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आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

८४ आत्मतत्त्वविवेके
ऽपि सहकार्यसन्निधेर्न कुर्यान्न जानीयात्। तत्र प्रथममिष्यते,
कार्यस्य कालदेशनियमोपलम्भात्।
द्वितीयस्तु सम्भवेदपि यदि कार्यमस्य ज्ञानं स्यात्, न च
तत्तथा। कथमिति चेत्, शरीरापाये तदाश्रितानामिन्द्रियादीना-
मपायात्।
न चान्वयव्यतिरेकसिद्धहेतुभावस्याभावेऽपि हेत्वन्तरात्
कार्यजन्म, निर्हेतुकत्वप्रसङ्गात्। न चाहेतुकं कार्यं नाम।
जातिनियत होती है। इसलिये एक आत्मामें सब कार्यके करने या
जाननेमें भले ही व्यभिचार हो, फिर भी लाघववश आत्मत्वरूपसे ही
कार्यमात्रको करने या जाननेमें आत्माको योग्य माना जाता है। अकेले
करने या जाननेमें समर्थ होता हुआ भी सहकारीका सन्निधान नहीं होने-
के कारण ही नहीं करेगा और नहीं जानेगा। यहाँ ईश्वरके सम्बन्धमें
पहली बात तो मानते हैं, क्योंकि किसी कार्यकी उत्पत्तिमें काल और
देशका नियम देखा जाता है। अर्थात् कोई भी कार्य किसी नियत
काल देश (स्थान) में ही उत्पन्न होता है। अतः जबतक वह समय
और स्थान नहीं प्राप्त होगा तबतक समर्थ होता हुआ भी ईश्वर उस
कार्यको नहीं करेगा।
द्वितीय बात तो संभव भी होती यदि ईश्वरीय ज्ञान कार्य (जन्य)
होता। अर्थात् जन्यज्ञान ही सहकारीके असन्निधानमें नहीं हो सकेगा।
ईश्वरीयज्ञान तो जन्य है नहीं किन्तु नित्य है। यदि पूछो कि-ईश्वर-
का ज्ञान जन्य क्यों नहीं है? तो इसलिये कि शरीरके नहीं होनेसे
शरीराश्रित इन्द्रियोंका ईश्वरमें अभाव है और ज्ञान उत्पन्न होनेके हेतु
इन्द्रियाँ ही हैं।
और यह भी नहीं हो सकता है कि-जिनकी (इन्द्रियोंकी) हेतुता
अन्वय व्यतिरेकसे सिद्ध है, उनके अभावमें भी अन्य हेतुसे कार्यकी
(ज्ञानकी) उत्पत्ति हो जाय--क्योंकि अन्वय व्यतिरेकसे सिद्ध हेतुके
अभावमें भी कार्यकी उत्पत्ति होनेपर वह ज्ञानादि कार्य निर्हेतुक हो
जायगा। जब कि संसारमें कोई भी कार्य अहेतुक (बिना हेतुका)

अनुपलम्भवादः ४२५
ततः सिद्धैवास्य ज्ञानचिकीर्षाप्रयत्नशक्तिर्यद्गोचरा तज्जातीय-
समस्तगोचरेति सार्वज्ञ्यसिद्धिः ।
शरीरापाय एव कथमिति चेत् , दृश्यस्य प्रत्यक्षबाधित-
तत्त्वात् , अदृश्यस्यापि सावयवतया मूर्ततया च निबिडतर-
पाषाणमध्यवर्त्तिनि भेकादौ¹ कार्ये कर्त्तव्ये नाभग्नस्य प्रवेशः ।
न च परमाणुरूपं तच्छरीरम् , अनन्तरालत्वेन निर्मनस्कतया
इन्द्रियाश्रयत्वानुपपत्तेः । न च बहिर्वृत्ति मनो ज्ञानजननोप-
योगि, शरीरवैयर्थ्यप्रसङ्गात् ।
नहीं होता । इसलिये ईश्वरकी ज्ञानशक्ति, चिकीर्षाशक्ति और
प्रयत्नशक्ति स्वतः सिद्ध अर्थात् नित्य ही है । तथा वह ज्ञानादिशक्ति
यद्विषयक होती है, वह उस जातिकी समस्त वस्तुओंको विषय करती
है । इस प्रकार ईश्वरमे सर्वज्ञताकी सिद्धि हो जाती है ।
यदि पूछो कि—ईश्वरको शरीराभाव ही क्यों है ?—तो इसलिये कि
ईश्वरमें दृश्य शरीरका होना प्रत्यक्षप्रमाणसे बाधित है । यदि अदृश्य
शरीर हो तो उस शरीरके सावयव और मूर्त होनेके कारण अत्यन्त
सघन पत्थरके भीतर रहनेवाले मेंढक आदिको पैदा करनेके
ईश्वरका वह अदृश्य शरीर भग्न हुए बिना पत्थरमें प्रविष्ट नहीं हो
सकेगा । यह भी नहीं कह सकते कि—परमाणुरूप वह शरीर है,
इसलिये पत्थरमें प्रवेशके लिये उसके भङ्गका प्रसङ्ग नहीं आता—क्योंकि
परमाणुरूप शरीरके निश्छिद्र होनेके कारण उसमें मन नहीं रह सकेगा
तथा शरीरका इन्द्रियाश्रयत्वरूप लक्षण उसमें नहीं मिल सकेगा । यह
भी नहीं हो सकता कि—शरीरके अन्दर बिना रहे ही बाहर ही रहता
हुआ मन ज्ञानादिकार्य करने मे उपयोगी होगा—क्योंकि उस स्थितिमें
शरीरका मानना ही व्यर्थ हो जायगा । अर्थात् शरीरकी यही उपयोगिता
है कि मन आदि इन्द्रिया उसमें रहती हुईं कार्य उत्पन्न कर सकें ।
अतः शरीरके बाहर मनका रहना माना जाय तो शरीर मानना व्यर्थ
होगा ।
१. भेकशरीरादौ इति १ पु० पा०

४२६ आत्मतत्त्वविवेके
न च दविष्ठ एव सूर्यादिस्तत् कुर्यादिति साम्प्रतम्,
कारकानधिष्ठानात्, शरीरस्य तदायतनतया प्रयत्नस्याव्या-
पकत्वात् । तथापि व्यापकत्वे त्वसमवायिकारणानुरोधेना-
कारणकतया तदेव नित्यत्वम् ।
न चोद्देशमात्रसम्बन्धेन क्रियाहेतुत्वम्, अस्मदादिप्रयत्न-
स्यापि तथाभावप्रसङ्गात् ।
यह भी नहीं कह सकते कि—ईश्वरीय-शरीरको पाषाणाभ्यन्तर
प्रवेशकी आवश्यकता नहीं है किन्तु अतिदूरवर्ती सूर्यादि शरीरसे ही
वह पाषाण मध्यवर्ती मेढक आदिको उत्पन्न करेगा—क्योंकि तब वह
मेढकको उत्पन्न करनेवाले कारकोंका अधिष्ठाता नहीं हो सकेगा।
अर्थात् उनमें व्यापारका आधान नहीं कर सकेगा। क्योंकि उन कारकों
का स्थान वह मेढक शरीर है, तथा ईश्वरीय प्रयत्नका स्थान दूरवर्ती
सूर्यादिका शरीर होनेसे ईश्वरीय प्रयत्न अव्यापक है। अर्थात् मेढक-
शरीरको उत्पन्न करनेवाले कारकों तक ईश्वरीय प्रयत्नके नहीं पहुँच
सकनेके कारण सूर्यादिशरीरगत ईश्वरीय प्रयत्नसे पाषाणान्तर्गत कारकों
में व्यापार नहीं हो सकेगा तथा व्यापारके अभावमें पाषाणके भीतर
मेढकशरीरकी उत्पत्ति नहीं हो सकेगी।
तथापि यदि ईश्वरीय प्रयत्नको व्यापक मानो अर्थात् सूर्यपदसे
नित्य एव व्यापक प्रयत्नोंसे युक्त ईश्वर ही लो—तो व्यापक होनेके कारण
उस ईश्वरीय प्रयत्नके प्रति कोई (द्रव्यसंयोग) असमवायिकारण
अपेक्षित नहीं होगा। अतः असमवायिकारणके अभावमें सर्वथा कारण
रहित होनेके कारण ही ईश्वरका प्रयत्नादि नित्य सिद्ध हो जाता है।
ऐसा नहीं हो सकता कि—सूर्यादिरूप ईश्वरीय शरीरके दूरवर्ती
होनेपर भी केवल इच्छाका विषय होनेके कारण ही अव्यापक भी
ईश्वरीय प्रयत्न पाषाणान्तर्गत मेढकको उत्पन्न करनेवाले कारकोंमें क्रिया
उत्पन्न कर देगा—क्योंकि यदि ऐसा हो तो हमारा भी प्रयत्न इच्छामात्र
से दूरवर्ती कारकोंमे क्रिया उत्पन्न करने लगेगा। अर्थात् इच्छामात्रसे
दूरवर्ती कुम्भकार भी चक्रादि चलाकर घट उत्पन्न करने लग जायेगा,
जो प्रत्यक्षबाधित है।

