आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
अनुपलब्धवादः ४२९
चेत्, न, यस्य कार्यस्य यत् कारणमन्वयव्यतिरेकसिद्धं तत्का-
रणाधिष्ठानयोः स्थूलसिद्ध्यर्थं तदवयवपरम्पराकारणाधिष्ठान-
वदवश्यम्भावनियमात् । न च सर्वत्र कार्ये कायः कारणमिति
प्रागुपेक्षितः । पितृत्वाद् वोपदेशानुमानम् ।
तथापि कतम आगमस्तेन प्रणीत इति चेत्, वेदायूर्वेदा-
दिरित्यरिकरिकर्णज्वरः सिंहनादः । तथाहि, न तावदयमा-
युर्वेदोऽप्रमाणम्, संवादस्य प्रामिकत्वात् । विसंवादस्य
काकतालीयतया कर्तृकर्मसाधनवैगुण्यहेतुकत्वात् । पुनस्तत्-
साद्गुण्ये तत एव फलसिद्धेः । न च निर्मूलस्तथा भवितु-
भी ईश्वर नहीं हो सकता है—तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि जिस
कार्यका जो कारण अन्वय व्यतिरेक द्वारा सिद्ध है, उस कारणकी तथा
उसके अधिष्ठाताकी सत्ता वैसे ही अनिवार्य है, जैसे स्थूल अवयवीकी
सिद्धिके लिये उसके अवयवधारारूप कारण एवं उसके अधिष्ठाताकी
सत्ता अनिवार्यरूपसे सिद्ध होती है । किन्तु सभी कार्यके प्रति शरीर
कारण नहीं होता, इसीलिये पूर्वमें द्व्यणुकादि उत्पन्न करनेमे अथवा
अङ्कुरादि उत्पन्न करनेमे ईश्वरको शरीरका होना अस्वीकार कर दिया
गया है । अथवा जगत्का पिता होनेके कारण लौकिक पिताके समान
जीवरूप पुत्रके प्रति ईश्वरीय उपदेशके रूपमे वेदका अनुमान करते हैं ।
क्योंकि जो पिता होता है, वह अपने पुत्रको हिताहितका उपदेश करता
ही है, यह व्याप्ति है ।
फिर यदि पूछो कि—ईश्वरने कौनसा आगम बनाया ?—तो “वह
वेद-आयुर्वेद आदिक ही आगम है, जिसका ईश्वरने प्रणयन किया”
ऐसा शत्रुरूपी हाथीको कर्णज्वर उत्पन्न कर देनेवाला हमारा सिंहनाद है ।
कारण, यह आयुर्वेद अप्रमाण नहीं है । क्योंकि आयुर्वेदकी सफल
प्रवृत्तिजनकता प्रायः देखी जाती है । अर्थात् आयुर्वेदका प्रयोग प्रायः
निष्फल नहीं होता । यदि कहीं उसकी निष्फलता देखी भी जाती है,
तो वह काकतालीय है तथा कर्ता, कर्म एवं साधनके वैगुण्यके कारण
है । पुनः जब ही कर्ता, कर्म एवं साधनमें साद्गुण्य (गुणवत्ता या
४३२ आत्मतत्त्वविवेके
कोऽतिशयः ? सर्वदर्शनान्तःपातित्वम् । कस्तैः परि-
ग्रहः ? तदर्थानुष्ठानं, स्वीकृतव्यवहारव्याकरणादिपालनी-
यत्व, स्वीकृतप्रामाण्यायुर्वेदादिस्वीकृतार्थत्वं च ।
( प्रश्न )—अतिशय क्या है ?
( उत्तर )—सभी दर्शनोंके अन्तःपाती होना अतिशय है । अर्थात्
न्याय मीमांसा प्रभृति जितने भी दर्शन हैं, उनमें प्रतिपादित
स्वर्गापवर्गादि मुख्य विषयोंको स्वीकार करनेवाले जन ही
अतिशय को प्राप्त हुए महाजन हैं। अथवा न्याय आदि
दर्शनोंका ज्ञान ही अतिशय है । सौगतादि दर्शनाभास
हैं न कि दर्शन हैं, अतः उनका ज्ञान अतिशय नहीं है।
( प्रश्न )—अतिशयको प्राप्त न्यायादिके ज्ञाता बहुत जनोंद्वारा किया
जानवाला परिग्रह क्या वस्तु है ?
( उत्तर )—निषेक प्रभृति वैदिक अर्थोंका उन सभीकेद्वारा अनुष्ठान
किया जाता है, इसलिये वेद महाजन परिगृहीत हुए ।
बौद्धादि आगमोंमें प्रतिपादित मण्डलीकरण केशोल्लुञ्चन
प्रभृति अर्थोंका अनुष्ठान उन महाजनोंद्वारा नहीं होता है,
अतः वे आगम महाजन परिगृहीत नहीं हुए । इसीलिये
महाजन परिगृहीतत्वहेतुसे वेदको सर्वज्ञ प्रणीत सिद्ध
करनेमें बौद्ध आगमोंको लेकर व्यभिचारदोष नहीं
आयेगा । और न उन आगमोंका सर्वज्ञ प्रणीत होना
सिद्ध होगा । परिग्रहका यह एक अर्थ है ।
परिग्रहका दूसरा अर्थ यह है कि जिन पाणि-यादि प्रणीत
व्याकरणोंका प्रामाण्य सभी मानते हैं उन व्याकरणोंद्वारा
हमारे वेदके विशेष विशेष पदोंका व्युत्पादन किया गया
है । इसलिये भी हमारे वेद महाजनपरिगृहीत हुए ।
इसप्रकार पाणि-यादि व्याकरणद्वारा तुम्हारे आगमके
विशेषपदोंका साधन नहीं किया गया है, इसलिये भी वे
महाजन परिगृहीत नहीं हैं ।
एव, जिस आयुर्वेदशास्त्रका प्रामाण्य सभीने स्वीकार किया है, उस
तथाहि, नास्त्येव तद्दर्शनं यत्र सांप्रतमित्युक्त्वापि गर्भा-
धानाद्यन्त्येष्टिपर्यन्तां वैदिकीं क्रियां जनो नानुतिष्ठति, स्पृश्या-
स्पृश्यादिविभागं वा नानुमनुते, व्यतिक्रमे चाऽऽचमनादि-
प्रायश्चित्तं वा नानुतिष्ठति ।
न सर्वत्र सर्वो जन एवमिति चेत्, मा भूत । न हि सर्वै
रोगिभिरायुर्वेदार्थो नानुष्ठीयत इति न तस्य महाजनपरिग्रहः,
अपि तु सर्वदर्शनान्तःपातिभिरित्येव ।
आयुर्वेदशास्त्रने भी वेदोक्त विषयोंका विधान किया है । जैसे, "शत-
कृत्वो गायत्रीमभ्यस्य नीरुग् भवति" ऐसा आयुर्वेदशास्त्रमें लिखा है।
तथा वह गायत्री वेदका ही अंश है न कि बौद्ध आगमोंका । यह
परिग्रहका तीसरा अर्थ है ।
उक्त तीनों प्रकारके परिग्रहोंमें महाजनोंद्वारा वेदार्थानुष्ठानरूप
प्रथम परिग्रह इस प्रकार है—जैसे, ऐसा कोई भी दर्शन नहीं है,
जिसको माननेवाला व्यक्ति वैदिक क्रियाका अनुष्ठान न करता हो ।
यहाँ तक कि ब्रह्मातिरिक्त सब विषयको अविद्याकल्पित कहनेवाले
वेदान्ती जन भी गर्भाधानसे लेकर अन्त्येष्टि तक वैदिक क्रियाओंको नहीं
