बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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के प्रति असन्तुष्ट थे। शायद इसका एक कारण यह था कि पूर्व बंगाल की अनु-
शीलन समिति के प्रायः सभी सदस्यों के मन में कुछ ऐसे गर्व का भाव था कि
उनके समान शक्तिशाली दल बंगाल में और कोई नहीं है। जान पड़ता है कि
इसीलिए पश्चिम बंगाल के विप्लव दलों का पूर्व बंगाल के दो-एक छोटे-छोटे
विप्लव दलों के प्रति वैसा द्वेष न था जैसा इस ढाका समिति के प्रति था। ऐसा
होने का एक और कारण भी था। ढाका समिति पुलिन बाबू द्वारा स्थापित हुई
थी। और इन पुलिन बाबू की प्रकृति में स्वेच्छाचारिता (autocracy) का भाव
भयानक रूप से प्रबल था। पुलिन बाबू सचमुच और किसी के साथ मिलकर
काम करने के पक्षपाती न थे। पुलिन बाबू का आधिपत्य जहाँ जरा भी कम हो
वहाँ पुलिन बाबू का रहना असम्भव होता, इस अंश में पुलिन बाबू और वारीन
बाबू एक ही प्रकृति के आदमी थे। इसी कारण पुलिन बाबू की विद्यमानता में
ढाका की समिति और किसी समिति के साथ न मिल सकी, और बहुत कुछ
पुलिन बाबू के कारण ही उसी समय से बंगाल के सभी दल ढाका समिति के प्रति
असन्तुष्ट हो जाते हैं और समय बीतने पर वही असन्तोष की आग क्रमशः बुरा
रूप धारण कर लेती है। असल में मिल-जुलकर काम करने के लिए जो समझौते
की प्रवृत्ति (compromising attitude) होनी चाहिए, पुलिन बाबू में उस
जिन्स का विशेष अभाव था। किन्तु पुलिन बाबू को जेल होने के बाद ढाका
समिति में एकछत्र आधिपत्य और किसी का नहीं रहता। तभी से यह समिति
बहुत-कुछ गणतन्त्र के आदर्श पर गठित हो गई। बंगाल के भिन्न-भिन्न दल अपने
नेताओं के नाम से ही परिचित थे, जैसे यतीन बाबू का दल, विपिन बाबू का दल
इत्यादि। किन्तु पूर्व बंगाल की इस ढाका समिति का कोई एक निर्दिष्ट नेता न
रहने से यह अन्त तक ढाका अनुशीलन समिति के नाम से ही परिचित होती आई
है। इस प्रकार सर्वांश में एक व्यक्ति के नेतृत्व में न रहने से यह दल कुछ कम
शक्तिशाली हो गया हो सो भी नहीं, कारण कि जितने आँधी-तूफानों में से इस
ढाका समिति को गुजरना पड़ा है उतने किसी और दल ने भी सहे हैं कि नहीं
इसमें सन्देह है। बार-बार विषम विपत्तियों में पड़कर भी फिर यह दल सिर
उठाकर खड़ा हो गया है। पूर्व बंग के युवकों की यही एक विशेषता है कि वे एक
बार जिसे ग्रहण कर लें उसे जीवन रहते तक चिपटकर पकड़े रहते हैं। पश्चिम
बंग के लोग पूर्व बंगाल के चाहे जितने दोष देखा करें, मुझे तो प्रतीत होता है कि
पूर्व बंगाल के युवक पश्चिम बंग के युवकों की अपेक्षा अधिक सरल और अधिक
दृढ़प्रतिज्ञ निकलते हैं। पश्चिम बंग के लोगों में आन्तरिकता कम है, और स्वदेशी
युग के इतिहास की आलोचना करने से देखा जाता है कि पूर्व बंगाल सभी प्रकार
से राष्ट्रीय कार्यों में पश्चिम बंगाल की अपेक्षा अधिक अग्रसर रहा है। पूर्व बंगाल के
युवक और सब बातों में अच्छे हैं, पर उनमें यह एक बड़ा दोष है कि वे अनेक बार
बड़े तिकड़मी (in riguing) साबित होते हैं और उनमें, मालूम होता है, संकीर्ण
प्रादेशिकता का भाव भी कुछ प्रबल है। खैर, जो भी हो, पुलिन बाबू के बाद ढाका
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समिति के जो नेता हुए, उन्होंने बहुत कुछ समझ लिया था कि देश के भिन्न-भिन्न
विप्लव दल मिल-जुलकर सम्पूर्ण रूप से एक न हो जाएंगे तो देश का मंगल नहीं
है। इसी से वे देश के सभी दलों के साथ मिलने को इच्छुक थे, इसीलिए सम्भवतः
बारी-साल षड्यंत्र के मामले के समय ही ढाका समिति चन्दननगर दल के साथ
मिल जाती है। काशी का दल भी इस ढाका समिति की मार्फत ही रासबिहारी
के उत्तर भारत के दल के साथ परिचित हुआ। इस प्रकार हमारा दल पूर्व बंगाल
से लेकर पंजाब तक फैलकर एक साथ काम करता रहा। पंजाब के विप्लवायोजन
के संवाद भी अधिकांश स्थानों में इसी ढाका समिति की मार्फत ही बंगाल के
भिन्न-भिन्न विप्लव दलों के पास भेजे जाते थे। लाहौर, दिल्ली, काशी,
चन्दननगर और ढाका के विप्लव दल इस प्रकार बिलकुल एक हो जाते हैं। किन्तु
इस बात को बंगाल के अन्यान्य विप्लव दल उस समय घुणाक्षर न्याय से भी न
जान सके थे।
जिस समय डिफेंस ऑफ इंडिया एक्ट (भारत रक्षा क़ानून) से कई हज़ार
युवक केवल सन्देह के फेर में बिना विचारे क़ैद हो गए, उस समय बंगाल के सभी
दलों ने शक्तिहीन होकर परस्पर मिल-जुलकर एक साथ काम करने की इच्छा
प्रकट की ओर कुछ दिन तक उस प्रकार कार्य चला भी। यह मिलाप यदि समय
रहते हो जाता तो शायद फल और ही तरह का हो सकता था। रासबिहारी भारत
छोड़ने से पहले जब एक बार कलकत्ता के निकट कही आए, उस समय उन्होंने
कलकत्ता अंचल के भिन्न-भिन्न दलो के निकट मिलकर एक हो जाने का प्रस्ताव
कर भेजा। किन्तु कलकत्ता अंचल के किसी भी दल ने इस मिलने के प्रस्ताव की
कुछ परवाह नही की। विवश होकर रासूदा को इस चेष्टा से हाथ खींचना पड़ा।
जो हो रासूदा की विदेश यात्रा के बाद भी हम इस पूर्व बंगाल के दल के
साथ पहले की तरह ही मिलकर काम करने लगे। रासूदा की विदेश यात्रा का खर्च
एक हज़ार रुपया, इसी ढाका समिति से लिया गया। जिस समय रासूदा को
विदेश भेजा गया तब तक भी बंगाल के विप्लव दलों की शक्ति कुछ भी कम न
हुई थी। प्रत्युत उस समय बगाल के भिन्न-भिन्न विप्लव दलों के बीच
प्रतियोगिता चलती थी कि कौन कितना काम करके दूसरे दलों को लज्जित कर
सकता है। रासूदा को विदेश भेजकर हमने समझा था कि विदेश से अस्त्र मँगाने
की चेष्टा हमारे दल से ही सबसे पहले हुई है, किन्तु हम उस समय न जानते थे कि
यतीन बाबू के दल ने भी ठीक इसी समय अपने आदमी विदेश भेजे थे। देश में
चाहे हम भिन्न-भिन्न दल इस प्रकार विच्छिन्न होकर कार्य करते थे किन्तु विदेश
में उस समय सभी दल, मालूम होता है, मिल गए थे।
इस समय की घटनाएं भली भाँति मेरी जानी नहीं हैं, विशेषकर विदेश में
किस प्रकार काम चलता था उसकी अनेक बातें मैं नहीं जानता, क्योंकि रासूदा के
विदेश जाने के दो-तीन मास बाद ही मैं पकड़ा गया। तो भी पूर्व बंग के गिरिजा
बाबू जब नवम्बर मास (सन् 1915) में पकड़े जाकर काशी आए थे तब उनसे
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सुना था कि रासदा ने कहीं संवाद भेजा है कि वे शीघ्र ही देश वापस आने वाले
हैं। उनके साथ बात थी कि विप्लव चलाने के लिए उपयुक्त अस्त्र-शस्त्र यथेष्ठ
परिमाण में पहुँचाने का पूरा बन्दोबस्त कर चुकने पर ही वे देश आएँगे, इसी से
उनकी 'देश वापस आता हूँ' यह खबर पाकर हमने समझा कि उन्होंने अस्त्र-शस्त्र
पहुँचाने का कोई अच्छा बन्दोबस्त कर लिया है। किन्तु ठीक उसी समय एक
और विश्वस्त सूत्र से हमने जान पाया कि सरकार बहादुर विदेश से अस्त्र लाने
के सभी संवाद जान गई थी और भारतवर्ष के तट के निकट दो-तीन अस्त्र भरे
जहाज भी कहीं पकड़ लिये गए हैं। पीछे रौलट कमेटी की रिपोर्ट में अनेक बातें
पढ़ीं। विगत विप्लव युग के इतिहास का यह अंश श्रीयुत नलिनीकिशोर गुह
प्रणीत 'बांग्लाय विप्लववाद' में विस्तृत रूप से आलोचित हुआ है। विप्लव युग
के इस अंश को मैं नलिनी बाबू के ग्रन्थ से ही कुछ-कुछ उद्धृत करके पाठकों की
भेंट करूँगा।
(4) विदेश में भारतीय विप्लववादी गण
भारत की विप्लव चेष्टा को सार्थक करने के लिए विदेशी राजशक्ति की
सहायता अत्यन्त आवश्यक है, यह बात भारत के प्रायः सभी विप्लववादी स्वीकार
