मन में क्या भावनाएं थी। एक
कालेपानी से विदाई | 199
तो मुझे दृढ़ विश्वास था कि मैं जल्दी छूट जाऊँगा, इसलिए मेरे दिल में वेदना का
असर ज्यादा न था। दूसरी बात यह थी कि मेरे मन में यह आशा थी कि बारीन्द्र,
उपेन्द्र इत्यादि जो बहुत-से राजबन्दी पहले ही से कालेपानी में हैं, वे अवश्य ही
दूसरे आनेवाले राजबन्दियों के लिए रास्ता साफ़ कर रहे होंगे। इसलिए मुसीबत
को सामने देखते हुए भी उस दिन मन ज्यादा चंचल नहीं हुआ था। लेकिन दो-
चार दिन में ही मेरा यह माया-जाल छिन्न-भिन्न हो गया। जितने दिन बीतते
गए, रुआँस भी बढ़ती गई। आज छूटने के दिन रोने की तबीयत हो रही थी
और हर्ष जी में छिपा हुआ था। जैसे-जैसे समय बीतता गया, वैसे ही हर्ष की
मात्रा बढ़ती गई और निरानन्द का भाव लुप्त होता गया। लेकिन छूटने के दिन
सचमुच आँसुओं को रोकना एक मुसीबत हो गई।
फाटक के बाहर आते ही पंजाब के सिख राजबन्दीगण गगनभेदी निनाद से
दस दिशा कम्पित करके 'सत्य श्री अकाल' के नारे लगाने लगे। एक ने कहा—'जो
बोले सो निहाल' और सबों ने प्रत्युत्तर में एक स्वर से कहा—'सत्य श्री अकाल'।
फाटक के अन्दर तक कठिन डिसिप्लिन था। फाटक के बाहर भी एक प्रकार से
जेलखाना ही था। लेकिन जब ये नारे लगने लगे, तो जेलखाने के अधिकारीगण
ताकते ही रह गए। लेकिन जितने जोरों से यह नारे लगने लगे उतने ही तीव्र रूप
से मेरे हृदय को यह आघात लगने लगा कि जेल के अन्दर जितने राजबन्दी इस
घड़ी बन्द हैं और जो कोठरियों में पड़े हुए हैं उनके हृदयों पर इस निनाद का क्या
असर पड़ता होगा ! हर एक नारे के साथ मेरे रोएँ-रोएँ खड़े हो जाते थे। सुबह का
समय था, चारों दिशा मे शान्ति विराज रही थी। दिग्दिगन्त-व्यापी समुद्र फैला
हुआ था और उसके बीच में छोटी-छोटी पहाड़ियाँ हरे पेड़ और पौधे से भरी हुईं
अपूर्व शोभा दे रही थी। सिख लोगों के लगाये हुए नारे चारों दिशाओं में गूँज रहे
थे। लेकिन क़तार अभी बनी हुई थी और वैसे ही पूर्ववत् हम लोग जोड़े-जोड़े से
खड़े हुए थे। जब कई बार नारे लग गए तो हम लोग आगे बढ़े। नारों की जगह
अब पंजाबी भाषा में गाने होने लगे। उसकी एक कड़ी मुझे आज भी याद है—
'चिड़ियों से मैं बाज लड़ाऊँ, तभी गोविन्दसिंह नाम धराऊँ।' पहले की ही तरह
से दो-तीन आदमी इस गाने की एक कड़ी को शुरू करते; बाद को तमाम
आदमी उसे दुहराते। अब तो मेरी आँखों मे आँसू भर आए। अभी तक एक भावना
दिल मे दबी हुई थी, अब वह उमड़ पडी। अण्डमन में रहते हुए प्रत्येक दिन मैने
जी-जान लड़ाकर यह प्रयत्न किया था कि छूटने के बाद फिर से राजनीति मे काम
करने के लिए अपने को सर्व प्रकार से उपयुक्त बनाऊँगा। जिस दिन मुझे मुक्ति
का संवाद मिला, उस दिन एक क्षण के लिए मेरे दिल मे यह खयाल हुआ कि जिसके
लिए मैंने आज तक तैयारी की है वह समय आज आ गया। क्या मैं अब उस दिन
के लिए तैयार हूँ ? सिखों के ये गाने सुनकर कल्पना के नेत्रों से हम मुगल-जमाने
के दृश्य देखने लगे। गुरु गोविन्दसिंह ने चिड़ियों से बाज को परास्त किया था।
आज इस नवीन युग मे एक नवीन गुरु गोविन्दसिंह की आवश्यकता है। मैंने मन-
200 / बन्दी जीवन
ही-मन यह सोचा कि जो नई ज़िम्मेदारी मेरे सिर पर आ रही है, क्या मैं उसके
लिए तैयार हूँ ? मेरा जीवन तो खतम हो ही गया; इस पुनर्जन्म के बाद से क्या
अपनी ज़िन्दगी पर मेरा व्यक्तिगत अधिकार है ? क्या मेरा जीवन अब समाज के