करते हैं, ऐसी बात नहीं है । या कोई भी दार्शनिक जन वेदोक्त
स्पृश्यास्पृश्यविभागको न स्वीकार करता हो अथवा अस्पृश्यस्पर्शरूप
व्यतिक्रम हो जानेपर आचमन-स्नान आदि प्रायश्चित्त न करता हो,
यह बात नहीं है ।
यदि कहो कि—सभी दर्शनोंके सभी व्यक्ति तो वैदिक क्रियाओंका
अनुष्ठान नहीं करते हैं—तो ऐसा भले ही मत हो । क्योंकि सभी रोगी
दवाका सेवन नहीं करते इससे वह शास्त्र महाजनपरिगृहीत नहीं है,
ऐसा नहीं हो जाता । किन्तु महाजनपरिगृहीत इतने ही से हो जाता
है कि सभी दर्शनोंके अधिकांश लोग वेदोक्त अर्थोंका अनुष्ठान करते
हैं । "फिर भी सभी वैदिक विधानोंका अनुष्ठान तो वे लोग भी नहीं
करते" यदि ऐसा कहो तो, भले ही वैसा न हो, उससे कोई क्षति नहीं
२८
४३० आत्मतत्त्वविवेके
मर्हति, अतिप्रसङ्गात् ।
न चान्वयव्यतिरेकभावोऽस्य मूलम्, आवापोद्वापेन
योगानामानन्त्यादर्वाचीनेनाशक्यत्वात् । विषादौ तथाकरणे
बहुतरानर्थप्रसङ्गात् । कः प्रेक्षावाननाकलितावस्तुतत्त्वः पाटन-
प्लोषणच्छेदनक्षारणशिरावेधनलङ्घनादि योग्यायै¹ कारयेत्,
कुर्याद् वा ।
न चोपदेशस्योपदेशपारम्पर्यमात्रं मूलम्, अवश्यमुपदेशस्य
क्वचित् प्रमाणे विश्रान्तेरिति हि न्यायैः । न च नित्यागम-
निर्दोषता) आ जाता है, तब ही उस आयुर्वेदिक प्रयोगसे ही आरोग्य-
रूप फलकी सिद्धि हो जाती है। इसप्रकार सर्वविदित आयुर्वेदकी
प्रमाणता निर्मूल नहीं हो सकती । क्योंकि तब निर्मूल अनाप्तवाक्य
भी प्रमाण होने लगेंगे ।
अन्वय और व्यतिरेकको आयुर्वेदके प्रामाण्यका मूल नहीं कहा जा
सकता। क्योंकि जड़ियोंके आवाप (प्रक्षेप) और उद्वाप (उत्क्षेप) के
द्वारा आयुर्वेदिक योगोंके अनन्त प्रकारके हो जानेके कारण हम लोगोंके
द्वारा रोगोंके प्रति उनके अन्वयव्यतिरेकका प्रत्यक्ष करना सर्वथा अशक्य
है। साथ ही विषादिके सम्बन्धमे स्वय प्रत्यक्ष करनेमे प्राणनाश आदि
अनेक प्रकारके अनर्थोंकी भी आपत्ति हो जायगी। क्योंकि कौन ऐसा
बुद्धिमान् होगा जो वस्तुस्थितिको जाने बिना केवल परीक्षाके लिये
अपने आपके ऊपर पाटन, प्लोषण, छेदन, क्षारण, शिरोवेधन तथा
लङ्घन आदि प्रयोगोंको दूसरोंसे करायेगा या स्वयं करेगा ?
यह भी नहीं हो सकता कि—आयुर्वेदिक उपदेशका मूल अन्वय-
व्यतिरेक नहीं है किन्तु उपदेशकी पूर्वपरम्परा ही उसका मूल है—
क्योंकि अन्ततोगत्वा उस पूर्ववर्ती उपदेशको भी नियमतः किसी प्रमाणमें
ही विश्रान्त मानना पड़ेगा। अर्थात् प्राथमिक उपदेशकत्र्ताके द्वारा
किये गये साक्षात्कारको ही परवर्ती उपदेशके प्रामाण्यका मूल
मानना पड़ेगा।
१. योग्यायै = शिक्षायै इति दीधिति ।
अनुपलब्धिवादः ४३१
सम्भवो वाक्यत्वात् । तस्मादतीन्द्रियार्थदर्शिपूर्वकोऽयमिति
परिशेषः । तथा चानेन दृष्टान्तेन महाजनपरिगृहीतत्वाद्
वेदा अपि सर्वज्ञपूर्वका इत्युन्नीयते ।
ननु महच्छब्दोऽत्र यदि प्रामाणिकवचनस्तदा सन्दिग्धा-
सिद्धविशेषणो हेतुः । अथ बह्वर्थः ? तदा सुगताद्यागमैरनै-
कान्तः । तेषामपि वा सर्वज्ञपूर्वकत्वं१ मिति चेत्, न, बहुत्वा-
तिशयस्य विवक्षितत्वात् ।
यह भी सम्भव नहीं है कि नित्य होनेके कारण आगम किसो
मूलकी अपेक्षा किये बिना स्वयं ही प्रमाण होगा—क्योंकि वाक्य होनेके
कारण अन्य वाक्योंकी तरह वह भी अनित्य ही है । इसलिये
परिशेषात् यही सिद्ध होता है कि यह आयुर्वेदका योग किसी अतीन्द्रि-
यार्थ दर्शीके द्वारा ही व्यक्त किया गया है । इसप्रकार इस आयुर्वेदके
दृष्टान्तसे महाजनद्वारा परिगृहीत होनेके कारण ऋगादिवेद भी सर्वज्ञके
ही बनाये हुए हैं, ऐसी कल्पना की जाती है । अर्थात् वेदोंका कर्ता
सर्वज्ञ ईश्वर सिद्ध हो जाता है ।
यहाँ यह विकल्प उठता है कि—'महाजन' इस पदमें महत्पद
प्रामाणिक अर्थमें है ? अथवा बहुत्वरूप संख्याके अर्थमे है ? यदि
यहाँ महत्पद प्रामाणिकवाचक है तो महाजनपरिगृहीतत्वरूप हेतु
सन्दिग्धासिद्ध विशेषणवाला हो जाता है । अर्थात् उक्त हेतुका
विशेषण जो महत्त्व है, वही सन्दिग्ध है । क्योंकि महाजनपदसे
आप मनु आदिको लेते हैं, किन्तु उनमें प्रामाणिकत्वका सन्देह है ।
यदि महत्शब्दका दूसरा अर्थ बहुत्वरूप संख्या हो, तब बुद्धादिके
आगमोंको लेकर व्यभिचारदोष हो जायगा । क्योंकि बहुत जनोंके
द्वारा स्वीकृत होनेपर भी न्याय उन्हें सर्वज्ञ-प्रणीत नहीं मानता है ।
अथवा बुद्धादिके आगमोंको भी सर्वज्ञ-प्रणीत मानना होगा—किन्तु
उक्त विकल्प हमारे हेतुके सम्बन्धमें नहीं उठ सकता है । क्योंकि यहाँ
महत्पदसे बहुत्वका अतिशय अभिप्रेत है । अर्थात् अतिशयको प्राप्त
हुए बहुत जनोंके द्वारा परिगृहीत होनेके कारण वेद सर्वज्ञ प्रणीत हैं ।
१. 'सर्वदर्शानवक्तृभिः परिगृहीतत्वमित्यर्थ' इति कलिकातामुद्रिते टिप्पणी ।
४३२ आत्मतत्त्वविवेके
कोऽतिशयः ? सर्वदर्शनान्तःपातित्वम् । कस्तैः परि-
ग्रहः ? तदर्थानुष्ठानं, स्वीकृतव्यवहारव्याकरणादिपालनी-
यत्वं, स्वीकृतप्रामाण्यायुर्वेदादिस्वीकृतार्थत्वं च ।
(प्रश्न)—अतिशय क्या है ?