करते थे। वे जानते थे कि पृथ्वी पर अंग्रेजों के जो अनेक शत्रु हैं, सुविधा और
सुयोग पाने पर वे भारतवासियों को भी अंग्रेजों के विरुद्ध सहायता देने में पीछे न
रहेंगे, और यदि भारतवर्ष में वैसे उपयुक्त नेताओं का आविर्भाव हो जाय तो वे
एक ऐसी अन्तर्राष्ट्रीय समस्या की सृष्टि कर सकेंगे जिसके द्वारा पृथ्वी के शक्ति-
शाली साम्राज्यों के बीच प्रतिद्वन्द्विता और ईर्ष्या का सदुपयोग करके वे भारतवर्ष
को स्वाधीनता के उच्च शिखर पर ले जाने में समर्थ हो जायँ।
संसार में ऐसे दृष्टान्तों का अभाव नहीं है जहाँ प्रबल राजशक्तियों के परस्पर
के द्वन्द्व के कारण अपेक्षाकृत दुर्बल जातियाँ प्रबलों के ग्रास से छुटकारा पा गई
हैं। एवं पुराने जमाने की अपेक्षा आजकल यह बात, मालूम होता है, और भी
निःसंशय रूप से कही जा सकती है कि पृथ्वी पर ऐसा कोई भी देश नहीं है
जिसके भले-बुरे अथवा उत्थान-पतन के साथ पृथ्वी के अन्य देशों का कोई भी
सम्बन्ध अथवा स्वार्थ न हो। इसी से भारत के विप्लववादियों की दृष्टि पहले से
ही विदेश की तरफ़ आकर्षित हुई थी। किन्तु वे यह भी भली प्रकार जानते थे कि
भारत का विप्लव दल यदि उपयुक्त रूप से शक्तिशाली न होगा तो विदेशियों की
सहायता भारतवासी ग्रहण न कर सकेंगे, और सहायता ले सकनेवाले आदमी न
रहें तो सहायकों के रहने से भी कुछ नहीं बनता। प्रबल की सहायता और प्रबल
की दुर्बल को निगल लेने की चेष्टा इन दोनों के बीच जो भेद है उसे भारत के
विप्लववादी खूब समझते थे, और ठीक इसी कारण से बहुत दिन तक, जब तक
घर में शक्ति न थी, देश के विप्लव दल ने विदेशों की ओर दृष्टि नहीं लगाई थी।
किन्तु विप्लव चेष्टा के आरम्भ से ही इस प्रकार विदेशों की ओर दृष्टि रखी
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जाती तो गत जर्मन-युद्ध के समय भारत का विप्लवायोजन बिलकुल व्यर्थ न होता।
भारतीय विप्लव दल में वैसे कोई दूर दृष्टिवाले प्रतिभावान् उपयुक्त पुरुष न
रहने से ठीक समयानुसार वे देश को भी तैयार न कर सके, और ठीक किस समय
से विदेशियों के साथ सम्बन्ध सूत्र स्थापित करना उचित है, यह भी वे निर्णय न
कर सके।
विप्लववादी भारतवासियों में से सबसे पहले श्यामजी कृष्ण वर्मा विदेश गए
और उनके संस्पर्श से और उनकी चेष्टा से अनेक विदेशस्थ भारतीय युवक विप्लव
धर्म में दीक्षित होते रहे। सन् 1905 के दिसम्बर महीने में श्यामजी ने इस बात
का विचार किया कि छः उपयुक्त भारतवासियों को छः हजार रुपया वृत्ति
देंगे जिससे वे यूरोप, अमेरिका और पृथ्वी के अन्यान्य स्थानों में घूमकर भारत-
वासियों को स्वाधीनता के मन्त्र में दीक्षित करने के लायक शिक्षा उपार्जन कर
सकें। इसी समय एस० आर० राणा नामक एक महाराष्ट्र के सज्जन ने श्यामजी
के पास पैरिस से इसी विषय का एक पत्र लिखा कि वे भी तीन भारतवासियों को
छः हजार रुपया राह खर्च के लिए वृत्ति देंगे, और ये वृत्तियां राणा प्रतापसिंह,
शिवाजी और किसी स्वनामधन्य मुसलमान राजा के नाम पर समर्पित की जायेंगी।
इनका उद्देश्य था इस प्रकार उपयुक्त शिक्षित भारतवासियों को भारत के बाहर
लाकर विप्लव कार्य में उपयुक्त कार्यकर्त्ता रूप से तैयार कर देना। किन्तु इनकी
चेष्टा से कोई विशेष कार्य हुआ कि नहीं, मुझे मालूम नहीं।
ईसवी सन् 1906 में विनायक दामोदर सावरकर नामक एक प्रतिभावान
महाराष्ट्र-ब्राह्मण लन्दन में बैरिस्टरी पढ़ने गए और इनके आने पर श्यामजी कृष्ण
वर्मा का कार्य खूब तेजी से अग्रसर हुआ। किन्तु ये भी विदेश की किसी भी राज-
शक्ति के साथ कोई भी सम्बन्ध-सूत्र स्थापित नहीं कर पाये।
विनायक सावरकर लन्दन में ही रहते थे। जब बंगाल के प्रसिद्ध हेमदास भी
विलायत गए, किन्तु हेमदास बम और विस्फोटक पदार्थ बनाने की शिक्षा पाने की
खातिर ही विदेश गए थे, इसी से उन्होंने भी विदेशी राजशक्ति के साथ कोई भी
सम्बन्ध स्थापित करने की चेष्टा नहीं की।
पंजाब के विख्यात लाला हरदयाल भी इस समय विलायत में थे एवं विला-
यत के विप्लववादियों के संस्पर्श में आकर वे भी पूरे उद्यम से विप्लव कार्य में
योग देने लगे, किन्तु इन्होंने भी उस समय किसी राजशक्ति की सहायता लेने की
ओर ध्यान नहीं दिया।
इसी बीच स्वदेशी आन्दोलन की प्रबल बाढ़ में बंगाल प्लावित हो गया और
बंगाल के अशान्त युवकों के मन-प्राण, उस समय दुस्साध्य साधन में, विपत्ति के
मुंह में कूद पड़ने लगे। इतने दिन तक केवल धनियों की ही सन्तान बैरिस्टरी
अथवा आई० सी० एस० पढ़ने के लिए अथवा विलायत के भोगविलास के दृश्य
अपनी आँखों देख आने के लिए ही भारत के बाहर जाया करती थी, किन्तु बंगाल
के नवजागरण के प्रभाव से कई युवक देश सेवा के आदर्श से उद्बुद्ध होकर और
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दूसरे ऐसे भी अनेकों जो देश शान्त, सुबोध, भले लड़के होने की ख्याति पाने से
वंचित थे, जिनकी उद्दाम प्रकृति की अशान्त गति देश की आबहवा में प्रकाशित
होने का सुयोग न पाती थी—ऐसे भी अनेकों युवक अमेरिका में आ इकट्ठे हुए।
इनमें से श्रीयुत तारकनाथदास के नाम से हम लोग सुपरिचित हैं।
श्यामजी कृष्ण वर्मा लन्दन में कुछ दिन काम करने के बाद अन्त में फ्रांस
भाग आने को विवश हुए। इस समय पैरिस में एक विप्लववादी पारसी रमणी
भी थी, जिसका नाम था मैडम कामा।
लाला हरदयाल भी इसी बीच एक बार देश आकर फिर अमेरिका वापस
चले आए। अमेरिका के कुछ विश्वविद्यालयों में उन्होंने बीच में कुछ दिन हिन्दू-
दर्शन-शास्त्र के अध्यापक का काम भी किया। इसी समय तारकनाथदास भी
अमेरिका के एक विश्वविद्यालय में अध्यापक नियुक्त हो गए। इनके सिवाय और
भी एक बंगाली सज्जन इस समय अमेरिका के एक विश्वविद्यालय में अध्यापक
का कार्य करते थे। यही 'बांग्लाय विप्लववाद' में उल्लिखित सुरेन्द्रकर थे कि
नहीं, कह नहीं सकता। अमेरिका में 'गदर' दल स्थापित होने के कुछ दिन बाद
लाला हरदयाल और बंगाली अध्यापक ने एक बार अमेरिका के तत्कालीन प्रेसी-
डेण्ट के साथ भेंट की और उनसे अनुरोध किया कि अमेरिका में भारतवासियों
को युद्ध-विद्या सीखने और अन्यान्य कई विषयों में सुयोग दिया जाय। अमेरिका
के प्रेसीडेण्ट ने उनसे भेंट ही की; उनके किसी अनुरोध को माना नही। इधर
अकृतकार्य होकर उन्होंने एक अन्य राजशक्ति के पास अपना आवेदन रखा और
इस दफ़ा उनका आवेदन स्वीकृत भी हो गया। इस घटना का इस पुस्तक के प्रथम
भाग में (तीसरे परिच्छेद में) उल्लेख किया गया है। किन्तु अमेरिका के इस
विप्लव दल के साथ भारत के विप्लव दल का वैसा सम्बन्ध न था।
इसी समय या इससे कुछ पहले बंगाल की एक विप्लव समिति की ओर से
एक युवक को बर्लिन भेजा गया, किन्तु ये जर्मन सरकार के ऊपर कुछ भी प्रभाव
न डाल सके। विदेशी राजशक्ति पर प्रभाव डालने के लिए जिस योग्यता और
चरित्रबल की आवश्यकता होती है, इस युवक में इसका अभाव था।
जो हो, जिस समय अमेरिका में विप्लव दल एक विदेशी राजशक्ति के साथ
सम्बन्ध सूत्र स्थापित करने में कृतकार्य हुआ उससे कुछ ही दिन बाद यूरोप का
महायुद्ध छिड़ गया; और लाला हरदयाल, तारकनाथ आदि अमेरिका छोड़
यूरोप भाग आए। उनकी विप्लव की सुन्दर योजना इस प्रकार विफल हो गई।
लालाजी पहले कोन्स्टैण्टिनोपल आए और फिर जेनेवा होकर बर्लिन में
अन्यान्य भारतीय विप्लववादियों के साथ आ मिले।
