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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 156, कुल 408 में से

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पृष्ठ 156

154 / बन्दी जीवन
किन्तु इसके बाद भी रासबिहारी ने फिर देश में अस्त्र भेजने का आयोजन
किया। इस आयोजन के अनुसार दिसम्बर, 1915 में भारत में विप्लव आरम्भ
होने की बात थी। इस बार का आयोजन इस प्रकार का था कि एक जहाज
अस्त्रादि लेकर अण्डमन के सब राजनैतिक कैदियों को मुक्त करके सीधा बर्मा
पर आक्रमण करता और दूसरे दो जहाज अस्त्रादि लेकर भारत के तट पर आते।
बंगाल के विप्लव दल की सहायता करने के लिए छियासठ हजार गिल्डर्स
(हालैंड का चांदी सिक्का) लेकर एक चीनी सज्जन भारत की ओर आ रहे थे।
ये भी सिगापुर में पकड़े गए। इनके पास रुपये के अतिरिक्त पिनांग के एक बंगाली
का पता और कलकत्ते के दो पते पाये गए। सिगापुर में अवनी मुखर्जी नामक
एक और विप्लवी पकड़े गए। उनकी नोटबुक में रासबिहारी का शांघाई का पता,
शांघाई के दो चीनियों का पता, चन्दन नगर के मतिलाल राय का पता, कलकत्ता,
ढाका और कुमिल्ला के कुछ पते एवं स्याम के एक सिक्ख इंजीनियर अमरसिंह
का पता पाया गया। शांघाई में खानातलाशी हुई और जिन दो चीनियों के पते
अवनी बाबू की नोटबुक में पाये गए थे। उनके पास बहुत-से रिवाल्वर और कई
हजार गोलियां पाई गईं। पहले के आयोजन में यह ठीक हुआ था कि हेनरी एस०
जहाज अस्त्रादि लेकर स्याम के इन्ही इंजीनियर अमरसिंह के पास जाता और उन
अस्त्रों आदि का कुछ अंश अमरसिंह के जिम्मे रख देता। रोलट (सिडीशन) कमेटी
की रिपोर्ट में छपा है कि अमरसिंह को फांसी दी गई है, किन्तु इन्हीं अमरसिंह
के साथ मेरी अंडमन में भेंट हुई थी। यह सच है कि इन्हें फाँसी का हुक्म हुआ
था किन्तु दूसरे अनेक विप्लवियों के साथ इन्हें भी फाँसी के बदले आजन्म
कालापानी हो गया था।
जो कुछ अस्त्रपूर्ण जहाज भारत की ओर आते थे, सुना था कि उनमें से एक
को डच सरकार ने अन्तर्राष्ट्रीय युद्ध के नियमों के अनुसार पकड़ लिया था, और
एक को सुनते हैं अंग्रेजों के लड़ाई के जहाज़ एच० एम० एस० कार्नवाल (H. M.
S. Cornwall) ने अण्डमन के निकट डुबा दिया था। तीसरे जहाज का क्या
हुआ कह नहीं सकता। इसी बीच यतीन बाबू के दल के एक और युवक भी
शांघाई आये, किन्तु बड़ी मुश्किल से शांघाई पहुँचते ही वे पकड़ लिये गए।
इस प्रकार विप्लव योजना की तीसरी चेष्टा भी व्यर्थ हुई। यूरोपियन महा-
युद्ध आरम्भ होने के एक बरस बाद तक भी भारत के बाहर जाना-आना
वैसी कठिन बात न थी, किन्तु जब अंग्रेज सरकार को विप्लव योजना के सभी
सम्वाद मिल गए तब से भारत के बाहर जाना-आना अत्यन्त कठिन कार्य हो
गया और इसी कारण अस्त्रपूर्ण जहाज अंग्रेजों की प्रखर दृष्टि से न बच सके।
इसके सिवाय जर्मनों को भी पश्चिमी सीमान्त के युद्ध में इतना व्यस्त होना पड़ा
कि भारत ने इस प्रकार ध्यान न दे सके। भारतीय विप्लव दल भी अपने अस्तित्व
का ऐसा कुछ परिचय न दे सका कि विदेशी राज-शक्तियों की दृष्टि इधर आप-
से-आप खिचती। यदि युद्ध के बहुत पहले से ही भारतीय विप्लव दल विदेशों की