आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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न च संयुक्तसंयोगादधिष्ठानम् , साक्षादधिष्ठानस्य विव-
क्षितत्वात् । विपापनोदादौ कथमिति¹ चेत्, न, तत्रास्मदादे-
र्ज्ञानमात्रं प्रति यत्नस्याविरोधात् । विपापनोदादौ तु तत्रत्यो
यत्नः क्रियाहेतुरिति ।
सर्गादौ तु न शरीरगन्धोऽपीति सर्वथा कलेवरविगमाद-
कारणतया बुद्धेः सर्वज्ञत्वमनिवायं विश्वेषां कर्तुरेकस्येति ।
“संयुक्त-संयोगसे भी ईश्वर पाषाणान्तर्गत भेकको उत्पन्न करनेवाले
कारकोंका अधिष्ठाता नहीं हो सकता। अर्थात् सूर्यादिरूप ईश्वरीय-
शरीरसे संयुक्त आकाश है तथा उस आकाशसे सयुक्त भेकजनक
कारकचक्र होगा, इसप्रकार परम्परा ईश्वर उन कारकोंका अधिष्ठाता हो
जायगा” यह भी नहीं हो सकता। क्योंकि वस्तुको उत्पन्न करनेके
लिये कारकोंका साक्षात् अधिष्ठाता होना ही अपेक्षित है न कि
परम्परा। यदि पूछो कि—विषादिको हटानेमें गारुडिक दूरसे ही कैसे
अधिष्ठाता हो जाता है?—तो ऐसा नहीं कह सकते। क्योंकि वहाँ
गरुडदेवताके ज्ञानमात्रके प्रति दूरवर्ती हमारे प्रयत्नके कारण होनेमें
कोई विरोध नहीं हैं। अर्थात् वहाँ गारुडिकद्वारा किये गये मन्त्र-
पाठादिसे गरुडदेवताको सर्पद्वारा काटे गये व्यक्तिका ज्ञान हो जाता
है और वह व्यक्ति जी जाता है। अतः दूरवर्ती प्रयत्नसे दूरवर्तीको
ज्ञान होनेमें कोई विरोध नहीं है। किन्तु विष उतरनेका जहाँ तक
प्रश्न है, वहाँ तो मन्त्रादिपाठके सहकारी अथवा मन्त्रादिपाठसे अदृष्ट-
के सहकारी किसी अन्यका अर्थात् ईश्वरका ही प्रयत्न, जो विषावतरण
स्थलमे ही है, विषके उतरनेका हेतु है।
किन्तु सृष्टिके पूर्वमे तो सूर्यादिशरीरकी गन्ध भी नहीं हे कि ईश्वर
उसकेद्वारा भी अधिष्ठाता होकर सृष्टि कर सकेगा। इसलिये सर्वथा
ही शरीररहित होनेके कारण ईश्वरीयज्ञान किसी हेतुसे उत्पन्न हुआ
नहीं सिद्ध होता, अतः विश्वके कर्ता ईश्वरका सर्वज्ञ होना अनिवार्य है।
अर्थात् ईश्वर विना शरीरके ही अधिष्ठाता है, यह बात सिद्ध हो जाती
है। तथा उसमें ज्ञानका कारण शरीर नहीं होनेसे शरीरके अधीन
१ 'शरीरस्य दूरस्थत्वादिति भावः' इति कलिकातामुद्रिते टिप्पणी ।