यूरोपियन युद्ध आरम्भ होते ही अलीगढ़ जिले के एक समृद्ध ज़मींदार श्रीयुत
महेन्द्रप्रतापसिंह स्विटज़रलैंड गए। लाला हरदयाल के जेनेवा आने पर महेन्द्र-
प्रताप के साथ उनकी भेंट हुई। लाला हरदयालजी के साथ वे बर्लिन आ उपस्थित
हुए। इस प्रकार महेन्द्रप्रताप भारतीय विप्लव दल में आ मिले।
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लाला हरदयाल आदि के चले आने पर अमेरिका के विप्लव दल का भार
रामचन्द्र नामी एक विप्लववादी सज्जन पर डाला गया ।
इससे पहले ही यूरोप में भारतीय विप्लववादी एक दल संगठित कर चुके
थे, इस यूरोपियन विप्लव दल के नेताओं में डा० चक्रवर्त्ती और श्रीयुत वीरेन
चट्टोपाध्याय प्रमुख थे ।
ये वीरेन चट्टोपाध्याय हमारे अघोर चट्टोपाध्याय महाशय के पुत्र हैं। श्रीमती
सरोजिनी नायडू और 'शमा' पत्रिका की वर्त्तमान सम्पादिका श्रीमती मृणालिनी
चट्टोपाध्याय इन्हीं वीरेन्द्र की ही बहनें हैं। वीरेन्द्र ने एक धर्मप्राण रोमन कैथो-
लिक युवती¹ का पाणिग्रहण किया है किन्तु इन दम्पति में यथेष्ठ प्रेम रहने पर
भी इन दोनों के ही धर्म-विश्वास इतने दृढ़ थे कि इनमें परस्पर इन धर्म-विश्वासों
के कारण बड़ी अशान्ति रहती, इसी से अन्त में इन्होंने अलग रहना आरम्भ कर
दिया। अब भी इनमें से किसी ने दूसरा विवाह नही किया और एक-दूसरे से दूर-
दूर रहने पर भी इनके प्रेम में कोई व्यतिक्रम नही हुआ । वह ही युवती अब भी
चट्टोपाध्याय महाशय का सब खर्च-भार उठाती है ।
खैर, यूरोपियन महायुद्ध आरम्भ हो जाने पर अमेरिका और यूरोप के
विभिन्न विप्लव दलों के नेता जर्मनी मे एकत्र हो गए और जर्मन सरकार के
राजप्रतिनिधियों के साथ परामर्श करके एक साथ भारत में विप्लव संघटन का
आयोजन करने लगे ।
जर्मनी मे जो सब भारतीय विप्लवी इकट्ठे हुए थे उनमें से हरदयाल,
तारकनाथ, बरकतुल्ला, चन्द्रकुमार चक्रवर्त्ती, हेरम्बलाल गुप्त, वीरेन्द्र सरकार,
महेन्द्रप्रताप और चम्पकरामन पिल्लै का नाम हम रोलट कमेटी की रिपोर्ट में देख
पाते हैं। चम्पकरामन स्विटजरलेंड के विप्लव दल के सभापति थे । वीरेन चट्टो-
पाध्याय का नाम हमने बहुत बार अनेक कागजों में देखा है।
पहले हरदयाल आदि कई एक सज्जनो ने जर्मनी के बाहर से सम्भवतः
स्टाकहाल्म शहर से एक पत्रिका निकाली । यह पत्रिका निकालने का उद्देश्य था
यूरोपियन देशो की भारतवासियों के प्रति सहानुभूति प्राप्त करना और अंग्रेज
किस प्रकार इस बीसवी शताब्दी मे भारत पर शासन करते हैं उसका विस्तृत
परिचय यूरोप वालो को देना । यूरोप और अमेरिका में भारत-विषयक ज्ञान के
प्रचार करने से कितना लाभ है, आज भी हमारे देश-नायक यह भली प्रकार नही
समझ सके, क्योकि यदि वे समझ पाते तो उम तरफ अवश्य ध्यान देते ।
इस प्रकार अपने स्वार्थों की सिद्धि के लिए प्रचार-कार्य में अंग्रेज कितना
रुपया खर्च करते हैं और कैसे विचारशील उपयुक्त व्यक्तियो को इस काम में
नियुक्त करते और उनकी कैसी सहायता करते हैं, यह हमारे देश-नायकों की
नजर मे अभी तक नही पड़ा, इसी से आज भी जब विदेशों में कुछ भारतवासी
- उनका नाम है—ग्नेसस्मैंड्ले । उनके लेख प्राय. भारतीय पत्रिकाओ में छपा करते हैं ।
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इस बात का प्रचार करते हैं कि भारतवासी संसार में स्वाधीन होकर ही रहना
चाहते हैं तब हमारे अपने देश में देश के नेतागण ब्रिटिश साम्राज्य की महिमा का
कीर्त्तन करते हैं। खैर, जाने दो उस बात को।
एक तरफ जैसे प्रचार का कार्य चलने लगा दूसरी तरफ वैसे ही भारतवासियों
का अस्त्र-शस्त्र जुटवा देने का भी आयोजन आरम्भ हो गया; सब कुछ हुआ पर
समय पर कुछ भी न हुआ। चीन के शांघाई शहर में जर्मनी के जो राजप्रतिनिधि
(German Consul General) थे, उन्हीं के ऊपर यह अस्त्रादि भिजवाने का
सब भार था। फिर ये भी अमेरिका के वाशिंगटन शहर में जो जर्मन राजप्रतिनिधि
थे उनके आदेशानुसार सब काम करते थे। इस प्रकार यूरोप और अमेरिका के
सभी भारतीय विप्लव नेता जर्मनी के राजप्रतिनिधि और युद्धसचिवों की सह-
कारिता से भारत में विप्लव की आग प्रज्वलित करने का आयोजन करने लगे।
जर्मन के विभिन्न विद्यापीठों में जो सब भारतीय युवक पढ़ते थे, अंग्रेजों के
साथ युद्ध छिड़ते ही जर्मन गवर्नमेंट ने पहले उन्हें कैद कर लिया और पीछे उनमें
से बहुतों को भारत में विप्लव प्रचार कार्य के लिए सहमत कर लिया और उनके
हाथ में भरपूर रुपया देकर उन्हें भारत भेज दिया, तब भी सम्भवतः यूरोप के
(भारतीय) विप्लववादियों के साथ जर्मन गवर्नमेंट की कोई बातचीत न हुई थी।
इस प्रकार जर्मनी से रुपया लेकर जो देश में आए उनमें से प्रायः सभी ने वह
रुपया हजम कर लिया। उनमें से केवल दो-एक व्यक्तियों ने देश में आकर विप्लव
दल के लोगों के साथ भेंट की। यूरोपियन विप्लव दल यदि पहले से ही सतर्क
और चेतन होकर कार्य करता तो ये सब विश्रृंखल घटनाएँ होने की सम्भावना न
रहती। रोलट कमेटी की रिपोर्ट पढ़कर तो मालूम नहीं होता कि यूरोप में वैसा
कोई शक्तिशाली विप्लव दल था, अमेरिका के 'गदर' दल ने ही यूरोप में जाकर
जो कुछ हो सका, किया।
जो हो, जर्मन एक्सपर्ट् स (विशेषज्ञों) के साथ परामर्श करके तय हुआ कि
बर्मा के सीमा के पास ही भारत में विप्लवप्रवासी युवकों को युद्ध-विषयक कुछ-
कुछ शिक्षा देकर बर्मा पर आक्रमण करना होगा और जिस किसी उपाय से हो,
विप्लव चलाने के लिए उपयुक्त अस्त्र-शस्त्र भारतवर्ष में विप्लववादियों के हाथ
में पहुँचा ही देने होंगे। 'गदर' दल के कुछ सिक्ख जैसे भारतवर्ष में आए थे वैसे
ही और भी बहुत-से सिक्ख उस समय अमेरिका, चीन और मलय उपद्वीप में भी
थे; इनके द्वारा ही बर्मा पर आक्रमण करने का उद्योग चलता था। उस समय
बटेविया (जावा की राजधानी), मनीला (फिलिपाइन्स की राजधानी), बेंकाक
(स्याम की राजधानी) और शांघाई आदि स्थानों में भारतीय विप्लववादियों का
आना-जाना हरदम जारी था।
इधर जैसे 'गदर' दल का आयोजन चलने लगा; उधर वैसे ही भारत के दल
भी बाहर के विप्लव दल के साथ मिल जाने की यथाशक्ति चेष्टा करने लगे।
सम्भवतः 1915 ईसवी के फरवरी महीने में यतीन बाबू के दल के श्रीयुत भोला-
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नाथ चट्टोपाध्याय बैंकाक गए, किन्तु इनके द्वारा कार्य कितना आगे बढ़ा यह कह
नहीं सकता। यतीन्द्रनाथ लाहिड़ी नामक एक युवक के यूरोप से आने के बाद ही
उनके कथनानुसार यतीन बाबू के दल के नरेन्द्रनाथ अप्रैल मास में पहले बटेबिया
गए और तभी से असल कार्य आरम्भ हुआ। रासबिहारी भी अप्रैल मास में
शांघाई में थे। बटेविया और बैंकाक का सम्पूर्ण आयोजन शांघाई के जर्मन
कौंसल जनरल के परामर्श से और 'गदर' दल की सहायता से ही चलता था।
बटेविया के 'गदर' दल के साथ बंगाल के दल का संयोग स्थापित हो गया था।
29 अप्रैल, 1915 के दिन कैलिफोर्निया के सानपेड़ो बन्दर से मैवरिक नामी
एक जहाज भारत के उपकूल की ओर प्रस्थित हुआ। यह जहाज पहले स्टैंडर्ड
आयल कम्पनी का तेल लाने ले जाने के काम आता था, पीछे सानफ्रांसिस्को की
एक जर्मन कम्पनी ने इसे खरीद लिया था। चलते समय इस जहाज में सब
मिलकर पच्चीस कर्मचारी और पांच नौकर बने हुए व्यक्ति थे। ये अपने को
ईरानी बतलाते थे, पर ये असल में भारतवासी ही। सानफ्रांसिस्को के जर्मन
कौन्सिल और विप्लव दल के रामचन्द्र के उद्योग से ही यह जहाज भेजा