कामों में ही न्योछावर न होना चाहिए ? इस भावना ने मुझे उस घड़ी उतावला
कर दिया। हम लोग समुद्र के किनारे आ पहुँचे । समुद्र के पानी को स्पर्श करते
ही मैंने ऐसा समझा कि यही पानी मेरी प्रिय मातृभूमि का भी स्पर्श कर रहा
है। उसे स्पर्श करके मानो मैंने मातृभूमि का भी स्पर्श कर लिया। मैंने ऐसी
कल्पना की कि मानो इस समुद्र का पानी आँचल की तरह बिछा हुआ है। उसका
एक छोर भारतवर्ष को और दूसरा छोर मुझे स्पर्श कर रहा है। नाव पर सवार
होकर कुछ दूर जाने के बाद जहाज़ मिला। वारीन्द्र वगैरह के कुछ पुराने मिलने-
वाले केला आदि फल-मूल भेंट करने के लिए ले आए थे ।
जब कालेपानी आए थे, तो जहाज़ में जिस जगह माल इत्यादि लादा जाता
है, उसी सबसे नीचे की तह में हम मनुष्यों को बे-जानदार वस्तुओं की तरह लादा
गया था; तिस पर भी पैरों में बेड़ियाँ भी पड़ी थी और संगीन लिये हुए
सिपाहियो का पहरा था। आज मुक्ति के दिन ऐसा नही हुआ। हम लोग जाकर
डेक पर बैठे। पैरों में बेड़ियाँ न थी, न कोई पहरे का इन्तजाम। अब मालूम होने
लगा कि हम लोग सचमुच छूट रहे है। दिल में आया, क्या इधर-उधर जा सकते
हैं, घूम-घामकर कुछ देख सकते हैं ? तो देखा कि कोई मना करनेवाला नही है।
स्वाधीनता पाने की यह प्रथम अनुभूति थी। जहाज़ में इधर-उधर जाकर मैं घूमने
लगा। इधर देखा, उधर देखा, कहाँ पर कैसे आदमी सवार हैं, इंजिन किधर है,
खाना पकाने की जगह कहाँ है और कहाँ स्नानागार और शौचागार है। आनन्द
की मात्रा बढ़ने लगी और सोचा, अब छूट गए। अब खाने-पीने की फिक्र हुई।
हिन्दुओं के लिए खाने का कोई इन्तज़ाम न था। या तो चना-चबेना चबाकर रहो
या जहाज़ के मुसलमान खलासियों के हाथ का पका हुआ भोजन खाओ। वारीन्द्र
घूम-घामकर जहाज़ के स्टुअर्ड के साथ खाने-पीने का कुछ बन्दोबस्त कर आए।
इस इन्तजाम मे हम चार आदमी शामिल थे—वारीन्द्र, उपेन्द्र, हेमचन्द्र और मै।
यहाँ पर यह बतला देना आवश्यक है कि खाने-पीने की छुआछूत में हम लोगों ने
कभी भी कोई परहेज नहीं किया। हाँ, अवश्य ही गो-मांस आज तक नही खाया।
लेकिन जब विचार करने बैठते हैं तो कबूतर के मांस मे और बछड़े के मांस में क्या
अन्तर होगा, यह समझ में नहीं आता। यह तो समझ में आता है कि नीति की
दृष्टि से किसी भी प्रकार के मांस का खाना अनुचित है, अन्याय है, अशोभन है और
सम्भव है कि बहुत-से अवसरों पर हानिकारक भी है। लोभ के वश में आकर
आजन्म के अभ्यास के कारण एवं संग-सोहबत की वजह से अक्सर मांस खा लेता
हूँ। ओर कभी-कभी दूसरे प्रकार के संग-सोहबत के कारण मैंने कई दफ़ा मांस
खाना छोड़ भी दिया और फिर शुरु भी कर दिया।
जब कालेपानी को आए थे तो बरसात का मौसम था। चार दिन और तीन
कालेपानी से विदाई / 201
रात जहाज़ में रहना पड़ा था। अब वापस जाने के वक़्त भी चार दिन और तीन
रात जहाज़ पर रहना पड़ा। आकाश साफ़ था। नभ-मण्डल में कोई चंचलता न
थी। जहाँ तक मुझे याद है पंजाब के मार्शल-लॉ के क़ैदियों को हम लोगों से अलग
रखा गया था और सम्भवतः उनके पैरों में बेड़ियाँ भी थीं और शायद उनसे यह
भी कहा गया था कि पंजाब में ले जाए जाकर ही वे लोग छोड़े जाएँगे। लेकिन
मुझे ये सब बातें अब ठीक याद नहीं हैं। सम्भव है, मैं कुछ ग़लती कर रहा होऊँ।
यह ठीक याद है कि हम चार आदमी एक तरफ़ थे और मार्शल-लॉ के क़ैदी दूसरी
तरफ़ थे। हम लोगों की रिहाई के सर्टिफिकेटों में चाल-चलन के कॉलम में 'फेयर'