अनुपलब्धवादः ४२७

न च संयुक्तसंयोगादधिष्ठानम् , साक्षादधिष्ठानस्य विव-
क्षितत्वात् । विपापनोदादौ कथमिति¹ चेत्, न, तत्रास्मदादे-
र्ज्ञानमात्रं प्रति यत्नस्याविरोधात् । विपापनोदादौ तु तत्रत्यो
यत्नः क्रियाहेतुरिति ।
सर्गादौ तु न शरीरगन्धोऽपीति सर्वथा कलेवरविगमाद-
कारणतया बुद्धेः सर्वज्ञत्वमनिवायं विश्वेषां कर्तुरेकस्येति ।
“संयुक्त-संयोगसे भी ईश्वर पाषाणान्तर्गत भेकको उत्पन्न करनेवाले
कारकोंका अधिष्ठाता नहीं हो सकता। अर्थात् सूर्यादिरूप ईश्वरीय-
शरीरसे संयुक्त आकाश है तथा उस आकाशसे सयुक्त भेकजनक
कारकचक्र होगा, इसप्रकार परम्परा ईश्वर उन कारकोंका अधिष्ठाता हो
जायगा” यह भी नहीं हो सकता। क्योंकि वस्तुको उत्पन्न करनेके
लिये कारकोंका साक्षात् अधिष्ठाता होना ही अपेक्षित है न कि
परम्परा। यदि पूछो कि—विषादिको हटानेमें गारुडिक दूरसे ही कैसे
अधिष्ठाता हो जाता है?—तो ऐसा नहीं कह सकते। क्योंकि वहाँ
गरुडदेवताके ज्ञानमात्रके प्रति दूरवर्ती हमारे प्रयत्नके कारण होनेमें
कोई विरोध नहीं हैं। अर्थात् वहाँ गारुडिकद्वारा किये गये मन्त्र-
पाठादिसे गरुडदेवताको सर्पद्वारा काटे गये व्यक्तिका ज्ञान हो जाता
है और वह व्यक्ति जी जाता है। अतः दूरवर्ती प्रयत्नसे दूरवर्तीको
ज्ञान होनेमें कोई विरोध नहीं है। किन्तु विष उतरनेका जहाँ तक
प्रश्न है, वहाँ तो मन्त्रादिपाठके सहकारी अथवा मन्त्रादिपाठसे अदृष्ट-
के सहकारी किसी अन्यका अर्थात् ईश्वरका ही प्रयत्न, जो विषावतरण
स्थलमे ही है, विषके उतरनेका हेतु है।
किन्तु सृष्टिके पूर्वमे तो सूर्यादिशरीरकी गन्ध भी नहीं हे कि ईश्वर
उसकेद्वारा भी अधिष्ठाता होकर सृष्टि कर सकेगा। इसलिये सर्वथा
ही शरीररहित होनेके कारण ईश्वरीयज्ञान किसी हेतुसे उत्पन्न हुआ
नहीं सिद्ध होता, अतः विश्वके कर्ता ईश्वरका सर्वज्ञ होना अनिवार्य है।
अर्थात् ईश्वर विना शरीरके ही अधिष्ठाता है, यह बात सिद्ध हो जाती
है। तथा उसमें ज्ञानका कारण शरीर नहीं होनेसे शरीरके अधीन
१ 'शरीरस्य दूरस्थत्वादिति भावः' इति कलिकातामुद्रिते टिप्पणी ।

४२८ आत्मतत्त्वविवेके
अस्तु तावदसौ सर्वज्ञः कर्ता, वक्ता तुकथमिति चेत्,
न, बचनशक्तौ सत्यां परार्थैकतानत्वात् । यो हिताहितविभागं
विद्वान्, परार्थाभिप्रायः सन्(स)स्थानकरणपाटवे सत्यविदुषेऽ-
वश्यमुपदिशेत्, यथा अन्धाय दक्षिणेन याहि वामेन मा गाः
इति पृथग्जनोऽपि, तथा भगवानिति ।
स्थानकरणपाटवमसिद्धं देहाभावात्, तेषां ताल्वादिविवृ-
त्तादिरूपत्वात् । न च तदन्तरेण वर्णनिष्पत्तिः, तदुत्पत्ते-
रवधारणात् ।
न च तत्कारणान्यनधितिष्ठतः तत्कर्तृत्वमीश्वरस्यापीति
होनेवाला विषयविशेषका प्रतिबन्ध (नियम) भी हट जाता है।
इसप्रकार ईश्वरकी सर्वज्ञता स्वतः सिद्ध हो जाती है।
ईश्वरमे वेदवक्तृत्वसिद्धि
यदि कहो कि—जगत्‌का कर्त्ता सर्वज्ञ भले ही हो, किन्तु वेदका
वक्ता वह कैसे है?—तो ऐसा नहीं कह सकते। क्योंकि ईश्वरमें बचन
की शक्ति है तथा वह परार्थमें ही सदा निरत है, इसलिये वह वेदका
उपदेश करता है। क्योंकि जो हित और अहितके विभागको जानता
है, तथा जिसके कण्ठ-तालु आदि स्थान एव संवृत-विवृत आदि प्रयत्न
ठीक हैं, वह परोपकारके अभिप्रायसे अज्ञानी व्यक्तिको अवश्य ही
उपदेश देगा। जैसे, किसी अन्धे व्यक्तिको "दाहिनेसे जावो बायेंसे
मत जावो" ऐसा पामर जन भी उपदेश देता है। इसीप्रकार भगवान्
भी अज्ञानी जनके लिये उपदेश करता है।
यदि कहो कि—ईश्वरको देह नहीं होनेसे उसमें स्थान और प्रयत्न
की पटुता असिद्ध है। क्योंकि तालु आदिक ही स्थान है और उसका
विवृत आदि होना ही प्रयत्न है, जो ईश्वरमें नहीं है। एव, स्थान-
प्रयत्नके अभावमें ककारादिवर्णोंकी उत्पत्ति नहीं हो सकती है। क्योंकि
वर्णोत्पत्ति और तालु आदि स्थानोंमे कार्यकारणभावका निश्चय है।
वर्णोत्पत्तिके कारणभूत ताल्वादिका अधिष्ठाता हुए विना वर्णोंका कर्त्तृ...

