आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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मर्हति, अतिप्रसङ्गात् ।
न चान्वयव्यतिरेकभावोऽस्य मूलम्, आवापोद्वापेन
योगानामानन्त्यादर्वाचीनेनाशक्यत्वात् । विषादौ तथाकरणे
बहुतरानर्थप्रसङ्गात् । कः प्रेक्षावाननाकलितावस्तुतत्त्वः पाटन-
प्लोषणच्छेदनक्षारणशिरावेधनलङ्घनादि योग्यायै¹ कारयेत्,
कुर्याद् वा ।
न चोपदेशस्योपदेशपारम्पर्यमात्रं मूलम्, अवश्यमुपदेशस्य
क्वचित् प्रमाणे विश्रान्तेरिति हि न्यायैः । न च नित्यागम-
निर्दोषता) आ जाता है, तब ही उस आयुर्वेदिक प्रयोगसे ही आरोग्य-
रूप फलकी सिद्धि हो जाती है। इसप्रकार सर्वविदित आयुर्वेदकी
प्रमाणता निर्मूल नहीं हो सकती । क्योंकि तब निर्मूल अनाप्तवाक्य
भी प्रमाण होने लगेंगे ।
अन्वय और व्यतिरेकको आयुर्वेदके प्रामाण्यका मूल नहीं कहा जा
सकता। क्योंकि जड़ियोंके आवाप (प्रक्षेप) और उद्वाप (उत्क्षेप) के
द्वारा आयुर्वेदिक योगोंके अनन्त प्रकारके हो जानेके कारण हम लोगोंके
द्वारा रोगोंके प्रति उनके अन्वयव्यतिरेकका प्रत्यक्ष करना सर्वथा अशक्य
है। साथ ही विषादिके सम्बन्धमे स्वय प्रत्यक्ष करनेमे प्राणनाश आदि
अनेक प्रकारके अनर्थोंकी भी आपत्ति हो जायगी। क्योंकि कौन ऐसा
बुद्धिमान् होगा जो वस्तुस्थितिको जाने बिना केवल परीक्षाके लिये
अपने आपके ऊपर पाटन, प्लोषण, छेदन, क्षारण, शिरोवेधन तथा
लङ्घन आदि प्रयोगोंको दूसरोंसे करायेगा या स्वयं करेगा ?
यह भी नहीं हो सकता कि—आयुर्वेदिक उपदेशका मूल अन्वय-
व्यतिरेक नहीं है किन्तु उपदेशकी पूर्वपरम्परा ही उसका मूल है—
क्योंकि अन्ततोगत्वा उस पूर्ववर्ती उपदेशको भी नियमतः किसी प्रमाणमें
ही विश्रान्त मानना पड़ेगा। अर्थात् प्राथमिक उपदेशकत्र्ताके द्वारा
किये गये साक्षात्कारको ही परवर्ती उपदेशके प्रामाण्यका मूल
मानना पड़ेगा।
१. योग्यायै = शिक्षायै इति दीधिति ।