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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 151, कुल 408 में से

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पृष्ठ 151

बंगाल में / 149

जाती तो गत जर्मन-युद्ध के समय भारत का विप्लवायोजन बिलकुल व्यर्थ न होता।
भारतीय विप्लव दल में वैसे कोई दूर दृष्टिवाले प्रतिभावान् उपयुक्त पुरुष न
रहने से ठीक समयानुसार वे देश को भी तैयार न कर सके, और ठीक किस समय
से विदेशियों के साथ सम्बन्ध सूत्र स्थापित करना उचित है, यह भी वे निर्णय न
कर सके।
विप्लववादी भारतवासियों में से सबसे पहले श्यामजी कृष्ण वर्मा विदेश गए
और उनके संस्पर्श से और उनकी चेष्टा से अनेक विदेशस्थ भारतीय युवक विप्लव
धर्म में दीक्षित होते रहे। सन् 1905 के दिसम्बर महीने में श्यामजी ने इस बात
का विचार किया कि छः उपयुक्त भारतवासियों को छः हजार रुपया वृत्ति
देंगे जिससे वे यूरोप, अमेरिका और पृथ्वी के अन्यान्य स्थानों में घूमकर भारत-
वासियों को स्वाधीनता के मन्त्र में दीक्षित करने के लायक शिक्षा उपार्जन कर
सकें। इसी समय एस० आर० राणा नामक एक महाराष्ट्र के सज्जन ने श्यामजी
के पास पैरिस से इसी विषय का एक पत्र लिखा कि वे भी तीन भारतवासियों को
छः हजार रुपया राह खर्च के लिए वृत्ति देंगे, और ये वृत्तियां राणा प्रतापसिंह,
शिवाजी और किसी स्वनामधन्य मुसलमान राजा के नाम पर समर्पित की जायेंगी।
इनका उद्देश्य था इस प्रकार उपयुक्त शिक्षित भारतवासियों को भारत के बाहर
लाकर विप्लव कार्य में उपयुक्त कार्यकर्त्ता रूप से तैयार कर देना। किन्तु इनकी
चेष्टा से कोई विशेष कार्य हुआ कि नहीं, मुझे मालूम नहीं।
ईसवी सन् 1906 में विनायक दामोदर सावरकर नामक एक प्रतिभावान
महाराष्ट्र-ब्राह्मण लन्दन में बैरिस्टरी पढ़ने गए और इनके आने पर श्यामजी कृष्ण
वर्मा का कार्य खूब तेजी से अग्रसर हुआ। किन्तु ये भी विदेश की किसी भी राज-
शक्ति के साथ कोई भी सम्बन्ध-सूत्र स्थापित नहीं कर पाये।
विनायक सावरकर लन्दन में ही रहते थे। जब बंगाल के प्रसिद्ध हेमदास भी
विलायत गए, किन्तु हेमदास बम और विस्फोटक पदार्थ बनाने की शिक्षा पाने की
खातिर ही विदेश गए थे, इसी से उन्होंने भी विदेशी राजशक्ति के साथ कोई भी
सम्बन्ध स्थापित करने की चेष्टा नहीं की।
पंजाब के विख्यात लाला हरदयाल भी इस समय विलायत में थे एवं विला-
यत के विप्लववादियों के संस्पर्श में आकर वे भी पूरे उद्यम से विप्लव कार्य में
योग देने लगे, किन्तु इन्होंने भी उस समय किसी राजशक्ति की सहायता लेने की
ओर ध्यान नहीं दिया।
इसी बीच स्वदेशी आन्दोलन की प्रबल बाढ़ में बंगाल प्लावित हो गया और
बंगाल के अशान्त युवकों के मन-प्राण, उस समय दुस्साध्य साधन में, विपत्ति के
मुंह में कूद पड़ने लगे। इतने दिन तक केवल धनियों की ही सन्तान बैरिस्टरी
अथवा आई० सी० एस० पढ़ने के लिए अथवा विलायत के भोगविलास के दृश्य
अपनी आँखों देख आने के लिए ही भारत के बाहर जाया करती थी, किन्तु बंगाल
के नवजागरण के प्रभाव से कई युवक देश सेवा के आदर्श से उद्बुद्ध होकर और