लिखा हुआ था, यानी न ज्यादा अच्छा और न ज्यादा खराब । और रिहाई के
कारण के कॉलम में यह लिखा था कि 'बादशाह के ऐलान के सिलसिले में रिहा
किए जा रहे हैं।' एक और लक्ष्य करने की बात यह थी कि रिहाई के सिलसिले में
यह लिखा था, 'कारसपांडेन्स एण्डिंग इन ए टेलीग्राम' अर्थात् चिट्ठी-पत्र व्यवहार
के बाद आखिर में तार आया तब छूटे। मेरे जीवन की यह एक ख़ूबी है कि आज
तक जीवन-भर मेरा कोई काम निर्विघ्न रूप से सहज सरल तरीके से कभी भी
नही हुआ। मुझे हमेशा कठिन-से-कठिन बाधाओं का सामना करना पड़ा है।
छूटते वक़्त भी आखिरकार तार आया तब छूटे। आखिर शादी के सिलसिले में
भी मुझे कोसों पैदल चलना पड़ा, तब जाकर कहीं लडकी को देखना नसीब हुआ।
इसी तरह से इस जीते-जी पुनर्जन्म के बाद फिर जब मैंने यात्रा प्रारम्भ की तो
पग-पग पर मुझे कठिन बाधाओं का सामना करना पड़ा।
अंग्रेजों के बच्चों को मैंने जहाज़ पर इधर-उधर निस्संकोच घूमते हुए देखा।
जहाज़ के बिलकुल एक किनारे से ऊपर के डेक से नीचे की डेक में जाने की एक
सीढ़ी थी। थोड़ी-सी ही असावधानी के कारण बच्चे इस सीढ़ी से गिरकर अथाह
समुद्र मे जा गिर सकते थे, लेकिन निस्संकोच ये बच्चे नीचे से ऊपर और ऊपर से
नीचे आया-जाया करते थे, कूदा-फाँदा करते थे। इनकी देखभाल के लिए कोई
साथ न रहता था। इस दृश्य ने मेरे मन पर अपनी गम्भीर छाप लगा दी। मैं
हैरान रह गया कि कैसे इनके माँ-बाप निश्चिन्त होकर चैन से अलग बैठे होंगे।
क्या हम भारतवासी इस प्रकार ऐसे अवसर पर बेफ़िक्र बैठे रह सकते हैं ? मैं अपने
को काफ़ी हिम्मत वाला समझता हूँ, लेकिन मेरे लिए आज भी ऐसा सम्भव नही
है। एक और भी दृश्य आज भी मुझे याद है। मैं उस वक़्त छात्र था। बनारस के
क्वीन्स कॉलेज में पढता था। करीब तीन-चार बजे शाम को कॉलेज के प्रांगण मे
होताहुआ कही जा रहाथा। सामने देखा कि कॉलेज के प्रिंसिपल मिन्सेण्ट साहब एक
प्रोफ़ेसर के साथ जा रहे हैं। प्रिंसिपल साहब का एक शिशु-सन्तान ज़मीन पर खेल
रहा था। पास ही आया बैठी थी। वह शिशु पेड़ पर चढ़ने को गया। आया ने
रोका तो प्रिंसिपल साहब ने आया को समझाया कि बच्चों को उनकी गतिविधि में
कभी रोका न करो। पेड़ पर चढ़ना चाहता है, तो चढ़ने दो। तुम देखती रहो कि
वह गिर न पड़े।
202 / बन्दी जीवन
जिनके साथ मुझे चार दिन तीन रात हर घड़ी एक साथ रहना पड़ा, उनकी
मनोवृत्ति एवं मानसिक झुकाव के साथ मेरा कोई ऐक्य न था। सम्भवतः
हमारे हरएक की दुनिया अलग-अलग थी। हम अपनी दुनिया में विचरण कर
रहे थे, वे किसी और दुनिया में विचरण कर रहे होंगे। आपस में मौखिक बात-
चीत तो होती रही, हँसते भी थे लेकिन एक-दूसरे के हृदय को स्पर्श नहीं कर पा
रहे थे। यह अनैक्य की बात एक-दूसरे से छिपी हुई न थी; मानो हरएक के
दिल के सामने एक पर्दा पड़ा हुआ था और उसी पर्दे की आड़ में रहकर हम लोग
एक-दूसरे से बातचीत कर रहे थे।
ऐसी परिस्थिति से ऊबकर मैं कभी-कभी सिख भाइयों के पास जाता था।
लेकिन वहाँ भी दिल को तसल्ली नहीं मिलती थी; क्योंकि हम लोगों का मानसिक
विकास विभिन्न मार्ग से अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार विभिन्न ध्येय को लेते
हुए हुआ है। इतने आदमियों के साथ रहते हुए भी मैं यह अनुभव करता था
कि मैं कितना अकेला हूँ। क्या करता, मजबूरी थी। पाठक यह महसूस कर सकते
हैं कि मैं इस आनन्द के दिन कितना निरानन्द रहा !