(उत्तर)—सभी दर्शनोंके अन्त:पाती होना अतिशय है । अर्थात्
न्याय मीमांसा प्रभृति जितने भी दर्शन हैं, उनमें प्रतिपादित
स्वर्गापवर्गादि मुख्य विषयोंको स्वीकार करनेवाले जन ही
अतिशय को प्राप्त हुए महाजन हैं । अथवा न्याय आदि
दर्शनोंका ज्ञान ही अतिशय है । सौगतादि दर्शनाभास
हैं न कि दर्शन हैं, अत उनका ज्ञान अतिशय नहीं है ।
(प्रश्न)—अतिशयको प्राप्त न्यायादिके ज्ञाता बहुत जनोंद्वारा किया
जानेवाला परिग्रह क्या वस्तु है ?
(उत्तर)—निषेक प्रभृति वैदिक अर्थोंका उन सभीकेद्वारा अनुष्ठान
किया जाता है, इसलिये वेद महाजन परिगृहीत हुए ।
बौद्धादि-आगमोंमें प्रतिपादित मण्डलीकरण केशोल्लुञ्चन
प्रभृति अर्थोंका अनुष्ठान उन महाजनोंद्वारा नहीं होता है,
अत वे आगम महाजन परिगृहीत नहीं हुए । इसीलिये
महाजन परिगृहीतत्वहेतुसे वेदको सर्वज्ञ-प्रणीत सिद्ध
करनेमें बौद्ध आगमोंको लेकर व्यभिचारदोष नहीं
आयेगा । और न उन आगमोंका सर्वज्ञ प्रणीत होना
सिद्ध होगा । परिग्रहका यह एक अर्थ है ।
परिग्रहका दूसरा अर्थ यह है कि जिन पाणिन्यादि-प्रणीत
व्याकरणोंका प्रामाण्य सभी मानते हैं, उन व्याकरणोंद्वारा
हमारे वेदके विशेष विशेष पदोंका व्युत्पादन किया गया
है । इसलिये भी हमारे वेद महाजनपरिगृहीत हुए ।
इसप्रकार पाणिन्यादि व्याकरणद्वारा तुम्हारे आगमके
विशेषपदोंका साधन नहीं किया गया है, इसलिये भी वे
महाजन परिगृहीत नहीं हैं ।
एव, जिस आयुर्वेदशास्त्रका प्रामाण्य सभीने स्वीकार किया है, उस
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तथाहि, नास्त्येव तद्दर्शनं यत्र सांवृतमित्युक्त्वापि गर्भा-
धानाद्यन्त्येष्टिपर्यन्तां वैदिकीं क्रियां जनो नानुतिष्ठति, स्पृश्या-
स्पृश्यादिविभागं वा नानुमनुते, व्यतिक्रमे चाऽऽचमनादि-
प्रायश्चित्तं वा नानुतिष्ठति ।
न सर्वत्र सर्वो जन एवमिति चेत्, मा भूत । न हि सर्वै
रोगिभिरायुर्वेदार्थो नानुष्ठीयत इति न तस्य महाजनपरिग्रहः,
अपि तु सर्वदर्शनान्तःपातिभिरित्येव ।
आयुर्वेदशास्त्रने भी वेदोक्त विषयोंका विधान किया है । जैसे, “शत-
कृत्वो गायत्रीमभ्यस्य नीरुग् भवति” ऐसा आयुर्वेदशास्त्रमे लिखा है ।
तथा वह गायत्री वेदका ही अंश है न कि बौद्ध आगमोंका ! यह
परिग्रहका तीसरा अर्थ है ।
उक्त तीनों प्रकारके परिग्रहोंमें महाजनोंद्वारा वेदार्थानुष्ठानरूप
प्रथम परिग्रह इस प्रकार है—जैसे, ऐसा कोई भी दर्शन नहीं है,
जिसको माननेवाला व्यक्ति वैदिक क्रियाका अनुष्ठान न करता हो ।
यहाँ तक कि ब्रह्मातिरिक्त सब विषयको अविद्याकल्पित कहनेवाले
वेदान्ती जन भी गर्भाधानसे लेकर अन्त्येष्टि तक वैदिक क्रियाओंको नहीं
करते हैं, ऐसी बात नहीं है । या कोई भी दार्शनिक जन वेदोक्त
स्पृश्यास्पृश्यविभागको न स्वीकार करता हो अथवा अस्पृश्यस्पर्शरूप
व्यतिक्रम हो जानेपर आचमन-स्नान आदि प्रायश्चित्त न करता हो,
यह बात नहीं है ।
यदि कहो कि—सभी दर्शनोंके सभी व्यक्ति तो वैदिक क्रियाओंका
अनुष्ठान नहीं करते हैं—तो वैसा भले ही मत हो । क्योंकि सभी रोगी
दवाका सेवन नहीं करते इससे वह शास्त्र महाजनपरिगृहीत नहीं है,
ऐसा नहीं हो जाता । किन्तु महाजनपरिगृहीत इतने ही से हो जाता
है कि सभी दर्शनोंके अधिकांश लोग वेदोक्त अर्थोंका अनुष्ठान करते
हैं । “फिर भी सभी वैदिक विधानोंका अनुष्ठान तो ये लोग भी नहीं
करते” यदि ऐसा कहो तो, भले ही वैसा न हो, उससे कोई क्षति नहीं
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४३४ आत्मतत्त्वविवेके
तथापि न सर्वो वेदार्थ एवमिति चेत्, मा भूत् । न हि
सर्वो वैद्यकार्थ एवमपि तु कश्चित् केनापि ।
एवं तर्हि सौगताद्यागमार्थोऽपि कश्चिदहिंसादिः सर्वदर्श-
नान्तःपातिभिरनुष्ठेयत एव कैश्चिदिति सोऽपि महाजनपरि-
गृहीतः स्यात्, न, सन्देहात् । किमयमहिंसादिर्वैदिक एवार्थो
बिडालव्रतन्यायेन श्रद्धाऽऽपादनाय शौद्धोदनिप्रभृतिभिरुप-
निबद्धः ? आहो स्वयं दृष्ट एवेति ? न तावत् स्वयं दृष्टः,
क्षपणकाद्यागमसाधारणत्वात् । यस्त्वसाधारणो मण्डली-
करणादिः केशोल्लुञ्चनादिर्वा, नासौ सर्वैरनुष्ठोयते । वैदिकस्तु
असाधारण एव निषेकादिस्तथेति ।
है ! क्योंकि आयुर्वेदोक्त सभी उपचारोंका अनुष्ठान सभी महाजन
नहीं करते किन्तु कोई किसीका ही अनुष्ठान करता है । वैसे ही वैदिक
विधानोंको भी समझना चाहिये ।
यदि कहो कि--ऐसे तो बौद्ध-आगमोंके अहिंसा आदि कुछ विषय
भी सभी दर्शनोंके कुछ जनोंके द्वारा अनुष्ठित होते ही हैं, इसलिये वे
भी महाजनपरिगृहीत हों—तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि अहिंसा
आदिके बौद्ध आगमोक्त होनेमें सन्देह है । कारण, क्या अहिंसा आदि
वेदोक्त विषय ही बिडालव्रत-न्यायसे लोगोंमें अपने प्रति श्रद्धा उत्पन्न
करनेके लिये बुद्धदेवाद्दिके द्वारा अपने ग्रन्थमें कहा गया है ? अथवा
स्वयं प्रत्यक्ष करके ही कहा गया है ? यहाँ स्वयं प्रत्यक्ष करके बुद्धदेवने