अनुपलब्धवादः ४२९

चेत्, न, यस्य कार्यस्य यत् कारणमन्वयव्यतिरेकसिद्धं तत्का-
रणाधिष्ठानयोः स्थूलसिद्ध्यर्थं तदवयवपरम्पराकारणाधिष्ठान-
वदवश्यम्भावनियमात् । न च सर्वत्र कार्ये कायः कारणमिति
प्रागुपेक्षितः । पितृत्वाद् वोपदेशानुमानम् ।
तथापि कतम आगमस्तेन प्रणीत इति चेत्, वेदायूर्वेदा-
दिरित्यरिकरिकर्णज्वरः सिंहनादः । तथाहि, न तावदयमा-
युर्वेदोऽप्रमाणम्, संवादस्य प्रामिकत्वात् । विसंवादस्य
काकतालीयतया कर्तृकर्मसाधनवैगुण्यहेतुकत्वात् । पुनस्तत्-
साद्गुण्ये तत एव फलसिद्धेः । न च निर्मूलस्तथा भवितु-
भी ईश्वर नहीं हो सकता है—तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि जिस
कार्यका जो कारण अन्वय व्यतिरेक द्वारा सिद्ध है, उस कारणकी तथा
उसके अधिष्ठाताकी सत्ता वैसे ही अनिवार्य है, जैसे स्थूल अवयवीकी
सिद्धिके लिये उसके अवयवधारारूप कारण एवं उसके अधिष्ठाताकी
सत्ता अनिवार्यरूपसे सिद्ध होती है । किन्तु सभी कार्यके प्रति शरीर
कारण नहीं होता, इसीलिये पूर्वमें द्व्यणुकादि उत्पन्न करनेमे अथवा
अङ्कुरादि उत्पन्न करनेमे ईश्वरको शरीरका होना अस्वीकार कर दिया
गया है । अथवा जगत्का पिता होनेके कारण लौकिक पिताके समान
जीवरूप पुत्रके प्रति ईश्वरीय उपदेशके रूपमे वेदका अनुमान करते हैं ।
क्योंकि जो पिता होता है, वह अपने पुत्रको हिताहितका उपदेश करता
ही है, यह व्याप्ति है ।
फिर यदि पूछो कि—ईश्वरने कौनसा आगम बनाया ?—तो “वह
वेद-आयुर्वेद आदिक ही आगम है, जिसका ईश्वरने प्रणयन किया”
ऐसा शत्रुरूपी हाथीको कर्णज्वर उत्पन्न कर देनेवाला हमारा सिंहनाद है ।
कारण, यह आयुर्वेद अप्रमाण नहीं है । क्योंकि आयुर्वेदकी सफल
प्रवृत्तिजनकता प्रायः देखी जाती है । अर्थात् आयुर्वेदका प्रयोग प्रायः
निष्फल नहीं होता । यदि कहीं उसकी निष्फलता देखी भी जाती है,
तो वह काकतालीय है तथा कर्ता, कर्म एवं साधनके वैगुण्यके कारण
है । पुनः जब ही कर्ता, कर्म एवं साधनमें साद्गुण्य (गुणवत्ता या

४३२ आत्मतत्त्वविवेके
कोऽतिशयः ? सर्वदर्शनान्तःपातित्वम् । कस्तैः परि-
ग्रहः ? तदर्थानुष्ठानं, स्वीकृतव्यवहारव्याकरणादिपालनी-
यत्व, स्वीकृतप्रामाण्यायुर्वेदादिस्वीकृतार्थत्वं च ।
( प्रश्न )—अतिशय क्या है ?
( उत्तर )—सभी दर्शनोंके अन्तःपाती होना अतिशय है । अर्थात्
न्याय मीमांसा प्रभृति जितने भी दर्शन हैं, उनमें प्रतिपादित
स्वर्गापवर्गादि मुख्य विषयोंको स्वीकार करनेवाले जन ही
अतिशय को प्राप्त हुए महाजन हैं। अथवा न्याय आदि
दर्शनोंका ज्ञान ही अतिशय है । सौगतादि दर्शनाभास
हैं न कि दर्शन हैं, अतः उनका ज्ञान अतिशय नहीं है।
( प्रश्न )—अतिशयको प्राप्त न्यायादिके ज्ञाता बहुत जनोंद्वारा किया
जानवाला परिग्रह क्या वस्तु है ?
( उत्तर )—निषेक प्रभृति वैदिक अर्थोंका उन सभीकेद्वारा अनुष्ठान
किया जाता है, इसलिये वेद महाजन परिगृहीत हुए ।
बौद्धादि आगमोंमें प्रतिपादित मण्डलीकरण केशोल्लुञ्चन
प्रभृति अर्थोंका अनुष्ठान उन महाजनोंद्वारा नहीं होता है,
अतः वे आगम महाजन परिगृहीत नहीं हुए । इसीलिये
महाजन परिगृहीतत्वहेतुसे वेदको सर्वज्ञ प्रणीत सिद्ध
करनेमें बौद्ध आगमोंको लेकर व्यभिचारदोष नहीं
आयेगा । और न उन आगमोंका सर्वज्ञ प्रणीत होना
सिद्ध होगा । परिग्रहका यह एक अर्थ है ।
परिग्रहका दूसरा अर्थ यह है कि जिन पाणि-यादि प्रणीत
व्याकरणोंका प्रामाण्य सभी मानते हैं उन व्याकरणोंद्वारा
हमारे वेदके विशेष विशेष पदोंका व्युत्पादन किया गया
है । इसलिये भी हमारे वेद महाजनपरिगृहीत हुए ।
इसप्रकार पाणि-यादि व्याकरणद्वारा तुम्हारे आगमके
विशेषपदोंका साधन नहीं किया गया है, इसलिये भी वे
महाजन परिगृहीत नहीं हैं ।
एव, जिस आयुर्वेदशास्त्रका प्रामाण्य सभीने स्वीकार किया है, उस

तथाहि, नास्त्येव तद्दर्शनं यत्र सांप्रतमित्युक्त्वापि गर्भा-
धानाद्यन्त्येष्टिपर्यन्तां वैदिकीं क्रियां जनो नानुतिष्ठति, स्पृश्या-
स्पृश्यादिविभागं वा नानुमनुते, व्यतिक्रमे चाऽऽचमनादि-
प्रायश्चित्तं वा नानुतिष्ठति ।
न सर्वत्र सर्वो जन एवमिति चेत्, मा भूत । न हि सर्वै
रोगिभिरायुर्वेदार्थो नानुष्ठीयत इति न तस्य महाजनपरिग्रहः,
अपि तु सर्वदर्शनान्तःपातिभिरित्येव ।
आयुर्वेदशास्त्रने भी वेदोक्त विषयोंका विधान किया है । जैसे, "शत-
कृत्वो गायत्रीमभ्यस्य नीरुग् भवति" ऐसा आयुर्वेदशास्त्रमें लिखा है।
तथा वह गायत्री वेदका ही अंश है न कि बौद्ध आगमोंका । यह
परिग्रहका तीसरा अर्थ है ।
उक्त तीनों प्रकारके परिग्रहोंमें महाजनोंद्वारा वेदार्थानुष्ठानरूप
प्रथम परिग्रह इस प्रकार है—जैसे, ऐसा कोई भी दर्शन नहीं है,
जिसको माननेवाला व्यक्ति वैदिक क्रियाका अनुष्ठान न करता हो ।
यहाँ तक कि ब्रह्मातिरिक्त सब विषयको अविद्याकल्पित कहनेवाले
वेदान्ती जन भी गर्भाधानसे लेकर अन्त्येष्टि तक वैदिक क्रियाओंको नहीं
करते हैं, ऐसी बात नहीं है । या कोई भी दार्शनिक जन वेदोक्त
स्पृश्यास्पृश्यविभागको न स्वीकार करता हो अथवा अस्पृश्यस्पर्शरूप
व्यतिक्रम हो जानेपर आचमन-स्नान आदि प्रायश्चित्त न करता हो,
यह बात नहीं है ।
यदि कहो कि—सभी दर्शनोंके सभी व्यक्ति तो वैदिक क्रियाओंका
अनुष्ठान नहीं करते हैं—तो ऐसा भले ही मत हो । क्योंकि सभी रोगी
दवाका सेवन नहीं करते इससे वह शास्त्र महाजनपरिगृहीत नहीं है,
ऐसा नहीं हो जाता । किन्तु महाजनपरिगृहीत इतने ही से हो जाता
है कि सभी दर्शनोंके अधिकांश लोग वेदोक्त अर्थोंका अनुष्ठान करते
हैं । "फिर भी सभी वैदिक विधानोंका अनुष्ठान तो वे लोग भी नहीं
करते" यदि ऐसा कहो तो, भले ही वैसा न हो, उससे कोई क्षति नहीं
२८