इसी जहाज़ पर अण्डमन टापू के अंग्रेज़ डिप्टी-कमिश्नर एवं कई एक बंगाली
मैडीकल ऑफिसर हिन्दुस्तान वापस लौट रहे थे। वारीन्द्र वगैरह से इन लोगों
का परिचय था। इन लोगों से मिलने के बाद एक दफ़े वारीन्द्र हम लोगों के पास
आकर कहने लगे कि हिन्दुस्तान की हालत बहुत नाजुक है। अब यह नहीं पता
चलता कि कौन मित्र है और कौन शत्रु। स्कूल के हेड-मास्टर, टीचर, डॉक्टर और
छात्र इनमें सब खुफ़िया पुलिस के आदमी भरे पड़े हैं। पड़ोस में जो रहते हैं उनमें
कौन खुफ़िया पुलिस के हैं और कौन नहीं, यह कहना बहुत मुश्किल है। दूसरे मौके
पर डिप्टी-कमिश्नर लुइस साहब से मिलकर लौटने के बाद वारीन्द्र यह कहने लगे :
'भई, लुइस साहब बड़े भलेमानस हैं। उनसे बहुत देर तक बातचीत की। सुख-
दुःख की बातें पूछीं। कहाँ रहेंगे इत्यादि बातें होते-होते उल्लासकर की बात आई।
लुइस साहब ने अकपट हृदय से यह कहा कि 'उल्लासकर का मन बड़े ऊँचे स्वर
से बँधा हुआ था। इसी प्रकार से सिख राजबन्दियों के बारे में बातचीत हुई।
सिखों के साहस एवं उनकी विरोधी पक्ष के सामने खड़े होने की शक्ति की बहुत
प्रशंसा की।' ऐसा कहते हुए वारीन्द्र ने इस शुभ मुहूर्त्त में यह स्वीकार किया कि
जो राजबदीगण जेल-अधिकारियों के विरोध में सिर ऊँचा रखते हुए आत्म-सम्मान
के लिए हमेशा लड़ा करते थे, वे यथार्थ में वीर थे और सराहनीय थे। उनके
मुकाबले में वारीन्द्र ने अपनी कमजोरी स्वीकार की।
यहाँ पर उल्लासकर का कुछ परिचय दे देना आवश्यक है। इनके पिता
शिवपुर में इंजीनियंरिंग कॉलेज के प्रोफ़ेसर थे। वारीन्द्र वगैरह के दल में शामिल
होने के पहले ही उल्लासकर ने अपने घर में ही एक रसायनागार बना लिया था
और वहाँपर वह विस्फोटक पदार्थ के विषयों में परीक्षण किया करते थे। उल्लास-
कर बड़े विचारशील और आध्यात्मिक प्रकृति के मनुष्य थे। वारीन्द्र का दल
कालेपानी से विदाई / 203
इनके दल में शामिल होने से बहुत पुष्ट हो गया था। मुक़दमे के दौरान में बयान
देते समय उल्लासकर ने यह कहकर गौरव अनुभव किया था कि 'अमुक बम ने
अमुक स्थान पर जो भैरव-लीला दिखाई थी, वह मेरे ही हाथ का बना हुआ था।'
एक अदालत के कमरे में एक राष्ट्रीय संगीत गाकर उल्लासकर ने सबको मुग्ध
कर दिया था। प्रसिद्ध राष्ट्रीय नेता स्व० विपिनचन्द्र की एक कन्या के साथ
उनका प्रणय हो गया था और विवाह की बात स्थिर हो चुकी थी, परन्तु इस
बीच में अलीपुर षड्यन्त्र के मामले में उल्लासकर गिरफ़्तार हो गए और उन्हें
सज़ा हो गई। विपिनपाल की लड़की ने आज तक शादी नहीं की। जब तक
उल्लासकर जेल में थे तब तक तो कोई बात ही नहीं थी। जेल में उल्लासकर का
मस्तिष्क विकृत हो गया है, यह जानकर तब उसने शादी न करना ही उचित
समझा। जहाँ तक मुझे मालूम है, उस लड़की ने फिर शादी नहीं की।
अण्डमन के जेल में रहते हुए उल्लासकर एक दिन कहने लगे कि आखिर
क्यों मैं जेल की मशक्कत करूँ। एक बागी के लिए जेल में भी बगावत का रास्ता
अख्तियार करना ही मुनासिब और इज्जत का रास्ता है। इस तरह से जेल में
कई बार क़ानून तोड़कर उल्लासकर ने तरह-तरह की सजायें पाईं। एक दफ़े
जेल के बाहर कड़ी धूप में ईंट की भट्ठी में काम करते समय पहले की तरह काम
करने से इनकार कर दिया। उल्लासकर और उनके कुछ साथियों को जेल में ले