गया था। बात थी कि आनी लार्सन (Aannie Larsen) नामक एक और
छोटा जहाज अस्त्रादि लेकर इस मैवरिक के साथ रास्ते में मिलेगा और लार्सन
के अस्त्रादि मैवरिक ले लेगा। किन्तु आनी लार्सन समय पर मैवरिक से मिल न
सका, इससे विवश होकर मैवरिक केवल कुछ भारतवासियों और जर्मन एक्स-
पर्ट् म (विशेषज्ञों) को लेकर बटेविया आ गया। बटेविया के उच्च अधिकारियों
ने मैवरिक की खानातालाशी कराई। किन्तु कोई आपत्तिजनक वस्तु न पाकर
मैवरिक को छोड़ दिया। दूसरी ओर आनी लार्सन (Aannie Larsen) जून
महीने के अन्त के क़रीब अस्त्रादि लेकर वाशिंगटन पहुँचा, किन्तु अमेरिका
की सरकार ने वे सब अस्त्रादि ज़ब्त कर लिए, वाशिंगटन के जर्मन कौन्सिल
ने उन सब अस्त्रों के लिए दावा किया, पर अमेरिका सरकार ने उसे नामंजूर
किया। मैवरिक अन्त में बटेविया से अमेरिका लौट आया और उसी में नरेन्द्रनाथ
(जिनका वर्तमान नाम मानवेन्द्रनाथ राय—एम० एन० राय है) अमेरिका भाग
गए।
हेनरी एस० (Henry S.) नामक एक और जहाज अस्त्रादि लेकर मनीला
पर्यन्त आ गया, किन्तु वहाँ फिलिपाइन के अधिकारियों ने वे सब अस्त्र जहाज से
उतरवा लिए। इस जहाज में बोहेम नामक एक जर्मन सेनापति थे, इन्ही पर सुनते
हैं बर्मा की सीमा के निकट भारतीय विप्लववादियों को सामरिक शिक्षा देने का
भार था। ये सिगापुर में पकड़े गए। जावा के जर्मन कौंसिल के साथ परामर्श
करके नरेन्द्रनाथ ने ठीक किया था कि मैवरिक के साथ सब अस्त्रादि बंगाल में
रायमंगल के पास उतारे जाएँगे। रायमंगल में भी इस बात का सब आयोजन हो
गया था, पर मैवरिक आया नही। जुलाई, 1915 मे अंग्रेज़ सरकार को सब बातें
मालूम हो गईं और उसके फलस्वरूप भारत मे धर-पकड़ आरम्भ हो गई।
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किन्तु इसके बाद भी रासबिहारी ने फिर देश में अस्त्र भेजने का आयोजन
किया। इस आयोजन के अनुसार दिसम्बर, 1915 में भारत में विप्लव आरम्भ
होने की बात थी। इस बार का आयोजन इस प्रकार का था कि एक जहाज
अस्त्रादि लेकर अण्डमन के सब राजनैतिक कैदियों को मुक्त करके सीधा बर्मा
पर आक्रमण करता और दूसरे दो जहाज अस्त्रादि लेकर भारत के तट पर आते।
बंगाल के विप्लव दल की सहायता करने के लिए छियासठ हजार गिल्डर्स
(हालैंड का चांदी सिक्का) लेकर एक चीनी सज्जन भारत की ओर आ रहे थे।
ये भी सिगापुर में पकड़े गए। इनके पास रुपये के अतिरिक्त पिनांग के एक बंगाली
का पता और कलकत्ते के दो पते पाये गए। सिगापुर में अवनी मुखर्जी नामक
एक और विप्लवी पकड़े गए। उनकी नोटबुक में रासबिहारी का शांघाई का पता,
शांघाई के दो चीनियों का पता, चन्दन नगर के मतिलाल राय का पता, कलकत्ता,
ढाका और कुमिल्ला के कुछ पते एवं स्याम के एक सिक्ख इंजीनियर अमरसिंह
का पता पाया गया। शांघाई में खानातलाशी हुई और जिन दो चीनियों के पते
अवनी बाबू की नोटबुक में पाये गए थे। उनके पास बहुत-से रिवाल्वर और कई
हजार गोलियां पाई गईं। पहले के आयोजन में यह ठीक हुआ था कि हेनरी एस०
जहाज अस्त्रादि लेकर स्याम के इन्ही इंजीनियर अमरसिंह के पास जाता और उन
अस्त्रों आदि का कुछ अंश अमरसिंह के जिम्मे रख देता। रोलट (सिडीशन) कमेटी
की रिपोर्ट में छपा है कि अमरसिंह को फांसी दी गई है, किन्तु इन्हीं अमरसिंह
के साथ मेरी अंडमन में भेंट हुई थी। यह सच है कि इन्हें फाँसी का हुक्म हुआ
था किन्तु दूसरे अनेक विप्लवियों के साथ इन्हें भी फाँसी के बदले आजन्म
कालापानी हो गया था।
जो कुछ अस्त्रपूर्ण जहाज भारत की ओर आते थे, सुना था कि उनमें से एक
को डच सरकार ने अन्तर्राष्ट्रीय युद्ध के नियमों के अनुसार पकड़ लिया था, और
एक को सुनते हैं अंग्रेजों के लड़ाई के जहाज़ एच० एम० एस० कार्नवाल (H. M.
S. Cornwall) ने अण्डमन के निकट डुबा दिया था। तीसरे जहाज का क्या
हुआ कह नहीं सकता। इसी बीच यतीन बाबू के दल के एक और युवक भी
शांघाई आये, किन्तु बड़ी मुश्किल से शांघाई पहुँचते ही वे पकड़ लिये गए।
इस प्रकार विप्लव योजना की तीसरी चेष्टा भी व्यर्थ हुई। यूरोपियन महा-
युद्ध आरम्भ होने के एक बरस बाद तक भी भारत के बाहर जाना-आना
वैसी कठिन बात न थी, किन्तु जब अंग्रेज सरकार को विप्लव योजना के सभी
सम्वाद मिल गए तब से भारत के बाहर जाना-आना अत्यन्त कठिन कार्य हो
गया और इसी कारण अस्त्रपूर्ण जहाज अंग्रेजों की प्रखर दृष्टि से न बच सके।
इसके सिवाय जर्मनों को भी पश्चिमी सीमान्त के युद्ध में इतना व्यस्त होना पड़ा
कि भारत ने इस प्रकार ध्यान न दे सके। भारतीय विप्लव दल भी अपने अस्तित्व
का ऐसा कुछ परिचय न दे सका कि विदेशी राज-शक्तियों की दृष्टि इधर आप-
से-आप खिचती। यदि युद्ध के बहुत पहले से ही भारतीय विप्लव दल विदेशों की
बंगाल में / 155
ओर उस प्रकार ध्यान दे सकते तो अवश्य ही और तरह का फल होता ।
जो लोग यह सोचते हैं कि संसार की इम्पीरियलिस्टिक (साम्राज्य कामी)
गवर्नमेंटों से भारतीय विप्लववादियों की सहायता पाने की आशा बिलकुल दुराशा
मात्र थी उन्हें जान लेना चाहिए कि ससार की इन साम्राज्यकामी गवर्नमेंटों की
परस्पर शत्रुता के कारण ही चीन अब तक अत्यन्त बुरी अवस्था मे रहने पर भी
एकदम असहाय होकर पराधीनता की जकड़ मे नही आया, अफ़गानिस्तान,
फारिस, तुर्की आदि देश भी इसी प्रकार विभिन्न राजशक्तियों की सहानुभूति और
सहायता पाकर ही क्रमशः एक-एक शक्तिशाली जाति के रूप मे परिणत होते
जाते हैं, पिछले बोअर युद्ध के समय जर्मनी ने बोअरों की अस्त्र-शस्त्र द्वारा कम
सहायता नही की और अभी पिछले युद्ध के कारण तुर्की की दशा तो एकदम
निढाल हो गई है, कमालपाशा ने तो उस समय एक प्रकार से तुर्की गवर्नमेंट के
विरुद्ध ही विद्रोह की घोषणा करके मित्र शक्तियो के सन्धि-पत्र को भी निकम्मा
कर दिया किन्तु ऐसा हो सका फ्रांसीसियों की सहायता से और फिर आज भी
एकदम फ्रांसीसियों पर ही बिलकुल निर्भर न रहना पड़े इसीलिए अमेरिका के
साथ अंगोरा की जान-पहचान बनाने की चेष्टा चल रही है।
असल बात यह है कि दुनिया मे यदि कोई माथा ऊँचा करके खड़ा हो सके
तो उसे सहायता का अभाव नही रहता. अन्दर की शक्ति के अभाव से ही सभी
लांछनाएँ होती हैं, अन्दर की दीनता से ही कंगाली होती है, "बाहर से दिया ही
जा सकता है किन्तु लेना होता है अपने गुण से।"
5
बर्मा की कहानी
भारतवासियों के प्रयत्न से ब्रह्मदेश में जो विप्लव की चेष्टा हुई उसके बहुत
पहले से ही वहाँ के स्वाधीनता-प्रयासी बर्मियों ने भी बहुत बार विप्लव का आयो-
जन किया था। अण्डमन में भी इस प्रकार के राजनीतिक अपराधों में दण्डित
बहुत-से बर्मी थे। युद्ध समाप्त होने के बाद ही उनमें से प्रायः सभी को छोड़ दिया
गया था। तो भी अंग्रेज़ गवर्नमेंट इन सब विप्लव चेष्टाओं को भय की दृष्टि से
न देखती थी। जान पड़ता है कि उसका कारण यह था कि यहसब विप्लवान्दोलन
एक व्यापक जातीय जागरण का फल न था, इसी से वैसा शक्तिशाली भी न हो
सका था। किन्तु भारतीय विप्लववादियों की चेष्टा से बर्मा में भी अत्यन्तर्निविड़
रूप से विप्लव का आयोजन हो गया था। रोलट रिपोर्ट में लिखा है- "Burma,
however has not been altogether free from criminal conspiracy
connected with the Indian revolutionary movement. It has been
the scene of determined efforts to stir up mutiny among the
military forces and to overthrow the British Government."