४३० आत्मतत्त्वविवेके
मर्हति, अतिप्रसङ्गात् ।
न चान्वयव्यतिरेकभावोऽस्य मूलम्, आवापोद्वापेन
योगानामानन्त्यादर्वाचीनेनाशक्यत्वात् । विषादौ तथाकरणे
बहुतरानर्थप्रसङ्गात् । कः प्रेक्षावाननाकलितावस्तुतत्त्वः पाटन-
प्लोषणच्छेदनक्षारणशिरावेधनलङ्घनादि योग्यायै¹ कारयेत्,
कुर्याद् वा ।
न चोपदेशस्योपदेशपारम्पर्यमात्रं मूलम्, अवश्यमुपदेशस्य
क्वचित् प्रमाणे विश्रान्तेरिति हि न्यायैः । न च नित्यागम-
निर्दोषता) आ जाता है, तब ही उस आयुर्वेदिक प्रयोगसे ही आरोग्य-
रूप फलकी सिद्धि हो जाती है। इसप्रकार सर्वविदित आयुर्वेदकी
प्रमाणता निर्मूल नहीं हो सकती । क्योंकि तब निर्मूल अनाप्तवाक्य
भी प्रमाण होने लगेंगे ।
अन्वय और व्यतिरेकको आयुर्वेदके प्रामाण्यका मूल नहीं कहा जा
सकता। क्योंकि जड़ियोंके आवाप (प्रक्षेप) और उद्वाप (उत्क्षेप) के
द्वारा आयुर्वेदिक योगोंके अनन्त प्रकारके हो जानेके कारण हम लोगोंके
द्वारा रोगोंके प्रति उनके अन्वयव्यतिरेकका प्रत्यक्ष करना सर्वथा अशक्य
है। साथ ही विषादिके सम्बन्धमे स्वय प्रत्यक्ष करनेमे प्राणनाश आदि
अनेक प्रकारके अनर्थोंकी भी आपत्ति हो जायगी। क्योंकि कौन ऐसा
बुद्धिमान् होगा जो वस्तुस्थितिको जाने बिना केवल परीक्षाके लिये
अपने आपके ऊपर पाटन, प्लोषण, छेदन, क्षारण, शिरोवेधन तथा
लङ्घन आदि प्रयोगोंको दूसरोंसे करायेगा या स्वयं करेगा ?
यह भी नहीं हो सकता कि—आयुर्वेदिक उपदेशका मूल अन्वय-
व्यतिरेक नहीं है किन्तु उपदेशकी पूर्वपरम्परा ही उसका मूल है—
क्योंकि अन्ततोगत्वा उस पूर्ववर्ती उपदेशको भी नियमतः किसी प्रमाणमें
ही विश्रान्त मानना पड़ेगा। अर्थात् प्राथमिक उपदेशकत्र्ताके द्वारा
किये गये साक्षात्कारको ही परवर्ती उपदेशके प्रामाण्यका मूल
मानना पड़ेगा।
१. योग्यायै = शिक्षायै इति दीधिति ।

अनुपलब्धिवादः ४३१
सम्भवो वाक्यत्वात् । तस्मादतीन्द्रियार्थदर्शिपूर्वकोऽयमिति
परिशेषः । तथा चानेन दृष्टान्तेन महाजनपरिगृहीतत्वाद्
वेदा अपि सर्वज्ञपूर्वका इत्युन्नीयते ।
ननु महच्छब्दोऽत्र यदि प्रामाणिकवचनस्तदा सन्दिग्धा-
सिद्धविशेषणो हेतुः । अथ बह्वर्थः ? तदा सुगताद्यागमैरनै-
कान्तः । तेषामपि वा सर्वज्ञपूर्वकत्वं१ मिति चेत्, न, बहुत्वा-
तिशयस्य विवक्षितत्वात् ।
यह भी सम्भव नहीं है कि नित्य होनेके कारण आगम किसो
मूलकी अपेक्षा किये बिना स्वयं ही प्रमाण होगा—क्योंकि वाक्य होनेके
कारण अन्य वाक्योंकी तरह वह भी अनित्य ही है । इसलिये
परिशेषात् यही सिद्ध होता है कि यह आयुर्वेदका योग किसी अतीन्द्रि-
यार्थ दर्शीके द्वारा ही व्यक्त किया गया है । इसप्रकार इस आयुर्वेदके
दृष्टान्तसे महाजनद्वारा परिगृहीत होनेके कारण ऋगादिवेद भी सर्वज्ञके
ही बनाये हुए हैं, ऐसी कल्पना की जाती है । अर्थात् वेदोंका कर्ता
सर्वज्ञ ईश्वर सिद्ध हो जाता है ।
यहाँ यह विकल्प उठता है कि—'महाजन' इस पदमें महत्पद
प्रामाणिक अर्थमें है ? अथवा बहुत्वरूप संख्याके अर्थमे है ? यदि
यहाँ महत्पद प्रामाणिकवाचक है तो महाजनपरिगृहीतत्वरूप हेतु
सन्दिग्धासिद्ध विशेषणवाला हो जाता है । अर्थात् उक्त हेतुका
विशेषण जो महत्त्व है, वही सन्दिग्ध है । क्योंकि महाजनपदसे
आप मनु आदिको लेते हैं, किन्तु उनमें प्रामाणिकत्वका सन्देह है ।
यदि महत्शब्दका दूसरा अर्थ बहुत्वरूप संख्या हो, तब बुद्धादिके
आगमोंको लेकर व्यभिचारदोष हो जायगा । क्योंकि बहुत जनोंके
द्वारा स्वीकृत होनेपर भी न्याय उन्हें सर्वज्ञ-प्रणीत नहीं मानता है ।
अथवा बुद्धादिके आगमोंको भी सर्वज्ञ-प्रणीत मानना होगा—किन्तु
उक्त विकल्प हमारे हेतुके सम्बन्धमें नहीं उठ सकता है । क्योंकि यहाँ
महत्पदसे बहुत्वका अतिशय अभिप्रेत है । अर्थात् अतिशयको प्राप्त
हुए बहुत जनोंके द्वारा परिगृहीत होनेके कारण वेद सर्वज्ञ प्रणीत हैं ।
१. 'सर्वदर्शानवक्तृभिः परिगृहीतत्वमित्यर्थ' इति कलिकातामुद्रिते टिप्पणी ।