आया गया और तनहा कोठरी में दीवाल में लगे हुए लोहे के छल्ले से हथकड़ी में
बाँधकर इन्हें खड़ा कर दिया गया। इसे जेल मे खड़ी हथकड़ी कहा करते हैं। क़ानूनन
यह एक दिन में आठ घण्टे तक ही लगाई जाती है एवं लगातार सात दिन से
अधिक ऐसी खड़ी हथकड़ी लगाने का हुक्म नही है। लेकिन जेल के अधिकारी-
गण जब किसी क़ैदी को सताना चाहते है तो इन सब क़ानूनों की पाबन्दी नही
की जाती। दफ़्तर के कागज़ात मे कार्रवाई क़ानून के हिसाब से सही तौर से
रखी जाती है, लेकिन अमल में कुछ और ही होता है। अगर कोई क़ैदी अदालत
के सामने यह सब बातें साबित करना चाहे तो यह गैरमुमकिन-सी बात है,
क्योकि जेल के अधिकारियो के खिलाफ कोई गवाह नही मिल सकता। खैर, जो
कुछ हो, उल्लासकर को खड़ी हथकड़ी की हालत मे ही एक सौ तीन या एक सौ
चार डिग्री बुखार आ गया। फिर भी वे खड़ी हथकड़ी मे ही रखे गए। इस
हालत मे वे बेहोश हो गये। बेहोशी की हालत मे वे अस्पताल भेजे गए एवं जब
उन्हें होश आया तो देखा गया कि वे पागल हो गए हैं। यही उल्लासकर कहा
करते थे कि भाई अब ऐसे आदमियो के पाले पड़े हैं कि ये हाड खाएँगे, मांस
खाएँगे, चमड़ी से डुगडुगी बजाएँगे। अण्डमन के डिप्टी-कमिश्नर लुइस साहब
उल्लासकर के विषय में बहुत ऊँचे खयाल रखते थे।
जब वारीन्द्र ने आकर लुइस साहब की बातें सुनाई और इस सिलसिले में
उल्लासकर का जिक्र आया तो मुझे उल्लासकर के बारे मे ऊपर लिखी बातें
मालूम हुईं। ये सब बातें सुनकर पिछले दिनों के वे नज़ारे आँखों के सामने घूमने
204 / बन्दी जीवन
लगे और मैं सहम-सा गया। उस समय के इतने अत्याचारों की रोमांचकारी
कहानी मैंने सुनी जिसे यहाँ पर लिखने की हिम्मत मुझमें नहीं है, क्योंकि अदालत
के सामने इन सब बातों का सबूत मैं नहीं दे सकता।
जब मैं कालेपानी आया था तो प्रकृति विरूप थी। अगस्त का महीना था।
आँधी-पानी और बादल का गरजना, जहाज़ के नीचे की तह में बैठे-बैठे ऐसा
मालूम हो रहा था, मानो एक प्रलयकारी बाढ़ में दुनिया डूब रही है। अब
लौटते वक़्त प्रकृति शान्त थी, मानो हम सबके छूटने से चारों दिशाओं में
प्रफुल्लता छा रही हो। रात में तयहुआ कि प्रातःकाल यह देखना है कि समुद्र के
बीच से सूर्योदय कैसे होता है ! सोते-सोते जब पहले आँख खुली तो देखा कि
चारों दिशा में उषा की लाली स्मित ज्योति से उद्भासित हो रही थी। मैं उठ
खड़ा हुआ। समझा कि वक़्त आ गया है, सूर्योदय अब होने ही वाला है। देखा
कि हेमचन्द्र भी उठ बैठे हैं। मैंने औरों को भी जगाना चाहा, लेकिन हेमचन्द्र ने
कहा, अभी थोड़ा और देख लें कि सूर्योदय में कितनी देर है। हम दोनों डेक के
किनारे आकर खड़े हो गए। रेलिंग को पकड़कर क्षितिज की ओर टकटकी
लगाये ताकते रहे। नीचे समुद्र का पानी उच्छलित हो रहा था। हम लोगों में से
किसी के पास घड़ी तो थी ही नहीं। पता नहीं चल रहा था कि वक़्त कितना
हुआ। खड़े-खड़े हम लोग थक गए, लेकिन उषा के प्रकाश में कुछ अन्तर नहीं
हुआ। अब भी हमारे साथियों में से कोई जगा न था। मैं और हेमचन्द्र जहाज़
में इधर-उधर घूमने लगे ताकि किसी सूरत से पता चले कि वक़्त क्या है। शायद
स्टुअर्ड के पास से पता चला कि अभी तो तीन ही बजा है। दिल में आया अभी
थोड़ा और लेटे रहें, लेकिन हेमचन्द्र ने मुझे रोक लिया और दोनों डेक चेयर में
या शायद किसी और चीज़ पर बैठ गए। तीन बजे से क़रीब साढ़े पाँच बजे
