सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 197, कुल 408 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 197

रिहाई की सूचना / 195
तब मेरी शादी अवश्य होनी ही है। मुझे अभी भी भारतीय फलित-ज्योतिष में
विश्वास है। मैं इसे कुसंस्कार नहीं समझता। और यदि यह कुसंस्कार हो भी तो
क्या हानि है; मुसीबतों के दिनों में तो मुझे इस संस्कार ने सहारा ही दिया।
गिरफ़्तार होने के पहले मेरी मां ने मुझे बतलाया था कि मेरी जन्मपत्री
बनारस के प्रसिद्ध भृगुसंहितावालों को दिखलाई गई थी। उन्होंने मेरे जीवन के
अतीत, वर्तमान एवं भविष्य के बारे में जो कुछ बतलाया वह अक्षरशः सबका
सब सही निकला। मेरी गिरफ़्तारी का समय, शत्रु-परिवेष्ठित रहने का काल,
मुक्ति पाने एवं विवाह का समय, पुनः गिरफ़्तारी होने का काल, ये सबकी सब
बातें मैंने बिलकुल सही पाईं। फ़रार हालत में अदूर भविष्य में विवाह होने की
सम्भावना से अपने दिल को मैंने इस तरह तसल्ली दी कि आख़िर यह सब झंझट
और मुसीबत के दिन शीघ्र ही व्यतीत हो जाएँगे, नहीं तो शादी कैसे सम्भव हो
सकती है। जिस दिन मां के मुंह से मैंने यह सब भविष्यवाणी की बातें सुनी थीं
उसी दिन से मैं मन-ही-मन शादी के लिए तैयार हो गया था। इसके पहले हज़ारों
कोशिशें होने पर भी एवं हज़ारों प्रलोभन दिलाने पर भी मैं शादी के लिए तैयार
नहीं हुआ था। लेकिन भविष्यवाणी के कारण फ़रार हालत में विवाह की
भावना सुखकर भी थी और यह सब प्रकार के फ़सादों से निष्कृति पाने का
इंगित भी था। मन में सोचा, चलो अब क्या है, विवाह कर ही लेंगे। अनिर्दिष्ट
काल के लिए फ़रार रहना और सुनिर्दिष्ट काल के अन्दर विवाह होना भला यह
भी कोई समस्या है जिसकी मीमांसा में कोई परेशानी हो सकती है ! इस मनो-
वृत्ति से कालेपानी में मुसीबत के दिन बिताने में मुझे बहुत सहायता मिली।
आजन्म कालेपानी की सज़ा कोई दिल्लगी तो है नहीं। कितने ही राजबन्दी
इस बोझ से दब से गये थे। मानो सर्वांग पर किसी ने रोलर-सा चला दिया हो।
ऐसी अवस्था में विचारे वारीन्द्र और उनके साथी झूठे आश्वासन पर भी भरोसा
करने लगे थे। और अन्य राजबन्दीगण मजबूरी का नाम सब्र, इस कहावत को
अक्षरशः सिद्ध कर रहे थे।
दुर्भाग्यवश जिस सुपरिटेण्डेण्ट ने रिहाई का दिलासा दिलाया था, उसी ने
युद्धावसान का दिन मनाने के अवसर पर वारीन्द्र वग़ैरह को दफ़्तर में बुलाकर
यह हुक्म सुना दिया कि सरकार ने तुम्हारी सज़ा में साल पीछे एक महीना माफ़ी
दे दी है। और हम लोगों को जो अभी तक जेल के अधिकारियों के साथ झगड़ते
आए थे, बुलाकर यह हुक्म सुनाया गया कि यदि हम और साल-भर ठीक चाल-
चलन दिखाएँ तो इसके बाद हम लोगों को भी साल पीछे एक महीने की माफ़ी
दी जायगी।
यह खबर सुनकर वारीन्द्र वग़ैरह को दिन में तारे दिखने लगे थे। और हम
सब खुश हुए थे।
मैं अपनी बात जितनी निश्चयतापूर्वक कह सकता हूँ, दूसरों के मन की बात
उतने निश्चयात्मक रूप से कैसे कह सकता हूँ ! महायुद्ध के अवसान पर अंग्रेज़ों

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित) · पृष्ठ 197, कुल 408 में से · SarvaKosh