आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअनुपलब्धवादः ४२९
चेत्, न, यस्य कार्यस्य यत् कारणमन्वयव्यतिरेकसिद्धं तत्का-
रणाधिष्ठानयोः स्थूलसिद्ध्यर्थं तदवयवपरम्पराकारणाधिष्ठान-
वदवश्यम्भावनियमात् । न च सर्वत्र कार्ये कायः कारणमिति
प्रागुपेक्षितः । पितृत्वाद् वोपदेशानुमानम् ।
तथापि कतम आगमस्तेन प्रणीत इति चेत्, वेदायूर्वेदा-
दिरित्यरिकरिकर्णज्वरः सिंहनादः । तथाहि, न तावदयमा-
युर्वेदोऽप्रमाणम्, संवादस्य प्रामिकत्वात् । विसंवादस्य
काकतालीयतया कर्तृकर्मसाधनवैगुण्यहेतुकत्वात् । पुनस्तत्-
साद्गुण्ये तत एव फलसिद्धेः । न च निर्मूलस्तथा भवितु-
भी ईश्वर नहीं हो सकता है—तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि जिस
कार्यका जो कारण अन्वय व्यतिरेक द्वारा सिद्ध है, उस कारणकी तथा
उसके अधिष्ठाताकी सत्ता वैसे ही अनिवार्य है, जैसे स्थूल अवयवीकी
सिद्धिके लिये उसके अवयवधारारूप कारण एवं उसके अधिष्ठाताकी
सत्ता अनिवार्यरूपसे सिद्ध होती है । किन्तु सभी कार्यके प्रति शरीर
कारण नहीं होता, इसीलिये पूर्वमें द्व्यणुकादि उत्पन्न करनेमे अथवा
अङ्कुरादि उत्पन्न करनेमे ईश्वरको शरीरका होना अस्वीकार कर दिया
गया है । अथवा जगत्का पिता होनेके कारण लौकिक पिताके समान
जीवरूप पुत्रके प्रति ईश्वरीय उपदेशके रूपमे वेदका अनुमान करते हैं ।
क्योंकि जो पिता होता है, वह अपने पुत्रको हिताहितका उपदेश करता
ही है, यह व्याप्ति है ।
फिर यदि पूछो कि—ईश्वरने कौनसा आगम बनाया ?—तो “वह
वेद-आयुर्वेद आदिक ही आगम है, जिसका ईश्वरने प्रणयन किया”
ऐसा शत्रुरूपी हाथीको कर्णज्वर उत्पन्न कर देनेवाला हमारा सिंहनाद है ।
कारण, यह आयुर्वेद अप्रमाण नहीं है । क्योंकि आयुर्वेदकी सफल
प्रवृत्तिजनकता प्रायः देखी जाती है । अर्थात् आयुर्वेदका प्रयोग प्रायः
निष्फल नहीं होता । यदि कहीं उसकी निष्फलता देखी भी जाती है,
तो वह काकतालीय है तथा कर्ता, कर्म एवं साधनके वैगुण्यके कारण
है । पुनः जब ही कर्ता, कर्म एवं साधनमें साद्गुण्य (गुणवत्ता या