तक यों ही बैठे रहे। आश्चर्य की बात तो यह थी कि समुद्र में उषा की स्थिति
तीन-तीन घण्टे तक क़रीब-क़रीब एक-सी रही। साढ़े चार या पाँच बजे से
मेरे दूसरे साथी भी पास आ गए। चारों दिशाओं में तो उजाला छा गया, लेकिन
जिस केन्द्र से चारों दिशा में यह ज्योति विकीर्ण हो रही थी उसका अभी भी कोई
पता न था। हम सब अस्थिर हो गए। केवल हर घड़ी यही सोचते रहे जाने
समुद्र में सूर्योदय कैसा होता है। यह इन्तज़ारी अब बुरी लगने लगी। लेकिन
जिस दृश्य को देखने के लिए घण्टो से बैठे है अब उस दृश्य को बिना देखे
जायें कैसे ? एकाएक सबका मन चंचल हो उठा और हाथ फैलाकर सबों ने
इशारा किया कि वह सूर्योदय का प्रारम्भ हुआ। सबों ने देखा एक ज्योतिपुंज
समुद्र से धीरे-धीरे उग रहा है। चारों दिशा में अथाह पानी और पानी। अनन्त
का आभास कुछ मिलने लगा। एक तरफ सूर्योदय हो रहा है दूसरी तरफ अनन्त
मानव मूर्त होकर दर्शनीय हो रहा है। मानो शान्त और अनन्त का मिलन हो
रहा हो। मस्तक के ऊपर अनन्त आकाश, नीचे अनन्त घटा के बीच एक हमारा
ही जहाज़ इच्छापूर्वक एक विशेष दिशा की तरफ असाध्य साधन करने की भाँति
कालेपानी से विदाई | 205
इस अनन्त दिशा को पार करने की अदम्य चेष्टा कर रहा है और दूसरी तरफ ज्योति-
पुंज की गति से भी यह प्रतीत होता था कि अनन्त के साथ शान्त का मिलन है।
और हम नितान्त दिशाहीन होकर भटक नहीं रहे हैं।
सूर्य का उदय अब प्रत्यक्ष हो रहा था। अर्धगोलाकार ज्योतिपुंज समुद्र के
ऊपर दिखाई दे रहा है। लेकित स्थल देश में सूर्यास्त के समय जैसे मनोहर रूप
में अवर्णनीय लालित्य के साथ सूर्य दिखाई देता है, समुद्र के बीच सूर्योदय के
समय वह लालित्य न था। उस दिन आकाश में एकदम मेघ न थे। सम्भव है,
इसीलिए सूर्य की किरणों से कोई रंग बिखर नहीं रहा था। समुद्र के बीच सूर्यो-
दय के समय एकमात्र विचित्र बात हम लोगों ने यह देखी थी कि अचानक वह
ज्योतिर्पिंड जो अभी तक वृत्ताकार पानी के ऊपर दिखाई दे रहा था, मानो
एकाएक पानी से कूदकर अलग हो गया और आकाश में सूर्य के रूप में दिखाई
देने लगा। इस विचित्र कूदने को छोड़कर समुद्र में सूर्योदय के वक्त और कोई
ऑब्जैक्टिव ब्यूटी हम लोगों ने नहीं दिख पाई। कुछ ने तो कहा कि यही समुद्र
में सूर्योदय की ब्यूटी है। वृथा तीन घंटे बरबाद हुए।
हम सब अपनी जगह पर चले आए और हँसी-दिल्लगी में वक्त बिताने लगे।
खाने-पीने की कोई खास चीज तो मिलने को थी नहीं और न पल्ले पैसा ही था।
आकाश की तरफ या क्षितिज की तरफ देखने से यह पता नहीं चलता था
कि हमारा जहाज़ किसी तरफ अग्रसर हो रहा है या नहीं। लेकिन नीचे पानी
की तरफ देखने से प्रतीत होता था कि किसी अज्ञात दिशा की तरफ हमारा
जहाज़ आगे बढ़ रहा है। अनन्त समुद्र में एकमात्र अपने ही जहाज़ को पानी के
ऊपर तैरते देखकर जैसे एक ओर अनन्त का अर्थ अनुभव करते थे, वैसे ही दूसरी
ओर मेरे मन मे एक असहायता की भावना एक प्रकार की अव्यक्त आशंका की
सृष्टि करती थी। मै जहाज़ के पीछे की तरफ चला गया। उस निर्जन स्थान में
अकेले खड़े होकर मैं देखता था कि कैसे हमारा जहाज़ अथाह समुद्र पर तुच्छ-
सा विक्षोभ पैदा करके समुद्र पर पानी का रास्ता बनाता चला जा रहा है। मन
में आया कि यदि हम गिर जाएँ तो क्या कोई सहायता हमें मिल सकती है !
