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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 483, कुल 530 में से

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पृष्ठ 483

अनुपलब्धिवादः ४३१
सम्भवो वाक्यत्वात् । तस्मादतीन्द्रियार्थदर्शिपूर्वकोऽयमिति
परिशेषः । तथा चानेन दृष्टान्तेन महाजनपरिगृहीतत्वाद्
वेदा अपि सर्वज्ञपूर्वका इत्युन्नीयते ।
ननु महच्छब्दोऽत्र यदि प्रामाणिकवचनस्तदा सन्दिग्धा-
सिद्धविशेषणो हेतुः । अथ बह्वर्थः ? तदा सुगताद्यागमैरनै-
कान्तः । तेषामपि वा सर्वज्ञपूर्वकत्वं१ मिति चेत्, न, बहुत्वा-
तिशयस्य विवक्षितत्वात् ।
यह भी सम्भव नहीं है कि नित्य होनेके कारण आगम किसो
मूलकी अपेक्षा किये बिना स्वयं ही प्रमाण होगा—क्योंकि वाक्य होनेके
कारण अन्य वाक्योंकी तरह वह भी अनित्य ही है । इसलिये
परिशेषात् यही सिद्ध होता है कि यह आयुर्वेदका योग किसी अतीन्द्रि-
यार्थ दर्शीके द्वारा ही व्यक्त किया गया है । इसप्रकार इस आयुर्वेदके
दृष्टान्तसे महाजनद्वारा परिगृहीत होनेके कारण ऋगादिवेद भी सर्वज्ञके
ही बनाये हुए हैं, ऐसी कल्पना की जाती है । अर्थात् वेदोंका कर्ता
सर्वज्ञ ईश्वर सिद्ध हो जाता है ।
यहाँ यह विकल्प उठता है कि—'महाजन' इस पदमें महत्पद
प्रामाणिक अर्थमें है ? अथवा बहुत्वरूप संख्याके अर्थमे है ? यदि
यहाँ महत्पद प्रामाणिकवाचक है तो महाजनपरिगृहीतत्वरूप हेतु
सन्दिग्धासिद्ध विशेषणवाला हो जाता है । अर्थात् उक्त हेतुका
विशेषण जो महत्त्व है, वही सन्दिग्ध है । क्योंकि महाजनपदसे
आप मनु आदिको लेते हैं, किन्तु उनमें प्रामाणिकत्वका सन्देह है ।
यदि महत्शब्दका दूसरा अर्थ बहुत्वरूप संख्या हो, तब बुद्धादिके
आगमोंको लेकर व्यभिचारदोष हो जायगा । क्योंकि बहुत जनोंके
द्वारा स्वीकृत होनेपर भी न्याय उन्हें सर्वज्ञ-प्रणीत नहीं मानता है ।
अथवा बुद्धादिके आगमोंको भी सर्वज्ञ-प्रणीत मानना होगा—किन्तु
उक्त विकल्प हमारे हेतुके सम्बन्धमें नहीं उठ सकता है । क्योंकि यहाँ
महत्पदसे बहुत्वका अतिशय अभिप्रेत है । अर्थात् अतिशयको प्राप्त
हुए बहुत जनोंके द्वारा परिगृहीत होनेके कारण वेद सर्वज्ञ प्रणीत हैं ।
१. 'सर्वदर्शानवक्तृभिः परिगृहीतत्वमित्यर्थ' इति कलिकातामुद्रिते टिप्पणी ।