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औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

औचित्यविचारचर्चा

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॥ श्रीः ॥
औचित्यविचारचर्चा
संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता
—: ० :—
कृतारिवञ्चने दृष्टिर्येनाञ्जनमलीमसा ।
अच्युताय नमस्तस्मै परमौचित्यकारिणे ॥ १ ॥
वन्दे गुरुचरणाब्ज-द्वन्द्वं प्रत्यक्षदेवरूपन्तम् ।
यान्ति महत्त्वं लोका यद्रजोलवलाभतोऽप्यत्र ॥
श्रीक्षेमेन्द्रकृतायाः सम्यगौचित्यविचारचर्चायाः ।
संस्कृत-हिन्दी-सहितां कुर्वे व्याख्यां प्रभेत्याख्याम् ॥
प्रारिप्सितग्रन्थप्रतिबन्धकीभूतविघ्नविनाशार्थं शिष्यशिक्षार्थञ्च महा-
मतिः क्षेमेन्द्रः स्वेष्टदेवतानमस्कारात्मकं मङ्गलमातनोति—कृतारिवञ्चने
इति । येन विष्णुना, अरिवञ्चने शत्रुप्रतारणे, विषयसप्तमीयम् । समुद्र-
मन्थनोपलब्धामृतवितरणकाले इति भावः । दृष्टिर्नेत्रयुगलम्, अञ्जनमली-
मसा कज्जलमलिना, कृता सम्पादिता, परमौचित्यकारिणे निरतिशयौ-
चित्यसम्पादकाय शत्रुवञ्चनोचितनारीवेषधारकायेति भावः । तस्मै प्रसि-
द्धाय अच्युताय, कदाचिदपि औचित्यच्युतिरहिताय विष्णवे नमः इति
सरलोऽर्थः । एतेनौचित्यविचारात्मकवस्तुनिर्देशोऽपि ध्वनितः ।
ग्रंथ-समाप्ति में विघ्न-प्रतिबन्धक और मंगल विघ्नविनाशक होता है, ऐसी
प्राचीन विद्वानों की मान्यता रहती आयी है । अतः वैष्णव मनीषी श्री क्षेमेन्द्र
भगवान् विष्णु को नमस्कार करने के व्याज से प्रस्तुत ग्रंथ-प्रतिपाद्य औचित्य का
भागवत-गुणसंपन्न होना सिद्ध कर रहे हैं—कृतारि इति । जिन्होंने (समुद्रमंथन
से प्राप्त अमृतवितरण के समय ) असुरों को ठगने के लिये मोहिनीरूप धारण कर
अपने नेत्रों को कज्जल से मलिन कर लिया अर्थात् पुंस्त्व का त्याग भी अंगीकृत
किया, औचित्य को समादृत करनेवाले तथा कभी भी उससे च्युत नहीं होने वाले
उन परब्रह्म परमात्मा भगवान् विष्णु को नमस्कार है ॥ १ ॥

२ औचित्यविचारचर्चा
कृत्वापि काव्यालङ्कारां क्षेमेन्द्रः कविकर्णिकाम् ।
तत्कलङ्कं विवेकञ्च विधाय विबुधप्रियम् ॥ २ ॥
औचित्यस्य चमत्कारकारिणश्चारुचर्वणे ।
रसजीवितभूतस्य विचारं कुरुतेऽधुना ॥ ३ ॥ (युग्मकम्)
विवेच्यवस्तु निर्दिशति—कृत्वापीति । क्षेमेन्द्रो ग्रन्थकर्ता, काव्याल-
ङ्काराम् काव्यस्य काव्याङ्गभूतेति यावत्, अलङ्कारा उपमारूपकादयो
यस्याम् इति व्यधिकरणपदो बहुव्रीहिः, अन्यथाऽलङ्कारशब्दस्य नित्य-
पुंल्लिङ्गतया स्त्रीलिङ्गत्वमसङ्गतं स्यात्, काव्यगतालङ्कारप्रतिपादिकामिति
भावः, कविकर्णिकाम् तन्नामकग्रन्थविशेषम्, कृत्वापि सम्पाद्यापि,
अपिना तत्करणेऽपि स्वपरितोषाभावः सूच्यते, च पुनः तत्कलङ्कम् काव्य-
कलङ्कम्, तन्नामकं काव्यदोषनिरूपणपरं निबन्धविशेषमिति यावत् ।
अथवा तत्कलङ्कम् तस्याः कविकर्णिकायाः, कलङ्कम् दोषम्, प्रमार्ष्टुमिति
शेषः, धातूनामनेकार्थत्वादुद्धृत्येत्यर्थक-विधायेतिल्यबन्तक्रियापदवाच्या-
न्वयार्थकम् कर्मपदं वैतत्, विवेकम् काव्यविवेकं तन्नामककाव्यलक्ष-
णादिनिरूपकग्रन्थविशेषम् अथवा विवेकम् वस्तुतत्त्वविचारं, विधाय
कृत्वा, द्वितीयकल्पतयोहितेनार्थेन “कविकर्णिकाकरणकालं यावत्, अल-
ङ्कारतत्त्वमेव काव्ये सर्वप्रधानं मन्यमानोऽहमासम्, परन्तु पश्चात्तन्-
निजमान्यतायां दोषो मया दृष्टः, अलङ्कारतत्त्वसूक्ष्मपरिशीलनेन च
औचित्यतत्त्वं सर्वतः प्रधानं मम ध्यानपथे समायातमिति रहस्यं
ध्वनितमवगन्तव्यम् । अधुना इदानीम्, तद्विधानानन्तरमिति यावत्,
चमत्कारकारिणः विच्छित्तिविशेषप्रयोजकस्य, चारुचर्वणे रमणीयास्वादे
सुन्दरास्वाददशायामिति यावत्, रसजीवितभूतस्य रसेऽपि सारभूतस्य
तदन्तरा रसनीयताविरहेण रसत्वस्यैवासम्भवात् । एतेन रसादेः प्रधानत्व-
प्रवादोऽलङ्कारादितत्त्वान्तरापेक्षिकः, सर्वतः प्रधानत्वन्तु औचित्यतत्त्व-
स्यैवेत्यर्थो ध्वनितः, औचित्यस्य वक्ष्यमाणलक्षणस्य काव्यात्मतत्त्वभूतस्य
विबुधप्रियं विशिष्टविद्वज्जनश्लाघ्यम्, एतेन साधारणपण्डितम्मन्यजन-
प्रियत्वाभावेऽपि नैतस्य विचारस्य किञ्चिच्छिन्नं भवतीति व्यज्यते,
विचारम् आलोचनम्, कुरुते विधत्ते इत्यर्थः । यशोलाभरूपस्य क्रियाफलस्य
कर्तृगामित्वेनात्मनेपदं बोध्यम् ॥ २-३ ॥
आचार्य क्षेमेन्द्र ने पहले कविकर्णिका नामक एक ग्रन्थ बनाया जिस