अर्थात् “बर्मा भी भारत के विप्लवान्दोलन से सम्बद्ध षड्यन्त्रों से बचा नहीं
रहा। ब्रिटिश सरकार को उखाड़ डालने और सेनाओं में विप्लव खड़ा कर देने
की दृढ़ चेष्टाओं की वह रंगस्थली बन चुका है।" किस प्रकार ये दृढ़ चेष्टाएँ
(determined efforts) हुई थीं उसका कुछ संक्षिप्त परिचय देता हूँ।
गत तुर्की-इटालियन युद्ध के समय भारतवर्ष के मुसलमानों ने एक मेडिकल
मिशन, अर्थात् युद्ध में घायलों की सेवा के लिए एक दल, तुर्की भेजा था। इस दल
में फैजाबाद के निकट अकबरपुर के रहनेवाले अलीअहमद सिद्दीकी नामक एक
तरुण युवक भी थे; अपने संरक्षकों को पता दिए बिना ही उन्होंने दल में प्रवेश
किया था और भारत का तट छोड़ने से पहले घर के लोगों को केवल एक पत्र से
जता दिया था कि वे भारतीय मेडिकल मिशन में शामिल होकर तुर्की जाते हैं।
तुर्की में कार्यवश इन्हें अनवर पाशा के साथ प्रायः चार मास तक समरांगण
में ही रहना पड़ा। उस समय इन्होंने अनवर पाशा के जीवन की अनेक रहस्यपूर्ण
कहानियाँ सुनीं। तुर्की-इटालियन और तुर्की-ग्रीक युद्ध के समय अंग्रेजों की कूट
राजनीति की महिमा का तुर्क लोगों ने मर्मान्तक अनुभव कर पाया था, अंग्रेजों
की कूटनीति की कहानी, तुर्की के भाग्यनियन्ता उस यंग टर्क (तरुण तुर्क) दल
की कहानी, किस प्रकार इस तरुण तुर्क दल ने तुर्की में पहले-पहल अपने को प्रकट
किया, किस प्रकार इस तरुण दल ने मृतप्राय तुर्क समाज में नवचेतना का संचार
करके विप्लव पथ में चलते हुए अब्दुलहमीद के समान प्रबल दुर्दान्त और क्रूर
सुलतान को पदच्युत करके तुर्की में नवीन नियमतन्त्र राज्यप्रणाली का प्रवर्त्तन
कियः । ये सब बातें, दिन पर दिन, अलीअहमद, अनवर पाशा के पास स्वप्नाविष्ट
की तरह एकान्त में तन्मय होकर सुनते थे । मुस्लिम-जगत् की कितनी ही मर्म-
कथाएँ, कितनी ही वीरता की कहानियाँ, कितनी ही मनुष्योचित अभिव्यक्ति की
घटनाएँ सुन-सुनकर उनका हृदय मानो एक अननुभूत आनन्द से खिल उठता,
मुस्लिम-जगत् के गौरवमय उज्ज्वल भविष्य का चित्र उन्हें अधीर-सा कर डालता
था । तुर्की के एक सर्वप्रधान यूरोप-प्रसिद्ध सेनापति और प्रसिद्ध नेता जो तुर्की
के भाग्य-परिवर्त्तन के प्रधान अवलम्बन थे, जब ऐसे एक प्रसिद्ध व्यक्ति भारत के
एक नगण्य तरुण युवक के साथ निःसंकोच दिल खोलकर बातें करते होते, तब एक
ओर जहां उनकी प्रशस्त उन्नत छाती फूलकर स्पन्दन करने लगती, वहां दूसरी
ओर वैसे ही उसी एक मुहूर्त्त में उनका मन भारत की उस हीनता और दीनतापूर्ण
जीवन-यात्रा के प्रतिदिन के अपमानों की कहानी स्मरण कर मानो अनजाने में
ही घोर अंग्रेज-विद्वेषी हो उठता, और उनकी धमनियों का रक्त नाच-नाचकर
दुर्निवार वेग से उन्हें विप्लववादियों के दल में खींचकर ला रखता ।
पीछे अलीअहमद आदि कई भारतवासियों ने तुर्की का देश देखने की इच्छा
प्रकट की तो तुर्की के भिन्न-भिन्न स्थानों के राजप्रतिनिधियों ने बड़ा समारोह
करके राज-सम्मान के साथ उन्हें अपना सारा देश दिखलाया । इस प्रकार देश में
भ्रमण करते समय जब नगर-नगर में तुर्क नर-नारी इकट्ठे होकर ऊंचे स्वर में
जयकार बुलाकर उनका आदर करते, जब राजपथ के दोनों ओर झरोखों में से
सुन्दरियों को उत्सुक दृष्टि और उनके हाथों से टपके हुए फूल उनके अंगों पर
झड़ पड़ते, तब वे भारतवासी तुर्क देश को भारतवर्ष की अपेक्षा भी सौ गुना
अधिक अपना समझकर चाहने लगते । स्वदेश में उन्हें अंग्रेजों के नजदीक जो
सलूक मिलता उसके साथ वे इन तुर्कों के व्यवहार की तुलना किए बिना न रह
सकते, इस प्रकार अली अहमद विप्लव मन्त्र में दीक्षित हुए और अन्य अनेक
भारतवर्षीय मुसलमानों की तरह अलीअहमद भी तरुण तुर्क (यंग टर्क) दल में
शामिल हो गए ।
इसी तुर्की-इटालियन युद्ध के समय पंजाब के एक और युवक, अबू सैयद,
रंगून से ईजिप्ट गए और फिर ईजिप्ट से तुर्की आए । इन्हीं अबू सैयद के अनुरोध
और प्रस्ताव से तरुण तुर्क दल के एक सदस्य, ताफ़्रिक बे को सन् 1916 में रंगून
भेजा गया । रंगून के एक मुसलमान व्यवसायी अहमद मुल्ला दाऊद को ताफ़्रिक
बे तुर्की का कोन्सल नियुक्त करा गए । पिछले युद्ध के समय यह मुल्ला दाऊद ही
तुर्की के काँसल रूप में रंगून मे थे ।
158 / बन्दी जीवन
बलकान युद्ध समाप्त हो जाने पर अथवा यूरोपीय युद्ध आरम्भ हो जाने के
बाद अलीअहमद देश में लौट आए और कुछ दिन घर पर रहकर अपनी स्त्री के
आभूषण आदि बेचकर कुछ थोड़ा रुपया ले अपना व्यापार करने के लिए रंगून
चले आए । कौन्स्टैण्टिनोपल से कायमअली नामक एक और भारतीय मुसलमान
को तुर्क लोगों ने दिसम्बर सन् 1914 में तरुण तुर्क दल का प्रतिनिधि बनाकर
रंगून भेजा । कायमअली और अलीअहमद सिद्दीकी दोनों ने रंगून आकर परस्पर
मिलने के बाद तुर्की के नेतृत्व में बर्मा में विप्लव-षड्यन्त्र आरम्भ कर दिया । कुछ
ही दिनों में इन्होंने स्थानीय मुसलमानों के पास से पन्द्रह हज़ार रुपया चन्दा जमा
कर लिया। इस चन्दा करने के सम्बन्ध में एक बात यहाँ कहे बिना नहीं रह
सकता, वह यह कि बंगाल के सम्पन्न व्यक्ति विप्लववादियों की धन से ज़रा भी
सहायता न करते थे, इसी से बंगाल में राजनैतिक डकैती का प्रादुर्भाव अनिवार्य
हो गया था ।
एक ओर यदि ये पैन-इस्लामिक (विश्व-इस्लामिक) दल के मुसलमान विप्लव
का आयोजन करते थे, तो दूसरी ओर अमेरिका का 'गदर' दल भी निश्चेष्ट न
था। खेमचन्द दामजी नामक एक गुजराती सज्जन किसी समय रंगून से अमेरिका
गए और अमेरिका में आते ही वहाँ के गदर दल में सम्मिलित हो गए। पहले-
पहल इन्हीं खेमचन्द की सहायता से केवल बर्मा में 'गदर' पत्रिका भेजी जाया
करती थी, युद्ध के समय यह पत्रिका गुजराती, हिन्दी और उर्दू तीन भाषाओं
में छापी जाती थी । यूरोप के युद्ध के कारण बर्मा के मुसलमान लांग भी उत्ते-
जित हो उठे थे और इस 'गदर' पत्रिका के प्रभाव से उत्तेजना का स्रोत क्रमशः
बढ़ता गया । इसी समय बम्बई में बिलोची पल्टन के एक सैनिक ने अपने अंग्रेज़
अफ़सर की हत्या कर डाली, जिससे इस सेनादल को फिर यूरोप न भेजकर रंगून
में रोक रखा गया । रंगून के मुसलमान 'गदर' अखबार के सहारे इस सेना में
विप्लव की बातों का प्रचार करते रहे; फलतः जनवरी, 1915 तक यह सेनादल
खुल्लमखुल्ला विप्लव आरम्भ करने को उद्यत हो गया, किन्तु समाचार का
आभासमात्र मिलते ही सेनापतियों ने इस दल को कठोर दण्ड दिये। दो सौ
`बलोचों को भारत की भिन्न-भिन्न जेलों में भेज दिया ।
इस समय सिंगापुर में दो रेजिमेण्टें थीं । उनमें से एक के साथ बर्मा के मुसल-
मान विप्लवी दल का जोड़-तोड़ हो गया । सिंगापुर के कासिममंसूर नामी एक
गुजराती मुसलमान ने रंगून में अपने पुत्र को पत्र लिखा, उसमें तुर्की के जो कौंसल
रंगून में थे उनके नाम भी एक पत्र था । उस पत्र में लिखा था, सिंगापुर का
