आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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कोऽतिशयः ? सर्वदर्शनान्तःपातित्वम् । कस्तैः परि-
ग्रहः ? तदर्थानुष्ठानं, स्वीकृतव्यवहारव्याकरणादिपालनी-
यत्वं, स्वीकृतप्रामाण्यायुर्वेदादिस्वीकृतार्थत्वं च ।
(प्रश्न)—अतिशय क्या है ?
(उत्तर)—सभी दर्शनोंके अन्त:पाती होना अतिशय है । अर्थात्
न्याय मीमांसा प्रभृति जितने भी दर्शन हैं, उनमें प्रतिपादित
स्वर्गापवर्गादि मुख्य विषयोंको स्वीकार करनेवाले जन ही
अतिशय को प्राप्त हुए महाजन हैं । अथवा न्याय आदि
दर्शनोंका ज्ञान ही अतिशय है । सौगतादि दर्शनाभास
हैं न कि दर्शन हैं, अत उनका ज्ञान अतिशय नहीं है ।
(प्रश्न)—अतिशयको प्राप्त न्यायादिके ज्ञाता बहुत जनोंद्वारा किया
जानेवाला परिग्रह क्या वस्तु है ?
(उत्तर)—निषेक प्रभृति वैदिक अर्थोंका उन सभीकेद्वारा अनुष्ठान
किया जाता है, इसलिये वेद महाजन परिगृहीत हुए ।
बौद्धादि-आगमोंमें प्रतिपादित मण्डलीकरण केशोल्लुञ्चन
प्रभृति अर्थोंका अनुष्ठान उन महाजनोंद्वारा नहीं होता है,
अत वे आगम महाजन परिगृहीत नहीं हुए । इसीलिये
महाजन परिगृहीतत्वहेतुसे वेदको सर्वज्ञ-प्रणीत सिद्ध
करनेमें बौद्ध आगमोंको लेकर व्यभिचारदोष नहीं
आयेगा । और न उन आगमोंका सर्वज्ञ प्रणीत होना
सिद्ध होगा । परिग्रहका यह एक अर्थ है ।
परिग्रहका दूसरा अर्थ यह है कि जिन पाणिन्यादि-प्रणीत
व्याकरणोंका प्रामाण्य सभी मानते हैं, उन व्याकरणोंद्वारा
हमारे वेदके विशेष विशेष पदोंका व्युत्पादन किया गया
है । इसलिये भी हमारे वेद महाजनपरिगृहीत हुए ।
इसप्रकार पाणिन्यादि व्याकरणद्वारा तुम्हारे आगमके
विशेषपदोंका साधन नहीं किया गया है, इसलिये भी वे
महाजन परिगृहीत नहीं हैं ।
एव, जिस आयुर्वेदशास्त्रका प्रामाण्य सभीने स्वीकार किया है, उस