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता ३
अलंकारों का निरूपण किया, अतएव कविकर्णिका का विशेषण काव्यालङ्काराम्
कहा। इस विशेषणबोधक पद में काव्य के अलङ्कार—उपमा-रूपक आदि हैं
जिसमें, इस तरह से बहुव्रीहि समास समझना चाहिए। अन्यथा काव्य को
अलंकृत करने वाली—इस अर्थ में "काव्यालङ्काराम्" ऐसा स्त्रीलिंग शब्द नहीं
संगत होगा। कारण अलंकार शब्द नित्य पुंल्लिङ्ग है। इसके बाद "काव्य-
कलंक अथवा कविकलं क" नाम का दूसरा निबन्ध भी उन्होंने लिखा, जिसमें
काव्यदोषों का विवेचन किया गया। फिर तीसरा ग्रंथ "काव्यविवेक" नाम का
रचा, जिसमें काव्यलक्षण, काव्यभेद आदि का वर्णन किया गया। तदुत्तर आज
इस "औचित्यविचारचर्चा" नामक पुस्तक का प्रणयन कर रहे हैं, ऐसा ग्रंथकार
का कथन है। यह पुस्तक उस औचित्य तत्त्व का विद्वन्मनोग्राही विचार है जो
काव्य में चमत्कार को उत्पन्न करता है और जो रमणीय आस्वादावस्था में
जाकर रस का भी जीवातुभूत सिद्ध होता है अर्थात् रस में भी रसनीयता लाने
का श्रेय जिसे प्राप्त है। तात्पर्य यह कि औचित्य के बिना आस्वाद्यता के अभाव
में रस रस कहलाने योग्य हो ही नहीं सकता।
यहाँ एक बात ध्यान देने योग्य यह है कि "औचित्यविचारचर्चा" के
अतिरिक्त जिन तीन ग्रन्थों का निर्देश ऊपर किया गया है वे आज प्राप्त नहीं
होते। इतिहासलेखकों ने भी केवल "कविकर्णिका" का ही उल्लेख किया है,
"काव्यकलंक" और "काव्यविवेक" का नहीं। पर मुझे मूल पंक्ति का स्वा-
भाविक स्वारस्य ऐसा ही प्रतीत होता है जिसके अनुसार "तत्कलङ्क विवेकञ्च"
को भी ग्रन्थनिर्देशपरक ही समझना संगत है। यदि क्षेमेन्द्र द्वारा "काव्यकलंक"
और "काव्यविवेक" की रचना वाली बात नहीं ही मानी जाय तब उक्त पंक्ति
की व्याख्या किसी तरह यों की जा सकती है—क्षेमेन्द्र ने पहले कविकर्णिका
लिखी, फिर उसके कलंक-दोष ( त्रुटियों ) का मार्जन करने के लिये विवेक-समु-
चित विचार-करके औचित्य का विचार किया। तात्पर्य यह कि अलंकार तत्त्व
का गंभीर मनन करते-करते उन्हें उस तत्त्व में त्रुटि दीख पड़ने लगी—फिर चिर-
चिंतन से उन्हें औचित्य तत्त्व का उद्भास हुआ और उन्होंने झट से "औचित्य-
विचारचर्चा" रच डाला जिससे "कविकर्णिका" में जो कुछ त्रुटि रह गयी थी
उसका मार्जन हो गया ॥ २-३ ॥
काव्यस्यालमलङ्कारैः किं मिथ्यागणितैर्गुणैः ।
यस्य जीवितमौचित्यं विचिन्त्यापि न दृश्यते ॥ ४ ॥

४ औचित्यविचारचर्चा
यस्य काव्यस्य, जीवितं जीवनाधायकम्, औचित्यम् अनुरूपविधान-
रूपं, विचिन्त्यापि विचार्यापि, न दृश्यते न अवलोक्यते, तस्य काव्यस्य,
अलङ्कारैरुपमारूपकादिभिः, अलम् असति प्राणे भूषणमिव व्यर्थमिति
भावः, मिथ्यागणितैर्मृषाख्यातैर्गुणैरोजःप्रसादादिभिः किम् ? न किमपी-
त्यर्थः । यत्र काव्ये रसजीवातुभूतौचित्यमेव नास्ति तत्र गुणालङ्कारादि-
चिन्तनक्लेशो मुधैवेति भावः ॥ ४ ॥
जिस काव्य में तदात्मतत्त्व अचित्य का कुछ भी लेश न हो वहाँ अलंकार
तथा गुण का चिंतन सर्वथा निरर्थक है ॥ ४ ॥
अलङ्कारास्त्वलङ्कारा गुणा एव गुणाः सदा ।
औचित्यं रस-सिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् ॥ ५ ॥
अलङ्कारा अनुप्रासोपमादयः, अलङ्कारा एव बाह्यशोभाकराणि
भूषणान्येव, एतेषामलङ्कार्यत्वाभाव इति बोध्यम् । गुणा ये च प्रसाद

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता ५
हारादिवल्लोकप्रसिद्धविविधभूषणवत्, अलंकारा एव भूषणान्येव, बाह्य-
शोभाकरत्वात् शब्दार्थरूपशरीरशोभातिशायितया अलंकारकत्वेनालंका-
र्य्यत्वाभावादित्यर्थः । येऽपि काव्यगुणाः ओजःप्रसादमाधुर्यादयः, केचन
कतिपये, आन्तरिकधर्मा गुणास्तल्लक्षणविचक्षणैर्गुणलक्षणाविष्कारकै-
र्विद्वद्भिः, समाम्नाता आख्यातास्तेऽपि श्रुतसत्यशीलादिवद् गुणा एव,
अर्थात् गुणगुणिनोर्भेदस्य सर्वविदातत्वेन तेषामप्यात्मस्थानीयत्वाभाव
इत्यर्थः । तत्र हेतुमाह—आहार्यत्वात् = आरोपविषयत्वात्-इति भावः ।
औचित्यन्तु वक्ष्यमाणलक्षणमनुरूपविधानरूपं, काव्यस्य स्थिरमविनश्वरं
जीवितं जीवनम् । तेन औचित्येन विना अस्य काव्यस्य गुणालङ्कार-
युक्तस्यापि निर्जीवत्वात् काव्योद्देश्यीभूतविच्छित्तिविशेषसम्पादकत्वा-
भावात् । धातुपदव्यवहार्यैः रसैः सिद्धस्य प्रसिद्धस्य रूपवत्तयाख्यातस्येति
यावत् । शरीरस्य नश्वरत्वेऽपि तदितर आत्मा यथा स्थिरस्तथैव रसेन
शृङ्गारादिना प्रसिद्धस्य काव्यस्य औचित्यमेव निश्चितं जीवनमिति
सारांशः ।
जिस तरह यथास्थान विन्यस्त कटक, कुंडल, केयूर, हार आदि लौकिक
आभूषण शरीर की शोभा को बढ़ाते हुए परंपरया आत्मा में भी विशेष गुणा-
धान करते रहते हैं उसी तरह उपमा, उत्प्रेक्षा आदि शास्त्रीय अलंकार रसादि
का उपकारक होते हुये भी काव्य के अलंकार ( भूषण ) ही हो सकते हैं, आत्मा
( अलंकार्य ) नहीं । कारण, अलंकार बाह्य धर्म हैं और आत्मा आन्तर पदार्थ
है । इसी तरह ओजः, प्रसाद आदि गुण आत्मधर्मिक होने पर भी गुण ही हैं,गुणी
अर्थात् काव्यात्मा नहीं, क्योंकि ये गुण भी आहार्य हैं — पीछे आरोपित होते हैं—
अर्थात् उनको छोड़कर भी अपनी सत्ता कायम रख सकते हैं फिर उन्हें आत्मा
कैसे कहा जा सकता है । कारण, आत्मा तो वह पदार्थ है जिसके बिना सत्ता ही
नहीं रह सके । अतः जैसे धातु शब्द से व्यवहृत रसों से प्राणी का शरीर नश्वर
होकर भी संसार में प्रसिद्धि तो पाता है, पर आत्मा उससे भिन्न अविनश्वर
पदार्थ ही माना जाता है, वैसे ही काव्य रस से जगत् में प्रसिद्धि लाभ करता है,
आत्मा तो उसका स्थिरतत्त्व औचित्य ही है । तात्पर्य यह है कि जैसे प्राणि-शरीर
में पंच महाभूत सबसे स्थूल और धातु उससे सूक्ष्म हैं, पर आत्मा उससे भी सूक्ष्म
तत्त्व है । उसी तरह काव्य में शब्द, अर्थ और उसके धर्म अलंकार सबसे स्थूल
तत्त्व हैं, रस तथा रसधर्म गुण उनसे सूक्ष्म तत्त्व अवश्य हैं, पर आत्मा का स्थान
उनसे भी सूक्ष्म तत्त्व औचित्य को ही दिया जा सकता है ।