एक सेनादल विद्रोह करके तुर्की का साथ देने को तैयार है और इस समय तुर्की
का एक लड़ाऊ जहाज़ सिंगापुर में आना आवश्यक है। यह पत्र अंग्रेज़ों के हाथ
लग गया और सिंगापुर की रेजिमेंट को दूसरी जगह भेज दिया गया ।
इसी बीच अमेरिका के 'गदर' दल के लोग भी सिंगापुर में आ उपस्थित
हुए। इन्होंने एक ओर जहाँ उसी सिंगापुर की दूसरी सेना के बीच प्रचार आरम्भ
बर्मा की कहानी / 159
कर दिया, वहां दूसरी ओर बर्मा में भी अपने आदमी भेजे। सन् 1915 के आरम्भ
में ही सोहनलाल पाठक और हसनखां नामक गदर दल के दो व्यक्तियों ने बैंकाक
से रंगून आकर अपना केन्द्र स्थापित कर दिया। यहां एक बात गौर करने की
है कि 'गदर' दल में मुसलमानों को भी लिया जाता था किन्तु मुसलमान विप्लव
दल में हिन्दुओं के लिए स्थान न था।
सिंगापुर की सेना मे प्रचार करने का फल यह हुआ कि इस बार सचमुच ही
विप्लव आरम्भ हो गया। यद्यपि इस सिंगापुर के विप्लवायोजन के साथ पंजाब
के विप्लवायोजन का कोई भी सम्बन्ध न था, तो भी आश्चर्य की बात है कि 21
फरवरी सन् 1915 को सिंगापुर में विप्लव शुरू हुआ और पंजाब में भी ठीक
यही 21 फरवरी विप्लव शुरू करने की तिथि निश्चित हुई थी। इस 21 फरवरी
के दिन सिंगापुर के सैनिक बहुत दिनों के संस्कारों को तोड़कर खुल्लमखुल्ला
अंग्रेजों के विरुद्ध खड़े हो गए। एक सप्ताह के लिए सिंगापुर भारतीय सेना के
हाथ में हो गया, किन्तु सिंगापुर भारत के बीच में न था इससे विप्लव की वह
आग चारों तरफ फैल न सकी, और एक सप्ताह के बाद रूसी, जापानी और
अंग्रेजों के लड़ाकू जहाजों ने आकर सिंगापुर को घेर लिया। इस एक सप्ताह-भर
विप्लवियों ने स्थानीय अंग्रेजी सेना के साथ योग्यता से युद्ध किया था, और अंग्रेजी
सेना को उस युद्ध में हार भी माननी पड़ी थी। किन्तु रूस इंग्लैण्ड और जापान
के जंगी जहाज आ जाने पर दो दिन की लड़ाई के बाद अन्त में बाध्य होकर
विप्लवियों को भागना पड़ा। विप्लवियों ने वनों-जंगलों में जाकर आश्रय लिया,
जो भाग न सके, वे वहीं अंग्रेजों के हाथ बन्दी हो गए। सिंगापुर से भागकर एक
ही बार छुटकारा पाने का भी कोई उपाय न था, कुछ ही दिनों में प्रायः सभी
विप्लवी पकड़े गए—अंग्रेज़ी अखबारों मे छपा, सिंगापुर में एक दंगा हो गया,
किन्तु अंग्रेज़ गवर्नमेण्ट और भारतीय विप्लव दल दोनों ही की समझ में निःसंशय
रूप से आ गया कि विप्लवियों का देशी सिपाहियों को हाथ में कर लेना कुछ वैसी
कठिन बात नहीं है।
सिंगापुर की दुर्घटना के बाद 'गदर' दल के दो-एक बचे हुए व्यक्ति बर्मा
चले आये और पूरे उद्यम से फिर वे देशी सेना में विप्लव की बात का प्रचार
करने लगे। एक तरफ से बर्मा के सेनादल में विप्लव प्रचार चलने लगा, दूसरी
तरफ वैसे ही बर्मा के सीमान्त पर स्याम में भी जर्मनों की सहायता से विप्लव
का आयोजन होता रहा। उत्तर स्याम प्रदेश में जर्मन इंजीनियरों की अधीनता
में एक रेलवे लाइन तैयार होती थी। इस कार्य में अधिकांश मिस्त्री और मजदूर
पंजाबी ही थे। इसी रेलवे लाइन की दिशा से बर्मा पर आक्रमण करने की
योजना चलने लगी। अमेरिका, चीन आदि देशों से लौटे हुए सिक्ख और पंजाबी
यहीं स्याम के सीमान्त में इकट्ठे होने लगे।
शिवदयाल कपूर नामक एक सिक्ख (पंजाबी) अमेरिका से लौटते समय
शांघाई आए। शांघाई के एक जर्मन ने इन्हीं की मार्फत बहुत-सा रुपया बैंकाक
160 / बन्दी जीवन
के जर्मन कौन्सल के पास भेजा। इस रुपए का कुछ अंश बर्मा जाने वाले सिक्खों
की खातिर खर्च हुआ और बाकी बैंकाक के एक बंगाली वकील की मार्फत बंगाल
के विप्लवियों के पास भेजा गया। कहते हैं, इसी बंगाली वकील ने, यह सब
विप्लवायोजन की बात अन्त में अंग्रेज गवर्नमेण्ट के सामने खोल दी। जो विप्लवा-
योजन युद्ध छिड़ने से बहुत पहले से ही करना उचित था जब वही आयोजन युद्ध
के समय में बड़ी दौड़-धूप में किया गया, तब ऐसे तुच्छ जीवों से भी काम लेना
आवश्यक हो गया। न जाने किसकी सिफारिश पर इस बंगाली वकील को इस
काम पर लगाया गया था। जो भी हो, इस प्रकार विदेश की विप्लव योजना
विफल हुई।—किन्तु बर्मा के कार्यकर्ताओं ने एक बार और विप्लव की चेष्टा कर
देखी।
सोहनलाल पाठक और नारायणसिंह ये दो जने एक बार फिर बर्मा में
विभिन्न स्थानों की छावनियों में जाकर सिपाहियों के बीच विप्लवमन्त्र का
प्रचार करने लगे। सोहनलाल बर्मा के एक गोलन्दाज सिपाहियों के दल में अंग्रेज-
विद्वेष फैलाने लगे, अंग्रेजों की तरफ रहकर प्राणों की बलि देने में कुछ भी सार्थ-
कता नहीं है, यही बात उन्हें समझाने लगे। यदि प्राण देने ही हों तो स्वदेश और
स्वधर्म के लिए प्राण देने का कितना महान् गौरव है, यह भी सिपाहियों को
समझाने लगे। सिपाहियों द्वारा भले ही उनका कोई अनिष्ट न हुआ किन्तु सिपा-
हियों के एक जमादार ने एक दिन सोहनलाल को पकड़ लिया। उस दिन उस
जगह उस जमादार और सोहनलाल के सिवाय और कोई नहीं था। सोहनलाल
के जामे की पाकेट में तब दो-तीन रिवाल्वर और भरपूर गोलियाँ भी थीं, किन्तु
क्या जाने सोहनलाल उस घड़ी किसी स्वप्न की खुमारी में थे कि उस दिन रिवा-
ल्वर की सहायता से उन्होंने उस प्राणघाती जमादार के हाथ से मुक्ति पाने की
कोई चेष्टा ही नहीं की। उस दिन ऐसी अवस्था में सोहनलाल के मुँह से केवल
कुछ ऐसे ही शब्द निकले थे—“अरे भाई तू मुझे पकड़ा देगा? तू क्या भूला जाता
है कि मैं तेरा भाई हूँ? भाई होकर भाई को पकड़ा देगा? भाई को पकड़ा देने
में तुझे क्या कुछ भी दर्द नहीं होता? अरे, तू कैसा भाई है, भाई होकर भाई को
पकड़ाए देता है?” लेकिन जमादार सोहनलाल को खींच ही ले चला। यह
सच है कि सोहनलाल बहुत बलिष्ठ न थे किन्तु यह बात भी सच है कि कोई भी
आदमी दूसरे एक आदमी को किसी और की सहायता बिना पूरी तरह काबू नहीं
कर सकता, चाहे वह कितना ही बलवान् व्यक्ति क्यों न हो। असल बात यह है
कि सोहनलाल ने उस स्वार्थान्ध जमादार के ऊपर जरा भी शारीरिक बल का
प्रयोग नहीं किया। इस प्रकार अंग्रेजों के पंजे में पड़ने का अर्थ उनके सामने खूब
सुस्पष्ट था, इच्छा होती तो वे उस प्राणलोलुप जमादार के हाथ से, रिवाल्वर की
सहायता से क्षणभर में छुटकारा पा सकते थे। किन्तु न जाने भगवान् ने उनके
मन को उस घड़ी किस दिव्य-लोक में भेज दिया था—वे मानो उस दिन इस
संसार में एकदम थे ही नहीं।
बर्मा की कहानी / 161
सोहनलाल जेल में डाल दिये गए सही, किन्तु जेल के किसी नियम का
पालन वे न करते थे। जेल के अधिकारी जेल के परिदर्शन के लिए आते तो सारे
कैदी जिस प्रकार आईने के मुताबिक उनको सम्मान दिखलाते थे, सोहनलाल
वैसा न करते। वे कहते—मैं अंग्रेजों के राजत्व को ही जब अन्याय और अत्या-
चार मानता हूँ तब अंग्रेजों की जेल के नियमों का ही क्योंकर पालन करूँ ?''
