बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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है। और बुद्ध-जीवनी दुष्प्राप्य है। वारीन्द्र और हेमचन्द्र के पास सौ-दो-सौ से
भी अधिक अति उत्कृष्ट पुस्तकें थीं। ये सब पुस्तकें वे अपने साथ वापस ले आए
थे। जहाज आने मे अभी कुछ दिन बाकी थे कि इतने में खबर आई कि सन्
1919 के पंजाब के मार्शल-ला मे सजा पाए कें दियो मे से अठारह कैदी रिहा किये
गए, ये भी सब मेरे ही साथ एक ही जहाज मे भारत वापस भेजे जाएँगे।
बैरक मे लौटने के बाद यह भी पता चला कि जिस दिनसुबह जेलर ने मुक्ति का
संवाद सुनाया था, उमी दिन करीब दम-ग्यारह बजे जेल के सुपरिटेण्डेण्ट ने
वारीन्द्र, हेमचन्द्र और उपेन्द्र को भी उनके मुक्त होने का संवाद सुनाया
था। वारीन्द्र और हेमचन्द्र हमेशा दफ्तर आया-जाया करते थे। जेल के अन्दर
एक छोटा-सा छापाखाना था। इसका सब काम वागीन्द्र के सुपुर्द किया गया
था। जेल मे जिल्दसाजी का काम भी होता था। यह काम हेमचन्द्र के सुपुर्द था।
अपने काम के सिलसिले मे ये हमेशा दफ्तर आते