४३२ आत्मतत्त्वविवेके
कोऽतिशयः ? सर्वदर्शनान्तःपातित्वम् । कस्तैः परि-
ग्रहः ? तदर्थानुष्ठानं, स्वीकृतव्यवहारव्याकरणादिपालनी-
यत्वं, स्वीकृतप्रामाण्यायुर्वेदादिस्वीकृतार्थत्वं च ।
(प्रश्न)—अतिशय क्या है ?
(उत्तर)—सभी दर्शनोंके अन्त:पाती होना अतिशय है । अर्थात्
न्याय मीमांसा प्रभृति जितने भी दर्शन हैं, उनमें प्रतिपादित
स्वर्गापवर्गादि मुख्य विषयोंको स्वीकार करनेवाले जन ही
अतिशय को प्राप्त हुए महाजन हैं । अथवा न्याय आदि
दर्शनोंका ज्ञान ही अतिशय है । सौगतादि दर्शनाभास
हैं न कि दर्शन हैं, अत उनका ज्ञान अतिशय नहीं है ।
(प्रश्न)—अतिशयको प्राप्त न्यायादिके ज्ञाता बहुत जनोंद्वारा किया
जानेवाला परिग्रह क्या वस्तु है ?
(उत्तर)—निषेक प्रभृति वैदिक अर्थोंका उन सभीकेद्वारा अनुष्ठान
किया जाता है, इसलिये वेद महाजन परिगृहीत हुए ।
बौद्धादि-आगमोंमें प्रतिपादित मण्डलीकरण केशोल्लुञ्चन
प्रभृति अर्थोंका अनुष्ठान उन महाजनोंद्वारा नहीं होता है,
अत वे आगम महाजन परिगृहीत नहीं हुए । इसीलिये
महाजन परिगृहीतत्वहेतुसे वेदको सर्वज्ञ-प्रणीत सिद्ध
करनेमें बौद्ध आगमोंको लेकर व्यभिचारदोष नहीं
आयेगा । और न उन आगमोंका सर्वज्ञ प्रणीत होना
सिद्ध होगा । परिग्रहका यह एक अर्थ है ।
परिग्रहका दूसरा अर्थ यह है कि जिन पाणिन्यादि-प्रणीत
व्याकरणोंका प्रामाण्य सभी मानते हैं, उन व्याकरणोंद्वारा
हमारे वेदके विशेष विशेष पदोंका व्युत्पादन किया गया
है । इसलिये भी हमारे वेद महाजनपरिगृहीत हुए ।
इसप्रकार पाणिन्यादि व्याकरणद्वारा तुम्हारे आगमके
विशेषपदोंका साधन नहीं किया गया है, इसलिये भी वे
महाजन परिगृहीत नहीं हैं ।
एव, जिस आयुर्वेदशास्त्रका प्रामाण्य सभीने स्वीकार किया है, उस

७ ... ४३३
तथाहि, नास्त्येव तद्दर्शनं यत्र सांवृतमित्युक्त्वापि गर्भा-
धानाद्यन्त्येष्टिपर्यन्तां वैदिकीं क्रियां जनो नानुतिष्ठति, स्पृश्या-
स्पृश्यादिविभागं वा नानुमनुते, व्यतिक्रमे चाऽऽचमनादि-
प्रायश्चित्तं वा नानुतिष्ठति ।
न सर्वत्र सर्वो जन एवमिति चेत्, मा भूत । न हि सर्वै
रोगिभिरायुर्वेदार्थो नानुष्ठीयत इति न तस्य महाजनपरिग्रहः,
अपि तु सर्वदर्शनान्तःपातिभिरित्येव ।
आयुर्वेदशास्त्रने भी वेदोक्त विषयोंका विधान किया है । जैसे, “शत-
कृत्वो गायत्रीमभ्यस्य नीरुग् भवति” ऐसा आयुर्वेदशास्त्रमे लिखा है ।
तथा वह गायत्री वेदका ही अंश है न कि बौद्ध आगमोंका ! यह
परिग्रहका तीसरा अर्थ है ।
उक्त तीनों प्रकारके परिग्रहोंमें महाजनोंद्वारा वेदार्थानुष्ठानरूप
प्रथम परिग्रह इस प्रकार है—जैसे, ऐसा कोई भी दर्शन नहीं है,
जिसको माननेवाला व्यक्ति वैदिक क्रियाका अनुष्ठान न करता हो ।
यहाँ तक कि ब्रह्मातिरिक्त सब विषयको अविद्याकल्पित कहनेवाले
वेदान्ती जन भी गर्भाधानसे लेकर अन्त्येष्टि तक वैदिक क्रियाओंको नहीं
करते हैं, ऐसी बात नहीं है । या कोई भी दार्शनिक जन वेदोक्त
स्पृश्यास्पृश्यविभागको न स्वीकार करता हो अथवा अस्पृश्यस्पर्शरूप
व्यतिक्रम हो जानेपर आचमन-स्नान आदि प्रायश्चित्त न करता हो,
यह बात नहीं है ।
यदि कहो कि—सभी दर्शनोंके सभी व्यक्ति तो वैदिक क्रियाओंका
अनुष्ठान नहीं करते हैं—तो वैसा भले ही मत हो । क्योंकि सभी रोगी
दवाका सेवन नहीं करते इससे वह शास्त्र महाजनपरिगृहीत नहीं है,
ऐसा नहीं हो जाता । किन्तु महाजनपरिगृहीत इतने ही से हो जाता
है कि सभी दर्शनोंके अधिकांश लोग वेदोक्त अर्थोंका अनुष्ठान करते
हैं । “फिर भी सभी वैदिक विधानोंका अनुष्ठान तो ये लोग भी नहीं
करते” यदि ऐसा कहो तो, भले ही वैसा न हो, उससे कोई क्षति नहीं
२८

४३४ आत्मतत्त्वविवेके

तथापि न सर्वो वेदार्थ एवमिति चेत्, मा भूत् । न हि
सर्वो वैद्यकार्थ एवमपि तु कश्चित् केनापि ।
एवं तर्हि सौगताद्यागमार्थोऽपि कश्चिदहिंसादिः सर्वदर्श-
नान्तःपातिभिरनुष्ठेयत एव कैश्चिदिति सोऽपि महाजनपरि-
गृहीतः स्यात्, न, सन्देहात् । किमयमहिंसादिर्वैदिक एवार्थो
बिडालव्रतन्यायेन श्रद्धाऽऽपादनाय शौद्धोदनिप्रभृतिभिरुप-
निबद्धः ? आहो स्वयं दृष्ट एवेति ? न तावत् स्वयं दृष्टः,
क्षपणकाद्यागमसाधारणत्वात् । यस्त्वसाधारणो मण्डली-
करणादिः केशोल्लुञ्चनादिर्वा, नासौ सर्वैरनुष्ठोयते । वैदिकस्तु
असाधारण एव निषेकादिस्तथेति ।


है ! क्योंकि आयुर्वेदोक्त सभी उपचारोंका अनुष्ठान सभी महाजन
नहीं करते किन्तु कोई किसीका ही अनुष्ठान करता है । वैसे ही वैदिक
विधानोंको भी समझना चाहिये ।
यदि कहो कि--ऐसे तो बौद्ध-आगमोंके अहिंसा आदि कुछ विषय
भी सभी दर्शनोंके कुछ जनोंके द्वारा अनुष्ठित होते ही हैं, इसलिये वे
भी महाजनपरिगृहीत हों—तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि अहिंसा
आदिके बौद्ध आगमोक्त होनेमें सन्देह है । कारण, क्या अहिंसा आदि
वेदोक्त विषय ही बिडालव्रत-न्यायसे लोगोंमें अपने प्रति श्रद्धा उत्पन्न
करनेके लिये बुद्धदेवाद्दिके द्वारा अपने ग्रन्थमें कहा गया है ? अथवा
स्वयं प्रत्यक्ष करके ही कहा गया है ? यहाँ स्वयं प्रत्यक्ष करके बुद्धदेवने
अहिंसाका प्रतिपादन किया है, यह पक्ष नहीं हो सकता । क्योंकि
जिस क्षपणक आदिके आगमको स्वयं बुद्धदेवने भी अप्रामाणिक माना
है, उसमें भी अहिंसाका प्रतिपादन हुआ है । इससे मालूम पडता है
कि वेदोक्त अहिंसाका तत्त्व बुद्धदेवने स्वयं प्रत्यक्ष नहीं किया है । किन्तु
बेडालव्रतके समान ही क्षपणक आदिकी तरह केवल दिखानेके लिये
उसे अपनाया है । जो तो मण्डलीकरण या केशोल्लुञ्चन आदि
बौद्धादि आगमोंका अपना विशेष विषय है, उसका अनुष्ठान सभी
नहीं करते । वेदमें कहे हुए निषेक (गर्भाधान) आदि तो वेदके

