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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 155, कुल 408 में से

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पृष्ठ 155

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बंगाल में / 153

नाथ चट्टोपाध्याय बैंकाक गए, किन्तु इनके द्वारा कार्य कितना आगे बढ़ा यह कह
नहीं सकता। यतीन्द्रनाथ लाहिड़ी नामक एक युवक के यूरोप से आने के बाद ही
उनके कथनानुसार यतीन बाबू के दल के नरेन्द्रनाथ अप्रैल मास में पहले बटेबिया
गए और तभी से असल कार्य आरम्भ हुआ। रासबिहारी भी अप्रैल मास में
शांघाई में थे। बटेविया और बैंकाक का सम्पूर्ण आयोजन शांघाई के जर्मन
कौंसल जनरल के परामर्श से और 'गदर' दल की सहायता से ही चलता था।
बटेविया के 'गदर' दल के साथ बंगाल के दल का संयोग स्थापित हो गया था।
29 अप्रैल, 1915 के दिन कैलिफोर्निया के सानपेड़ो बन्दर से मैवरिक नामी
एक जहाज भारत के उपकूल की ओर प्रस्थित हुआ। यह जहाज पहले स्टैंडर्ड
आयल कम्पनी का तेल लाने ले जाने के काम आता था, पीछे सानफ्रांसिस्को की
एक जर्मन कम्पनी ने इसे खरीद लिया था। चलते समय इस जहाज में सब
मिलकर पच्चीस कर्मचारी और पांच नौकर बने हुए व्यक्ति थे। ये अपने को
ईरानी बतलाते थे, पर ये असल में भारतवासी ही। सानफ्रांसिस्को के जर्मन
कौन्सिल और विप्लव दल के रामचन्द्र के उद्योग से ही यह जहाज भेजा
गया था। बात थी कि आनी लार्सन (Aannie Larsen) नामक एक और
छोटा जहाज अस्त्रादि लेकर इस मैवरिक के साथ रास्ते में मिलेगा और लार्सन
के अस्त्रादि मैवरिक ले लेगा। किन्तु आनी लार्सन समय पर मैवरिक से मिल न
सका, इससे विवश होकर मैवरिक केवल कुछ भारतवासियों और जर्मन एक्स-
पर्ट् म (विशेषज्ञों) को लेकर बटेविया आ गया। बटेविया के उच्च अधिकारियों
ने मैवरिक की खानातालाशी कराई। किन्तु कोई आपत्तिजनक वस्तु न पाकर
मैवरिक को छोड़ दिया। दूसरी ओर आनी लार्सन (Aannie Larsen) जून
महीने के अन्त के क़रीब अस्त्रादि लेकर वाशिंगटन पहुँचा, किन्तु अमेरिका
की सरकार ने वे सब अस्त्रादि ज़ब्त कर लिए, वाशिंगटन के जर्मन कौन्सिल
ने उन सब अस्त्रों के लिए दावा किया, पर अमेरिका सरकार ने उसे नामंजूर
किया। मैवरिक अन्त में बटेविया से अमेरिका लौट आया और उसी में नरेन्द्रनाथ
(जिनका वर्तमान नाम मानवेन्द्रनाथ राय—एम० एन० राय है) अमेरिका भाग
गए।
हेनरी एस० (Henry S.) नामक एक और जहाज अस्त्रादि लेकर मनीला
पर्यन्त आ गया, किन्तु वहाँ फिलिपाइन के अधिकारियों ने वे सब अस्त्र जहाज से
उतरवा लिए। इस जहाज में बोहेम नामक एक जर्मन सेनापति थे, इन्ही पर सुनते
हैं बर्मा की सीमा के निकट भारतीय विप्लववादियों को सामरिक शिक्षा देने का
भार था। ये सिगापुर में पकड़े गए। जावा के जर्मन कौंसिल के साथ परामर्श
करके नरेन्द्रनाथ ने ठीक किया था कि मैवरिक के साथ सब अस्त्रादि बंगाल में
रायमंगल के पास उतारे जाएँगे। रायमंगल में भी इस बात का सब आयोजन हो
गया था, पर मैवरिक आया नही। जुलाई, 1915 मे अंग्रेज़ सरकार को सब बातें
मालूम हो गईं और उसके फलस्वरूप भारत मे धर-पकड़ आरम्भ हो गई।