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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 481, कुल 530 में से

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पृष्ठ 481

तथाहि, नास्त्येव तद्दर्शनं यत्र सांप्रतमित्युक्त्वापि गर्भा-
धानाद्यन्त्येष्टिपर्यन्तां वैदिकीं क्रियां जनो नानुतिष्ठति, स्पृश्या-
स्पृश्यादिविभागं वा नानुमनुते, व्यतिक्रमे चाऽऽचमनादि-
प्रायश्चित्तं वा नानुतिष्ठति ।
न सर्वत्र सर्वो जन एवमिति चेत्, मा भूत । न हि सर्वै
रोगिभिरायुर्वेदार्थो नानुष्ठीयत इति न तस्य महाजनपरिग्रहः,
अपि तु सर्वदर्शनान्तःपातिभिरित्येव ।
आयुर्वेदशास्त्रने भी वेदोक्त विषयोंका विधान किया है । जैसे, "शत-
कृत्वो गायत्रीमभ्यस्य नीरुग् भवति" ऐसा आयुर्वेदशास्त्रमें लिखा है।
तथा वह गायत्री वेदका ही अंश है न कि बौद्ध आगमोंका । यह
परिग्रहका तीसरा अर्थ है ।
उक्त तीनों प्रकारके परिग्रहोंमें महाजनोंद्वारा वेदार्थानुष्ठानरूप
प्रथम परिग्रह इस प्रकार है—जैसे, ऐसा कोई भी दर्शन नहीं है,
जिसको माननेवाला व्यक्ति वैदिक क्रियाका अनुष्ठान न करता हो ।
यहाँ तक कि ब्रह्मातिरिक्त सब विषयको अविद्याकल्पित कहनेवाले
वेदान्ती जन भी गर्भाधानसे लेकर अन्त्येष्टि तक वैदिक क्रियाओंको नहीं
करते हैं, ऐसी बात नहीं है । या कोई भी दार्शनिक जन वेदोक्त
स्पृश्यास्पृश्यविभागको न स्वीकार करता हो अथवा अस्पृश्यस्पर्शरूप
व्यतिक्रम हो जानेपर आचमन-स्नान आदि प्रायश्चित्त न करता हो,
यह बात नहीं है ।
यदि कहो कि—सभी दर्शनोंके सभी व्यक्ति तो वैदिक क्रियाओंका
अनुष्ठान नहीं करते हैं—तो ऐसा भले ही मत हो । क्योंकि सभी रोगी
दवाका सेवन नहीं करते इससे वह शास्त्र महाजनपरिगृहीत नहीं है,
ऐसा नहीं हो जाता । किन्तु महाजनपरिगृहीत इतने ही से हो जाता
है कि सभी दर्शनोंके अधिकांश लोग वेदोक्त अर्थोंका अनुष्ठान करते
हैं । "फिर भी सभी वैदिक विधानोंका अनुष्ठान तो वे लोग भी नहीं
करते" यदि ऐसा कहो तो, भले ही वैसा न हो, उससे कोई क्षति नहीं
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