अनुपलब्धवादः ४३५
अपि च वाचकापभ्रंशविभागोऽस्तु न वा, तद्व्यवहार-
स्तावत् सर्वैरेव तीर्थिकैरविगानेन स्वीकृतः । तथा शिक्षा-
ज्योतिषच्छन्दोनिगमनिरुक्ताद्यर्थश्च । तेषां च वेदरक्षैव परमं
प्रयोजनमिति ।
स्यादेतत्, व्याकरणादीनि तावत् सर्वैरभ्युपगतार्थानि, वेदा
अपने विशेष विषय हैं, जिनका सभी महाजन अनुष्ठान करते हैं।
इसप्रकार महाजनद्वारा वैदिक विधानोंका अनुष्ठान होनेसे वेदोंका
सर्वज्ञ-प्रणीत होना सिद्ध होता है ।
एवं वाचकशब्द और अपभ्रंशात्मक शब्दका विभाग भले ही
व्याकरण द्वारा न हो सकता हो, क्योकि “गां गृहाण” इत्यादिमें वाचक-
भूत गो-प्रकृति और अम्-प्रत्यय तथा ग्रह्-प्रकृति एव सिप्-प्रत्यय इनमेंसे
कोई भी नहीं है किन्तु विकार या आदेश बन गया है। लोप स्थलमें
तो मूलशब्दका पता भी नहीं रहता, फिर भी उन स्थलोंमें व्याकरणद्वारा
परिकल्पित प्रकृति-प्रत्यय और आगमादिको व्याकरणद्वारा ही सभी
जानते और “गां गृहाण” आदिका अर्थ समझते हैं। इस प्रकार
व्याकरणका व्यवहार सभी दार्शनिकोंने श्रद्धापूर्वक स्वीकार किया है।
तथा उस सर्व-स्वीकृत व्याकरणने ‘बहुल छन्दसि’ इत्यादि सूत्रोंके द्वारा
“भद्रं कर्णेभि” इत्यादि वेदोक्त पदोंका ही साधन किया है न कि
बौद्धादि-आगमोक्त पदोंका। बल्कि व्याकरणके व्याख्याता महाभाष्य-
कारादिने सौगत आगमोंका अप्रमाण ही प्रतिपादित किया है।
एवं, वेदाङ्गभूत शिक्षा, ज्योतिष, छन्द, निगम और निरुक्तादिद्वारा
कथित अर्थका भी सभी तीर्थिकोंने स्वीकृत किया है। तथा प्रकृति-
प्रत्ययके व्यवहारको बतानेवाले व्याकरण और वेदोक्त अर्थोंको स्फुट
करनेवाले शिक्षादिका भी मुख्य प्रयोजन वेदोंकी रक्षा ही है। अर्थात्
वेदार्थोंका निश्चय करना और उनका अनुष्ठान किया जाना इसी मुख्य
प्रयोजनके उद्देश्यसे पाणिन्यादि मुनियोंने व्याकरण शिक्षा आदिकी
रचना की है। यदि वेद अप्रमाण होते तो उनके अर्थोंके निर्णयार्थ एवं
अनुष्ठानार्थ उन उन शास्त्रोंकी रचना ही मुनिगण नहीं करते ।
अस्तु, व्याकरणादिके विषय सभीके द्वारा स्वीकृत हों, तथा वेदोंका

४३६ आत्मतत्त्वविवेके
अपि तैः पालनीया भवन्तु । त एवेति कुतः ? संसारमोचका-
गमोऽपि तत्पालनीयः किन्न स्यादिति चेत्, न, तत्कर्तृभिस्तथा-
नभ्युपगमात्, अव्युत्पादनात्, असाधारणलिङ्गाभावात्, विरुद्ध-
लिङ्गसद्भावाच्च । न हि वेदशब्दार्थाविव सुगताद्यागमा-
साधारणशब्दार्थाननुरुध्य तेषां प्रवृत्तिर्यत एवमुन्नीयत, प्रत्युत
विरोध एव, तैस्तदप्रामाण्यव्युत्पादनात् । तस्मात् सर्वाभ्युपेत-
व्यवहारव्याकरणादिपालनीयत्वमपि वेदानामेव नान्येषाम् ।
पालन उन व्याकरणादि शास्त्रोंका मुख्य उद्देश्य भी हो, फिर भी वेद ही
उनका पालनीय है, यह कैसे माना जाय ? ससारमोचकादि आगम भी
उनका पालनीय ( उद्देश्य ) क्यों न होगा ?—तो इस प्रकारकी शङ्का
नहीं की जा सकती । क्योंकि व्याकरणादिके रचयिता पाणिनि आदिके
द्वारा ससारमोचकागममे प्रतिपादित शब्द एव अर्थका अभ्युपगम नहीं
किया गया है। क्योंकि उनके द्वारा जैसे वैदिक पदोंका व्युत्पादन
किया गया है, वैसे बौद्धादि आगमोंके पदोंका व्युत्पादन नहीं किया गया
है। क्योंकि व्युत्पादित किये जानेका जो असाधारण लिङ्ग है, वह
उनमें नहीं है । अर्थात् वैसे पद उन आगमोंमे प्रयुक्त होते जो भाषामें
प्रयुक्त नहीं हैं, तब वे पद ही उनके असाधारण लिङ्ग होते और उनका
भी व्युत्पादन व्याकरणादिका उद्देश्य माना जाता, किन्तु वैसा है नहीं ।
बल्कि व्युत्पादनके विरोधी लिङ्ग ही ससारमोचकागमोंमें विद्यमान हैं ।
क्योंकि जैसे वेदमें असाधारण शब्द एव अर्थ हैं, वैसे सौगतादि आगमों
में असाधारण शब्द एव अर्थ नहीं हैं, जिनके अनुरोधसे मुनियोंकी
प्रवृत्ति होती और उनके द्वारा व्युत्पादन किये जानेकी कल्पना की
जाती । बल्कि अनुरोधकी जगह विरोध ही पाया जाता है । क्योंकि
मुनियोंने उन आगमोंके अप्रामाण्यका ही व्युत्पादन किया है । इस
प्रकार सिद्ध होता है कि सर्व स्वीकृत है व्यवहार जिसका, ऐसे व्याकर-
णादिके द्वारा वेदका ही पालन लक्ष्य है न कि सौगतादि आगमोंका ।
यह द्वितीय प्रकारका महाजनपरिगृहीतत्व है ।