अहिंसाका प्रतिपादन किया है, यह पक्ष नहीं हो सकता । क्योंकि
जिस क्षपणक आदिके आगमको स्वयं बुद्धदेवने भी अप्रामाणिक माना
है, उसमें भी अहिंसाका प्रतिपादन हुआ है । इससे मालूम पडता है
कि वेदोक्त अहिंसाका तत्त्व बुद्धदेवने स्वयं प्रत्यक्ष नहीं किया है । किन्तु
बेडालव्रतके समान ही क्षपणक आदिकी तरह केवल दिखानेके लिये
उसे अपनाया है । जो तो मण्डलीकरण या केशोल्लुञ्चन आदि
बौद्धादि आगमोंका अपना विशेष विषय है, उसका अनुष्ठान सभी
नहीं करते । वेदमें कहे हुए निषेक (गर्भाधान) आदि तो वेदके
अनुपलब्धवादः ४३५
अपि च वाचकापभ्रंशविभागोऽस्तु न वा, तद्व्यवहार-
स्तावत् सर्वैरेव तीर्थिकैरविगानेन स्वीकृतः । तथा शिक्षा-
ज्योतिषच्छन्दोनिगमनिरुक्ताद्यर्थश्च । तेषां च वेदरक्षैव परमं
प्रयोजनमिति ।
स्यादेतत्, व्याकरणादीनि तावत् सर्वैरभ्युपगतार्थानि, वेदा
अपने विशेष विषय हैं, जिनका सभी महाजन अनुष्ठान करते हैं।
इसप्रकार महाजनद्वारा वैदिक विधानोंका अनुष्ठान होनेसे वेदोंका
सर्वज्ञ-प्रणीत होना सिद्ध होता है ।
एवं वाचकशब्द और अपभ्रंशात्मक शब्दका विभाग भले ही
व्याकरण द्वारा न हो सकता हो, क्योकि “गां गृहाण” इत्यादिमें वाचक-
भूत गो-प्रकृति और अम्-प्रत्यय तथा ग्रह्-प्रकृति एव सिप्-प्रत्यय इनमेंसे
कोई भी नहीं है किन्तु विकार या आदेश बन गया है। लोप स्थलमें
तो मूलशब्दका पता भी नहीं रहता, फिर भी उन स्थलोंमें व्याकरणद्वारा
परिकल्पित प्रकृति-प्रत्यय और आगमादिको व्याकरणद्वारा ही सभी
जानते और “गां गृहाण” आदिका अर्थ समझते हैं। इस प्रकार
व्याकरणका व्यवहार सभी दार्शनिकोंने श्रद्धापूर्वक स्वीकार किया है।
तथा उस सर्व-स्वीकृत व्याकरणने ‘बहुल छन्दसि’ इत्यादि सूत्रोंके द्वारा
“भद्रं कर्णेभि” इत्यादि वेदोक्त पदोंका ही साधन किया है न कि
बौद्धादि-आगमोक्त पदोंका। बल्कि व्याकरणके व्याख्याता महाभाष्य-
कारादिने सौगत आगमोंका अप्रमाण ही प्रतिपादित किया है।
एवं, वेदाङ्गभूत शिक्षा, ज्योतिष, छन्द, निगम और निरुक्तादिद्वारा
कथित अर्थका भी सभी तीर्थिकोंने स्वीकृत किया है। तथा प्रकृति-
प्रत्ययके व्यवहारको बतानेवाले व्याकरण और वेदोक्त अर्थोंको स्फुट
करनेवाले शिक्षादिका भी मुख्य प्रयोजन वेदोंकी रक्षा ही है। अर्थात्
वेदार्थोंका निश्चय करना और उनका अनुष्ठान किया जाना इसी मुख्य
प्रयोजनके उद्देश्यसे पाणिन्यादि मुनियोंने व्याकरण शिक्षा आदिकी
रचना की है। यदि वेद अप्रमाण होते तो उनके अर्थोंके निर्णयार्थ एवं
अनुष्ठानार्थ उन उन शास्त्रोंकी रचना ही मुनिगण नहीं करते ।
अस्तु, व्याकरणादिके विषय सभीके द्वारा स्वीकृत हों, तथा वेदोंका
४३६ आत्मतत्त्वविवेके
अपि तैः पालनीया भवन्तु । त एवेति कुतः ? संसारमोचका-
गमोऽपि तत्पालनीयः किन्न स्यादिति चेत्, न, तत्कर्तृभिस्तथा-
नभ्युपगमात्, अव्युत्पादनात्, असाधारणलिङ्गाभावात्, विरुद्ध-
लिङ्गसद्भावाच्च । न हि वेदशब्दार्थाविव सुगताद्यागमा-
साधारणशब्दार्थाननुरुध्य तेषां प्रवृत्तिर्यत एवमुन्नीयत, प्रत्युत
विरोध एव, तैस्तदप्रामाण्यव्युत्पादनात् । तस्मात् सर्वाभ्युपेत-
व्यवहारव्याकरणादिपालनीयत्वमपि वेदानामेव नान्येषाम् ।
पालन उन व्याकरणादि शास्त्रोंका मुख्य उद्देश्य भी हो, फिर भी वेद ही
उनका पालनीय है, यह कैसे माना जाय ? ससारमोचकादि आगम भी
उनका पालनीय ( उद्देश्य ) क्यों न होगा ?—तो इस प्रकारकी शङ्का
नहीं की जा सकती । क्योंकि व्याकरणादिके रचयिता पाणिनि आदिके
द्वारा ससारमोचकागममे प्रतिपादित शब्द एव अर्थका अभ्युपगम नहीं
किया गया है। क्योंकि उनके द्वारा जैसे वैदिक पदोंका व्युत्पादन
किया गया है, वैसे बौद्धादि आगमोंके पदोंका व्युत्पादन नहीं किया गया
है। क्योंकि व्युत्पादित किये जानेका जो असाधारण लिङ्ग है, वह
उनमें नहीं है । अर्थात् वैसे पद उन आगमोंमे प्रयुक्त होते जो भाषामें
प्रयुक्त नहीं हैं, तब वे पद ही उनके असाधारण लिङ्ग होते और उनका
भी व्युत्पादन व्याकरणादिका उद्देश्य माना जाता, किन्तु वैसा है नहीं ।
बल्कि व्युत्पादनके विरोधी लिङ्ग ही ससारमोचकागमोंमें विद्यमान हैं ।
क्योंकि जैसे वेदमें असाधारण शब्द एव अर्थ हैं, वैसे सौगतादि आगमों
में असाधारण शब्द एव अर्थ नहीं हैं, जिनके अनुरोधसे मुनियोंकी
प्रवृत्ति होती और उनके द्वारा व्युत्पादन किये जानेकी कल्पना की
जाती । बल्कि अनुरोधकी जगह विरोध ही पाया जाता है । क्योंकि
मुनियोंने उन आगमोंके अप्रामाण्यका ही व्युत्पादन किया है । इस
प्रकार सिद्ध होता है कि सर्व स्वीकृत है व्यवहार जिसका, ऐसे व्याकर-
णादिके द्वारा वेदका ही पालन लक्ष्य है न कि सौगतादि आगमोंका ।
यह द्वितीय प्रकारका महाजनपरिगृहीतत्व है ।
अनुपलम्भवादः ४३७
सर्वाभ्युपेतप्रामाण्यैरायुर्वेदादिभिः स्वीकृतश्चैषामर्थः, प्रतिपदं
तदीयशान्तिकपौष्टिकप्रायश्चित्ततपोजपदानहोमाद्युपदेशात् ।
न चैष भागस्तत्राप्रमाणमेव, तुल्ययोगक्षेमत्वात् । एतदेवा-
