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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 152, कुल 408 में से

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पृष्ठ 152

150 / बन्दी जीवन
दूसरे ऐसे भी अनेकों जो देश शान्त, सुबोध, भले लड़के होने की ख्याति पाने से
वंचित थे, जिनकी उद्दाम प्रकृति की अशान्त गति देश की आबहवा में प्रकाशित
होने का सुयोग न पाती थी—ऐसे भी अनेकों युवक अमेरिका में आ इकट्ठे हुए।
इनमें से श्रीयुत तारकनाथदास के नाम से हम लोग सुपरिचित हैं।
श्यामजी कृष्ण वर्मा लन्दन में कुछ दिन काम करने के बाद अन्त में फ्रांस
भाग आने को विवश हुए। इस समय पैरिस में एक विप्लववादी पारसी रमणी
भी थी, जिसका नाम था मैडम कामा।
लाला हरदयाल भी इसी बीच एक बार देश आकर फिर अमेरिका वापस
चले आए। अमेरिका के कुछ विश्वविद्यालयों में उन्होंने बीच में कुछ दिन हिन्दू-
दर्शन-शास्त्र के अध्यापक का काम भी किया। इसी समय तारकनाथदास भी
अमेरिका के एक विश्वविद्यालय में अध्यापक नियुक्त हो गए। इनके सिवाय और
भी एक बंगाली सज्जन इस समय अमेरिका के एक विश्वविद्यालय में अध्यापक
का कार्य करते थे। यही 'बांग्लाय विप्लववाद' में उल्लिखित सुरेन्द्रकर थे कि
नहीं, कह नहीं सकता। अमेरिका में 'गदर' दल स्थापित होने के कुछ दिन बाद
लाला हरदयाल और बंगाली अध्यापक ने एक बार अमेरिका के तत्कालीन प्रेसी-
डेण्ट के साथ भेंट की और उनसे अनुरोध किया कि अमेरिका में भारतवासियों
को युद्ध-विद्या सीखने और अन्यान्य कई विषयों में सुयोग दिया जाय। अमेरिका
के प्रेसीडेण्ट ने उनसे भेंट ही की; उनके किसी अनुरोध को माना नही। इधर
अकृतकार्य होकर उन्होंने एक अन्य राजशक्ति के पास अपना आवेदन रखा और
इस दफ़ा उनका आवेदन स्वीकृत भी हो गया। इस घटना का इस पुस्तक के प्रथम
भाग में (तीसरे परिच्छेद में) उल्लेख किया गया है। किन्तु अमेरिका के इस
विप्लव दल के साथ भारत के विप्लव दल का वैसा सम्बन्ध न था।
इसी समय या इससे कुछ पहले बंगाल की एक विप्लव समिति की ओर से
एक युवक को बर्लिन भेजा गया, किन्तु ये जर्मन सरकार के ऊपर कुछ भी प्रभाव
न डाल सके। विदेशी राजशक्ति पर प्रभाव डालने के लिए जिस योग्यता और
चरित्रबल की आवश्यकता होती है, इस युवक में इसका अभाव था।
जो हो, जिस समय अमेरिका में विप्लव दल एक विदेशी राजशक्ति के साथ
सम्बन्ध सूत्र स्थापित करने में कृतकार्य हुआ उससे कुछ ही दिन बाद यूरोप का
महायुद्ध छिड़ गया; और लाला हरदयाल, तारकनाथ आदि अमेरिका छोड़
यूरोप भाग आए। उनकी विप्लव की सुन्दर योजना इस प्रकार विफल हो गई।
लालाजी पहले कोन्स्टैण्टिनोपल आए और फिर जेनेवा होकर बर्लिन में
अन्यान्य भारतीय विप्लववादियों के साथ आ मिले।
यूरोपियन युद्ध आरम्भ होते ही अलीगढ़ जिले के एक समृद्ध ज़मींदार श्रीयुत
महेन्द्रप्रतापसिंह स्विटज़रलैंड गए। लाला हरदयाल के जेनेवा आने पर महेन्द्र-
प्रताप के साथ उनकी भेंट हुई। लाला हरदयालजी के साथ वे बर्लिन आ उपस्थित
हुए। इस प्रकार महेन्द्रप्रताप भारतीय विप्लव दल में आ मिले।