अनुपलम्भवादः ४३७
सर्वाभ्युपेतप्रामाण्यैरायुर्वेदादिभिः स्वीकृतश्चैषामर्थः, प्रतिपदं
तदीयशान्तिकपौष्टिकप्रायश्चित्ततपोजपदानहोमाद्युपदेशात् ।
न चैष भागस्तत्राप्रमाणमेव, तुल्ययोगक्षेमत्वात् । एतदेवा-
सिद्धम्, प्रक्षेपस्यापि सम्भवादिति चेत्, न, अध्येतृऽध्यापयितृ-
संप्रदायाविच्छेदात् ।
“अन्यथाकरणे चास्य बहुभ्यः स्यान्निवारणम्”
इति न्यायात् ।
तस्मादेवंरूपोऽपि महाजनपरिग्रहो वेदानामिति । सोऽयमी-
दृशो महाजनपरिग्रहोऽसर्वज्ञपूर्वकत्वेऽसंभवन् सर्वज्ञपूर्वकत्वेन
व्याप्यते ।
एवं, सभीने जिसका प्रामाण्य माना है, ऐसे आयुर्वेदादिके द्वारा
भी वैदिक विषय स्वीकृत किया गया है। क्योंकि पद-पदपर वेदोक्त
शान्तिक, पौष्टिक, प्रायश्चित्त तप, जप, दान और होम आदिका उपदेश
पाया जाता है। यह नहीं हो सकता कि—आयुर्वेदका यह शान्तिक
पौष्टिकादि भाग अप्रमाण ही है—क्योंकि आयुर्वेदके सम्पूर्ण भागों
का समान योगक्षेम है। अर्थात् आयुर्वेदका जैसे औषधवाला भाग
प्रमाण है, वैसे ही शान्तिकादि भाग भी प्रमाण होगा, क्योंकि वह
भी उसीका भाग है। अन्यथा औषधवाला भाग भी प्रमाण नहीं हो
सकेगा।
यदि कहो कि—आयुर्वेदमे शान्तिकादि भाग प्रक्षिप्त हो सकते हैं,
अतः तुल्य योगक्षेमत्व ही असिद्ध है—तो यह नहीं हो सकता है।
क्योंकि उसके पढ़ने और पढ़ानेवालेका सम्प्रदाय कभी टूटा नहीं है,
इसलिये प्रक्षेपकी संभावना ही नहीं है। क्योंकि “अन्यथाकरणे चास्य
बहुभ्यः स्यान्निवारणम्” इस कुमारिलभट्टोक्त न्यायके अनुसार सर्वत्र
प्रक्षेपकी आशङ्का होने लगेगी। और तुम्हारे आगममें भी तुम्हें प्रक्षेप
मानना पड़ जायगा। इसलिये इस तृतीय प्रकारका महाजनपरिग्रह
भी वेदोंमें है। अतः पूर्वोक्त दोनों ही प्रकारके महाजनपरिग्रह वेदोंके

४३८ आत्मतत्त्वविवेके

यथा हि पूर्वविरुद्धपूर्वव्याकरणादिवैद्यकादिषु विगानाद-
परिग्रहः, तथा तथाविधे धर्मशास्त्रेऽपि । व्यामोहाद् भवन्नपि
कस्यचिदेव न तु सर्वेषाम् । अथ पूर्वाविरुद्धं चेत्, तथापि
पूर्वस्य पूर्ववदपरिग्रहे केनचित् परिग्रहे वा कथं तन्मूलस्यान्यस्य
सर्वैः परिग्रहः ?
न च नासीदेव पूर्वं धर्मशास्त्रम्, मानान्तरस्यात्र वस्तुनि

असर्वज्ञ प्रणीत होनेपर असम्भव हैं, इसलिये वेदोंमे सर्वज्ञपूर्वकत्वका
निश्चय होता है।
इसमे तर्क यह है कि जैसे पूर्ववर्ती व्याकरणादिसे विरुद्ध नवीन
व्याकरणादि एव वैद्यक आदिके निन्दित होनेके कारण वे महाजनद्वारा
परिगृहीत नहीं होते, वैसे पूर्वसे विरुद्ध नवीन धर्मशास्त्र भी निन्दित
होनेसे महाजनपरिगृहीत नही होता है। अर्थात् विवादका विषय
वेदरूप धर्मशास्त्र यदि सर्वज्ञपूर्वक (ईश्वरप्रणीत) नहीं होता तो वह
उक्त तीनों ही प्रकारके महाजनपरिग्रहका विषय नहीं होता। जैसे
कि आधुनिक व्याकरण वैद्यक आदि सर्वज्ञपूर्वक नहीं होनेके कारण
महाजनपरिग्रहका विषय भी नहीं होता है।
यदि उस पूर्वविरुद्ध संसारमोचकादि धर्मशास्त्रके प्रति अज्ञानतावश
परिग्रह होता भी है तो किसीको ही होता है न कि सबको। अर्थात्
वेद सभी महाजनोंद्वारा परिगृहीत है, इसलिये वेदका परिग्रह अज्ञान-
पूर्वक नहीं हो सकता है। यदि संसारमोचकादिकोंका या सुगतोंका
धर्मशास्त्र (आगम) पूर्ववर्ती धर्मशास्त्रसे अविरुद्ध हो तो भी उसका वह
पूर्ववर्ती धर्मशास्त्र स्वयं यदि महाजन परिगृहीत न हो या किसी एकके ही
द्वारा परिगृहीत हो तो तन्मूलक सुगतादिका धर्मशास्त्र सबके द्वारा परि-
गृहीत कैसे हो सकेगा ? अर्थात् सौगतोंको भी उस पूर्ववर्ती धर्मशास्त्रको
अवश्य ही महाजनपरिगृहीत मानना होगा। इस प्रकार वह पूर्ववर्ती
धर्मशास्त्र हमारा वेद ही है, जो महाजनपरिगृहीत होनेके कारण सर्वज्ञ
पूर्वक (सर्वज्ञप्रणीत) सिद्ध हो जाता है।
यह नहीं कह सकते कि—वेदरूप कोई पूर्ववर्ती धर्मशास्त्र था ही

कुण्ठतयाऽनुष्ठानाभावप्रसङ्गात् । तथा च धर्माभावे तत्कार्यस्य
सुखस्याप्यभावे रागानुत्पत्तौ लोकसमीहोच्छेदे लोकोच्छेद-
प्रसङ्गः ।
तस्मान्महाजनपरिगृहीतपूर्वपूर्वागमपूर्वकत्वात्, प्रवाहनित्य-
त्वाद् वा, प्रलयविच्छेदे सर्गादौ सर्वानुविधेयपुरुषधौरेयपूर्वकत्वाद्
वा महाजनपरिग्रहो न तु पूर्वागममानपेक्ष्यार्वाचीनपुरूषपशुपूर्वकत्वात्
पूर्वागमप्रामाण्याप्रामाण्ययोरुभयथाऽपि तस्य विप्रलम्भकत्वात् ।
प्रामाण्ये हि तद्विरुद्धाभिधानं विप्रलम्भ एव । अप्रामाण्येऽप्यु-
नहीं—क्योंकि यदि पूर्ववर्ती वेद न होता तो धर्मके विषयमे अर्थात् याग
दानादिकी इष्टसाधनतामे अन्य प्रमाण कुण्ठित हैं, इसलिये धर्मानुष्ठानका
अभाव हो जायगा । ऐसी स्थितिमें धर्मका अभाव होनेपर उससे उत्पन्न
होनेवाले सुखका भी अभाव हो जायगा और सुखके अभावमें उसकी
अनुभूति नहीं होनेके कारण पुन सुखप्राप्तिके प्रति राग नहीं उत्पन्न
होगा तथा रागके अभावमे प्रवृत्ति नहीं होनेसे जगत् निश्चेष्ट हो जायगा
और चेष्टाहीन हो जानेसे पुत्रादिकी उत्पत्ति भी नहीं हो सकेगी । इस
प्रकार जगत्का ही उच्छेद हो जायगा ।
अतः महाजनपरिगृहीत जो पूर्व पूर्व आगम, तत्पूर्वक होनेके कारण
या तत्तद् आगमोंके अनित्य होनेपर भी आगमधाराके नित्य होनेके
कारण अथवा प्रलयके द्वारा आगमधाराका विच्छेद हो जानेपर भी सृष्टि
के आदिमें किसी पुरुषविशेषसे निर्मित होनेके कारण ही कोई आगम
महाजनपरिगृहीत माना जाता है, न कि पूर्व आगमोंकी बिना अपेक्षा
किये आधुनिक-जनद्वारा प्रणीत होनेके कारण कोई भी आगम महाजन
परिगृहीत कहा जाता है । इनमे प्रथम पक्षके अनुसार पूर्व आगम जो
वेद, उसका प्रामाण्य मानकर या अप्रामाण्य मानकर, दोनों ही दशाओंमें
संसारमोचकागमोंका प्रणेता आधुनिक पुरुष विप्रलम्भक ( ठगनेवाला )
ही सिद्ध होता है । क्योंकि पूर्ववर्ती आगम वेदको यदि प्रमाण मानता
है तो उसके विरुद्ध कहना ठगना ही है । यदि उस पूर्ववर्ती आगम
वेदको अप्रमाण मानता है तो, "यागादिक स्वर्गादि सिद्धिका उपाय है" इस

