आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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न च दविष्ठ एव सूर्यादिस्तत् कुर्यादिति साम्प्रतम्,
कारकानधिष्ठानात्, शरीरस्य तदायतनतया प्रयत्नस्याव्या-
पकत्वात् । तथापि व्यापकत्वे त्वसमवायिकारणानुरोधेना-
कारणकतया तदेव नित्यत्वम् ।
न चोद्देशमात्रसम्बन्धेन क्रियाहेतुत्वम्, अस्मदादिप्रयत्न-
स्यापि तथाभावप्रसङ्गात् ।
यह भी नहीं कह सकते कि—ईश्वरीय-शरीरको पाषाणाभ्यन्तर
प्रवेशकी आवश्यकता नहीं है किन्तु अतिदूरवर्ती सूर्यादि शरीरसे ही
वह पाषाण मध्यवर्ती मेढक आदिको उत्पन्न करेगा—क्योंकि तब वह
मेढकको उत्पन्न करनेवाले कारकोंका अधिष्ठाता नहीं हो सकेगा।
अर्थात् उनमें व्यापारका आधान नहीं कर सकेगा। क्योंकि उन कारकों
का स्थान वह मेढक शरीर है, तथा ईश्वरीय प्रयत्नका स्थान दूरवर्ती
सूर्यादिका शरीर होनेसे ईश्वरीय प्रयत्न अव्यापक है। अर्थात् मेढक-
शरीरको उत्पन्न करनेवाले कारकों तक ईश्वरीय प्रयत्नके नहीं पहुँच
सकनेके कारण सूर्यादिशरीरगत ईश्वरीय प्रयत्नसे पाषाणान्तर्गत कारकों
में व्यापार नहीं हो सकेगा तथा व्यापारके अभावमें पाषाणके भीतर
मेढकशरीरकी उत्पत्ति नहीं हो सकेगी।
तथापि यदि ईश्वरीय प्रयत्नको व्यापक मानो अर्थात् सूर्यपदसे
नित्य एव व्यापक प्रयत्नोंसे युक्त ईश्वर ही लो—तो व्यापक होनेके कारण
उस ईश्वरीय प्रयत्नके प्रति कोई (द्रव्यसंयोग) असमवायिकारण
अपेक्षित नहीं होगा। अतः असमवायिकारणके अभावमें सर्वथा कारण
रहित होनेके कारण ही ईश्वरका प्रयत्नादि नित्य सिद्ध हो जाता है।
ऐसा नहीं हो सकता कि—सूर्यादिरूप ईश्वरीय शरीरके दूरवर्ती
होनेपर भी केवल इच्छाका विषय होनेके कारण ही अव्यापक भी
ईश्वरीय प्रयत्न पाषाणान्तर्गत मेढकको उत्पन्न करनेवाले कारकोंमें क्रिया
उत्पन्न कर देगा—क्योंकि यदि ऐसा हो तो हमारा भी प्रयत्न इच्छामात्र
से दूरवर्ती कारकोंमे क्रिया उत्पन्न करने लगेगा। अर्थात् इच्छामात्रसे
दूरवर्ती कुम्भकार भी चक्रादि चलाकर घट उत्पन्न करने लग जायेगा,
जो प्रत्यक्षबाधित है।