उक्तार्थस्यैव विशेषमाह—
उचितस्थानविन्यासादलङ्कृतिरलङ्कृतिः ।
औचित्यादच्युता नित्यं भवन्त्येव गुणा गुणाः ॥ ६ ॥
मूलार्थमेव विवृण्वन्नाह—उचितेति । अलङ्कृतिर्लौकिकालङ्कारोऽपि
उचितस्थानविन्यासात् यथोचितस्थाने साधुन्यासादेव, अलङ्कृतिर-
लङ्कारपदवाच्यो भवितुमर्हति । एवमेव औचित्यादच्युता अपरिभ्रष्टा
एव गुणा गुणा भवन्ति, गुणतामासादयन्ति ॥
मूल अर्थ पर ही विशेष प्रकाश डालने के अभिप्राय से कहा जा रहा है—
उचितेति । अलंकार तथा गुण तभी अलंकार एवम् गुण कहलाने की क्षमता रखते
हैं जब वे औचित्य की सीमा से बाहर नहीं जाते, अर्थात् उचित स्थान में
विन्यस्त अलंकार ही अलंकार और उचित स्थान में प्रदर्शित गुण ही गुण कहला
सकते हैं अन्यथा नहीं ॥ ६ ॥
अलङ्कृतिरुचितस्थानविन्यासादलङ्कर्तुं क्षमा भवति, अन्यथा
त्वलङ्कृतिव्यपदेशमेव न लभते । तद्वदौचित्यादपरिच्युता गुणा गुणता-
मासादयन्ति अन्यथा पुनरगुणा एव ।
यदाह—
कण्ठे मेखलया नितम्बफलके तारेण हारेण वा,
पाणौ नूपुरबन्धनेन चरणे केयूरपाशेन वा ।
शौर्येण प्रणते रिपौ करुणया नायान्ति के हास्यता-
मौचित्येन विना रुचिं प्रतनुते नालङ्कृतिर्नो गुणाः ॥ ६ ॥
पूर्वोक्तार्थमेवोदाहरणादिना स्पष्टयति-अलङ्कृतिरिति । अलङ्कृति
भूषणसमूहः, उचितस्थानविन्यासादेव, अलङ्कर्तुं भूषयितुं, क्षमा समर्था
भवति । अन्यथा उचितस्थानविन्यासाभावे, अलङ्कृतिव्यपदेशमेव अल-
ङ्कारपदवाच्यत्वमेव, न लभते = न प्राप्नोति । स्थूलव्यत्ययेनालङ्कृतीनां
शोभाविशेषजनकत्वापेक्षया भद्रभावनाराहित्यस्यैव द्योतनत्वमुपपद्येतेति
भावः । तद्वदौचित्यादपरिच्युताः तथैव औचित्यादहीना एव गुणा गुण-
तामासादयन्ति गुणपदवाच्या भवन्ति, अन्यथा औचित्यराहित्ये पुनरगुणा
एव । कापुरुषादीनां शौर्यादिवर्णनेऽनन्विततया रसादिपोषणापेक्षया
तद्व्याघातस्यैव सम्भावनेति बोध्यम् ।

संस्कृत-हिन्दोव्याख्याद्वयोपेता ७
गुणाङ्कारयोरनौचित्येन गुणालङ्कारतेति दर्शनाय उदाहरणमुपस्था-
पयति—यदाहेति। कण्ठे इति। कण्ठे गले, मेखलया काञ्च्या, हारस्थाने
मेखलाधारणेनेति भावः, वा अथवा, नितम्बफलके कटिप्रदेशे, तारेण
निर्मलेन, हारेण मौक्तिकेन, मेखलास्थाने हारधारणेनेत्यर्थः, पाणौ करे,
नूपुरबन्धनेन, प्रणते शरणागते, शौर्येण वीरताप्रदर्शनेन, रिपौ शत्रौ,
करुणया दयाप्रदर्शनेन, के मनुष्याः, हास्यताम् उपहासयोग्यतां, न
आयान्ति = न प्राप्नुवन्ति ? सर्वेऽपि प्राप्नुवन्त्येवेति भावः (औचित्येन
विना अलङ्कृतिर्गुणा वा रुचिं शोभां न प्रतनुते न विस्तारयति। गुणपक्षे
प्रतन्वते इति वचनविपरिणामेनान्वयः ॥ ६ ॥
पूर्वोक्त अर्थ को ही उदाहरण के द्वारा स्पष्ट करने के लिये कहा जा रहा है
अलङ्कृतिरिति । औचित्यरक्षण की मर्यादा ही अलंकार तथा गुणों को अलंकार
एवं गुण की संज्ञा देती है। उसके बिना न अलंकार अलंकार ( भूषण ) हो
सकता है और न गुण गुण ही । जैसे कर्णफूल ( जो कि एक सुन्दर कर्णाभरण है )
को कान के बदले नाक में पहन लेने पर वह नायिका के सौन्दर्य का पोषण न
कर शोषण ही करता है । अथवा शौर्य ( जो कि एक विलक्षण गुण है ) का
वर्णन किसी वीर के प्रसंग में न करके किसी कायर के प्रसंग में किया जाय तो
वहाँ रसादि पुष्ट न होकर दुष्ट ही हो जाता है । फिर वे अलंकार और गुण
कहलाने का दावा कैसे कर सकते हैं ? अर्थात् औचित्य ही वह तत्त्व है जो कि
अलंकार को अलंकार और वण को गुण कहलाने का अवसर प्रदान करता है ।
औचित्य-सुरक्षा के अभाव में अलंकार और गुण किस तरह अपनी महत्ता
खो देते हैं, इसी को दिखाने के लिये कहा जा रहा है—कण्ठे इति । यदि कोई
कामिनी, कंठ में कांची, कमर में हार, हाथ में पायजेब और पैर में केयूर पहनले
तो उसकी मूर्खता पर कौन उसकी हंसी नहीं उड़ायगा ? इसी तरह यदि कोई
पुरुष शरणागत पर वीरता का और शत्रु पर दया का भाव दिखाये तो वह भी
अवश्य उपहास का पात्र समझ जायगा । सत्य बात तो यह है कि औचित्य के
बिना न तो अलंकार शोभा प्रदान करते हैं और न गुण आकृष्ट ही कर
सकते हैं ॥ ६ ॥
किं तदौचित्यमित्याह—
उचितं प्राहुराचार्याः सदृशं किल यस्य यत् ।
उचितस्य च यो भावस्तदौचित्यं प्रचक्षते ॥ ७ ॥