सिद्धम्, प्रक्षेपस्यापि सम्भवादिति चेत्, न, अध्येतृऽध्यापयितृ-
संप्रदायाविच्छेदात् ।
“अन्यथाकरणे चास्य बहुभ्यः स्यान्निवारणम्”
इति न्यायात् ।
तस्मादेवंरूपोऽपि महाजनपरिग्रहो वेदानामिति । सोऽयमी-
दृशो महाजनपरिग्रहोऽसर्वज्ञपूर्वकत्वेऽसंभवन् सर्वज्ञपूर्वकत्वेन
व्याप्यते ।
एवं, सभीने जिसका प्रामाण्य माना है, ऐसे आयुर्वेदादिके द्वारा
भी वैदिक विषय स्वीकृत किया गया है। क्योंकि पद-पदपर वेदोक्त
शान्तिक, पौष्टिक, प्रायश्चित्त तप, जप, दान और होम आदिका उपदेश
पाया जाता है। यह नहीं हो सकता कि—आयुर्वेदका यह शान्तिक
पौष्टिकादि भाग अप्रमाण ही है—क्योंकि आयुर्वेदके सम्पूर्ण भागों
का समान योगक्षेम है। अर्थात् आयुर्वेदका जैसे औषधवाला भाग
प्रमाण है, वैसे ही शान्तिकादि भाग भी प्रमाण होगा, क्योंकि वह
भी उसीका भाग है। अन्यथा औषधवाला भाग भी प्रमाण नहीं हो
सकेगा।
यदि कहो कि—आयुर्वेदमे शान्तिकादि भाग प्रक्षिप्त हो सकते हैं,
अतः तुल्य योगक्षेमत्व ही असिद्ध है—तो यह नहीं हो सकता है।
क्योंकि उसके पढ़ने और पढ़ानेवालेका सम्प्रदाय कभी टूटा नहीं है,
इसलिये प्रक्षेपकी संभावना ही नहीं है। क्योंकि “अन्यथाकरणे चास्य
बहुभ्यः स्यान्निवारणम्” इस कुमारिलभट्टोक्त न्यायके अनुसार सर्वत्र
प्रक्षेपकी आशङ्का होने लगेगी। और तुम्हारे आगममें भी तुम्हें प्रक्षेप
मानना पड़ जायगा। इसलिये इस तृतीय प्रकारका महाजनपरिग्रह
भी वेदोंमें है। अतः पूर्वोक्त दोनों ही प्रकारके महाजनपरिग्रह वेदोंके
४३८ आत्मतत्त्वविवेके
यथा हि पूर्वविरुद्धपूर्वव्याकरणादिवैद्यकादिषु विगानाद-
परिग्रहः, तथा तथाविधे धर्मशास्त्रेऽपि । व्यामोहाद् भवन्नपि
कस्यचिदेव न तु सर्वेषाम् । अथ पूर्वाविरुद्धं चेत्, तथापि
पूर्वस्य पूर्ववदपरिग्रहे केनचित् परिग्रहे वा कथं तन्मूलस्यान्यस्य
सर्वैः परिग्रहः ?
न च नासीदेव पूर्वं धर्मशास्त्रम्, मानान्तरस्यात्र वस्तुनि
असर्वज्ञ प्रणीत होनेपर असम्भव हैं, इसलिये वेदोंमे सर्वज्ञपूर्वकत्वका
निश्चय होता है।
इसमे तर्क यह है कि जैसे पूर्ववर्ती व्याकरणादिसे विरुद्ध नवीन
व्याकरणादि एव वैद्यक आदिके निन्दित होनेके कारण वे महाजनद्वारा
परिगृहीत नहीं होते, वैसे पूर्वसे विरुद्ध नवीन धर्मशास्त्र भी निन्दित
होनेसे महाजनपरिगृहीत नही होता है। अर्थात् विवादका विषय
वेदरूप धर्मशास्त्र यदि सर्वज्ञपूर्वक (ईश्वरप्रणीत) नहीं होता तो वह
उक्त तीनों ही प्रकारके महाजनपरिग्रहका विषय नहीं होता। जैसे
कि आधुनिक व्याकरण वैद्यक आदि सर्वज्ञपूर्वक नहीं होनेके कारण
महाजनपरिग्रहका विषय भी नहीं होता है।
यदि उस पूर्वविरुद्ध संसारमोचकादि धर्मशास्त्रके प्रति अज्ञानतावश
परिग्रह होता भी है तो किसीको ही होता है न कि सबको। अर्थात्
वेद सभी महाजनोंद्वारा परिगृहीत है, इसलिये वेदका परिग्रह अज्ञान-
पूर्वक नहीं हो सकता है। यदि संसारमोचकादिकोंका या सुगतोंका
धर्मशास्त्र (आगम) पूर्ववर्ती धर्मशास्त्रसे अविरुद्ध हो तो भी उसका वह
पूर्ववर्ती धर्मशास्त्र स्वयं यदि महाजन परिगृहीत न हो या किसी एकके ही
द्वारा परिगृहीत हो तो तन्मूलक सुगतादिका धर्मशास्त्र सबके द्वारा परि-
गृहीत कैसे हो सकेगा ? अर्थात् सौगतोंको भी उस पूर्ववर्ती धर्मशास्त्रको
अवश्य ही महाजनपरिगृहीत मानना होगा। इस प्रकार वह पूर्ववर्ती
धर्मशास्त्र हमारा वेद ही है, जो महाजनपरिगृहीत होनेके कारण सर्वज्ञ
पूर्वक (सर्वज्ञप्रणीत) सिद्ध हो जाता है।
यह नहीं कह सकते कि—वेदरूप कोई पूर्ववर्ती धर्मशास्त्र था ही
कुण्ठतयाऽनुष्ठानाभावप्रसङ्गात् । तथा च धर्माभावे तत्कार्यस्य
सुखस्याप्यभावे रागानुत्पत्तौ लोकसमीहोच्छेदे लोकोच्छेद-
प्रसङ्गः ।
तस्मान्महाजनपरिगृहीतपूर्वपूर्वागमपूर्वकत्वात्, प्रवाहनित्य-
त्वाद् वा, प्रलयविच्छेदे सर्गादौ सर्वानुविधेयपुरुषधौरेयपूर्वकत्वाद्
वा महाजनपरिग्रहो न तु पूर्वागममानपेक्ष्यार्वाचीनपुरूषपशुपूर्वकत्वात्
पूर्वागमप्रामाण्याप्रामाण्ययोरुभयथाऽपि तस्य विप्रलम्भकत्वात् ।
प्रामाण्ये हि तद्विरुद्धाभिधानं विप्रलम्भ एव । अप्रामाण्येऽप्यु-
नहीं—क्योंकि यदि पूर्ववर्ती वेद न होता तो धर्मके विषयमे अर्थात् याग
दानादिकी इष्टसाधनतामे अन्य प्रमाण कुण्ठित हैं, इसलिये धर्मानुष्ठानका
अभाव हो जायगा । ऐसी स्थितिमें धर्मका अभाव होनेपर उससे उत्पन्न
होनेवाले सुखका भी अभाव हो जायगा और सुखके अभावमें उसकी
अनुभूति नहीं होनेके कारण पुन सुखप्राप्तिके प्रति राग नहीं उत्पन्न
होगा तथा रागके अभावमे प्रवृत्ति नहीं होनेसे जगत् निश्चेष्ट हो जायगा
और चेष्टाहीन हो जानेसे पुत्रादिकी उत्पत्ति भी नहीं हो सकेगी । इस
प्रकार जगत्का ही उच्छेद हो जायगा ।
अतः महाजनपरिगृहीत जो पूर्व पूर्व आगम, तत्पूर्वक होनेके कारण
या तत्तद् आगमोंके अनित्य होनेपर भी आगमधाराके नित्य होनेके
कारण अथवा प्रलयके द्वारा आगमधाराका विच्छेद हो जानेपर भी सृष्टि
के आदिमें किसी पुरुषविशेषसे निर्मित होनेके कारण ही कोई आगम