थोड़ी देर में फिर वही बात याद आई कि मेरा जीवन तो समाप्त हो चुका था,
मेरी इस नई जिन्दगी पर मेरा क्या अधिकार है ? दिवा-स्वप्न देखने लगा। क्या
फिर देश-सेवा के कार्य मे निर्भीकता के साथ अपने जीवन को लगा पाऊँगा ?
मुझे याद आया कि मेरी माता विधवा है और मैं आज तक किसी भी प्रकार से
जननी को लौकिक दृष्टि से सुखी नहीं कर पाया। क्या अब लौटकर अपनी माता
के लिए कुछ कर पाऊँगा ? अब तो माताजी शादी के लिए अवश्य कहेंगी। शादी
मैं अवश्य करूँगा, लेकिन शादी करने के बाद क्या मैं फिर त्याग के रास्ते को ग्रहण
कर सकूँगा ? इन्ही सब भावनाओ मे मैं तल्लीन था। जब मैंने एकाएक सिर
उठाया तो देखा कि हेमचन्द्र मेरे पास खड़े हुए हैं। उनके आग्रह करने से मैंने
अपने मन की सब बातें बताईं।
हेमचन्द्र कानूनगो एक अति भद्रेश सज्जन थे। जब जेल में आए होंगे तब
वह अवश्य जवान रहे होंगे। लेकिन जिस दिन मैंने प्रथम बार अण्डमन की जेल
में क़दम रखा था उस दिन जब मैने दूर से हेमचन्द्र को एक स्टूल पर बैठे देखा
उस दिन का दृश्य मैं कभी नहीं भूल सकता। दाढ़ी के बाल आधे से ज्यादा सफ़ेद
हो गए हैं, छाती तक बाल लटक रहे हैं, आंख में चश्मा है और रंग गंदुमी। मैं
यह सोचने लगा कि भारत के स्वाधीनता संग्राम में इन सज्जन ने अपने बाल
सफेद कर लिये, सालों से जेल में पड़े हुए हैं, मुखमंडल चिन्तनशील गम्भीरता-
मंडित दिखाई दे रहा है, एकाग्र चित्त से कोई किताब पढ़ रहे हैं।
कालेपानी में आकर एक नवीन युवक दत्तचित्त होकर उन्हें इस तरह से
टकटकी लगाकर देख रहा है, हेमचन्द्र को इस बात की कोई ख़बर नही। अपने
देश से सहस्रों मील की दूरी पर समुद्र-परिवेष्टित एक छोटे-से टापू के कारागार
में एक प्रौढ़ के साथ एक नौजवान का इस परिस्थिति मे मिलना आज भी मुझे
याद है। ये वही हेमचन्द्र हैं जो अपनी जायदाद बेचकर फ्रांस चले गये थे बम
इत्यादि बनाना सीखने के लिए। जिस समय हेमचन्द्र इस वैप्लविक मनोवृत्ति
को लेकर फ्रांस गए थे उस समय भारत के राष्ट्रीय क्षेत्र में किसी नेता ने भी
यह कल्पना नहीं कर पाई थी कि भारत के नौजवानों में देश को स्वाधीन करने
की इतनी प्रबल आग्रहपूर्ण क्रांतिकारी भावनाएं तीव्र रूप से फैल रही हैं।
आज वही हेमचन्द्र बारह साल जेल-जीवन व्यतीत करने के बाद घर वापस
जा रहे हैं। घर में उनके स्त्री है एवं एक पुत्र। बारह साल मे अण्डमन मे उन्होने
जितनी पुस्तकें एकत्रित की थी अपने पुत्र के लिए आज वे सब पुस्तकें अपने साथ
लिये जा रहे हैं। जो युवक काले पानी मे कदम रखते ही उनको देखकर दंग रह
गया था, आज मुक्ति पाने के दिन जहाज़ मे वे उसके ही पास आकर मित्र की
तरह खडे हुए हैं और भविष्य की आशा और आकाक्षाओं की बातें पूछ रहे है।
दिन यो ही बीत गया। आज जहाज़ पर आखिरी रात थी। हम सब
मातृभूमि के क़रीब आ गए हैं। बहुवांछित तटभूमि अभी दिखलाई नही दी है।
सम्भव है, कल दिखलाई दे। जहाज़ मे बिजली की बत्तियां काफ़ी जल रही थी।
चारों दिशाओ में अंधकार छा रहा था। आकाश मे नक्षत्र चमक रहे थे। क्षितिज
स्पष्ट रूप से दिखाई नही दे रहा था। अनन्त गगन-मण्डल अतल समुद्र मे समा
गया था। या यों कहिए कि सीमाहीन समुद्र असीम गगन मे समा गया था। इस
असीमता के बीच में जल के बुदबुदों की तरह हमारा जहाज़ समुद्र की लहरों के
ऊपर भासमान था। तारो की वजह से अधकार समुद्र के बीच भयानक मालूम हो