करणे" -> ल, ङ्क, र, णे.
In line 28: "(५) अलङ्क" - wait, the ङ्क has a 'र' under it? "अलङ्क्र"? No, it's ङ्क.
Wait, is it "अलङ्कारे"? If it were "अलङ्कारे", it would have 'ा' after ङ्क. Is there an 'ा'? No!
Wait, could it be "अलङ्करणे"?
Wait, look at the right edge of line 28:
It ends with: "(५) अलङ्क" then a letter that looks like 'र' with something, maybe 'णे' is cut off or compressed?
Actually, looking closely at the image:
"(५) अलङ्क" -> wait, after ङ्क, there is 'रणे'?
Wait, look at the very edge:
It is: ( ५ ) अ ल ङ्क र [णे is cut off or very faint?]
Wait, let's zoom in on that exact spot:
Line 27 ends with: "कुमार-"
Line 28 ends with: "(५) अलङ्क..."
Wait, under "कुमार-":
The 'कु' is above '(४)'.
'मा' is above 'गुणे'.
'र' is above 'ओजः'.
'-' is above 'प्रसादादौ,'.

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता ९
(१२ उपसर्गे क्रियायोगाश्रिते प्र-परादिरूपे, (१३) निपातेऽद्रव्यार्थके च-
वा-हेत्यादिरूपे, (१४) काले समये, (१५) देशे स्थानविशेषे, (१६) कुले
वंशपरम्परायाम्, (१७) व्रते नियमविशेषरूपे, (१८) तत्त्वे तत्त्वाख्याने
यथावद्वस्तुवर्णन इत्यर्थः, (१९) सत्त्वे सत्त्वस्यान्तर्बलस्य वर्णनायाम्,
(२०) अभिप्राये तात्पर्ये, (२१) स्वभावे प्रकृतौ, (२२) सारसंग्रहे निष्कृ-
ष्टार्थकथने, (२३) प्रतिभायां नवनवोन्मेषशालिबुद्धिरूपायाम्, (२४) अव-
स्थायां वयःक्रमे, (२५) विचारे विवेचनायां, (२६) नाम्नि संज्ञाभिधाने,
(२७) आशिषि आशीर्वादे । एतेषु च काव्याङ्गेषु व्यापि व्यापकं, जीवितं
जीवनमौचित्यमेव प्राहुर्मनीषिण इति भावः । एतद्ग्रन्थाशयमेव स्फोर-
यत्येतेष्विति । अयं भावः—कारिकोक्तं पदादिकमादायैव काव्यशरीरं
संपन्नं भवति । एवञ्च पदादिकं काव्यस्य शरीरस्य हस्तादिकमिव लब्धंश-
भूतम्, सकलतदंशव्यापिनस्तत्त्वस्यौचित्यस्यात्मत्वमुचितं न तु रसादे-
स्तस्य सकलतदंशव्यापित्वविरहात् । किञ्च काव्ये कारिकोक्तपदादि-
भिन्नोऽप्यंशः संभवति चेत् ? भवतु नाम, किन्तु मर्मभूता अंशास्त एव ।
तथा च यथा प्राणिशरीरगतमर्मस्थानेषु जायमानेनाघातेन प्राणोत्क्रमण-
क्रमेण जीवस्तच्छरीरं जहाति तथैव काव्यशरीरगतमर्मस्थलेषु पदादिषु
व्याघाते चमत्काराजननद्वारौचित्यं काव्यं परिहरति, येन तदकाव्यमेव
सम्पद्यते ॥ ८-१० ॥
औचित्य का क्षेत्र यद्यपि बहुत विस्तृत है, काव्य में ही नहीं अपितु लोक में
भी सब जगह औचित्य का ही साम्राज्य दृष्टिगोचर हो रहा है, फिर इसकी गणना
कर निश्चित संख्या बताना आसान काम नहीं है। तथापि दृष्टान्त के रूप में
ग्रंथकार ने सत्ताईस स्थानों का निर्देश किया है जो कि निम्नलिखित हैं :—
(१) पद, (२) वाक्य, (३) प्रबन्धार्थ, (४) गुण, (५) अलंकार, (६) रस,
(७) क्रिया, (८) कारक, (९) लिंग, (१०) वचन, (११) विशेषण, (१२) उपसर्ग,
(१३) निपात, (१४) काल, (१५) देश, (१६) कुल, (१७) व्रत, (१८) तत्त्व,
(१९) सत्त्व, (२०) अभिप्राय, (२१) स्वभाव, (२२) सारसंग्रह, (२३) प्रतिभा,
(२४) अवस्था, (२५) विचार. (२६) नाम, (२७) आशीर्वाद, अर्थात् काव्य के
मर्म के समान इन स्थानों में औचित्य की स्पष्ट प्रतीति होती है । सारांश यह है
कि जैसे प्राणि-शरीर के प्रत्येक अंश में व्याप्त तत्त्व का नाम आत्मा होता है,
उसी तरह काव्यशरीर के उक्त सभी अंशों में रहने वाले तत्त्व "औचित्य"

१० औचित्यविचारचर्चा
आत्म-संज्ञा प्राप्त करता है, और जैसे प्राणि-शरीर के मर्मभूत स्थानों पर आघात
होने से प्राण-निष्क्रमण द्वारा आत्मा शरीर को त्याग देता है, उसी तरह काव्य-
शरीर के मर्मभूत पूर्वोक्त स्थानों में किसी प्रकार की गड़बड़ी होने से औचित्य
काव्य का परित्याग कर देता है । फिर वह काव्य कहलाने का अधिकारी नहीं
रह जाता है ॥ ८-१० ॥
तेषूदाहरणानि क्रमेण दर्शयितुमाह—
तिलकं बिभ्रती सूक्तिर्भात्येकमुचितं पदम् ।
चन्द्राननेव कस्तूरीकृतं श्यामेव चान्दनम् ॥ ११ ॥
एकमेवोचितं पदं तिलकायमानं बिभ्राणा सूक्तिः समुचितपरभाग-
शोभातिशयेन रुचिरतामावहति ।
उपर्युक्तौचित्योदाहरणप्रदर्शनक्रमे प्रथमं पदगतौचित्यं विवेचयति-
तिलकमिति । कस्तूरीकृतं मृगमदविरचितं श्याममिति यावत्, तिलकमिव
विशेषकं, बिभ्रती धारयन्ती, चन्द्राननेव गौरवर्णनायिकेव, चान्दनं
श्रीखण्डद्रवकल्पितं धवलमिति यावत्, तिलकं, बिभ्रती, श्यामेव श्याम-
वर्णा कामिनीव च तिलकं तिलकवदाचरत्, एकमप्युचितं पदं किमुत
बहूनि पदानि, बिभ्रती, सूक्तिः काव्यरूपा वाक्, भाति शोभते, इत्यर्थः
वृत्त्यर्थः स्पष्ट एव ।
जैसे शरदिन्दुवदना सुन्दरी के ललाट पर कस्तूरीविरचित श्याम तिलक और
श्यामवर्णा कामिनी के भाल पर श्वेत चन्दन का एक भी टीका उनके सौन्दर्य में
चार चांद लगा देता है वैसे ही एक भी समुचित पद-पदान्तर की शोभा को
बढ़ाती हुई संपूर्ण सूक्ति ( काव्यात्मक वाणी ) में अपूर्व मधुरिमा का संचार कर
देता है ॥ ११ ॥
यथा परिमलस्य—
मग्नानि द्विषतां कुलानि समरे त्वत्खड्गधाराकुले,
नाथास्मिन्निति वन्दिवाचि बहुशो देव श्रुतायां पुरा ।
मुग्धा गुर्ज्जरभूमिपालमहिषी प्रत्याशया पाथसः,
कान्तारे चकिता विमुञ्चति मुहुः पत्युः कृपाणे दृशौ ॥
पदगतमौचित्यमुदाहर्तुमाह—यथा परिमलस्येति । मग्नानीति । हे देव
राजन् ! त्वत्खड्गधाराकुले त्वत्खड्गप्रवाहेणाकुले व्याप्ते, अस्मिन्
सद्योजाते, समरे युद्धे, द्विषतां शत्रूणाम्, कुलानि समूहाः, नाथ