जेल सुपरिटेण्डेण्ट अथवा जेलर उनके सम्मुख आते तो वे और सबकी तरह
सम्मान के लिए उठकर खड़े न होते, इसी से जब बर्मा के लाटसाहब सोहनलाल
के पकड़े जाने के ठीक बाद ही जेल का परिदर्शन करने आए, तब जेलर साहब
ने अत्यन्त संकोच के साथ सोहनलाल से अनुरोध किया कि वे कम-से-कम लाट-
साहब को तो सम्मान दिखाएँ, किन्तु वे इस पर सहमत न हुए। किन्तु ऐसे निर्भीक
और आत्ममर्यादा पर इस प्रकार सुप्रतिष्ठित होते हुए भी सोहनलाल मनुष्य के
साथ मनुष्य की तरह व्यवहार करते थे, कभी किसी प्रकार की अभद्रता नहीं
दिखाते थे। कोई उनके साथ बात करने आए तो वे भद्रतापूर्वक यथोचित सम्मान
करके उससे बात करते। कोई उनके साथ खड़ा होकर बात करे तो वे भी खड़े
होकर बात करते। इसी से लाटसाहब के सोहनलाल के पास आने से ठीक पहले
जेलर सोहन के पास आकर खड़े होकर बात करने लगे। इसीलिए लाटसाहब के
आने पर नए सिरे से उन्हें खड़ा नहीं होना पड़ा, और इस प्रकार जेलर ने अपनी
और लाटसाहब की मर्यादा की उस बार रक्षा की।
लाटसाहब ने प्रायः दो घण्टे सोहनलाल के साथ वार्तालाप किया। लाट-
साहब ने सोहनलाल से बड़ा अनुरोध किया कि वे क्षमा माँग लें; लाटसाहब ने
कहा कि वे केवल एक बार क्षमा की प्रार्थना कर दें, बस, उनकी प्राणदण्ड से रक्षा
हो जायगी। सोहनलाल ने लाटसाहब को भली प्रकार समझाकर कहा कि इस
समय जो कुछ अन्याय या जोर-जुल्म हो रहा है, सब अंग्रेजों की तरफ से ही हो
रहा है, अंग्रेजों ने केवल डंडे के जोर से इस देश पर दखल किया है और डंडे के
जोर से ही इस देश में शासन कर रहे हैं, इसलिए क्षमा-प्रार्थना यदि किसी को
करनी चाहिए तो लाटसाहब को ही, —सोहनलाल ने यह सब बात लाटमाहब
को समझा देनी चाही।
फाँसी होने के दिन जब सोहनलाल को फाँसी के तख्ते पर खड़ा किया गया
तब भी एक अंग्रेज मजिस्ट्रेट ने उन्हें फिर एक बार समझाया कि अब भी यदि वे
केवल मुँह से क्षमा-प्रार्थना कर लें तो एकदम उनकी प्राण-दण्ड से रक्षा हो सकती
है। इन अंग्रेज अधिकारी ने सोहन से कहा कि उनके पास आदेश आया है कि
अन्तिम बार एक दफ़ा फिर सोहनलाल से क्षमा-भिक्षा मांगने के लिए अनुरोध
किया जाय। जीवन और मरण के सन्धि-स्थल में खड़े सोहनलाल के मुंह की ओर
जेल के कर्मचारी और राज्याधिकारी अवाक् होकर ताक रहे थे। सोहनलाल
धीरे-धीरे मुस्कराने लगे और अनायास ही बोले—"क्षमा माँगनी हो तो अंग्रेज
मुझसे क्षमा मांगें, मैं किसलिए तुम्हारे पास क्षमा मांगने आऊँगा।" अंग्रेज राज्या-
162 / बन्दी जीवन
धिकारी ने फिर भी सोहनलाल से बड़ा अनुरोध किया, अनेक प्रकार समझाया
कि वृथा प्राण देकर कुछ लाभ नहीं होगा। अन्त में सोहनलाल कुछ सोचकर
बोले—"देखो, यदि मुझे बिलकुल छोड़ दो और यदि मैं इच्छानुसार चला जा
सकूँ, तो क्षमा प्रार्थना करने को प्रस्तुत हूँ।" अंग्रेज राज्याधिकारी ने दुःखित होकर
कहा, "वैसा कोई अधिकार उनके हाथ में नहीं है।" सोहनलाल ने कहा, 'तो
और ज़रा भी देर न करो, अपने कर्त्तव्य का पालन करो, और मुझे भी अपना
कर्त्तव्य पूरा करने दो।"
सोहनलाल को फाँसी हो गई।
बर्मा के मुसलमान विप्लववादियों ने फिर बकरीद के समय विप्लव का
आयोजन किया। किन्तु आयोजन पूरा न होने से विप्लव का दिन पच्चीस दिसम्बर
तक हटा दिया गया। बर्मा की मिलिटरी पुलिस की एक बारक में रिवाल्वर,
डाइनामाइट आदि बहुत-सी चीजें पकड़ी गईं और उसके बाद बर्मा के सब सन्देह-
जनक व्यक्तियों को डिफेंस ऑफ़ इंडिया ऐक्ट के अनुसार नज़रबन्द करा दिया
गया। उसके बाद बर्मा में कोई उपद्रव नहीं हुआ है।
6
परिणाम
विप्लवियों की सभी चेष्टाएँ बार-बार व्यर्थ हुईं, उसका फल यह हुआ कि
स्वदेश में और विदेश में भिन्न-भिन्न राजशक्तियों की चक्की मे पिसते हुए उनकी
लांछनाओं की सीमा न रही । स्वदेश की तो बात ही नही, विदेश में भी वे एक
देश से दूसरे देश को मारे-मारे फिरने लगे और स्वदेश में ‘भारत रक्षा आईन’ के
नीचे ज़रा-सा सन्देह होते ही दल-के-दल युवकों को जेलों में या गाँवों की नज़र-
बन्दी में ठेल दिया जाता । जिनके विरुद्ध तनिक-सा भी प्रमाण पाया गया, उन्हें
अंग्रेज़ सरकार के हाथ कठोर दण्ड भोगना पड़ा । अनेकों ने फाँसी के तख्ते पर
जीवन दिया, बहुतों को कालापानी हुआ । पुलिस का उत्पात या जेल की कठोरता
न सह सकने पर कई युवकों ने आत्महत्या का आश्रय लिया, इन सब करुण-
कथाओं ने कितने ही तरुण युवकों की माताओं के दिल निष्ठुरता से टुकड़े-टुकड़े
कर डाले । विप्लव दल प्रायः छिन्न-भिन्न हो गया । विप्लवियों के नेता या तो
जेल मे डाले गए, या फाँसी के तख्ते पर चढ़े । विप्लव दल जब इस प्रकार छिन्न-
भिन्न होकर देश के चारों ओर बिखर गया तब अनेक स्थानों पर पुलिस के साथ
उनके जो सब सघर्ष हुए, विप्लव युग के इतिहास में वे स्मरणीय रहेंगे ।
पजाब के विप्लवान्दोलन की गम्भीरता और व्यापकता जब प्रकट हो गई,
तब गवर्नमेंट जान गई कि इस विप्लव दल की अब किसी प्रकार अवहेलना करने
से काम न चलेगा । भारत के प्रवीण, विज्ञ और राजनीति-विशारद नेता लोग
बहुत समय से यह बात कहते आते थे कि भारत का यह विप्लव प्रयास बिलकुल
लड़कपन है, किन्तु अंग्रेज़ गवर्नमेंट यह बात अच्छी तरह जान गई थी कि इन
विप्लवियों को यदि कुछ दिन भी निर्विघ्न रूप से अपने अभीष्ट के अनुसार काम
करने का अवसर और सुयोग मिल जाय तो भारत की अवस्था में सचमुच एक
अभूतपूर्व परिवर्तन हो जायगा । भारतीय विप्लववादियों के लिए क्या-कुछ कर
डालना सम्भव है, इसकी अंग्रेज़ गवर्नमेंट जैसी कल्पना करती थी, भारत के
राजनीतिक नेताओं ने वैसी कल्पना कभी नही की । अण्डमन जाने से पहले कुछ
ऊँचे अंग्रेज़ अधिकारियों के साथ मेरी इस विषय में अनेक बार बातचीत हुआ
करती थी। इनकी बातचीत से मैं समझ पाया था कि गवर्नमेंट भारत के
भिन्न-भिन्न आन्दोलनों में से एकमात्र विप्लवान्दोलन को चिन्ता करने लायक
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गिनती थी, इसी से इस गवर्नमेंट में जो कुछ जहर था, इन्हीं विप्लवियों पर