महाजनपरिगृहीत माना जाता है, न कि पूर्व आगमोंकी बिना अपेक्षा
किये आधुनिक-जनद्वारा प्रणीत होनेके कारण कोई भी आगम महाजन
परिगृहीत कहा जाता है । इनमे प्रथम पक्षके अनुसार पूर्व आगम जो
वेद, उसका प्रामाण्य मानकर या अप्रामाण्य मानकर, दोनों ही दशाओंमें
संसारमोचकागमोंका प्रणेता आधुनिक पुरुष विप्रलम्भक ( ठगनेवाला )
ही सिद्ध होता है । क्योंकि पूर्ववर्ती आगम वेदको यदि प्रमाण मानता
है तो उसके विरुद्ध कहना ठगना ही है । यदि उस पूर्ववर्ती आगम
वेदको अप्रमाण मानता है तो, "यागादिक स्वर्गादि सिद्धिका उपाय है" इस
८० आत्मतत्त्वविवेके
पायमविदुषोऽननुष्ठाने तदा ( भाव ) भासानुष्ठाने वाऽसर्वज्ञस्योप-
देशो विप्रलम्भ एवेति ।
तत्र न प्रथमः, वेदपरम्पराऽनुपलम्भात्, अर्वाचीनानां पाठ-
पारतन्त्र्यमात्रेण प्रवाहोपपत्तौ तत्कल्पनायां प्रमाणाभावात् ।
नापि द्वितीयः, वेदह्रासदर्शनात् । यत इदानीमश्रूयमाणस्यापि
बातको नहीं जाननेवाले उस असर्वज्ञ व्यक्तिद्वारा यागादिके अननुष्ठान
का उपदेश देना अथवा मण्डलीकरण केशोल्लुञ्चन प्रभृति सुखके उपाया-
भासोंके अनुष्ठानका उपदेश देना संसारको ठगना ही है । क्योंकि अर्थ-
निर्णय किये बिना ही स्वकपोलकल्पित ऐसा उपदेश दिया गया है ।
अर्थात् उक्तप्रकारका वञ्चनात्मक उपदेश महाजनपरिग्रहका विषय नहीं
हो सकता है ।
महाजनपरिग्रहके प्रति सम्भावित पूर्वोक्त तीन हेतुओंमें प्रथम हेतु
नहीं हो सकता है । क्योंकि पूर्वपूर्वागमपूर्वकत्व-हेतुमें “पूर्वपूर्वागम”
पदसे विजातीय वेदपरम्परा विवक्षित हो तो वैसी वेदपरम्परा प्रत्यक्ष-
प्रमाणसे सिद्ध नहीं है । यदि अनुमानद्वारा वर्तमान वेदके मूलके
रूपमें विजातीय वेदपरम्पराकी कल्पना करो तो यह संभव नहीं है ।
क्योंकि जैसे अर्वाचीन ( वर्तमान ) वेदोंका प्रवाह गुरु-शिष्यके केवल
क्रमिक पाठके द्वारा सजातीय प्रवाह ही चल रहा है, न कि शिष्यद्वारा
पढे जानेवाले वेदका मूल गुरुद्वारा पढा जानेवाला कोई विजातीय वेद
होता है । वैसे ही परम्परागत पाठके द्वारा सजातीय वेद परम्पराको
वर्तमान वेदके मूलके रूपमें कल्पना करना अप्रामाणिक है ।
प्रबाहनित्यत्वरूप द्वितीय पक्ष भी नहीं हो सकता है । अर्थात्
“प्रवाहरूपसे वेद नित्य है, इसलिये यह महाजनपरिगृहीत है” यह
पक्ष भी ठीक नहीं है । क्योंकि वेदका ह्रास देखे जानेसे वेदप्रवाह नित्य
नहीं हो सकता । कारण, जो वेदभाग इस समय उपलब्ध नहीं है,
उसके विषयका भी अनुष्ठान देखा जाता है तथा मनु आदि स्मृतिकारोंने
उस विषयको भी अपनी स्मृतियोंमें निबद्ध किया है । अर्थात् होलाका
( होली ) करनी चाहिये—इसका सूचक वेदभाग यद्यपि अनुपलब्ध है,
फिर भी उसका अनुष्ठान सर्वजन-प्रसिद्ध है । तथा अष्टकनामक याग
अनुपलम्भवादः ४४१
वेदस्यार्थोऽनुष्ठीयते निवध्यते च मन्वादिभिः ।
पुरुषाणामपचीयमानशक्तिकत्वाच्च । यथा ह्यश्वमेधराजसूया-
द्यनुष्ठानशक्तेरपचयस्तथाऽध्ययनशक्तेरपि । न च पूर्वमपि नानु-
ष्ठिता एव राजसूयादयः, तदर्थस्य वेदराशेर्वैयर्थ्यप्रसङ्गात् ।
न च नित्यानुमेयवेदसंभवः, वर्णानां नित्यत्वेऽप्यानुपूर्व्याः
पाठाश्रयत्वात् । न चानुपूर्वीशून्यवर्णाः पदं नाम, न चाका-
वर्तमान वेदमें नहीं मिलता है, फिर भी मनु आदि ऋषियोंने अपनी
स्मृतिमें उसका उल्लेख किया है । इससे सिद्ध होता है कि वेदका वह
भाग उच्छिन्न हो चुका है ।
एव पुरुषोंकी अध्ययनशक्ति क्रमशः क्षीण होती देखी जा रही है,
इससे भी सिद्ध होता है कि वेदका ह्रास संभव है । अर्थात् एक व्यक्ति
वेदकी समस्त शाखाओंका अध्ययन करनेमें असमर्थ है, अतः एकके
समान दूसरेके द्वारा भी किसी शाखाका अध्ययन संभव है । इससे
वैदिक शाखाके उच्छेदकी संभावना सिद्ध होती है । क्योंकि जैसे
बहुद्रव्य-साध्य अश्वमेध-राजसूय आदि यज्ञोंकी अनुष्ठानशक्तिका ह्रास
हो गया है ; यह नहीं कह सकते कि—पूर्वकालमें भी राजसूय आदि-
का अनुष्ठान नहीं ही हुआ था—क्योंकि तब उस विषयका प्रतिपादक
वेदसमुदाय व्यर्थ हो जायगा ।
यह नहीं हो सकता कि—होलाकादि-विषयक वेद कभी भी पाठमें
नहीं आये किन्तु पूर्वकालीन स्मृति और आचारके द्वारा उक्त वेदभाग
का अनुमान करके ही तदनुसार मन्वादि-स्मृति या शिष्टाचार बने हैं ।
अर्थात् मन्वादिस्मृति या आचारका आधार सीधे वेद नहीं हैं किन्तु
तद्विषयक वेदके अनुमापक पूर्वकालीन अन्य स्मृति या आचार ही हैं ।
अतः वेद, नित्यानुमेय हैं तथा शाखा-उच्छेदमे कोई प्रमाण नहीं है—
क्योंकि वर्ण भले ही नित्य हों, किन्तु वर्णोंकी आनुपूर्वी ( गकारोत्तर-
अकारोत्तर-णकारोत्तर-अत्त्वादि ) तो पुरुषाधीन पाठ ( उच्चारण ) के
आश्रित होनेसे अनित्य ही है । क्योंकि आनुपूर्वी रहित वर्ण पद नहीं
कहाता । एवं आकाङ्क्षा-योग्यता-और आसत्तिसे युक्त पदसमूहके अलावे
दृष्टायुपेतपदकदम्बादन्यद् वाक्यं नामेति गुरुरपि लघुरेव ।
तस्मात् पुरुषाणामनुष्ठानशक्तिवत् अध्ययनशक्तिरपि युग-
क्रमेणापचीयते, ततो वेदानां शाखोच्छेदः, तदर्थानामन्ष्ठानो-