स्वामिन् ! मग्नानि लीनानि, इति एवंभूतायां वन्दिवाचि वन्दिजन-
समुच्चारितवाण्यां, पुरा, बहुशोऽनेकवारं, श्रुतायामाकर्णितायां सत्यां,
मुग्धा सरलचित्ता, गुर्जरभूमिपालमहिषी गुर्जरभूमिपालस्य गुर्जरपृथिवी-
पतेः, महिषी राज्ञी, पाथसो जलस्य, प्रत्याशया पिपासामभिसान्त्वयितुम्,
आशाविशेषेण, कान्तारे वने, चकिता सती, पत्युः स्वामिनः, कृपाणे
खड्गे, दृशौ नेत्रे, विमुञ्चति प्रक्षिपतीत्यर्थः ।
पदगत औचित्य का उदाहरण दिखाने के लिये कहा गया है—यथा परिम-
लस्येति । मग्नानीति—जंगल में सरल हृदयवाली गुर्जर देश की सम्राज्ञी चकित
होकर अपने पति की तलवार को दोनों आँखों से देख रही है और कह रही है
कि—हे नाथ ! बन्दीजनों के मुख से पहिले मैंने अनेकों बार सुन रखा है कि युद्ध
में आपके तलवार की धारा के जल में शत्रुओं के झुंड के झुंड डूब गये हैं, परन्तु
अभी इसकी धारा के जल से मेरी प्यास क्यों नहीं बुझ पाती ? बेचारी रानी
इतनी भोली है कि उसे पता नहीं कि इस खड्गधारा को प्यास मिटाने की
क्षमता नहीं है, शत्रुओं को भले ही डुबा दे । यह पद्य गुर्जरराजविजेता किसी
राजा की स्तुति में किसी कवि के द्वारा कहा गया है ।
अत्र मुग्धापदेनौचित्यचमत्कारिणी सूक्तिः शरदिन्दुवदनेव श्याम-
तिलकेन श्यामेव शुभ्रविशेषकेण विभूषिता सकलकविकुलललामभूतां
विच्छित्तिमातनोति ।
अत्र अर्थौचित्यचमत्कारिणाभिधेयौचित्यचमत्कारप्रवणेन, मुग्धा-
पदेन मुग्धेतिपदप्रयोगेण, सूक्तिः, श्यामतिलकेन कस्तूर्यादिघटितकृष्ण-
बिन्दुना, विभूषिता, शरदिन्दुवदना शरच्चन्द्रानना गौरीति यावत्, इव,
शुभ्रविशेषकेण श्रीखण्डद्रवतिलकेन, विभूषिता, श्यामा श्यामवर्णा नायि-
केव च, सकलकविकुलललामभूतां समस्तसरसजनस्पृहणीयां विच्छित्तिं
चमत्कारस्, आतनोति विस्तारयतीत्यर्थः । कृपाणधारातः पिपासा-
शान्तिमिच्छन्त्याः गुर्जरराजमहिष्याः मुग्धेतिविशेषणतया प्रयोगं कुर्वाणः
कविः सम्पूर्णमपि पद्यं चमत्कारचर्चितमिवाकरोदिति सुतरां पदगतौ-
चित्यमत्रेति ।
उपर्युक्त पद्य में अर्थौचित्य के कारण चमत्कार को उत्पन्न करने वाले मुग्धा
( भोली ) पद के प्रयोग से यह सूक्ति श्याम तिलक से चन्द्रानना एवम् स्वच्छ
तिलक से श्यामा की तरह समस्त सरस सम्प्रदाय के हृदय में एक अपूर्व ही

१२ औचित्यविचारचर्चा
चमत्कार चमका देती है। तात्पर्य यह है कि जो गुर्जरराजमहिषी इतना भी
नहीं समझ पाती कि खड्गधारा से जलधारा की तरह प्यास नहीं बुझ सकती
उसके लिए मुग्धा पद का प्रयोग कितना वाञ्छनीय है, इसका अनुभव कोई
सहृदय ही कर सकता है।
न तु यथा धर्मकीर्तेः—
लावण्यद्रविणव्ययो न गणितः क्लेशो महान्स्वीकृतः,
स्वच्छन्दस्य सुखं जनस्य वसतश्चिन्ताज्वरो निर्मितः ।
एषापि स्वयमेव तुल्यरमणाभावाद्वराकी हता,
कोऽर्थश्चेतसि वेधसा विनिहितस्तन्व्यास्तनुं तन्वता ॥
पदगतौचित्यं प्रदर्श्य सम्प्रति तदनौचित्यं प्रदर्शयितुमाह-नतु यथेति।
लावण्येति। कस्या अप्यलौकिककान्तिमय्याः कामिन्याः सौन्दर्यवर्णनेयम्।
लावण्यद्रविणव्ययो लावण्यं सौन्दर्यरूपमेव यद् द्रविणं द्रव्यन्तस्य व्ययो
न, गणितः संख्यातः, महानतिशयः, क्लेशो दुःखं तन्निर्माणे श्रम इति
यावत्, स्वीकृतोऽङ्गीकृतः, स्वच्छन्दस्य स्वतन्त्रस्य, सुखं वसतो निश्चिन्त-
तया सुखपूर्वकं तिष्ठतो निश्चिन्तजीवनं यापयत इति भावः, जनस्य
मानवस्य कृते इति शेषः, चिन्ताज्वरश्चिन्तारूपतापमयरोगविशेषो
निर्मितो रचितः । तुल्यरमणाभावादनुरूपप्रियतमाभावात्, एषापीयमपि
वराकी दुःखदग्धेति भावः, स्वयमेव नतु परेण हता नष्टा, (तर्हि) तन्व्याः
कृशाङ्गयाः, तनुं शरीरं, तन्वता सृजता, वेधसा विधात्रा, चेतसि
चित्ते, कोऽर्थः—कोऽभिप्रायः, विनिहितः स्थापित इति न जाने-इति शेषः।
पदगत औचित्य को दिखलाकर अभी तद्गत अनौचित्य को दिखलाने के लिए
कहा गया है—नतु यथेति। किसी अलौकिक कान्तिमयी कामिनी की प्रशंसा में
कवि कह रहा है कि विधाता ने इस तन्वी की शरीर-रचना कर अपने हृदय में
किस लाभ की आशा की थी पता नहीं, क्योंकि इसके निर्माण में सौन्दर्य-सम्पत्ति
का जो अपार व्यय हुआ उसकी तो गिनती ही नहीं की, ऊपर से परिश्रम भी
खूब ही करना पड़ा। इस तरह अपनी हानि तो हुई ही, साथ ही आज तक
स्वच्छन्द और सुखमय जीवन बितानेवाले पुरुषजाति के हृदय में कामिनी-जिज्ञासा
जगाकर चिंतारूप एक व्याधि की सृष्टि कर दी। इतना ही नहीं, अनुरूप
प्रियतम के अभाव में यह बेचारी खुद भी बेमौत मारी गयी। यदि ब्रह्मा के