रहा था। मैं डेक पर रेलिग के किनारे खड़ा था। नीचे समुद्र की लहरें उमड रही
थी। अगर जहाज़ पर बिजली की बत्तियां न होती तो नीचेकी लहरें बिलकुल न
दिखाई देती लेकिन बिजली की बत्तियो की रोशनी के कारण नीचे लहरों का
भीषण रूप मैंने देखा। यह दृश्य भी भूलना सम्भव नही। भयानां भय भीषणं
भीषणानाम् इस श्लोक की पंक्तियां सुनी ही थी। अब यह दृश्य आँखों देखने
कालेपानी से विदाई / 207
का अवसर आया। छोटी-सी बत्ती के सहारे गहन अंधकार ने मानो आँखों के
सामने रूप ग्रहण किया हो। अंधकार का भी रूप होता है, यह पहले-पहल ही
अनुभव किया। लहरें उमड़ रही हैं, लेकिन वह पानी नहीं मालूम हो रहा है।
यदि हम अचानक पानी में गिर पड़ें तो किस अनिर्देश्य अज्ञात कराल लोक में
जा पहुँचेंगे इसका कोई ठीक-ठिकाना नहीं है। काल की कराल छाया मानो उन
लहरों के रूप में उमड़ रही है। अंधकार को भी देखा जा सकता है। जिन्होंने
देखा है वे ही स्वीकार कर सकते हैं, दूसरे नहीं।
सम्भव है रात को किसी समय पाइलट हमारे जहाज में सवार हो गया हो।
प्रातःकाल सुदूर में एक रेखा की तरह स्वदेश भूमि को देख पाता था, ऐसा मुझे
ख्याल है। नदी और समुद्र के संगम-स्थल को किस समय मैंने पार किया था,
यह मुझे ठीक याद नहीं। अभी भी समुद्र था या नदी आ गई थी, मैं इसको भी
ठीक नहीं कह सकता था।
चौथे दिन समुद्री पक्षियों को समुद्र में मछली का शिकार करते हुए देखा।
एकाध बार मछलियों को भी थोड़ी दूर तक उड़ते हुए देखा था। ये समुद्री पक्षी
जिन्हें अंग्रेजी में सीराल्जं कहते हैं, अण्डमन टापू से दो सौ मील की दूरी तक
दिखाई दिए, और इधर भी भारत की तटभूमि से सौ मील की दूरी पर दिखाई
दिए होंगे। अब मुझे ठीक-ठीक याद नहीं है लेकिन जहाँ तक मैं स्मरण कर सकता
हूँ, ये समुद्री पक्षी बीच समुद्र में नहीं दिखाई दिए थे। यूरोपियन पुरुष और
स्त्रियाँ इन पक्षियों के खाने के लिए कुछ फेंक दिया करते थे। समुद्री पक्षी इसलिए
जहाज के आस-पास खूब उड़ा करते थे। इन साहबों की बदौलत इन पक्षियों
की लीलाएं देखकर हम भी आनन्द-उपभोग करते थे।
हेमचन्द्र ने कहा कि हम लोग रात में गंगासागर संगम पार कर चुके हैं।
प्रातःकाल में भी बहुत दूर पर जो क्षीण रेखा दिखाई दे रही थी, इसमें सन्देह
है कि यथार्थ में वह रेखा तटभूमि की द्योतक थी या नहीं। हम लोगों में
बात छिड़ी कि जाने कितने दिनों में हममें जहाज चलाने वाले आदमी पाइलट
इत्यादि पैदा होंगे। जितना दिन चढ़ता गया उतनी ही तटभूमि की रेखा निकट-
वर्ती होती गई। वह दृश्य बड़ा मनोहर था। अब स्पष्ट रूप से तटभूमि दिखलाई
देने लगी थी, लेकिन इधर पानी का प्रसार समुद्रवत् ही था। एक तरफ जल
का अनन्त प्रसार, दूसरी तरफ तटभूमि का इंगित; यह सान्त और अनन्त का
सम्मेलन बहुत ही हृदयग्राही होता है। केवल अनन्त से हमारा काम नहीं चलता
और न केवल सान्त से ही हम तुष्ट रह सकते हैं। अनन्त समुद्र में भी आसमान
व जहाज मेरे साथी थे; जहाज के निवासी भी साथी थे, सम्भव है इसलिए वहाँ
पर सान्त और अनन्त का मिलन रहा। लेकिन निरे अनन्त में जी घबरा जाता
है। सम्भव है मुझमें अभी भी वासनाएं प्रबल हैं इसलिए अभी केवल अनन्त से
जी घबराता है। एक दफा श्री रामकृष्ण परमहंस ने स्वामी विवेकानन्द को कुछ
अनुभव कराया था। स्वामी विवेकानन्द घबराकर कहने लगे, "अभी मेरे माता-