च्छेदः, वर्णाश्रमाचारव्यवस्थाविप्लवश्चेति ।
अतएव भगवतो व्यासस्य पुरुषशक्त्यपचयमपेक्ष्य वचनानि
“अल्पायुषो ऽल्पसत्त्वा” इत्यादीनि । वेदोच्छेदसवेक्ष्य “प्रति-
मन्वन्तरं चैषा श्रुतिरन्या विधीयते” इत्यादीनि । अनुष्ठानो-
त्सादमवेक्ष्य “दानमेकं कलौ युगे” इत्यादीनि । आचारविप्लव-
मवेक्ष्य “प्रजास्तत्र भविष्यन्ति शिरनोदरपरायणाः” इत्यादीनि ।
तथा च श्रूयमाणा अपि वेदा उच्छेदमुपयास्यन्ति, वेदत्वाद्
वाक्यत्वाद् वा, उच्छिन्नशाखावदिति न्यायात् । यथा चैतत् तथा
आश्रय भी नहीं होता । अतः पूर्वोक्त रीतिसे वेदको नित्यानुमेय
प्रतिपादित करनेवाले गुरु 'प्रभाकर' भी वस्तुत लघु ही हैं ।
इसलिये पुरुषोंकी अनुष्ठान-शक्तिके समान अध्ययनशक्ति भी युग-
क्रमके अनुसार क्षीण होती है और अध्ययन-शक्तिके क्षीण होनेके कारण
वेदकी शाखाओंका उच्छेद, उसके विधियोंके अनुष्ठानका उच्छेद तथा
वर्णाचार एवं आश्रमसम्बन्धी आचारोंकी व्यवस्था भी छिन्न-भिन्न हो
जाती है। इसीलिये पुरुष-शक्तिके ह्रासकी दृष्टिसे भगवान् व्यासके
"अल्पायुषोऽल्पसत्त्वाः" इत्यादि वचन हैं। वेद सम्प्रदायके ह्रासकी
दृष्टिसे "प्रतिमन्वन्तर चैषा श्रुतिरन्या विधीयते" इत्यादि वचन हैं।
अनुष्ठान ह्रासकी दृष्टिसे "दानमेकं कलौ युगे" इत्यादि वचन हैं।
तथा आचारोंके ह्रासकी दृष्टिसे "प्रजास्तत्र भविष्यन्ति शिरनोदर-
परायणाः" इत्यादि वचन हैं।
इस प्रकार जो वेद आज श्रूयमाण (प्रत्यक्ष) हैं, वे भी उच्छिन्न हो
जायेंगे, वेद होनेके कारण या वाक्य होनेके कारण, पूर्वमें उच्छिन्न
वेदकी शाखाओंके समान—यह अनुमान उच्छेदमें प्रमाण है। एवं, जैसे
भविष्यमें वेदोंका उच्छिन्न हो जाना अनुमान-प्रमा...
अनुपलम्भवादः ४४३
पर्वता अपि चूर्णीभविष्यन्ति, पार्थिवत्वात्, घटवत् । समुद्रा अपि
शोषमेष्यन्ति, जलाशयत्वात्, स्थलीपल्वलवत् । सूर्योऽपि निर्वा-
स्यति, तैजसत्वात् प्रदीपवत् । ब्रह्मापि प्रैष्यति, शरीरित्वात्,
अस्मदादिवदित्यागमाविरोधेनानुमीयताम् ।
स्यादेतत्, भविष्यन्नुच्छेदोऽनुमितः । न तु भूतोऽपीति
कुत इति चेत्, यत एव १ उच्छेदानन्तरं पुनः सर्गेण भाव्यम् ।
अन्यथा संसारिणां कृतहानप्रसङ्गात् । न हि विश्वनिर्माणमन्तरेण
भोगज्ञानयोः सम्भवः । न च तेन विना कर्मप्रवाहसंरोधः । ततो
ही-पर्वत भी चूर्ण हो जायेंगे, पार्थिव अर्थात् पृथिवीसमवेत द्रव्य होनेके
कारण, घटके समान । समुद्र भी सूख जायेंगे, जलाशय होनेके कारण,
पोखरोंके समान । सूर्य भी बुझ जायगा, तैजस अर्थात् तेजःसमवेत द्रव्य
होनेके कारण, प्रदीपके समान । तथा ब्रह्मा भी मरेंगे, शरीरधारी होनेके
कारण, हम लोगोंके समान । इस प्रकार आगमानुसार अनुमान कर लें ।
शङ्का—अस्तु, पूर्वोक्त हेतुओंसे कार्य जगत्के भावी उच्छेदका
अनुमान हुआ । किन्तु भूतकालमें भी उच्छेद था, यह कैसे सिद्ध होगा ?
अर्थात् यदप्रवाहके अनादि होनेसे ही वह महाजनपरिगृहीत क्यों न है ?
समाधान—इसलिये कि उच्छेदके बाद पुनः सृष्टि होनी चाहिये ।
अन्यथा संसारियोंके लिये कर्मोंकी हानि अर्थात् निष्फलता हो जायगी ।
तात्पर्य यह है कि वर्तमान सृष्टिमें जो कर्म प्राणियोंने किये हैं, वे
निष्फल हो जायेंगे, यदि भविष्यमें सृष्टि न हो । अतः वर्तमान सृष्टिके
बाद प्रलय होने पर पुनः सृष्टिका होना अनिवार्य है । इसी प्रकार यह
वर्तमान सृष्टि भी पूर्वप्रलयके बाद हुई है तथा उस प्रलयके पूर्वकी
सृष्टि भी उसके पूर्ववर्ती प्रलयके बाद हुई थी । इस प्रकार यह सृष्टि
और प्रलयका प्रवाह अनादि ही सिद्ध है ।
यदि प्रलयके बाद पुनः सृष्टि न हो तो कर्मोंके फलस्वरूप सुखदुःख-
साक्षात्काररूप भोग तथा तत्त्वज्ञान नहीं हो सकेंगे । इस प्रकार कृतहान-
दोषकी प्रसक्ति हो जायगी । एवं भोग और ज्ञान इन दोनोंके असम्भव
१. अत एव यत इति क्वचित् पाठः ।
४५४ आत्मतत्त्वविवेके
यथा भविष्यन् विश्रमर्गं उच्छेदपूर्वकस्तथाऽयमपीति । समय-
नियमस्तु प्राणिनां कर्मवैषम्येऽपि वर्षादिनियमवदुदयास्तनियमवद्
वा द्रष्टव्यः, कर्मणामेवैवंस्वभावत्वात् । एतदर्थमेव हि पुराणेषु
सृष्टिप्रलययोर्दिवसरात्रिव्यवहारः ।
तथापि सर्वप्राणिनाशयौगपद्ये किं प्रमाणमिति चेत्, द्वि-
सप्तभौमभुवनप्रासादभङ्गेऽपि निर्भया एव ग्रामकुटीहट्टविहारिणः १
हो जानेसे कर्मप्रवाहका निरोध भी नहीं हो सकेगा । अर्थात् मुक्ति
भी असम्भव हो जायगी । क्योंकि प्रारब्धकर्मोंका भोगद्वारा ही नाश
होगा तथा अन्य कर्मोंका तत्त्वज्ञानसे । अतः मोक्षोपयोगी भोग और
तत्त्वज्ञानके साधनके लिये प्रलयोत्तर पुन सृष्टि अनिवार्य है ।
यहाँ प्राणियोंके कर्मोंके विपाकका समय यद्यपि भिन्न भिन्न होता है,
फिर भी ब्रह्माकी आयुके सौ वर्ष काल बीतनेपर प्रलय होनेका जो नियम
है, वह तो वर्षाकाल आदिके नियमके समान अथवा सूर्योदय सूर्यास्त
काल (दिन रात) के नियमके समान है, ऐसा जानना चाहिये । अर्थात्
जैसे, वर्षा आदि ऋतुओंके जनक कर्म एक नियत अवधिके बाद ही