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता १३
इसके योग्य किसी पुरुष की रचना करने की क्षमता नहीं थी तो संसार में इस
तन्वी की सृष्टि कर लाभ क्या हुआ, यह वही जानें ।
अत्र "तन्व्याः" इति पदं केवलशब्दानुप्रासव्यसनितया निबद्धं न
काञ्चिदर्थौचित्यचमत्कारकणिकामाविष्करोति । "सुन्दर्याः" इत्यत्र
पदमनुरूपं स्यात् । अन्यानि वा निरतिशयरूपलावण्यव्यञ्जकानि ।
तन्वीपदं तु विरहविधुररमणीजने प्रयुक्तमर्थौचित्यशोभां जनयति ।
उपपादयति-अत्रेति । उपर्युक्तपद्ये "तन्व्याः" इतिपदं केवलशब्दानुप्रा-
सव्यसनितया केवलं 'तनुं तन्वता' इत्यत्रोक्तकारानुप्रासाग्रहितया,
निबद्धं योजितं, न काञ्चित् कामपि, अर्थौचित्यचमत्कारकणिकाम्
वाच्यौचित्यचमत्कारकणम्, आविष्करोति जनयति । अत्र तन्व्या
इति पदस्थाने सुन्दर्या इति पदम् अनुरूपं समुचितप्रयोगयोग्यं स्यात् ।
नन्वेवं छन्दोभङ्ग इति चेत्तत्राह—अन्यानीति इतराणि वा, निरतिशयरूप-
लावण्यव्यञ्जकानि विलक्षणरूपसोन्दर्यप्रतिपादकानि, प्रयोगयोग्यानि
स्युरिति शेषः । वस्तुतस्तु छन्दोभङ्गप्रसङ्गोऽकिञ्चित्करः । "कान्तामिमां
तन्वता" इत्येवं निर्माणे दोषाभावात् । तन्वीपदं तु विरहविधुररमणीजने
वियोगक्षामकामिनीलोके प्रयुक्तं सदर्थौचित्यशोभां वाच्यौचित्यचारुतां
जनयति । इह तु तदन्यथाप्रयुक्तमित्यौचित्यक्षयान्नितरां सहृदयहृदय-
हानिरिति बोध्यम् ।
उपर्युक्त पद में तन्वी शब्द का प्रयोग केवल तकारानुप्रास के आग्रह से किया
गया है । यथार्थतः यहाँ इसकी कुछ भी उपयोगिता नहीं है, क्योंकि दुर्बलता वियोग
का स्वाभाविक गुण है अतः इस पद का प्रयोग केवल विरहविधुर रमणीजनों
के लिए ही उपयुक्त हो सकता है । यहाँ तो कवि का अभिप्राय उत्कृष्ट सौन्दर्य
वर्णन से है फिर तो सुन्दरी, कान्तिमयी इत्यादि विलक्षण सौन्दर्यव्यञ्जक शब्दों
का प्रयोग ही उचित था ऐसा न करके कवि ने एक भारी भूल की है । इस एक
मात्र पद के अनौचित्य से पूरा का पूरा पद्य प्राणहीन-सा मालूम पड़ता है । यही
"तन्व्यास्तनुं तन्वता" की जगह यदि "कान्तामिमां-तन्वता" ऐसा पाठ कर दिया
जाय तब कान्ता पद से अनुरूप सौन्दर्य की अभिव्यक्ति के द्वारा औचित्य की रक्षा
हो सकती है ।

२४ औचित्यविचारचर्चा
यथा श्रीहर्षस्य—
परिम्लानं पीनस्तनजघनसङ्गादुभयत-
स्तनोर्मध्यस्यान्तः परिमलनमप्राप्य हरितम् ।
इदं व्यस्तन्यासं श्लथभुजलताक्षेपवलनैः,
कृशाङ्ग्याः सन्तापं वदति बिसिनीपत्रशयनम् ॥
तन्वीपदसमानार्थकस्य कृशाङ्गीपदस्यानुरूपप्रयोगं दर्शयितुमाह-यथा
श्रीहर्षस्येति । परिम्लानमिति—रत्नावलीनाटिकाप्रधाननायिकायाः
सागरिकाया विरहावस्थासूचकम् पद्यमिदम् । पीनस्तनजघनसङ्गात्
पीनयोः अतिस्थूलयोः, स्तनयोर्जघनयोश्च, सङ्गात्सम्पर्कात्, उभयत
उभयत्र, परिम्लानं शुष्कप्रायं, तनोः क्षीणस्य, मध्यस्य मध्यभागस्य,
परिमलनं सङ्घर्षणम्, अप्राप्य न लब्ध्वा, अन्तर्मध्ये, हरितं स्वाभाविक-
रूपेण हरिद्वर्णकमेव स्थितमित्यर्थः, स्तनयोर्जघनयोश्चात्युच्चत्वेनाधो-
मुखं शयानाया नायिकाया मध्यभागस्य शय्यासम्पर्कविरहितत्वेन तत्रत्य-
शय्यायाः स्वाभाविकत्वं सुतरां सम्भवतीति बोध्यम् । श्लथभुजलता-
क्षेपवलनैः श्लथे शिथिले ये भुजलते बाहुबल्लर्यौ, तयोराक्षेपवलनैराकुञ्चन-
प्रसारणैः, व्यस्तन्यासं व्यस्तो विपरीतो न्यासः स्थापनं यस्य तथाभूतम्,
इदं पुरोवर्ति बिसिनीपत्रशयनं कमलपत्रशय्या, कृशाङ्ग्यास्तन्व्याः,
सन्तापं विरहज्वरज्वालां वदति कथयति ।
तन्वी शब्द के समान अर्थ रखने वाले कृशांगी पद का समुचित प्रयोग
दिखाने के लिये कहा गया है यथा—श्रीहर्षस्येति । परिम्लानमिति यह श्लोक
'रत्नावली नाटिका' से उद्धृत किया गया है—इसमें लंकेशकुमारी सागरिका की
विरहावस्था का सजीव चित्र खींचा गया है । वत्सराज उदयन के विरह में
सागरिका विह्वल हो गयी है । अंग सूखकर कृश हो गये हैं, विरहज्वर की
ज्वाला से कहीं भी उसे शान्ति नहीं मिलती, जिधर ही आँखें फिरती हैं उधर
ही उद्वेजक दृश्य दीख पड़ते हैं । अतः अधोमुख होकर कमलदलकल्पित शय्या
पर पड़ी रहती है । इस स्थिति में परितापसूचक अन्य चिह्नविशेष के न रहने
पर भी उसके संताप के संबन्ध में किसी से पूछने की आवश्यकता नहीं होती,
क्योकि वह कमलपत्र की बनी शय्या ( जिस पर वह सोई रहती है ) ही उसके
संताप को प्रकट कर रही है । कारण, उस शय्या के पार्श्वदेश ( दोनों बगल )
उच्च कुच तथा स्थूल जघनों के संपर्क से मलिन हो रहे हैं, पर शय्या का मध्य
भाग कृश मध्य-उदर-भाग के स्पर्श को न पाकर हरा-ताजा बना हुआ है और

