सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 195, कुल 408 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 195

रिहाई की सूचना / 193
घेर लिया और सब बातें पूछने लगे । अपने कल्पना-नेत्रों से जो चित्र मैंने देखा
था वही दृश्य मेरे सामने आया । अभी दो-एक दिन ही पहले जिन साथियों के
साथ हम अपने बन्धन के दिन बिता रहे थे, आज उन्हीं साथियों के बीच होते हुए
भी कैसे उन्हें गैर समझने लगे मानो मैं और मेरे वे साथी दो अलग-अलग दुनिया
के निवासी हैं । यह बात कहने की न थी, हमसे प्रत्येक ने अपने मर्म स्थान में
इस बात का अनुभव किया । एक तरफ मुझमें आनन्द की दबी हुई आशा थी,
दूसरी तरफ वेदना की स्फुट व्यंजना। यह अजीब परिस्थिति थी अपने अनजान
में ही मैं यह अनुभव कर रहा था । अपने स्वाभाविक अभूतपूर्व कल्पनातीत
आनन्द को व्यक्त करना इस अवस्था में तो नितान्त अपराध ही हो गया । इस
प्रकार से अनजाने ही प्रतिक्षण अपने भावों को छिपाने का व्यर्थ प्रयास करता
रहा ।
सम्भव है, मेरे साथियो के मन मे बन्धन में पड़े रहने की वेदना के साथ
मुक्ति पाने की भी क्षीण आशा की झलक दिखलाई दी हो; सम्भव है कि
भविष्य में मुक्ति न पाने की आशंका से वे अत्यन्त वेदना का अनुभव कर रहे
हो ।
उनमे से जो सबसे कम उम्र का युवक था उसने मुझसे एक पुस्तक स्मृति-
चिह्न-स्वरूप मांगी। मैं उस समय सब-कुछ दे सकता था, मैंने सहर्ष अपनी पुस्तकों
में से एक पुस्तक उसे दे दी । इस प्रकार मैंने अपनी सब पुस्तकें सेल्यूलर जेल-
निवासी बहुत से राजबन्दियों को स्मृतिचिह्न-स्वरूप दे दीं । मेरे लिए पुस्तकों से
अधिक और कोई प्रिय वस्तु नहीं है । मैं कोई धनी व्यक्ति नहीं था । चौदह-
पन्द्रह वर्ष की अवस्था में ही मेरे पिता का देहान्त हो गया था । पिताजी इंश्यो-
रेंस इत्यादि मे कुछ छोड़ गए थे, उसी से हम चार भाइयों तथा मेरी विधवा माता
का निर्वाह हो रहा था। मुक्ति के बाद भी, इन पुस्तकों में से कुछ तो आजकल
अप्राप्य ही हैं, तथापि उनके लिए जो जीते-जी कब्र मे रह गए, उसी कब्र से
मुक्ति पाने के दिन मैं क्या न दे सकता था । केवल एक पुस्तक मैंने अपने पास
रख ली । वह पुस्तक थी, ईसाइयों की धर्म-पुस्तक — होली बाइबिल और इसमें
मेरे पिताजी के हस्ताक्षर थे । मैंने अपने साथियों को जो पुस्तकें दे दी थीं उनमें
से जिनके नाम मुझे याद हैं, वे हैं—

  1. Liberation of Italy by Countess Matrinengo ceseresco.
  2. Life of Voltaire by Morley.
  3. Life of Rousseau by Morley.
  4. Life of Gladstone by Morley.
  5. बुद्ध जीवनी—डॉ० रामदास सेन ।
    6 दो-तीन वर्ष के भारतवर्ष और प्रवासी मासिक पत्रों की फाइलें ।
    अन्य लगभग आठ-दस पुस्तकें भी थी, जिनका नाम मुझे इस समय याद नहीं
    है। इनमें पहली पुस्तक आजकल लाइब्रेरियों में छोड़कर अन्यत्र नहीं मिल रही