वर्षादिकालको उत्पन्न करते हैं, न कि कभी घण्टा प्रहर आदिके बाद
और कभी वर्ष दो वर्ष आदिके बाद । एव जैसे, दिन और रात नियमवत
होती है, वैसे ही सृष्टि और प्रलयके जनक कर्म भी ब्रह्माकी आयुके
हिसाबसे सौ सौ वर्ष बीतने पर ही सृष्टि और प्रलयको नियमवत उत्पन्न
करते रहते हैं । क्योंकि कर्मोंका ही ऐसा स्वभाव है कि सुषुप्ति अवस्था
के समान उन सबोंकी वृत्ति एक साथ निरुद्ध हो जाती है । इसीलिये
पुराणोंमें सृष्टि और प्रलयका दिन और रातके रूपमें व्यवहार किया
गया है ।
यदि कहो कि-कुछ प्राणियोंके कर्मका एकसाथ निरोध और
प्राकट्य भले ही हो किन्तु सभी प्राणियोंका एकसाथ नाश होनेमें क्या
प्रमाण है ? तो चौदह कोठों वाले भुवनरूपी महलके ध्वस्त हो जानेपर
भी गाँवकी कुटिया एवं हट्ट (झापड़ी) में विहार करनेवाले शरीरधारी
१. ग्रामटीहट्टकुटीविहारिण इति २ पु० पा० ।
अनुपलब्धवादः ४४५
शरीरिण इति महती प्रेक्षा । तस्मात् सर्गादिमहाजनमन्वादि-
परिग्रहपूर्वकोऽयमद्याप्यनुवर्तत इति नानवमरदोषावकाशोऽ-
पीति युक्तमुत्पश्यामः ।
तदेवं कथं मन्वादिभिः परिगृह्यन्तां वेदा इति चेत्, आयुर्वेद-
वदाप्तोक्तत्वनिश्चयात् । स एव कुत इति चेत्, अध्यक्षतः, तेषाम-
प्यतीन्द्रियार्थदर्शित्वात् । तादृशां तेषां तत्परिग्रहेण किं प्रयोजन-
मिति चेत्, अस्मद्व्यवहारेणास्मदपत्यादि व्युत्पद्यताम्, तथा च
धर्मसंप्रदायः प्रवर्ततामिति भूतदया स्वाधिकारसम्पादनं च ।
जीव निर्भय ही हैं—यह आपकी अच्छी सूझ है । इसलिये सृष्टिके
आदिमें वेदोंके प्रणयनकालमे ही ईश्वरके द्वारा मनु आदि मानस
महाजन भी उत्पन्न किये गये और उन्हींके द्वारा पहिले वेदोंका परिग्रह
हुआ, जो आजतक चला आ रहा है । अतः "महाजनके अभावमें
महाजनद्वारा परिग्रहका अवसर ही कहाँ है !" इस दोषका भी अवकाश
नहीं है । अत हमारा यह विचार युक्त है ।
यदि कहो कि—सृष्टिके आदिकालमे मनुपभृति महाजन भले ही हों,
फिर भी उस समय उनके द्वारा परिग्रह कैसे हुआ ?—तो इसलिये कि
जैसे आप्तोक्तत्वके निश्चयसे आजकल हम लोग आयुर्वेदका परिग्रह
करते हैं, वैसे ही उस समय मनु आदिने वेदोंमे आप्तोक्तत्वका निश्चय
होनेसे उनका परिग्रह किया । यदि कहो कि—उन्हें वेदोंमें आप्तोक्तत्व-
का निश्चय ही कैसे हुआ ?—तो यही उत्तर है कि "प्रत्यक्षसे"। क्योंकि
वे भी अतीन्द्रिय विषयोंके द्रष्टा थे । यदि पूछो कि—वेदोंके परिग्रहसे
उनका क्या प्रयोजन था ?—तो यही कि हमारे वेदार्थानुष्ठानरूप
व्यवहारसे हमारे पुत्रादि भी परिचित होकर वैसा अनुष्ठान करें और
उनकी देखादेखी अन्य लोग भी वैसा अनुष्ठान करें । इस प्रकार लोकमे
धार्मिक सम्प्रदाय चालू हो-ऐसी भूतानुकम्पा तथा अपने अधिकारका
पालन ही उनका प्रयोजन था । अर्थात् सर्गादिकालमें मन्वादिकने
लोककल्याणकी भावनासे वेदार्थानुष्ठान ( वेदपरिग्रह ) किया । तथा
इसलिये भी वैसा किया कि ईश्वरने ही वेदोंका निर्माण कर उनके परि-
ग्रहार्थ मनु आदिको अधिकारी बनाया था ।
४५६ आत्मतत्त्वविवेके
अथवा सर्गान्तरगृहीतव्याप्तिप्रादुर्भावे सुप्तप्रतिबुद्धवत् पितृत्वे-
नाविप्रलम्भकत्वमुच्चावचभूतनिर्माणदर्शनेन सार्वज्ञयमनुमायाऽऽ-
प्तत्वनिश्चयस्तस्य तेषाम् ।
यद्वा भगवान्नेव सम्प्रदायप्रवर्तनव्यसनव्यग्रः कायसहस्राणि
व्युत्पाद्यव्युत्पादकभावव्यवस्थितानि निर्माय तदातन महाजनं
परिग्राहितवान् नटोपाध्याय इव स्वयं नटित्वेति सर्वं सुस्थम् ।
पक्षत्रयेऽप्यत्र पुराणादिसंवादोऽप्यस्तीति ।
स्यादेतत्, परमेश्वरप्रवर्तितोऽयमेव वेदसंप्रदायः सर्गान्तर-
अथवा सोकर उठे हुए व्यक्तिके समान मन्वादि भी पूर्वसृष्टिमें गृहीत
व्याप्तिका स्मरण कर पितृत्वहेतुसे ईश्वरमे अविप्रलम्भकत्व (अवञ्चकत्व)
का अनुमान करते हैं। तथा अनेक प्रकारके प्राणियोंकी रचना देखकर
उसमें सर्वज्ञत्वका भी अनुमान करते हैं। क्योंकि जो जिसका पिता
होता है, वह उसके प्रति वञ्चक नहीं होता है। अतः ईश्वर भी सबका
पिता होनेके कारण वञ्चक नहीं है। एव सर्वज्ञ ही विविध रचनामे
समर्थ हो सकता है, इसलिये ईश्वर सर्वज्ञ भी है। इस प्रकार अवि
प्रलम्भकत्व और सर्वज्ञत्वका अनुमान होनेके बाद मन्वादिकों को ईश्वर
में आप्तत्वका निश्चय होता है और वे ईश्वर प्रणीत वेदोंका परिग्रह
करते हैं ।
अथवा स्वयं ईश्वर ही धर्मसम्प्रदायके सञ्चालनरूप व्यसनमे व्यस्त
होकर हजारों शरीरको व्युत्पाद्य और व्युत्पादक (शिष्य शिक्षक) के
रूपमे बनाकर (धारणकर) सर्गादिकालीन मन्वादि महाजनोंको वेदोंका
परिग्रह कराया । जैसे, कोई नाट्यविद्या का आचार्य स्वयं नाट्य कर
अन्योंको नाट्यकी शिक्षा देता है । इस प्रकार पूर्वोक्त सम्पूर्ण विषय
सुस्थिर है । इन तीनों ही पक्षोंमे पुराणादिकोंका संवाद भी है । अर्थात्
पुराणोंद्वारा भी इन तीनों पक्षोंकी पुष्टि होती है ।
यदि कहो कि-उक्त रीतियोंसे महाजनद्वारा वेदोंका परिग्रह भले ही
हो, फिर भी परमेश्वरद्वारा, सञ्चालित वर्तमान वेद सम्प्रदाय पूर्वसृष्टिगत