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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 194, कुल 408 में से

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पृष्ठ 194

192 / बन्दी जीवन
कर रही थी। मैं यही सोचकर परेशान हो रहा था कि कैसे मैं अपने साथियों के
सामने आकर खडा हूँगा। जिस क्षण मैंने यह सुना कि मैं मुक्त हो गया हूँ बस
जेल मे रहते हुए भी उसी क्षण से मैं यह एकाएक अनुभव करने लगा कि मैं अब
इस जगह का रहनेवाला नही हूँ मानो मैं यहाँ अतिथि हूँ, दो घडी ठहर कर बाद
को चला जाऊँगा। मेरे और सब साथियो के चेहरे जब मुझे याद आए और
उनके आजन्म द्वीपान्तर वास का दंड उनके चेहरो पर लिखा देख रहा था तो
मेरे लिए यह दृश्य असहनीय हो गया। इस दृश्य को देखते हुए मै अपनी मुक्ति
के आनन्द से कुछ भी हर्षोत्फुल्ल नही हो पाया। मुझे इस समय याद नही कि उस
दिन मेरे साथ अस्पताल मे ओर भी कोई राजबन्दी थे या नही।
जेलर ने हमे बतलाया था कि अभी हमे करीब बीस दिन अण्डमन जेल मे ही
रहना पडेगा। कैदियो को ले जानेवाला जहाज अभी अन्यत्र गया हुआ है। यह
जहाज वापस आएगा तभी मुझे उस पर सवार कराया जाएगा, इन बीस दिनो
तक मुझे जेल के अन्दर ही रहना पडेगा। जेल का ही भोजन नसीब होगा और
दूसरे कैदियो की तरह रात को कोठरी मे ही सोना पडेगा। मैन एक बार यह
आग्रह किया था कि कम-से-कम एक दफा तो मुझे जेल के बाहर अण्डमन टापू
का दृश्य देखने का मौका दिया जाए। आजन्म कालेपानी की सजा लेकर आए,
चार साल तक जेल के अन्दर ही रहे, अब जन्मभूमि की तरफ लौटने के पहले
तो एक स्वाधीन व्यक्ति की तरह अण्डमन टापू को देखने का मौका मिले। लेकिन
मेरी प्रार्थना स्वीकार नही की गई। यह अजीब परिस्थिति थी कि मै रिहा भी
कर दिया गया था, लेकिन बीस दिन तक जेल के बाहर भी नहीं जा सकता था।
खाना, पीना, रहना जेल के अन्दर ही दूसरे कैदियो की तरह ही होना रहा।
आजन्म कालेपानी की सजा पाकर साल के प्रति दिन, प्रति घडी जिस सुअवसर
की बाट जोह रहा था वह दिन आ गया। लेकिन जब वह दिन आया तो वह
कल्पनातीत हर्ष मैने क्यो नही अनुभव किया ? इसका उत्तर आज भी मैं ठीक
तरह से नही दे सकता। दूसरे बहुत-से कैदियो को मैंने छूटते हुए देखा। उन
कैदियो के हर्षोद्वेग की सीमा नही रहती थी। वे आपे से बाहर हो जाते थे, स्वप्ना-
विष्टो की तरह विह्वल होकर वे इधर-उधर घूमा करते थे। मुझे ठीक मालूम
है कि मै विह्वल नही हुआ। सम्भव है कि अपने दूसरे साथियो की अवस्था को
सोचकर अनजाने ही मैं अपने हृदयावेग को सहज तरीके से सहन कर पाया।
ऐसी परिस्थिति मे अस्पताल को छोडकर अपनी बैरक मे मैं अपने साथियो के
बीच वापस आया।
अस्पताल से अपनी बैरेक मे लौटने तक जेल-भर मे यह समाचार फैल गया
कि भारत के सर्वप्रथम षड्यन्त्र केस के कैदी वारीन्द्र, उपेन्द्र एव हेमचन्द्र भी
छूट गये हैं। और वे भी मेरे साथ एक ही जहाज मे स्वदेश लौटेगे। उन्हे भी मेरी
तरह अभी बीस दिन तक और जेल मे ही रहना पडेगा।
बैरक मे पहुँचते ही मेरे सब साथी मेरे पास आ खडे हुए, चारो तरफ से मुझे