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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 149, कुल 408 में से

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पृष्ठ 149

बंगाल में / 147
समिति के जो नेता हुए, उन्होंने बहुत कुछ समझ लिया था कि देश के भिन्न-भिन्न
विप्लव दल मिल-जुलकर सम्पूर्ण रूप से एक न हो जाएंगे तो देश का मंगल नहीं
है। इसी से वे देश के सभी दलों के साथ मिलने को इच्छुक थे, इसीलिए सम्भवतः
बारी-साल षड्यंत्र के मामले के समय ही ढाका समिति चन्दननगर दल के साथ
मिल जाती है। काशी का दल भी इस ढाका समिति की मार्फत ही रासबिहारी
के उत्तर भारत के दल के साथ परिचित हुआ। इस प्रकार हमारा दल पूर्व बंगाल
से लेकर पंजाब तक फैलकर एक साथ काम करता रहा। पंजाब के विप्लवायोजन
के संवाद भी अधिकांश स्थानों में इसी ढाका समिति की मार्फत ही बंगाल के
भिन्न-भिन्न विप्लव दलों के पास भेजे जाते थे। लाहौर, दिल्ली, काशी,
चन्दननगर और ढाका के विप्लव दल इस प्रकार बिलकुल एक हो जाते हैं। किन्तु
इस बात को बंगाल के अन्यान्य विप्लव दल उस समय घुणाक्षर न्याय से भी न
जान सके थे।
जिस समय डिफेंस ऑफ इंडिया एक्ट (भारत रक्षा क़ानून) से कई हज़ार
युवक केवल सन्देह के फेर में बिना विचारे क़ैद हो गए, उस समय बंगाल के सभी
दलों ने शक्तिहीन होकर परस्पर मिल-जुलकर एक साथ काम करने की इच्छा
प्रकट की ओर कुछ दिन तक उस प्रकार कार्य चला भी। यह मिलाप यदि समय
रहते हो जाता तो शायद फल और ही तरह का हो सकता था। रासबिहारी भारत
छोड़ने से पहले जब एक बार कलकत्ता के निकट कही आए, उस समय उन्होंने
कलकत्ता अंचल के भिन्न-भिन्न दलो के निकट मिलकर एक हो जाने का प्रस्ताव
कर भेजा। किन्तु कलकत्ता अंचल के किसी भी दल ने इस मिलने के प्रस्ताव की
कुछ परवाह नही की। विवश होकर रासूदा को इस चेष्टा से हाथ खींचना पड़ा।
जो हो रासूदा की विदेश यात्रा के बाद भी हम इस पूर्व बंगाल के दल के
साथ पहले की तरह ही मिलकर काम करने लगे। रासूदा की विदेश यात्रा का खर्च
एक हज़ार रुपया, इसी ढाका समिति से लिया गया। जिस समय रासूदा को
विदेश भेजा गया तब तक भी बंगाल के विप्लव दलों की शक्ति कुछ भी कम न
हुई थी। प्रत्युत उस समय बगाल के भिन्न-भिन्न विप्लव दलों के बीच
प्रतियोगिता चलती थी कि कौन कितना काम करके दूसरे दलों को लज्जित कर
सकता है। रासूदा को विदेश भेजकर हमने समझा था कि विदेश से अस्त्र मँगाने
की चेष्टा हमारे दल से ही सबसे पहले हुई है, किन्तु हम उस समय न जानते थे कि
यतीन बाबू के दल ने भी ठीक इसी समय अपने आदमी विदेश भेजे थे। देश में
चाहे हम भिन्न-भिन्न दल इस प्रकार विच्छिन्न होकर कार्य करते थे किन्तु विदेश
में उस समय सभी दल, मालूम होता है, मिल गए थे।
इस समय की घटनाएं भली भाँति मेरी जानी नहीं हैं, विशेषकर विदेश में
किस प्रकार काम चलता था उसकी अनेक बातें मैं नहीं जानता, क्योंकि रासूदा के
विदेश जाने के दो-तीन मास बाद ही मैं पकड़ा गया। तो भी पूर्व बंग के गिरिजा
बाबू जब नवम्बर मास (सन् 1915) में पकड़े जाकर काशी आए थे तब उनसे