उसका प्रयोग किया गया। इसी से पंजाब के विप्लव आन्दोलन का पता लगते
ही भारत सरकार ने भारत के मंगल के लिए 'भारत-रक्षा-आईन' के समान
अत्यन्त कठोर शासन-प्रणाली जारी कर दी।
इतिहास में जो चिरकाल से होता आता है, भारत की बारी में भी उससे
उलटा नहीं हुआ। जब कोई पराधीन जाति जागने लगती है तब उस जागरण को
व्यर्थ करने के लिए ऐसी ही कठोर शासन-नीति जारी की जाती है। किन्तु जाति
जब सचमुच जाग उठती है तब संसार की कोई भी कठोर नीति उस जागरण को
व्यर्थ नहीं कर सकती, वरन् इस तरह की कठोर दमन-नीति के द्वारा जाति की
केवल शक्ति-परीक्षा होती है। जाति में यदि सचमुच प्राणों की कुछ शक्ति हो
तो यह सब कठोरता जागृति की रुकावट न होकर सहायक हो जाती है। इसी
से जागरण के दिन राजकोप को वास्तव में कोप न समझकर भगवान् का अनुग्रह
समझना उचित है। भारत के विप्लवियों ने भी सचमुच कभी भी इस दमन-
नीति के लिए अंग्रेजों को दोषी नहीं ठहराया, प्रत्युत वे तो यह सोचते थे कि
इन सब कठोरताओं में से गुजारकर भगवान् हमें जाति को पुनरुज्जीवित करने
के लिए आह्वान करते हैं। वे जानते थे कि पराधीन जाति का स्वाधीनता-प्रयास
इन सब कठोरताओं में से गुज़रकर ही सार्थक होता है। सभी दमन-नीति मानो एक
प्रकार के मीलों के पत्थर (Milestone) हैं। कौन पराधीन जाति स्वाधीनता
प्राप्ति के पथ में कितनी आगे बढ़ी है यह सब दमन-नीति ही मानो उसका
परिचय देती है, भारतीय विप्लववादी यही विश्वास करते थे। इसी विश्वास के
कारण वे सब दुःख-लांछनाएँ प्रफुल्ल-वदन से सह सके, प्राणों के बलिदान से ही
जाति में प्राणों का संचार होता है, इसी विश्वास से वे प्राणों की बलि देने से भी
घबराते न थे।
डिफेंस ऑफ़ इण्डिया ऐक्ट जारी होने के बाद से समरी ट्रायल्स (संक्षिप्त
मुकद्दमे) आरम्भ हो गए। बारी-बारी से पंजाब में तीन षड्यन्त्र केस चले। प्रत्येक
मामले में साठ-सत्तर आसामी थे। इन सब मुकद्दमों के फलस्वरूप पंजाब में एक
साथ अट्ठाईस व्यक्तियों को फाँसी हुई। मेरठ पलटन में ग्यारह व्यक्तियों को
फाँसी हुई, सातवीं राजपूत सेना में कई व्यक्तियों को सम्भवतः दिल्ली में फाँसी
हुई, जिन्हें फाँसी न हुई, उन्हें प्रायः सभी को कालापानी हुआ। ऐसी अवस्था
के बाद भी पंजाब के बचे हुए विप्लवियों के बीच फिर विप्लव की योजना चलने
लगी। कुछ अकाली दल इन सब क़ैदी विप्लवियों को जेल से छुड़ाने के इरादे
बाँधने लगे। सिक्खों के एक और दल ने अस्त्र-शस्त्र की ओर ध्यान दिया। उन
दिनों बड़े-बड़े रेलवे-स्टेशनों पर और बड़े-बड़े पुलों के नीचे हथियारबन्द सिपाहियों
का पहरा रहता था। एक बार विप्लवियों के एक छोटे-से दल ने, जान पड़ता है,
केवल सात-आठ व्यक्तियों ने मिलकर अमृतसर के पुल के सिपाहियों पर एकाएक
हमला कर दिया। वहाँ पंद्रह सिपाही, पंद्रह मैगजीन राइफ़लें और प्रायः सात
परिणाम / 165
सौ पचास कारतूस थे। सात-आठ पिस्तौलधारी विप्लवी सात सौ पचास कारतूस
समेत पंद्रह-की-पंद्रह राइफलें छीन ले गए। किन्तु उस समय दल की कुछ
अच्छी विधि-व्यवस्था न रहने से थोड़े दिनों में ही बन्दूकों समेत पांच विप्लवी
पकड़े गए। उन पाँचों को फाँसी हुई। इससे पहले ही अट्ठाईस व्यक्तियों को
फाँसी हो चुकी थी। इन्हें फाँसी देने के बाद भी फिर से कुछ सिक्ख स्कूल-
मास्टरों ने मिलकर विप्लव की धारा को अक्षुण्ण रखने की चेष्टा की, सम्भवतः
उसका सिलसिला आज भी चलता होगा। डा० मथुरासिंह आदि कई विप्लवी
भारत त्यागने के बाद अफ़गानिस्तान में से होकर फ़ारस में और मेसोपोटामिया
की भारतीय सेनाओं में विप्लव की बातों का प्रचार करते रहे। एक बार घटना-
क्रम से डा० मथुरासिंह भारत-अफ़गानिस्तान के सीमान्त प्रदेश में पकड़े गए।
उन्हें भी फांसी हुई। जो इस प्रकार फाँसी और कालापानी से बच पाए उनमें से
अनेकों को इण्टर्नमेंट (नज़रबन्दी) भोगनी पड़ी। उस युग में बंगाल और पंजाब
की जितनी इण्टर्नमेंट और किसी प्रान्त में नहीं हुई, और कालापानी और फाँसी
उस बार पंजाब में ही और सब प्रान्तों की अपेक्षा अधिक हुई।
उक्त प्रदेश में भी बनारस षड्यन्त्र मामले के बाद मैनपुरी को केन्द्र बनाकर
प्रायः एक बरस-भर में ही फिर एक बड़ा विप्लव दल उठ खड़ा हुआ। इस
विप्लव दल की बात भी प्रायः दो-एक बरस के बीच ही प्रकाशित हो गई। इस
प्रसंग में एक बात कह देना चाहता हूँ; रूस में प्रायः कोई भी विप्लवी दो मास से
अधिक समय तक अप्रकाशित रूप से काम न कर पाते थे। दो महीने के अन्दर ही
या तो वे राज्य से दण्ड पा जाते थे, या उन्हें देश छोड़कर विदेश का आश्रय लेना
पड़ता था। भारतवर्ष में अब तक प्रायः देखा गया है कि यहाँ विप्लवियों का
कार्यकलाप और उनका परिचय दो बरस से अधिक समय गुप्त नहीं रह पाता।
बंगाल में उस समय फांसी और कालापानी की अपेक्षा नज़रबन्दी ही अधिक
हुई। इन नज़रबन्दियों के कारण बंगाल का विप्लव दल बहुत-कुछ टूट गया,
तब यह विप्लव दल भिन्न-भिन्न भागों में बँटकर देश मे बिखर गया। उस समय
यदि विप्लवियों के हाथ में उपयुक्त परिमाण में अस्त्र-शस्त्र रहते तो वे सरकार
का राज्य चलाना असम्भव कर डाल सकते थे।
उस समय तक रासबिहारी काशी में ही थे। एक दिन केन्द्र से संवाद आया
कि बंगाल के प्रसिद्ध विप्लवनेता श्रीयुत यतीन्द्रनाथ मुखोपाध्याय को अज्ञातवास
में रहना होगा, और उन्होंने कांशी में आकर रहने की इच्छा प्रकट की है। हमने
परामर्श करके देखा कि उन्हें काशी में बेखटके रहना कुछ ऐसी कठिन बात नहीं
है; किन्तु हमने यह भी देखा कि काशी के बाहर उनके दल की भूल-चूक के
कारण काशी पर भी विपत्ति आ सकती है। जिस दल की प्रत्येक विधि-व्यवस्था
अपने नियन्त्रण के अधीन हो उसकी भूल-चूक के लिए दायित्व लिया जा सकता
है, और उस अवस्था में भूल-चूक पकड़ना और उसका संशोधन करना भी अपनी
ताक़त में होता है। किन्तु जिस दल की विधि-व्यवस्था के ऊपर अपना कोई हाथ