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता १५
इस शय्या की रचना तो सर्वत्र शिथिल बाहुवल्लरी के आकुंचन-प्रसारण से
अस्तव्यस्त हो ही गयी है। ऐसी शय्या को देखकर भी क्या किसी दर्शक को उस
पर लोटती हुयी कामिनी के संताप को समझने के लिये किसी से पूछने की
आवश्यकता पड़ सकती है ? कभी नहीं ।
अत्र सागरिकाया विरहावस्थासूचकं "कृशाङ्ग्याः" इति पदं परमौ-
चित्यं पुष्णाति ॥ ११ ॥
उपपादयन्नाहात्रेति । उक्तश्लोके, सागरिकाया लङ्केशकुमार्याः, विर-
हावस्थासूचकं वियोगस्थितिव्यञ्जकम्, "कृशाङ्ग्याः" इतिपदं, परमौ-
चित्यम् औचित्यस्य परां काष्ठां, पुष्णाति पोषयति ॥ ११ ॥
यहाँ पर लंकेशकुमारी सागरिका के लिये वत्सराज उदय के वियोग को
सूचित करने वाले कृशांगी पद का प्रयोग अत्यन्त समीचीन होने के कारण पाठकों
को अपूर्व आनन्द प्रदान करता है ॥ ११ ॥
वाक्यगतौचित्यं दर्शयितुमाह—
औचित्यरचितं वाक्यं सततं संमतं सताम् ।
त्यागोदग्रमिवैश्वर्यं शीलोज्ज्वलभिव श्रुतम् ॥ १२ ॥
औचित्यरचितं वाक्यं काव्यविवेकविचक्षणानामभिमततमम् ।
पदगतौचित्यं प्रदर्श्य सम्प्रति द्वितीयं वाक्यगतौचित्यप्रदर्शनायाह—
औचित्येति । औचित्यरचितम् औचित्याभिनिवेशपूर्वकं निर्मितं, वाक्यं
पदसमूहः, त्यागोदग्रं त्यागेन दानादिनोदग्रमुदात्तमैश्वर्यं, विभूतिरिव,
शीलोज्ज्वलं शीलेन सत्स्वभावेन, उज्ज्वलं प्रशस्तं, श्रुतं शास्त्रमिव, सततं
सर्वदा, सतां सज्जनानां, सम्मतमभिमतमभीष्टमित्यर्थः । अस्यैव निर्ग-
लितार्थमाह—औचित्यरचितमिति । औचित्यरचितं वाक्यं, काव्यविवेक-
विचक्षणानां काव्यालोचनचतुराणां, विदुषाम्, अभिमततमं निरतिशय-
मभीष्टमिति भावः ।
पदगत औचित्य को दिखाकर अभी क्रमागत द्वितीय वाक्यगत औचित्य
का प्रदर्शन करने के लिये कहा गया है—औचित्येति । जैसे दान आदि के द्वारा
संपत्ति की उदात्तता और दाक्षिण्यादि गुणों के द्वारा विद्या की उज्ज्वलता सज्जनों
के लिये विशिष्ट स्थान रखती है वैसे ही औचित्य को ध्यान में रखकर की गयी
वाक्यरचना काव्यालोचकों के लिये सर्वदा स्पृहणीय बनी रहती है । इसी
आशय को सीधे शब्दों में वृत्ति के द्वारा स्पष्ट किया है । औचित्यरचितमिति—

१६ औचित्यविचारचर्चा
औचित्य की मर्यादा से युक्त वाक्य-विन्यास काव्यालोचनचतुरों का अत्यन्त प्रिय
होता है ।
यथा मम विनयवल्ल्याम्—
देवो दयावान्विजयो जितात्मा यमौ मनः संयममाननीयौ ।
इति ब्रुवाणः स्वभुजं प्रमाष्टि यः कीचकालिककालदण्डम् ॥
धीरः स किर्मीरजटासुरारिः कुबेरशौर्यप्रशमोपदेष्टा ।
दृष्टो हिडिम्बादयितः कुरूणां पर्यन्तरेखागणनाकृतान्तः ॥युग्मकम्॥
वाक्यगतमौचित्यमुदाहर्तुमाह-यथा ममेति । देव इति । देवो युधि-
ष्ठिरः, दयावान् दयाशीलः, विजयोऽर्जुनः, जितात्मा विजितात्मव्यापारो
यमौ नकुलसहदेवौ, मनःसंयममाननीयौ मनसश्चित्तस्य संयमेन वशी-
करणेन, माननीयौ मानार्हौ, इति पूर्वोक्तरूपेण, ब्रुवाणः—कथयन्, यः
( भीमसेनः ) कीचकाकालिककालदण्डे कीचकाय तन्नामकनृपविशेषाय
विराटश्यालकायेति भावः, अकालिकमसामयिकं कालदण्डं कृतान्तल-
गुडमिव वर्तमानं, स्वभुजं निजबाहूदण्डं, प्रमाष्टि प्रमार्ज्यति, दयादि-
भिर्हेतुभिर्युधिष्ठिरादयः शत्रुशातने नितरामसमर्था इति स्वभुजस्यैव
संवलत्वेन तत्परिमार्जनमुचितमेवेति भावः । किर्मीरजटासुरारिः किर्मीरी
चित्रविचित्रा, जटा केशग्रन्थिर्यस्यैवंभूतो योऽसुरो राक्षसः, तस्यारिर्घातकः
कुबेरशौर्यप्रशमोपदेष्टा कुबेरस्य धनाधिपस्य, शौर्यस्य शूरतायाः, प्रशमस्य
विनाशस्योपदेष्टा, कुरूणां कौरवाणां, दुर्योधनादीनां, पर्यन्तरेखागणना-
कृतान्तः पर्यन्तरेखाया जीवनान्तलेखायाः, गणनायां संख्याने, कृतान्तो
यमराडिव वर्तमानः गुरुकुलविनाशकारक इत्यर्थः, हिडिम्बादयितः
हिडिम्बायास्तन्नामकासुरकन्यकायाः, दयितः प्रियतमो, धीरो गम्भीरो
स भीमसेनो दृष्टोऽवलोकितो लोकैरिति शेषः ।
वाक्यगत औचित्य के उदाहरणस्वरूप ग्रंथकार ने स्वरचित विनयवल्ली
नामक पुस्तक में से यह पद्य उद्धृत किया है । धर्मराज युधिष्ठिर अत्यन्त दयावान्
हैं, अर्जुन बलवान् होते हुए आत्मविजेता भी हैं, नकुल और सहदेव चित्तवृत्ति
के संयम में पूर्ण प्रसिद्धि प्राप्त कर चुके हैं, ऐसी स्थिति में इनलोगों के द्वारा
शत्रुसंहार असंभव है ऐसा कहता हुआ जिसने कीचक के लिये दूसरे यमदंड के
समान आचरण करने वाले अपने बाहुयुगलों को चढ़ाना शुरू कर दिया, किर्मीर

