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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 153, कुल 408 में से

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पृष्ठ 153

बंगाल में / 151
लाला हरदयाल आदि के चले आने पर अमेरिका के विप्लव दल का भार
रामचन्द्र नामी एक विप्लववादी सज्जन पर डाला गया ।
इससे पहले ही यूरोप में भारतीय विप्लववादी एक दल संगठित कर चुके
थे, इस यूरोपियन विप्लव दल के नेताओं में डा० चक्रवर्त्ती और श्रीयुत वीरेन
चट्टोपाध्याय प्रमुख थे ।
ये वीरेन चट्टोपाध्याय हमारे अघोर चट्टोपाध्याय महाशय के पुत्र हैं। श्रीमती
सरोजिनी नायडू और 'शमा' पत्रिका की वर्त्तमान सम्पादिका श्रीमती मृणालिनी
चट्टोपाध्याय इन्हीं वीरेन्द्र की ही बहनें हैं। वीरेन्द्र ने एक धर्मप्राण रोमन कैथो-
लिक युवती¹ का पाणिग्रहण किया है किन्तु इन दम्पति में यथेष्ठ प्रेम रहने पर
भी इन दोनों के ही धर्म-विश्वास इतने दृढ़ थे कि इनमें परस्पर इन धर्म-विश्वासों
के कारण बड़ी अशान्ति रहती, इसी से अन्त में इन्होंने अलग रहना आरम्भ कर
दिया। अब भी इनमें से किसी ने दूसरा विवाह नही किया और एक-दूसरे से दूर-
दूर रहने पर भी इनके प्रेम में कोई व्यतिक्रम नही हुआ । वह ही युवती अब भी
चट्टोपाध्याय महाशय का सब खर्च-भार उठाती है ।
खैर, यूरोपियन महायुद्ध आरम्भ हो जाने पर अमेरिका और यूरोप के
विभिन्न विप्लव दलों के नेता जर्मनी मे एकत्र हो गए और जर्मन सरकार के
राजप्रतिनिधियों के साथ परामर्श करके एक साथ भारत में विप्लव संघटन का
आयोजन करने लगे ।
जर्मनी मे जो सब भारतीय विप्लवी इकट्ठे हुए थे उनमें से हरदयाल,
तारकनाथ, बरकतुल्ला, चन्द्रकुमार चक्रवर्त्ती, हेरम्बलाल गुप्त, वीरेन्द्र सरकार,
महेन्द्रप्रताप और चम्पकरामन पिल्लै का नाम हम रोलट कमेटी की रिपोर्ट में देख
पाते हैं। चम्पकरामन स्विटजरलेंड के विप्लव दल के सभापति थे । वीरेन चट्टो-
पाध्याय का नाम हमने बहुत बार अनेक कागजों में देखा है।
पहले हरदयाल आदि कई एक सज्जनो ने जर्मनी के बाहर से सम्भवतः
स्टाकहाल्म शहर से एक पत्रिका निकाली । यह पत्रिका निकालने का उद्देश्य था
यूरोपियन देशो की भारतवासियों के प्रति सहानुभूति प्राप्त करना और अंग्रेज
किस प्रकार इस बीसवी शताब्दी मे भारत पर शासन करते हैं उसका विस्तृत
परिचय यूरोप वालो को देना । यूरोप और अमेरिका में भारत-विषयक ज्ञान के
प्रचार करने से कितना लाभ है, आज भी हमारे देश-नायक यह भली प्रकार नही
समझ सके, क्योकि यदि वे समझ पाते तो उम तरफ अवश्य ध्यान देते ।
इस प्रकार अपने स्वार्थों की सिद्धि के लिए प्रचार-कार्य में अंग्रेज कितना
रुपया खर्च करते हैं और कैसे विचारशील उपयुक्त व्यक्तियो को इस काम में
नियुक्त करते और उनकी कैसी सहायता करते हैं, यह हमारे देश-नायकों की
नजर मे अभी तक नही पड़ा, इसी से आज भी जब विदेशों में कुछ भारतवासी

  1. उनका नाम है—ग्नेसस्मैंड्ले । उनके लेख प्राय. भारतीय पत्रिकाओ में छपा करते हैं ।