बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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के प्रति असन्तुष्ट थे। शायद इसका एक कारण यह था कि पूर्व बंगाल की अनु-
शीलन समिति के प्रायः सभी सदस्यों के मन में कुछ ऐसे गर्व का भाव था कि
उनके समान शक्तिशाली दल बंगाल में और कोई नहीं है। जान पड़ता है कि
इसीलिए पश्चिम बंगाल के विप्लव दलों का पूर्व बंगाल के दो-एक छोटे-छोटे
विप्लव दलों के प्रति वैसा द्वेष न था जैसा इस ढाका समिति के प्रति था। ऐसा
होने का एक और कारण भी था। ढाका समिति पुलिन बाबू द्वारा स्थापित हुई
थी। और इन पुलिन बाबू की प्रकृति में स्वेच्छाचारिता (autocracy) का भाव
भयानक रूप से प्रबल था। पुलिन बाबू सचमुच और किसी के साथ मिलकर
काम करने के पक्षपाती न थे। पुलिन बाबू का आधिपत्य जहाँ जरा भी कम हो
वहाँ पुलिन बाबू का रहना असम्भव होता, इस अंश में पुलिन बाबू और वारीन
बाबू एक ही प्रकृति के आदमी थे। इसी कारण पुलिन बाबू की विद्यमानता में
ढाका की समिति और किसी समिति के साथ न मिल सकी, और बहुत कुछ
पुलिन बाबू के कारण ही उसी समय से बंगाल के सभी दल ढाका समिति के प्रति
असन्तुष्ट हो जाते हैं और समय बीतने पर वही असन्तोष की आग क्रमशः बुरा
रूप धारण कर लेती है। असल में मिल-जुलकर काम करने के लिए जो समझौते
की प्रवृत्ति (compromising attitude) होनी चाहिए, पुलिन बाबू में उस
जिन्स का विशेष अभाव था। किन्तु पुलिन बाबू को जेल होने के बाद ढाका
समिति में एकछत्र आधिपत्य और किसी का नहीं रहता। तभी से यह समिति
बहुत-कुछ गणतन्त्र के आदर्श पर गठित हो गई। बंगाल के भिन्न-भिन्न दल अपने
नेताओं के नाम से ही परिचित थे, जैसे यतीन बाबू का दल, विपिन बाबू का दल
इत्यादि। किन्तु पूर्व बंगाल की इस ढाका समिति का कोई एक निर्दिष्ट नेता न
रहने से यह अन्त तक ढाका अनुशीलन समिति के नाम से ही परिचित होती आई
है। इस प्रकार सर्वांश में एक व्यक्ति के नेतृत्व में न रहने से यह दल कुछ कम
शक्तिशाली हो गया हो सो भी नहीं, कारण कि जितने आँधी-तूफानों में से इस
ढाका समिति को गुजरना पड़ा है उतने किसी और दल ने भी सहे हैं कि नहीं
इसमें सन्देह है। बार-बार विषम विपत्तियों में पड़कर भी फिर यह दल सिर
उठाकर खड़ा हो गया है। पूर्व बंग के युवकों की यही एक विशेषता है कि वे एक
बार जिसे ग्रहण कर लें उसे जीवन रहते तक चिपटकर पकड़े रहते हैं। पश्चिम
बंग के लोग पूर्व बंगाल के चाहे जितने दोष देखा करें, मुझे तो प्रतीत होता है कि
पूर्व बंगाल के युवक पश्चिम बंग के युवकों की अपेक्षा अधिक सरल और अधिक
दृढ़प्रतिज्ञ निकलते हैं। पश्चिम बंग के लोगों में आन्तरिकता कम है, और स्वदेशी
युग के इतिहास की आलोचना करने से देखा जाता है कि पूर्व बंगाल सभी प्रकार
से राष्ट्रीय कार्यों में पश्चिम बंगाल की अपेक्षा अधिक अग्रसर रहा है। पूर्व बंगाल के
युवक और सब बातों में अच्छे हैं, पर उनमें यह एक बड़ा दोष है कि वे अनेक बार
बड़े तिकड़मी (in riguing) साबित होते हैं और उनमें, मालूम होता है, संकीर्ण
प्रादेशिकता का भाव भी कुछ प्रबल है। खैर, जो भी हो, पुलिन बाबू के बाद ढाका