८० आत्मतत्त्वविवेके

पायमविदुषोऽननुष्ठाने तदा ( भाव ) भासानुष्ठाने वाऽसर्वज्ञस्योप-
देशो विप्रलम्भ एवेति ।
तत्र न प्रथमः, वेदपरम्पराऽनुपलम्भात्, अर्वाचीनानां पाठ-
पारतन्त्र्यमात्रेण प्रवाहोपपत्तौ तत्कल्पनायां प्रमाणाभावात् ।
नापि द्वितीयः, वेदह्रासदर्शनात् । यत इदानीमश्रूयमाणस्यापि
बातको नहीं जाननेवाले उस असर्वज्ञ व्यक्तिद्वारा यागादिके अननुष्ठान
का उपदेश देना अथवा मण्डलीकरण केशोल्लुञ्चन प्रभृति सुखके उपाया-
भासोंके अनुष्ठानका उपदेश देना संसारको ठगना ही है । क्योंकि अर्थ-
निर्णय किये बिना ही स्वकपोलकल्पित ऐसा उपदेश दिया गया है ।
अर्थात् उक्तप्रकारका वञ्चनात्मक उपदेश महाजनपरिग्रहका विषय नहीं
हो सकता है ।
महाजनपरिग्रहके प्रति सम्भावित पूर्वोक्त तीन हेतुओंमें प्रथम हेतु
नहीं हो सकता है । क्योंकि पूर्वपूर्वागमपूर्वकत्व-हेतुमें “पूर्वपूर्वागम”
पदसे विजातीय वेदपरम्परा विवक्षित हो तो वैसी वेदपरम्परा प्रत्यक्ष-
प्रमाणसे सिद्ध नहीं है । यदि अनुमानद्वारा वर्तमान वेदके मूलके
रूपमें विजातीय वेदपरम्पराकी कल्पना करो तो यह संभव नहीं है ।
क्योंकि जैसे अर्वाचीन ( वर्तमान ) वेदोंका प्रवाह गुरु-शिष्यके केवल
क्रमिक पाठके द्वारा सजातीय प्रवाह ही चल रहा है, न कि शिष्यद्वारा
पढे जानेवाले वेदका मूल गुरुद्वारा पढा जानेवाला कोई विजातीय वेद
होता है । वैसे ही परम्परागत पाठके द्वारा सजातीय वेद परम्पराको
वर्तमान वेदके मूलके रूपमें कल्पना करना अप्रामाणिक है ।
प्रबाहनित्यत्वरूप द्वितीय पक्ष भी नहीं हो सकता है । अर्थात्
“प्रवाहरूपसे वेद नित्य है, इसलिये यह महाजनपरिगृहीत है” यह
पक्ष भी ठीक नहीं है । क्योंकि वेदका ह्रास देखे जानेसे वेदप्रवाह नित्य
नहीं हो सकता । कारण, जो वेदभाग इस समय उपलब्ध नहीं है,
उसके विषयका भी अनुष्ठान देखा जाता है तथा मनु आदि स्मृतिकारोंने
उस विषयको भी अपनी स्मृतियोंमें निबद्ध किया है । अर्थात् होलाका
( होली ) करनी चाहिये—इसका सूचक वेदभाग यद्यपि अनुपलब्ध है,
फिर भी उसका अनुष्ठान सर्वजन-प्रसिद्ध है । तथा अष्टकनामक याग

अनुपलम्भवादः ४४१
वेदस्यार्थोऽनुष्ठीयते निवध्यते च मन्वादिभिः ।
पुरुषाणामपचीयमानशक्तिकत्वाच्च । यथा ह्यश्वमेधराजसूया-
द्यनुष्ठानशक्तेरपचयस्तथाऽध्ययनशक्तेरपि । न च पूर्वमपि नानु-
ष्ठिता एव राजसूयादयः, तदर्थस्य वेदराशेर्वैयर्थ्यप्रसङ्गात् ।
न च नित्यानुमेयवेदसंभवः, वर्णानां नित्यत्वेऽप्यानुपूर्व्याः
पाठाश्रयत्वात् । न चानुपूर्वीशून्यवर्णाः पदं नाम, न चाका-
वर्तमान वेदमें नहीं मिलता है, फिर भी मनु आदि ऋषियोंने अपनी
स्मृतिमें उसका उल्लेख किया है । इससे सिद्ध होता है कि वेदका वह
भाग उच्छिन्न हो चुका है ।
एव पुरुषोंकी अध्ययनशक्ति क्रमशः क्षीण होती देखी जा रही है,
इससे भी सिद्ध होता है कि वेदका ह्रास संभव है । अर्थात् एक व्यक्ति
वेदकी समस्त शाखाओंका अध्ययन करनेमें असमर्थ है, अतः एकके
समान दूसरेके द्वारा भी किसी शाखाका अध्ययन संभव है । इससे
वैदिक शाखाके उच्छेदकी संभावना सिद्ध होती है । क्योंकि जैसे
बहुद्रव्य-साध्य अश्वमेध-राजसूय आदि यज्ञोंकी अनुष्ठानशक्तिका ह्रास
हो गया है ; यह नहीं कह सकते कि—पूर्वकालमें भी राजसूय आदि-
का अनुष्ठान नहीं ही हुआ था—क्योंकि तब उस विषयका प्रतिपादक
वेदसमुदाय व्यर्थ हो जायगा ।
यह नहीं हो सकता कि—होलाकादि-विषयक वेद कभी भी पाठमें
नहीं आये किन्तु पूर्वकालीन स्मृति और आचारके द्वारा उक्त वेदभाग
का अनुमान करके ही तदनुसार मन्वादि-स्मृति या शिष्टाचार बने हैं ।
अर्थात् मन्वादिस्मृति या आचारका आधार सीधे वेद नहीं हैं किन्तु
तद्विषयक वेदके अनुमापक पूर्वकालीन अन्य स्मृति या आचार ही हैं ।
अतः वेद, नित्यानुमेय हैं तथा शाखा-उच्छेदमे कोई प्रमाण नहीं है—
क्योंकि वर्ण भले ही नित्य हों, किन्तु वर्णोंकी आनुपूर्वी ( गकारोत्तर-
अकारोत्तर-णकारोत्तर-अत्त्वादि ) तो पुरुषाधीन पाठ ( उच्चारण ) के
आश्रित होनेसे अनित्य ही है । क्योंकि आनुपूर्वी रहित वर्ण पद नहीं
कहाता । एवं आकाङ्क्षा-योग्यता-और आसत्तिसे युक्त पदसमूहके अलावे