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता १७
जटा वाले असुर विशेष का विघातक, कुबेर की वीरता का विनाशक, कुरुकुल की
जिन्दगी का अन्त करने वाला, हिडिम्बा का पति, अत्यन्त धैर्यशाली वह भीमसेन
देखा गया ।
अत्र भीमस्य भीमचरितोचितकीचकाकालिककालदण्डहिडिम्बाद-
यितादिभिः पदैरुन्निद्ररौद्रस्वरूपानुरूपो वाक्यार्थः सजीव इव भासते ।
अत्र पद्यद्वये भीमस्य युधिष्ठिरानुजस्य, भीमचरितोचितकीचका-
कालिककालदण्डहिडिम्बादयितादिभिः भीमचरित्रानुरूपतत्तद्विशेषणो-
पादानैरुन्निद्ररसानुरूपं उद्बुद्धरौद्ररसोचितो वाक्यार्थः सजीवः
प्राणवानिव, भासते शोभते । अत्रौचित्यस्य पदाधिकस्थितिमत्तया
वाक्यगतत्वमित्यवसेयम् ।
उपर्युक्त पद्यों में भीमसेन की प्रकृति के अनुकूल कीचकाकालिक कालदंड,
हिडिम्बादयित आदि पदों का प्रयोग रौद्ररस को जगाता हुआ सहृदयों के मानस-
पटल में अपूर्व आनन्द प्रदान करता है, जिससे पूरा का पूरा वाक्यार्थ सजीव के
समान प्रतिभासित हो रहा है । अनेक पदव्यापी होने के कारण ही यह वाक्यगत
औचित्य का उदाहरण हुआ ।
अथवा राजशेखरस्य—
सम्बन्धी पुरुभूभुजां मनसिजव्यापारदीक्षागुरु-
गौराङ्गीवदनोपमापरिचितस्तारावधूवल्लभः ।
सद्योमर्जितदाक्षिणात्यतरुणीदन्तावदातद्युति-
श्चन्द्रः सुन्दरि दृश्यतामयमितश्चण्डीशचूडामणिः ॥
वाक्यगतौचित्यस्य द्वितीयमुदाहरणमुपस्थापयत्यथवा राजशेखर-
स्येति । सम्बन्धीति । हे सुन्दरि ! पुरुभूभुजां पुरुवंशोद्भवराज्ञां, सम्बन्धी
सम्पर्क, पुरुवंशस्य चन्द्रत एवोत्पत्तिरिति तत्सम्बन्धः स्फुट एव । मनसि-
जस्य कामस्य, व्यापारस्य व्यवहारस्य, दीक्षायाः शिक्षणस्य, गुरुरुपदेष्टा,
उद्दीपकत्वादिति भावः । गौराङ्ग्या गौरवर्णायाः ( नायिकायाः ), वदन-
स्याननस्य, उपमया परिचितः, कामिनीमुखोपमाभूत इति यावत्,
तारा नक्षत्राण्येव वध्वः पत्न्यस्तासां वल्लभः प्रियतमः, सद्योऽचिरादेव,
मार्जितानां परिष्कृतानां, दाक्षिणात्यानां दक्षिणदेशोद्भूतानां, तरुणीनां
२ औ०

१८ औचित्यविचारचर्चा
युवतीनां, दन्तानां, याऽवदाता निर्मला द्युतिः शोभा, सेव द्युतिर्यस्य सः,
दन्तचन्द्रयोरुभयोरपि समुज्ज्वलत्वेन युक्तोपमेति बोध्यम्। चण्डीशस्य
शिवस्य, चूडाया मौलिग्रन्थेर्मणिभूषणमिव वर्तमानोऽयं लब्धोदयश्चन्द्रः
सुधांशुरितः पूर्वस्यां दिशि दृश्यतामवलोक्यतां त्वयेति शेषः।
आलोचक कवि राजशेखर के द्वारा रचित यह पद्य वाक्यगत औचित्य के
द्वितीय उदाहरण के रूप में उपस्थित किया गया है। सम्बन्धीति—नायिका को
अनुकूल बनाने के लिये उगते हुये चन्द्र को लक्ष्य कर नायक कह रहा है—अये
सुन्दरि ! देखो पूरब दिशा में चन्द्र उग आये हैं, जो कि भगवान् शंकर के
शिरोभूषण, तारातरुणी के तरुण प्रियतम और पौरवों के कुल के मूल ही नहीं,
अपितु कामकला के शिक्षक, गौरांगी के मुख की उपमा से परिचित, तथा
दाक्षिणात्यकामिनी के सद्योमार्जित धवल दन्तपंक्ति के समान स्वच्छ भी है।
अत्रापि चन्द्रमसः शृङ्गारान्तरङ्गैरनङ्गोद्दीपनैः पदैर्निर्वर्तितो वाक्यार्थः
सर्वथौचित्यसामर्थ्येन समुचितार्थवशेनार्थात्यर्थमत्यन्तमर्थनीयतां प्राप्तः।
अत्रापि चन्द्रमसः, शृङ्गारान्तरङ्गैः शृङ्गाराऽनुकूलैरनङ्गोद्दीपनैः कामो-
त्तेजकैः, मनसिजव्यापारदीक्षागुरुरित्यादिभिः पदैर्निर्वर्तितो निष्पादितो
वाक्यार्थः, सर्वथौचित्यसामर्थ्येन समुचितार्थवशेनार्थात्यर्थमत्यन्तमर्थनी-
यतामुपादेयतां, प्राप्तो गतः, चन्द्रमसो विशेषणीभूतैरौचित्यपोषकैः-
कियद्भिः पदैर्वाक्यगतौचित्यं पोष्यते इति भावः।
इस पद्य में भी शृङ्गाररसोद्दीपक् “मनसिजव्यापारदीक्षागुरुः” इत्यादि पदों
के द्वारा पूरे वाक्य का अर्थ औचित्य की महिमा से अत्यन्त उपादेयता को प्राप्त
कर गया है, अर्थात् चन्द्रमा के विशेषण में कहे गये समुचित पदों के प्रयोग से
पूरे वाक्य में औचित्य का आधान हो रहा है। इसलिये यह भी वाक्यगत औचित्य
का उदाहरण सिद्ध होता है।
नतु यथास्यैव—
नाले शौर्यमहोत्पलस्य विपुले सेतौ समिद्वारिधेः
शश्वत्खड्गभुजङ्गचन्दनतरौ क्रीडोपधाने श्रियः।
आलाने जयकुञ्जरस्य सुदृशां कन्दर्पदर्पे परं
श्रीदुर्योधनदोष्णि विक्रमपरे लीनं जगन्नन्दतु ॥